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ब्लॉग पोस्ट (22)

  • ''हम सब के सरदार''

    नमन्,जय सरदार ''यदि अंग्रेज सरकार ने हमें स्वतंत्र न किया तो हम जबरदस्ती सत्ता छीन लेंगे'' | सरदार पटेल सन 1945 सरदार बनना तो हर कोई चाहेगा, क्या सरदार बनना आसान है, जो सरदार बनाना चाहते हैं उसे सबसे पहले सच्चा सैनिक एवं देश भक्त बनना होगा जैसा कि सरदार वल्लभ भाई पटेल सच्चे देशभक्त एवं लौह पुरुष थे गांधीजी के सच्चे अनुयायी एवं गांधीवादी थे | इसी तरह एक दिन वह सिपाही से सरदार बन गए वे सिर्फ बने ही नहीं बल्कि लोगों ने उन्हें अपना सरदार मान लिया था | बापू के चले जाने के बाद सरदार वल्लभ भाई पटेल और जवाहर नेहरू की जोड़ी थी जिसने हिंदुस्तान को सँभाला और आज भी उनके बताए हुए मार्गों पर हम चल रहे हैं यह दोनों बापू की दो आंखे थे | (1) इंदोर में, सरदार के पिता | ऐसा नहीं कि वल्लभ भाई पटेल ही सरदार थे बल्कि उनके पिता भी सरदारों से कम नहीं थे उनके द्वारा भी ब्रिटिश सरकार के खिलाफ़ बगावत की गई और उनको 1857 में भी बंदी बनाया गया कारागार में डाला गया | जैसा कि लेखक श्री सोम भाई भावसार एवं श्री काशी नाथ त्रिपाठी (1951) के अतिरिक्त प्रसिद्ध लेखक शर्मा बी ए अपनी पुस्तक 1946 प्रकाशित पुस्तक ''सरदार पटेल'' में उल्लेख करते हैं कि सरदार के पिता साधारण परिवार एवं किसान परिवार से थे | इसके साथ-साथ वह देशभक्त भी थे, 1857 में जब हिंदुस्तान के समस्त देशभक्त तात्या, टोपे एवं झांसी की रानी के साथ दे रहे थे, इसी समय सरदार जी के पिता झेबर भाई भी अपना हल लेकर पेशवाओं की सेना में शामिल हुए | कई मोर्चों पर उन्होंने लड़ाई लड़ी बाद में उनको बंदी बनाकर इंदौर के राजा मल्हार राव होल्कर ने उनको कैदी बनाकर अपने राजभवन में कैद कर लिया ऐसा कहा जाता है कि एक दिन उनकी मुलाकात इंदौर रियासत के शासक मल्हार राव होल्कर से, उस दौरान हुई जब वे शतरंज खेल रहे थे और शतरंज में उनकी हार होने लगी थी तभी वह से निकलते समय ,झाबेरभाई पटेल ने उनको चाल बदलने के लिए कहा, उनका कहना मानकर मल्हार राव ने शतरंज की चाल चली और वे जीत गए इससे खुश होकर मल्हार राव ने उनको रिहा कर दिया ,वह अपने घर करमसद गांव चले गए | ( 2 ) सरदार का जन्म एवं उनके बचपन के किस्से | सरदार पटेल का जन्म गुजरात के खेडा जिले में चलोतरण नाम का एक इलाका है इसमें करमसद गांव आता है इसी में 31 अक्तूबर 1875 कुछ जन्म हुआ था, और इनकी शिक्षा बड़ौदा की एक पाठशाला से प्रारंभ हुई सरदार पटेल बचपन से ही लगता है आंदोलनकारी थे और गलत कार्यों का विरोध करते थे जैसा कि एक उदाहरण से स्पष्ट होता है | सरदार पटेल जब स्कूल जाया करते थे तब एक शिक्षक , छात्रों के लिए निजी लाभ हेतु ऊंचे दामों पर स्कूल सामग्री बेचा करता था अर्थात व्यापार करता था और उन्होंने ये नहीं बना दिया था कि सभी छात्रों को उनकी दुकान से ही सामग्री खरीदनी होगी सुन्नी की दुकान से कागज उन्हीं की दुकान से रबड़ उन्हीं की दुकान से नोटबुक उनकी दुकान से किताब उन्हीं की दुकान से आदि आदि | एक बार देखा कि सरदार के हाथ में दूसरी पेंसिल एवं कागज है इसे देखकर शिक्षक भड़क गए और कहने लगे कि क्या तो मैं अपनी पाठशाला का नियम मालूम नहीं है, सरदार जी ने कहा नियम मालूम है, यह नियम पाठशाला का नहीं है बल्कि आपका है और यह कहकर सरदार पटेल स्कूल से बाहर निकल गए उनके साथ अन्य बालक भी थे पाठशाला लगभग 3-4 दिन बंद रही आखिरकार शिक्षक को अपनी सामग्री स्कूल में बेचना बंद करनी पड़ी | सरदार पटेल का स्कूल की एक घटना और बताना चाहता हूँ कि वडोदरा की पाठशाला में सरदार पटेल ने संस्कृत छोड़कर गुजराती सीखने का निश्चय किया और वह गुजराती शिक्षक के पास पहुंचे और उनसे कहने लगे कि मैं संस्कृत छोड़कर गुजराती सीखना चाहता हूँ | इस पर शिक्षक ने नाराजगी व्यक्त की और उनको बेंच पर खड़ा कर दिया, बाद में शिक्षक ने सदर को एक से 10 तक के पहाड़े लिए खिलाने के लिए कहा गया परन्तु सरदार ने जानबूझकर शिक्षक के इस आदेश को इसलिए मना किया कि वह उनको प्रताड़ित करना चाह रहा था इसलिए उन्होंने पहाड़ी नहीं लिखें और शिक्षकों से प्रतिदिन पहाड़े की पूछता था 1 दिन शिक्षक ने बालक सरदार पटेल को हेडमास्टर के सामने पेश कर दिया , सरदार ने हेडमास्टर से कहा कि शिक्षक कम से इसलिए नाराज हैं क्योंकि मैं संस्कृति छोड़कर गुजराती सीख रहा हूँ और मैं कक्षा सातवीं का छात्र इनके द्वारा मुझे पहाड़े लिखने के नाम पर प्रताड़ित किया जा रहा है बालक सरदार पटेल का इस प्रकार का साहस जीवन भर उनके साथ रहा इसलिए उनको लोह पुरुष एवं भारत का सरदार कहते हैं (3 ) कार्य के प्रति इमानदार /समय के पाबन्द | सरदार पटेल बचपन से ही संघर्षशील एवं साहसी बुद्धिमान व्यक्तित्व के धनी थे इसलिए मैट्रिक परीक्षा पास कर सरदार पटेल विधि (वकालत) की पढ़ाई करने के लिए विदेश जाना चाहते थे लेकिन उनके पास धन का अभाव था, किसी ने उनको सलाह दी कि ''ईदर के राजा'' पढ़ाई के लिए धन देते हैं परन्तु यंहा से भी को यहाँ से भी मदद नहीं मिली , परन्तु उन्होंने साहस नहीं खोया और अपने जिले में ही वकालत सीखकर\पडकर कुछ काम करने लगे, बाद में धन एकत्रित होने के पश्चात आप पढ़ाई के लिए बिलायत चले गए विदेश से वापस आकर उन्होंने अहमदाबाद में वकालत चालू कर दी | जबकि उनके बड़े भाई बिट्ठल भी मुंबई में वकालत करते थे उनके पास नहीं गए और उन्होंने अपने दम पर ही वकालत का कार्य स्थापित करने का निश्चय किया सरदार पटेल अपने कार्य के प्रति बहुत ईमानदार और सजग थे एक दिन न्यायालय में पैरवी करते समय उनको एक संदेश प्राप्त हुआ कि उनकी पत्नी का प्लेग से स्वर्गवास हो गया है जब सरदार की उम्र केवल 33 वर्ष की थी परन्तु उन्होंने पैरवी करना बंद नहीं किया, और न्यायालय की छुट्टी होने के बाद वह अपने घर पहुँचे थे | (4 ) युवा सरदार ने, अंग्रेजी कलेक्टर को दिखाई औकात | सरदार पटेल कभी भी लालच में नहीं आते थे, सर जब वकालत किया करती थी, उसी समय मैं गुलाब राजा नाम का एक प्रसिद्ध डाकू था और उसी समय ''वुड'' नाम का एक अंग्रेज कलेक्टर उसको पकड़ना चाहता था जब यह खबर डाकू को लगी तो डाकू उसके घर ही पहुँच गया और अंग्रेज कलेक्टर को धमकाने लगा कि तुम मुझे पकड़कर बताओ कलेक्टर डाकू के सामने घबरा का टकटकी से देखता रहा और डाकू गुलाब रानी ने कहा कि मैं चाहूं तुम अभी जान से मार सकता हूँ परन्तु मैं तुम्हें नहीं मारूंगा और यह कह कर वे चला गया | कलेक्टर वुड गुस्से से तिलमिला रहा था और वे डाकू को पकड़ना चाहता था जिससे की पकड़ कर उसको फांसी देकर अपने अपमान का बदला ले सके, बोर्ड को ये खबर लगी कि डाकू गुलाब , सरदार पटेल से मिलने के लिए आय करता है और सरदार पटेल ही उसकी तरफ से न्यायालय में पैरवी करता है, कलेक्टर ने सरदार पटेल को एक पुलिस अधिकारी भेजकर यह संदेश दिया गया, यदि मैं गुलाब को पकड़वाने में उनकी मदद करेंगे तब उनको बहुत बड़ा इनाम दिया जाएगा और ऊंचे पद पर जगह दी जाएगी पुलिस अधिकारी ने सरदार पटेल के पास जाकर सारी आखिर सुनाई परन्तु सरदार पटेल ने कहा कि मैं अपने कार के प्रति ईमानदार हूँ गुलाब की मैं पैर भी करता हूँ और उसके साथ में विश्वासघात नहीं कर सकता और पुलिस अधिकारियों कहा कि जाओ अपने साहब को यह बता दूँ कि मुझे किसी का डर नहीं है क्योंकि मैं भी कानून जानता हूँ (5 ) गाँधी जी से पहली मुलाकात ,बनाया गुरु सरदार पटेल की मुलाकात महात्मा गांधी से उस समय हुई, जब वे अहमदाबाद के गुजरात क्लब में बैठे बैठे ताश खेल रहे थे किसी ने उनसे कहा कि सरदार चलिए महात्मा गाँधी महापुरुष है | वे कुछ उद्बोधन दे रहे हैं आप भी चलिए, परन्तु सरदार ने जाने से मना कर दिया और कहने लगे कि यह केवल ब्रह्मचर्य के बारे में कहेंगे जिसे मैं जानता हूँ और ये भी कहेंगे कि सादा जीवन जीओ यह भी जानता हूँ | उस समय सरदार गाँधीजी का मजाक उड़ाया करते थे लेकिन बाद में लगभग सन 1915 मैं गाँधी से मुलाकात हुई लेकिन धीरे धीरे जैसे देसी गाँधी के विचारों को उन्होंने पढ़ा वैसे वैसे गांधीजी के नजदीक आने लगे थे | होमरूल आंदोलन मैं गांधीजी के कार्यों से सरदार पटेल बहुत प्रभावित हुए बाद में जब गांधीजी के द्वारा गुजरात में खेड़ा मैं किसानों के लिए आंदोलन चलाया जा रहा था इस आंदोलन को और अधिक गति देने के लिए एक कुशल व्यक्ति की आवश्यकता गांधीजी के लिए थी गांधीजी ने पहली बार सरदार पटेल के लिए चुना और खेड़ा आंदोलन में अपने साथ रखा गांधीजी के विश्वास के अनुसार सरदार पटेल ने बहुत बढ़िया काम किया गाँधीजी इससे बेहद खुद एवं प्रभावित थे और गांधीजी के लिए सरदार की शक्ति को पता चला और मरते दम तक सरदार गांधीजी के साथ रहे , इस समय सरकार ने गाँधीजी को अपना राज नैतिक गुरु मान लिया | (6 )गुरु के आदेश पर अपनाई देसी वेषभूषा | जैसा कि हम सब जानते हैं गांधीजी ने शर्ट पेंट आई आदि विदेशी वेषभूषा को त्यागकर देश भी सुझाव को अपनाया था वैसे ही सरदार वल्लभ भाई पटेल ने जब गोधरा के परिषद में एक बैठक में जा रहे थे तब उन्होंने विदेशी बीज मूसा को त्याग कर देसी वेषभूषा धोती कुर्ता को पहनकर पहुंचे यह सब देखकर सब चकित रह गए क्योंकि उन्होंने इसके पहले कभी भी सरदार पटेल को धोती कुर्ता में नहीं देखा था इस बैठक के बाद हमेशा उन्होंने भारतीय वेशभूषा को धारण किया और लोगों को भी यह संदेश दिया कि भारतीय वेशभूषा पहनकर भारतीयों में आत्मसम्मान एवं देश के प्रति सम्मान प्रकट करें उनका यह संदेश भी था कि देसी वेषभूषा से स्थानीय कारीगरों को बड़े पैमाने पर रोजगार मिल सकता है जिससे कि वह आत्मनिर्भर बनेंगे और अंग्रेजों से लड़ने के लिए सक्षम होंगे | सरदार पटेल ने गोधरा की राजनीतिक कॉन्फ्रेंस को भी संबोधित किया था और उन्होंने गुजरात में उस समय बेगारी की परंपरा को प्रथा को बंद करने के लिए कई कार्यक्रम चलाए थे इस प्रकार सरदार पटेल सामाजिक क्षेत्र में भी कार्य कर रहे थे जिससे की दवे एवं कुचले लोगों का सुधार तथा पुनर्वास किया जाए | ( 7 ) न्यायाधीश के विरुद्ध, सरदार का सत्याग्रह 1923 | नागपुर में एक अंग्रेजी न्यायाधीश ने एक अजीब फरमान निकाला कि कोई भी सड़कों पर राष्ट्रीय झंडा लेकर नहीं निकलेगा कांग्रेस ने इस न्यायाधीश के फरमान का विरोध किया इस विरोध में वर्धा की सेठ जमनालाल बजाज ने भी सत्याग्रह शुरू कर दिया सरकार ने जमनालाल बजाज गिरफ्तार कर लिया जमनालाल बजाज के स्थान पर उनकी कमान सरदार बल्लभ भाई पटेल संभाली थी सरदार पटेल गाँधीजी के आदेश पर तुरंत नागपुर पहुंचे और उन्होंने वहाँ लोगों को संबोधित कर कहा कि देखिए सोचिए समझिए ''देश हमारा, जमीन हमारी, झंडा हमारा, फिर क्या ऐसी वजह है कि हम उसे लेकर सड़कों पर नहीं चल सकते'' सरदार पटेल के भाषण से वहाँ के लोगों ऊर्जा एवं शक्ति का संचार हुआ और लोगों के द्वारा उसी स्थान से झंडा रैलियां निकालने लगे जिससे स्थान पर अंग्रेजी न्यायाधीश ने झंडा रैली निकालने से मना किया था , लोग गिरफ्तार किए जाने लगा जगह जगह गिरफ्तारियां होने लगी इस गिरफ्तारी से पूरे देश में लोगों की नाराजगी का सामना अंग्रेजों को करना पड़ा, इसके साथ साथ लोग उत्साहित होने लगी लगातार गिरफ्तारियां होने के कारण सरकार थक गई और सरकार को सरदार पटेल से समझौता करना पड़ा जमना लाल बजाज को रिहा करना पड़ा इस प्रकार सरदार पटेल ने अंग्रेज सरकार को झुकाकर अपनी प्रतिभा को और अधिक लोगों के सामने लाने का कार्य किया (8 )गांधीजी के असहयोग आन्दोलन में सरदार की भूमिका1920 | गांधीजी ने अंग्रेजों के खिलाफ़ उनकी नीतियों के विरोध में मैं कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में अहिंसात्मक तरीके से अंग्रेजों की नीतियों का विरोध करने का संकल्प लिया था इसमें कौंसिल कॉलेज स्कूल अदालतें आदि का बहिष्कार करने का संकल्प लिया गया था गाँधी के आदेश पर वकीलों ने भी अपनी प्रैक्टिस को बंद कर दिया था पूरा सरकारी कर्मचारियों त्यागपत्र दे दिए थे मोती लाल नेहरू, देशबंधु ,सरदार वल्लभ भाई पटेल ,राजेन्द्र प्रसाद, राजगोपालाचार्य ,इन सभी ख्याति प्राप्त वकीलों ने लाखों रुपये की फीस को लात मार कर गाँधीजी का साथ दिया था गांधीजी के गिरफ्तार होने के बाद गाँधी के कार्यों को सरदार ने आगे बढ़ाया ( 9 ) बारडोली सत्याग्रह ने बनाया ''हिंदुस्तान का सरदार'' 1922 | बिना किसी जांच पड़ताल के अंग्रेज सरकार ने अपनी मर्जी से इस क्षेत्र के किसानों पर अतिरिक्त लगान लगाया साथ उसने सोचा था कि धन मान लोग पढ़े लिखे होते है, इसलिए वह विरोध नहीं करते, व्यापारी होशियार होते हैं इसलिए वह भी पार पा लेते हैं पर किसान तो अनपढ़ और बेजुबान है बे भला सरकार का क्या कर लेंगे | परन्तु बारदोली की किसान चुप नहीं बैठे और वह सरदार पटेल के पास पहुँच गए उनको सारी बात सुनकर अपना दुख और पीड़ा प्रकट की थी ,सरदार पटेल ने गांधीजी के सत्याग्रह का पालन कर किसानों को एकत्रित किया और अंग्रेजों से लड़ने के लिए एकत्रित हुई, सरदार ने किसानों की पीड़ा अंग्रेज सरकार तक पहुंचाई लगातार आंदोलन चले, किसानों के जानवर, किसानों की जायजा, किसानों की खेती, किसानों के घर जब्त कर लिए और किसानों को जेल में डाले जाने लगा, किसानों में फूट डालने का भी अंग्रेजी सरकार ने षड्यंत्र किया परन्तु सरदार पटेल की चतुराई से वे अपने संयंत्र में सफल नहीं हुए, बाद में अंगेजो आन्दोलन दबाने के लिये पठानों की भर्ती की गई इस प्रकार फूट डालो राज़ करो की नीती को अंग्रेजों के द्वारा उन्हें अपनाया जा रहा था आखिरकार सरदार से अंग्रेजों को समझौता करना पड़ा और किसानों को न्याय मिला बारदोली आंदोलन से सरदार वल्लभ भाई पटेल की ख्याति सारे देश में फैल गई थी, मैं मशहूर हो गए थे अब वह केवल गुजरात के साधारण नहीं थे, बल्कि हिंदुस्तान के सरदार बन चूके थे | सरदार भी गांधीजी के जैसे ही अंग्रेजों की आँखों में खटकने लगे थे इसलिए के सत्याग्रह में सरदार पटेल को तीन माह तक जेल में बंद रहना पड़ा बाद में सरदार पटेल को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का सभापति भी नियुक्त किया यह उनके लिए बहुत बड़ी उपलब्धि थी, क्योंकि गांधीजी के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का सभापति होने का गौरव गुजरात से सरदार पटेल को ही प्राप्त हुआ था बारदोली आंदोलन के बाद महात्मा गाँधी ने ही सदा वल्लभ भाई पटेल को सरदार की उपाधि से सम्मानित किया था (10 ) अंग्रेज सरकार के मूंड-कर का विरोध 1923 | बोरसद में अंग्रेज सरकार ने मूड कर लगाया था इसका अर्थ यह होता कि जिसके घर में जिंस परिवार में जितनी सदस्य उतनी पर कर लगेगा सरकार यह भी जानती थी की बोरसद क्षेत्र में डाकू और लुटेरे का आतंक है इन के द्वारा वहाँ की जनता को बहुत अधिक सताया जाता है मुझे यह डाकू लुटेरे लूटपाट करते हैं वह पहले से ही आर्थिक रूप से कमजोर है दुखी है इसके बाद भी परिवार के प्रत्येक सदस्य पर कर लगाना अत्याचार था इसका विरोध करने के लिए सरदार वल्लभ भाई पटेल बोरसल क्षेत्र में पहुंचे और अंग्रेजों के इस नीति का विरोध किया | सरदार पटेल ने बोरसद की जनता से यह कह दिया कि किसी भी प्रकार का कर देने की आवश्यकता नहीं है, पटेल ने सत्याग्रह किया लोगों को जागरूक किया, लोगों की गिरफ्तारियां हूँ लेकिन बाद में नागपुर के जैसे ही सरदार पटेल को विजय प्राप्त हुई और सरकार ने अपनी गलती मानकर बोरसद के लोगों पर लगाया गया ''मूड कर'' को वापस कर लिया | (11 ) न्यायाधीश के विरुद्ध, सरदार का सत्याग्रह 1923 | नागपुर में एक अंग्रेजी न्यायाधीश ने एक अजीब फरमान निकाला कि कोई भी सड़कों पर राष्ट्रीय झंडा लेकर नहीं निकलेगा कांग्रेस ने इस न्यायाधीश के फरमान का विरोध किया इस विरोध में वर्धा की सेठ जमना लाल बजाज ने भी सत्याग्रह शुरू कर दिया सरकार ने जमना लाल बजाज गिरफ्तार कर लिया जमना लाल बजाज के स्थान पर उनकी कमान सरदार वल्लभ भाई पटेल संभाली थी सरदार पटेल ने गाँधीजी के आदेश पर तुरंत नागपुर पहुंचे और उन्होंने वहाँ लोगों को संबोधित कर कहा कि देखिए सोचिए समझिए ''देश हमारा, जमीन हमारी, झंडा हमारा, फिर क्या ऐसी वजह है कि हम उसे लेकर सड़कों पर नहीं चल सकते'' सरदार पटेल के भाषण से वहाँ के लोगों ऊर्जा एवं शक्ति का संचार हुआ और लोगों के द्वारा उसी स्थान से झंडा रैलियां निकालने लगे जिससे स्थान पर अंग्रेजी न्यायाधीश ने झंडा रैली निकालने से मना किया था , लोग गिरफ्तार किए जाने लगा जगह जगह गिरफ्तारियां होने लगी इस गिरफ्तारी से पूरे देश में लोगों की नाराजगी का सामना अंग्रेजों को करना पड़ा, इसके साथ साथ लोग उत्साहित होने लगी लगातार गिरफ्तारियां होने के कारण सरकार थक गई और सरकार को सरदार पटेल से समझौता करना पड़ा जमना लाल बजाज को रिहा करना पड़ा इस प्रकार सरदार पटेल ने अंग्रेज सरकार को झुकाकर अपनी प्रतिभा को और अधिक लोगों के सामने लाने का कार्य किया | (12 ) नेहरू जी के साथ सरदार 19 29 मैं लाहौर कांग्रेस अधिवेशन आयोजित किया गया इसकी अध्यक्ष पंडित जवाहरलाल नेहरू कर रहे थे इस अधिवेशन में कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज की मांग की एम इसके लिए आंदोलन चलाएं अप्रैल 1930 को सप्ताह ग्रह प्रारंभ हुआ सबरमती आश्रम से गाँधी जी ने दांडी मार्च निकाल कर अंग्रेजों द्वारा लगाए जा रहे करों का ग्रोथ किया गाँधीजी केस आर्थिक रूप में सरदार वल्लभ भाई पटेल आगे आगे चल रहे थे और लोगों को जागरूक कर रहे थे अगर इस सरकार ने सरदार पटेल को गिरफ्तार कर लिया परंतु बाद में जून 1930 उनको रिहा कर दिया | इसके बाद 1931 में पाकिस्तान के कराची में कांग्रेस अधिवेशन हुआ सरदार पटेल को इसका प्रधान चुना गया इस अधिवेशन में लोगों के द्वारा गाँधीजी एवं सरदार पटेल को काले झंडे दिखाए गए क्योंकि सरदार भगत सिंह, राजगुरु, एवं सुखदेव, को कुछ ही दिनों पहले फांसी हुई थी इससे कई भारतीय नाराज थे परन्तु सरदार वल्लभ भाई पटेल ने देर पूर्वक विद्रोह को शांत किया और अहिंसा के रास्ते पर चलने की सलाह दी गाँधी की विचारधारा को मानने के लिए प्रेरित किया | 14) गोलमैज कांफ्रेंस की असफलता सरदार का जेल जाना | गाँधीजी लंदन में गोलमेज सम्मेलन में शामिल होने के लिए लंदन गए हुए थे, परंतु असफल होने के बाद वापस आए और उन्होंने पुनः सत्याग्रह का बिगुल फूंक दिया और सारे भारतवर्ष में फिर से आंदोलन होने लगी वही है, कांग्रेस के नेताओं की गिरफ्तारी होने लगी कांग्रेस को सरकार ने गैरकानूनी घोषित कर दिया इस समय सरदार पटेल कांग्रेस के प्रधान थे इसी वजह से उनको भी पकड़ लिया गया बाद में किसी विशेष कारणों से आंदोलन स्थगित कर दिया गया, परन्तु सरदार पटेल को जेल में डाल दिया था जिसके कारण उनका स्वास्थ्य बिगड़ता जा रहा था इस वजह से उनको 1934 मैं रिहा कर दिया गया (15 ) सरदार ने किया , आठ राज्यों में मंत्र परिषद का गठन 1935 मैं सरकार ने प्रांतों में नए चुनाव की घोषणा कर दी कांग्रेस ने चुनाव लड़ने का निर्णय लिया गया, और कांग्रेस को आठ प्रांतों में मंत्रिमंडल बनाने का अधिकार प्राप्त हुआ | परंतु कांग्रेस ने मंत्रिमंडल इसलिए नहीं बनाया क्योंकि बेए चाहती थी कि ब्रिटिश गवर्नर मंत्रिमंडलों के कामों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे इस कारण कांग्रेस और अंग्रेज सरकार के बीच में उनके बाद होने लगा अंत में ''अंग्रेज बाईसराय'' ने यह विश्वास दिलाया कि सरकारों को स्वतंत्रता पूर्वक कार्य करने का अधिकार दिया जाएगा इस प्रकार कांग्रेस ने आठ प्रांतों में मंत्रिमंडल बनाकर स्वतंत्रता पूर्वक कार्य करने का निर्णय लिया सरदार पटेल के नेतृत्व में आठ राज्यों में मंत्रिमंडल गठन करने का दायित्व सौंपा और उस मंत्रिमंडल पर किस प्रकार नियंत्रण एवं अनुशासन रखा जाए यह कार्य भी सरदार वल्लभ भाई को सोंपा गया सरदार पटेल के अनुशासन एवं नियंत्रण दो वर्षों तक आठ राज्यों में मंत्रिमंडल ने स्वतंत्रता पूर्वक कार्य किया परन्तु यूपी के गवर्नर ने राजनीतिक बन्दियों की रिहाई के पृष्ठ पर हस्तक्षेप करना प्रारम्भ कर दिया फिर क्या था सरदार पटेल ने कांग्रेस मंत्रिमंडल को त्यागपत्र दिलवा दिया इस प्रकार अंग्रेज सरकार और कांग्रेस मंत्रिमंडल में एक बार पुनः विवाद स्थापित हो गया द्वितीय विश्व युद्ध एवं सरदार के निर्णय | सन 1939 मैं दूसरा महायुद्ध छिड़ गया और अंग्रेजों ने जनतंत्र और स्वतंत्रता के नाम पर भारत के नेता एवं जनता की सलाह लिए बिना ही दूसरे युद्ध में भारत को झोंक दिया था कांग्रेस ने इसका विरोध किया और ज्ञापन दिया कि अंग्रेज वास्तव में जनतंत्र पिछले राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं तब उनके लिए भारत को स्वतन्त्र कर देना चाहिए इस मांग को पूरा करने के लिए सन 1940 गांधीजी ने व्यक्तिगत सत्याग्रह प्रारंभ कर दिया इस सप्ताह गृह में घोषणा की गई कि हिंदुस्तान को अंग्रेज की कोई सहायता नहीं करनी चाहिए कांग्रेस मंत्रिमंडल तो पहले ही त्यागपत्र दे चुका था गांधीजी के करीब माने जाने वाले सरदार पटेल ने इस सप्ताह ग्रह का नेतृत्व किया था इसलिए उनको भी जेल जाना पड़ा (16) अहमद नगर की जेल में रहे सरदार | व्यक्तिगत सत्याग्रह विशेष रूप से प्रभावशाली आंदोलन नहीं बन सका इस पर सन 1942 में कांग्रेस ने महात्मा गाँधी के नेतृत्व में अंतिम आंदोलन शुरू कर दिया 8 अगस्त 1942 को मुंबई में ऑल इंडिया कांग्रेस कामेटी का बम्बई में अधिवेशन हुआ इसमें निर्णय लिया गया कि अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए दबाव बनाया जाएगा और भारत छोड़ो आंदोलन के नाम से मुहिम चलाई जाएगी इस प्रस्ताव मैं अंग्रेजी सरकार से मांग की गई थी कि वह भारत से अपना बिस्तर बांध कर चले जाए अगले ही दिन नौकरशाही ने महात्मा गाँधी और कांग्रेस वर्किंग कमेटी के समस्त सदस्यों को पकड़कर गिरफ्तार कर लिया | महात्मा गाँधी के लिए पुणे के आगा खां महल में रखा गया परन्तु वर्किंग कमिटी के सदस्यों को अहमदनगर फोर्ट मैं बंद कर दिया सरदार पटेल भी इसी फूड में बंद रहे नेताओं के गिरफ्तार होते ही हिंदुस्तान भर में क्रान्ति की ज्वाला फूट पड़ी जनता ने गांधीजी की अहिंसा को भूलकर मजबूरी बस कुछ ऐसे रास्ते अपनाए जिनको हमेशा गाँधी ने नहीं अपनाया | सितारा और बलियां जैसे स्थानों में तो जनता ने अपना स्वतंत्र राज्य भी स्थापित कर लिया था लोगों ने रेलवे उखाड़ फेंकी थानों में आग लगा दी, तारों को काट दिया, अंग्रेजों ने भी इसको दवाने में क्रूरता का सहारा लिया और यह आंदोलन कांग्रेस का अंतिम आंदोलन था | ( 17 ) अंतरिम सरकार में सरदार गृहमंत्री | सन 1945 मैं श्री भूलाभाई देसाई के प्रयास से कांग्रेस नेताओं को रिहा किया गया एवं राजनीतिक उलझन को समझने के लिए भारत के अंग्रेज वायसराय मि वेवल ने शिमला में भारत के सभी राजनीतिक नेताओं का एक सम्मेलन बुलाया इस सम्मेलन में कांग्रेस, विवादों को समाप्त करने के लिए मुसलमानों को हिंदुओं के बराबर अधिकार देने को तैयार थी | फिर भी उसका मुस्लिम लीग से कोई समझौता नहीं हो सका और शिमला सम्मेलन असफल हो गया इस पर सरदार पटेल ने बड़े कड़े शब्दों में अंग्रेज सरकार को चेतावनी दी और कहा यदि अंग्रेज सरकार ने हमें स्वतंत्र न किया तो हम जबरदस्ती सत्ता छीन लेंगे | सन 1946 में इंग्लैंड की लिवर सरकार ने हिंदुस्तान की समस्याओं को हल करने के लिए मंत्रिमंडल के तीन मेंबरों का एक मिशन भारत भेजा, जिसने विभिन्न राजनीतिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों से मिलकर एक योजना तैयार की| इससे मंत्रिमंडल की योजना कहा जाता है कांग्रेस ने इसे स्वीकार कर लिया इस योजना के अनुसार भारत में एक अंतरिम सरकार बनाई जाना थी जिसमे कांग्रेस भी शामिल हो गयी | मुसलिम लीग ने पहले तो इस योजना को ठुकरा दिया था परन्तु फिर वह अंतरिम सरकार में शामिल हो गई इस सरकार में सरदार पटेल गृहमंत्री बने इसके अतिरिक्त सूचना तथा ब्रॉडकास्टिंग विभाग भी सरदार पटेल को सौंपा गया पंडित नेहरू इस सरकार के प्रधानमंत्री थे यह योजना भी असफल रही, तब अंग्रेज सरकार ने लॉर्ड माउंटबेटन को भारत का बाइसराय बनाकर भेजा | लॉर्ड माउंटबेटन ने 3 जून की घोषणा से हिंदुस्तान की बंटवारे की घोषणा कर दी, 15 अगस्त 1947 को हिंदुस्तान और पाकिस्तान के नए राज्य बने और दोनों को ब्रिटिश गुलामी से मुक्ति मिल गई स्वतंत्र हिंदुस्तान में सरदार पटेल के पास गृह विभाग के अतिरिक्त रियासती विभाग भी शामिल था | (19 ) सरदार ने किया, साहस से रियासतों का गठन | अंग्रेजों ने भारत को तो आज़ादी दे दी थी परन्तु बैठ जाते जाते एक ऐसा षड्यंत्र कर गए जिसके परिणाम आज तक हिंदुस्तान और पाकिस्तान को भोगना पड़ रहा है, अंग्रेजों ने जाते -जाते समय ,भारत को दो टुकड़ों में बांट दिया, यही नहीं भारत में विवाद बना रहे इसलिए अंग्रेजों ने भारत की सभी रियासतों को स्वतंत्र कर दिया यह एक प्रकार की अंग्रेज की भयानक चाल थी | सरदार पटेल का निधन 15 दिसंबर 1950 को मुंबई में हुआ था आज हमारा समाज ऐसे ही लौह पुरुष की तलाश में है जो समाज में किसी भी कीमत पर एकता लाने में सफल हो , वे सरदार वल्लभ भाई पटेल थे जिन्होंने अखंड भारत को 500 रियासतों को मिलाने का कार्य कर एक किया | नमन्

  • ''अद्वितीय गाँधी ''

    अद्वितीय गाँधी(1916-1930) भाग 1 गुजरात भारत का आज से ही नहीं बल्कि प्राचीन काल से ही एक महत्वपूर्ण और प्रभावशाली राज्य रहा है इसने ने अपने काल के कई उतार चढ़ाव देखें एवं कई विदेशी आक्रमणों का सामना भी किया है |''गजनी''आक्रमण किसे याद नहीं हैं| परंतु गुजरात आज भी खड़ा है, गुजरात से कई नागरिक विदेशों में बसकर भारत का झंडा बुलंद कर रहे इस पर हमें गर्व होना चाहिए और अभिमान भी हैं ,कि गुजरात से एक महात्मा निकल कर विदेशों में जाकर भारतीय की मदद कि थी, अपनी प्रतिभा से वहा सरकारों के दमन कामो को रोका ओर हम आज ऐसे महामानव के प्रति अशोभनीय टीका टिप्पणी की जा रही है| जोअत्यंत दुखद है वह महामानव और कोई नहीं बल्कि अद्वितीय ''महात्मा गांधी'' जिनका सम्मान उनकें विरोधी भी कहा करते थे |स्वय सुभाषचंद्र बोस ने गाँधी को रास्ट्रपिता कहा है | महात्मगांधी का पूरा नाम हे मोहनदास करमचंद गाँधी था और इनका जन्म 2 अक्टूबर 1869 को काठियाबाड़ प्रांत के पोरबंदर के सुदामापुरी नामक स्थान पर हुआ था इनके पिता करमचंद पोरबंदर के दीवान थे इनके पिता की ईमानदारी न्याय प्रियता के चर्चे सारे प्रांत में वह करते थे| गाँधीजी की माँ का नाम पुतलीबाई था जो अत्यंत धार्मिक प्रवृत्ति की थी गाँधीजी की प्राथमिक शिक्षा सुदामापुरी एवं पोरबंदर में हुई थी ,एवं उच्च शिक्षा के लिए 4 सितंबर 1888 इंग्लैंड चले गए , ऐसा कहा जाता है कि गांधीजी के द्वारा जब समुद्र को पार किया गया तब गांधीजी के परिवार को समाज से बहिष्कृत कर दिया गया क्योंकि समुद्र को पार करना धर्म विरोधी में था, परन्तु गांधीजी ने अपनी पढ़ाई मैं किसी भी प्रकार की बाधा नहीं आने दी थी| गाँधीजी ने बैरिस्टर(वकील ) की परीक्षा मैं प्रथम स्थान प्राप्त किया और स्वदेश वापस लौट आए एवं ब्रिटिश न्यायालय मुंबई हाईकोर्ट में वकालत करने लगे| दक्षिण अफ्रीका में रह रहे व्यापारी सेठ अब्दुल्ला ने महात्मा गाँधी से अनुरोध किया कि उनके साथ दक्षिण अफ्रीका के न्यायालयों में भेदभावपूर्ण रवैया अपनाया जा रहा है| वहाँ के न्यायालयों में भारतीयों के लिए न्याय नहीं मिल रहा है, क्योंकि रंग भेद की नीति के कारण भेदभाव किया जा रहा है |इस पीड़ा से महात्मा गाँधी पहले से ही भली भांति परिचित थे, इसलिए गांधीजी ने सेठ अब्दुल्ला के अनुरोध को स्वीकार कर लिया और अप्रैल 1893 में मुंबई हाईकोर्ट की वकालत को छोड़कर दक्षिण अफ्रीका रवाना हो गए| सेट अब्दुल्ला का प्रकरण दक्षिण अफ्रीका की राजधानी डरबन में चल रहा था| जिसकों गांधीजी ने अपने तर्कों से जीत लिया, यह जीत केवल गांधीजी एवं सेठ अब्दुल्ला की नहीं थी, बल्कि यह जीत विदेशी भूमि पर बसने वाले हर नागरिक की थी| इस जीत से '' विदेशी भारतीय'' अपने आप को गौरवान्वित महसूस करने लगे | जिसके चर्चा ना केवल दक्षिण अफ्रीका में बल्कि पूरे यूरोप में होने लगे, विदेशों में भारतीयों को सम्मान दिलाने वाले और कोई नहीं बल्कि गांधी थे| दक्षिण अफ्रीका में गाँधी जी ने नही उतारी पगड़ी 1894 यहाँ मैं पाठकों के लिए अभी बताना चाहता हूँ कि, जब गाँधी डरबन के उच्च न्यायालय में पेश हुए तब वह भारतीय परंपरा के अनुसार पगड़ी पहनी हुई थी न्यायाधीश ने पगड़ी उतारने के लिए कहा परन्तु गांधीजी ने भारतीय परंपरा का हवाला देकर पगड़ी उतारने से मना कर दिया, जिसको न्यायाधीशों ने भी स्वीकार किया इस प्रकार गाँधीजी ने न केवल सेठ अब्दुल्ला को जीत दिलाई बल्कि अपनी भारतीय परंपरा को भी विदेशों में कायम रखा | इस प्रकार से सम्पूर्ण दक्षिण अफ्रीका के समाचार पत्रों में खूब प्रकाशित हुआ और कई भारतीय एवं विदेशी भी गांधीजी से मिलने आने लगे गाँधीजी ने भी भारतीयों के लिए बचन दिया वह उनके साथ है ,गाँधीजी ने दूसरा प्रकरण भी सेठ अब्दुल्ला के लिए ही जीता था, यही वजय रही कि गाँधी जी के लिए दक्षिण अफ्रीका में ही प्रथम श्रेणी की डिब्बे में बैठने की वजह से अपमानित किया था और रात में ही उतार दिया था और सारी रात गाँधीजी को प्लेटफार्म पर बैठकर ही गुजारने पड़ी यह हालत एक ऐसे हिन्दुस्तानी की थी जिसने डरबन में विदेशियों से न्यायिक जीत हासिल की थी, यह पीड़ा गांधीजी के मन में जीवन भर रही 1901 मैं वापस आकर 1903 में पुनः दक्षिण अफ्रीका चले गए| गाँधी जी ने किया , पहला सत्याग्रह दक्षिण अफ्रीका पाठकों के लिए यह भी बताना चाहता हूँ कि दक्षिण अफ्रीका में रहने वाले प्रत्येक भारतीय के लिए 25 पोंड सालाना देना पड़ता था यह राशि आज लाखों में होती है| गांधीजी ने इसके खिलाफ़ भी मोहन छेड़ने का मन बनाया और उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में नेटाल इंडियन कांग्रेस की ओर से, मजदूरों और भारतीयों ने गाँधीजी का सहयोग किया दोनों ने मिलकर अन्याय के खिलाफ़ संघर्ष किया इस संघर्ष की कहानी पर एक पुस्तक लिखी गई जिसका नाम हरी पुस्तक है और ये पुस्तक दक्षिण अफ्रीका में रह रहे प्रत्येक भारतीय के लिए वितरित की गई बल्कि दक्षिण अफ्रीका में उन मज़दूरों को भी दी गई जो विदेशों से आकर बसे थे सेट अब्दुल्ला को दक्षिण अफ्रीका के गोरों के द्वारा धमकिया दी जाने लगी की तुम मोहनचंद करमचंद गाँधी को अपने घर से निकाल दो, वरना तुम्हारा सारा व्यापार चौपट कर देंगे| परन्तु गांधीजी के लिए सीट अब्दुल्ला ने नहीं निकला जबकि नेटाल शहर के लोग गांधीजी के खून के प्यासे हो गए थे सेट अब्दुल्ला नहीं गाँधीजी की प्राण की रक्षा की थी गाँधी जब किसी कार से नेटाल शहर के बाहर जा रहे थे तब कुछ लोगों ने उनके साथ मारपीट की थी उसी समय पुलिस अधीक्षक ने आकार गाँधीजी की मदद की जब गाँधीजी सेट अब्दुल्ला के घर पहुंचे तो उनके घर को भी विरोधयो ने घेर लिया था परन्तु सेट अब्दुल्ला को गाँधीजी की जान बचाने के लिए पिछले दरवाजे से निकालना पड़ा और चुपकर गाँधी थाने पहुँच गए| गाँधीजी बिलकुल नहीं डरें और उन्होंने आप्रवासी भारतीयों के लिए अपना हक दिलाने के उद्देश्य ऊँच- नीच की भावना को खत्म करने के लिए सत्याग्रह प्रारंभ कर दिया, और सभी सत्ताग्राहियों को यह सलाह दी कि अंग्रेजों का क्रोध हिंसा से नहीं, बल्कि शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करना हैं| हम किसी को मारेंगे नहीं ,कोई हमको मारेगा तो हम सह लेगे, कोई जेल भेजेगा तो हम जेल चले जाएंगे, कोई हमारा अपमान करेगा तो, हम सहन कर लेंगे परन्तु हिंसा का सहारा नहीं लेंगे पहली बार गाँधीजी,गये जेल गाँधीजी ने इस प्रकार की पर्ची हिंदी अंग्रेजी तमिल तेलुगू आदि भाषाओं में वितरित करवा दिए इस प्रकार अंग्रेजों का विरोध दक्षिण अफ्रीका में लोगों को जागरूक कर किया गया था सत्याग्रह में हजारों लोगों ने भाग लिया भारतीयों पर लाठीचार्ज किया गया उन पर गोलियां चलाई गईं, कई भारतीय घायल हुए और पहली बार महात्मा गाँधी की पत्नी कस्तूरबा गाँधी ने दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह आंदोलन में भाग लेकर भारतीय नारियों का सम्मान बढ़ाया और कस्तूरबा गाँधी अपने पति के साथ नेटाल जेल में भी रहीं दोनों को पत्थर गिट्टियां तुड़वाकर प्रताड़ित किया गया ताकि उनका मनोबल टूट जाए| परन्तु पत्थर टूट गए, गाँधी एवं उनकी पत्नी का मनोबल नहीं टूट पाया| गाँधीजी से कई मुस्लिम भी जुड़ गए थे, जो अन्य देशों के रहने वाले भी थे| गांधीजी की सामाजिक सेवा एवं युद्ध में सैनिकों की मदद करने, अहिंसा का मार्ग अपनाने से, अफ्रीका में लॉर्ड हार्डिंग ने केसर हिंद की उपाधि दी थी, यह पाठकों को यह बताना चाहता हूँ कि गाँधीजी को केसर हिंद की उपाधि भारत में नहीं बल्कि दक्षिण अफ्रीका में दी गई थी गांधीजी ने 37 वर्ष की उम्र में 1903 छः ब्रह्मचर्य का व्रत ले लिया था जिसका समर्थन उनकी पत्नी ने भी किया और वह आजीवन इस का पालन करते रहे, गांधीजी ने इंडियन ओपिनियन नामक पत्रिका का प्रकाशन किया था, भारतीय एवं मज़दूरों की मदद करने की वजह से अंकित में पहली बार जेल जाना पड़ा और अपनी पत्नी के साथ दो माह तक जेल में रहे सन् 1910 में पुन सत्याग्रह किया यही नहीं सत्ता ग्रह के लिए टालस्टाय नामक संस्था की स्थापना की और 1 दिन में 55 किलोमीटर चले| दूसरी बार भारत, लौटें गाँधी,1916 भारतीय स्वतंत्रता संग्राम मैं लगी नेताओं के द्वारा महात्मा गाँधी के लिए भारत आमंत्रित किया गया जिससे की ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ़ चल रहे स्वतंत्रता संबंधी आंदोलनों को और अधिक गति मिल सके| इसलिए महात्मा गाँधी 1916 में भारत लौटें इस समय इनकी उम्र लगभग 47 थी |भारत आकर सर्वप्रथम भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को नए तरीके से संगठित करने का प्रयास किया, और इस प्रकार आम नागरिक को भी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जोडकर आजादी की लड़ाई में शामिल करने का कार्य किया | भारत में खेड़ा आंदोलन, गुजरात प्रांत के खेडा जिले में भयानक अकाल आने की वजह से कई लोग भुखमरी एवं लाचारी से मारे गए ,परंतु ब्रिटिश सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही थी बल्कि मदद करने की वजह ब्रिटिश हुकुमत तानाशाही एवं सख्ती से राजस्व कर वसूल रही थी| इस दमनकारी नीतियों के खिलाफ़ गाँधीजी ने पहला आंदोलन अपनी जन्मभूमि प्रांत के खेड़ा जिले से प्रारंभ किया, और यहाँ पर वैसा ही अहिंसक सत्याग्रह प्रारंभ किया जैसा कि एक समय में उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में किया था काशी विश्वविद्यालय का उद्घाटन 4 फरवरी 1916 में जब गाँधी दक्षिण अफ्रीका से लौटकर आए ,उसी समय उन्होंने काशी विश्वविद्यालय का उद्घाटन किया और इसी वर्ष लखनऊ कांग्रेस में शामिल हुए, गाँधीजी और नेहरू की पहली मुलाकात लखनऊ में ही में हुई थी| 17 जून में गांधीजी ने साबरमती आश्रम की स्थापना की, यहाँ आज भी गांधीजी की विचारधारा को एवं उनके सिद्धांतों को युवा पीढ़ी में आगे बढ़ाया जा रहा है| इसी समय राष्ट्र कवि साहित्य नोबल विजेता स्वर्गीय रवीन्द्रनाथ टैगोर ने मोहनचंद करमचंद गाँधी को महात्मा की उपाधि देकर सम्मानित किया था क्योंकि उनके द्वारा दक्षिण अफ्रीका से वापस आने के पश्चात सूट बूट त्याग कर एक भारतीय परिधान को अंगीकार किया था |और सारा जीवन गरीबों की सेवा करने का संकल्प, ब्रिटिश हुकूमत को अहिंसा के सिद्धांत पर देश से बाहर निकालने का संकल्प भी लिया था ,गांधीजी ने भारतीय जागरण देशभक्ति आजादी का आंदोलन को घर घर पहुंचाने के लिए 8 अक्तूबर 1919 को नव ''जीवन ''और ''यंग इंडिया'' नामक पत्रिका का प्रकाशन किया था 'बतख मियां'' ने बचाई गाँधी जान,मिली ''बापू की उपाधि'' बिहार के चम्पारण जिले में किसानों से जबरन नील की खेती कराई जा रही थी इस वजह से लगातार किसानों की भूमि बंजर रही थी किसानों की आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय होती जा रही थी| चारों तरफ भुखमरी फैल रही थी परंतु अंग्रेजों ने किसानों पर किसी भी प्रकार का तरस नहीं आ रहा था हूँ और जबरन कर भी वसूल रहे थे इसलिए सन 1917 में गांधीजी ने किसानों की मदद करने का समय संकल्प लिया, परन्तु गांधीजी की शर्त यह थी कि आंदोलन पूर्णतः अहिंसक होगा | परन्तु कृपलानी के द्वारा कुछ हिंसा हुई , शांतिभंग भंग हुई इस कारण उन पर ब्रिटिश हुकूमत ने प्रकरण दर्ज कर दिया जुर्माने की राशि ₹40 थी परन्तु कृपलानी जी यह राशि जमा नहीं कि और 15 दिनों तक जेल में सजा भुगतनी पड़ी चंपारण आंदोलन में राजेंद्र बाबू भी शामिल थे बाद में इस आंदोलन में गांधीजी के लिए भी गिरफ्तार कर लिया गया परन्तु अंग्रेजी न्यायाधीश ने गाँधीजी को इसलिए रिहा कर दिया क्योंकि उनके द्वारा आंदोलन की अनुमति ली गई थी,परन्तु गाँधीजी की निगरानी के लिए एक अंग्रेज अधिकारी नियुक्त कर दिया| आंदोलन में गांधीजी को मारने का षड्यंत्र किया गया इसमें मोतीहारी नील फैक्टरी के मैनेजर डब्ल्यू एस इरविन ने खानसामा के लिए लालच दिया, परन्तु खानसामा बतख मियां ने षड्यंत्र के बारे में ''राजेन्द्र बाबू'' को बता दिया, इस प्रकार खानसामा ने गाँधीजी की जान बचाई बाद में ब्रिटिश हुकूमत ने बतख मिया को नौकरी से निकाल कर जेल भेज दिया| रोलट कानून 1918 एवं जलियांवाला बाग1919 1916 से लगातार अंग्रेजों के खिलाफ़ अहिंसक रूप से आंदोलन किए जा रहे थे एव भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को जन साधारण जनता से जोड़ दिया गया था| यही वजह है कि आंदोलन धीमे धीमे सारे देश में फैल रहा था अंग्रेजों की नीतियों को विरोध हो रहा था. उनकी दमनकारी नीतियों विदेशों में भी प्रचारित किया जा रहा थी | इसलिए दमन करने के लिए एक ऐसे कानून की आवश्यकता थी जिसकी सुनवाई किसी न्यायालय में भी न हो सके और ऐसा ही कानून उन्होंने तानाशाही रवैया बनाया किसको रॉलेट एक्ट के नाम से भारतीय इतिहास में जाना जाता है इस कानून मैं यह लिखा था कि कोई भी भारतीय अपने बचाव में अभिव्यक्त नियुक्त नहीं कर सकता और न ही न्यायालय में अपना पक्ष रख सकता है उसको सीधे गिरफ्तार कर कारागार में डाल दिया जाता था गाँधीजी ने इसका विरोध भी अहिंसक तरीके से किया और उनका साथ न केवल हिंदुओं ने दिया बल्कि बड़ी तादाद में मुसलमानों ने भी भाग लिया जगह जगह हड़ताल की गई मोर व्रत रखे गए और हिंदी तथा मुसलमानों ने एकता का परिचय देकर अंग्रेजों को हिला दिया होना चाहिय हिंदू मुस्लिम एकता को तोड़ने के लिए अंग्रेजों ने चालाकी से दंगे भड़का दिए दोनों वर्गों पर अत्याचार किए गए जबकि दोनों ही शांतिपूर्ण तरीके से काले कानून का विरोध कर रहे थे पंजाब के बगीचे में एकत्रित भीड़ पर बिना कोई सूचना दिए जनरल डायर ने गोलियां चलवा दी और इसमें भाग लेने वाले हजारों लोग मारे गए जो बच गए उनके लिए अंडमान निकोवर कि सेल्युलर जेल भेज दिया गय बाद में ''उधम सिंह'' इंग्लैंड जाकर जनरल डायर की हत्या कर बदला लिया हिंदू मुस्लिम एकता का समर्थन(1919) ब्रिटिश हुकुमत के द्वारा बगदाद के खलीफा के कुछ धार्मिक अधिकारों को कम कर दिया था एवं उन पर कई प्रतिबंध लगा दिए थे इससे मुस्लिम देशों में एक मुसलमानों में इतने भेज दिया असंतोष व्याप्त हो गया था भारत में भी ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ़ मुसलमान मुसलमानों ने एकत्रित होकर अंग्रेजों के विरुद और उनकी नीतियों के खिलाफ़ भारत में आन्दोलन चलाया यह आंदोलन अली बंधुओं के द्वारा चलाया जा रहा था गांधीजी के लिए हिंदू मुस्लिम एकता को कायम करने के लिए इससे अच्छा अवसर नहीं था| यही वजह रही कि मुसलमानों का गाँधीजी ने समर्थन किया| एवं अंग्रेजी हुकूमत खिलाफ़ कांग्रेस का समर्थन दिलवाया, खलीफा के अधिकार वापस करने के लिए अंग्रेजों पर दबाव बनाया पहली खादी भंडार दुकान की स्थापना इसी आन्दोलन में पहली बार मौलाना अब्दुल कलाम आजाद से 18 जनवरी 1920 को मुलाकात हुई थी, एवं गांधीजी ने पहली बार जनवरी 1921 में मुंबई में खादी भंडार की दुकान की स्थापना की थी ताकि स्वदेशी को अपनाया जा सके और 1 अगस्त सको भारत के हर स्थान पर विदेशी वस्तुओं को जलाकर अपना बूथ जताया इसमें सभी वर्गों के लोगों ने बढ़ चढ़कर भाग लिया इसी समय गांधीजी ने टोपी का त्याग कर जीवन भर लंगोटी पहनने का संकल्प लिया गाँधी के द्वारा अंग्रेजों का असहयोग करना(4 अप्रैल1920) कांग्रेस अधिवेशन ''कलकत्ता'' में गांधीजीने अंग्रेजों की नीतियों का विरोध किया और किसी भी तरह उनको सहयोग नहीं करने का प्रस्ताव अधिवेशन में पारित कराया क्योंकि ब्रिटिश गवर्नमेंट के द्वारा भारत को बर्बाद करने की नीतियाँ लगातार बनाई जा रही थी इसलिए उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के जैसे ही अहिंसावादी सत्याग्रह प्रारंभ किया गांधीजी ने यह ऐलान भी किया कि हम किसी भी तरह से विदेशी सरकार से संबंध नहीं रखेंगे| अदालतों एवम भारतीय वकील स्कूल कॉलेज जैसी सभी संस्थाओं का परित्याग करेंगे ओर इसके स्थान पर स्वदेशी अपनाएंगे जिससे कि आर्थिक रूप से ब्रिटिश हुकुमत को नुकसान हो सके| सारे हिंदुस्तान में लोगों के द्वारा आंदोलन किए जा रहे थे ओर इन आंदोलनों का दमन ब्रिटिश हुकुमत तानाशाही से कर रही थी| 1922 को गोरखपुर के चोरा चोरी नामक स्थान पर पुलिस चौकी में तैनात 23 सिपाहियों को उग्र भीड़ ने जिंदा जला दिया था इस वजह से गांधीजी के विरुद्ध एक प्रकरण दर्ज हुआ इस प्रकरण में गांधीजी को सजा सुनाई गई चोरा चोरी कांड के नायक रमापति चमार थे 2 फरवरी 1922 को चोर चोरी के थानेदार गुप्तेश्वर सिंह ने एक भगवान दास नामक दुकानदार को बुरी तरह पीटा था एवं उसको भद्दी भद्दी गालियां दी थी ये गुप्तेश्वर अंग्रेजों का गुलाम था इस अन्याय के विरोध में सात तारीख बाजार बंद रखा गया रमापति चमार के नेतृत्व में 5000 सै दलितों ने विरोध किया था| लोग यह भी कहते हैं कि गांधीजी ने यह आंदोलन इसलिए समाप्त कर दिया था कि आंदोलन की कमान दलितों के हाथ में जा रही थी परन्तु एक इतना सत्य है यह कहा नहीं जा सकता हें| रमापति चमार फांसी के फंदे पर लटकाया गया| गाँधीजी ने अपना पुरस्कार सर की उपाधि अंग्रेजों को विरोध स्वरूप वापस कर दी| स्वराज दल की स्थापना 1923 ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ़ हिंदुस्तान में गांव- गांव, गली -गली आंदोलन चल रहे थे| और ऐसा लग रहा था कि अंग्रेज देश छोड़कर चले जाएंगे परंतु इसी समय गांधीजी ने चोरी चोरी प्रकरण के बाद जिसमें 23 जवानों को कुछ दलितों ने जिंदा जला दिया था इस घटना से दुखी होकर उन्होंने असहयोग आंदोलन को वापस ले लिया गांधीजी के इस निर्णय से आंदोलनकारियों में असंतोष हुआ एवं कई आंदोलनकारी इतने दुखी हुए कि उन्होंने गांधीजी से अलग हटकर अपना रास्ता चुन लिया रु के नए दिल की स्थापना की जिसकों स्वराज दल कहा जाता है इसकी स्थापना करने वाले मोतीलाल नेहरू एवं चितरंजन दास थे जो दुखी होकर कांग्रेस छोड़ कर स्वराज दल की स्थापना की थी यह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का पहला विभाजन था परस्पर मतभेद के कारण अंग्रेजों के खिलाफ़ चल रही मुहिम धीमी गति आ गयी| गाँधी जी द्वारा क्षमा याचना(1924) गाँधीजी को ऐसा लग रहा था कि उनके द्वारा चलाई गई मुहिम में जाने अनजाने में कई लोगों को पीड़ा हुई जिसमें अंग्रेजी भी शामिल थे और कई लोगों की आंदोलन के दौरान हत्या हो चुकी थी इससे गांधीजी बहुत दुखी थे और उनको लगातार आप मिलानी हो रही थी इस पीड़ा से उबरने के लिए उन्होंने 18 सितंबर 1924 21 दिवस का उपवास क्या और पहली बार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बेलगाम सम्मेलन के अध्यक्ष नियुक्त हुए इसके पहले और बाद में कभी भी गाँधीजी कांग्रेस के अध्यक्ष नहीं रहे| गाँधी जी ने लिया,''स्वतंत्रता दिवस'' मनाने का संकल्प1930 गाँधीजी असहयोग आंदोलन के बाद पुनः सक्रिय हुए , उन्होंने 26 जनवरी 1930 को पहली बार प्रति वर्ष स्वतंत्रता दिवस मनाने का संकल्प लिया और यही वजह रही कि 26 जनवरी के दिन ही भारतीय गणतंत्र को चलाने के लिए संविधान लागू किया गया| जिससे कि आने वाली पीढ़ियों को यह ज्ञात हो सके कि आजादी का संकल्प कब लिया गया था इसमें ये नहीं कहा जा सकता कि इसके पहले कभी आजादी का संकल्प नहीं लिया गया था| सविनय अवज्ञा आन्दोलन(1930) ब्रिटिश हुकुमत के द्वारा लगातार जनविरोधी नीतियों एवं कानून बनाए जा रहे थे इसका विरोध करने के लिए साबी ने अवज्ञा आंदोलन गांधीजी ने पुन प्रारंभ किया की हम आपके हर आदेश का पालन नहीं करेंगे, विनम्रतापूर्वक ही कानून को तोड़ेंगे यही कारण कारण रहा कि नमक पर लगने वाले टैक्स को तोड़ने का निश्चय गांधीजी ने लिया और इस आंदोलन को पुनः जन साधारण लोगों से जुड़ने का प्रयास किया गया 13 मार्च 1930 को दांडी यात्रा की गई इसमें सभी धर्मों के लोगों ने हिस्सा लिया 5 मई 1930 को गाँधीजी ने गुजरात की दाडी नामक स्थान पर पहुंचा नवकार को थोड़ा और बाद में 4 मार्च 1931 को गाँधी एवं इरविन के बीच समझौता हुआ जिससे भारतीय इतिहास में गाँधी इरविन के नाम से जाना जाता है | इसी समय गांधीजी ने कहा था कि गांधीवादी विचारधारा आज भी जीवित हैं और आगे भी रहेंगी गाँधी मर सकता है, लेकिन गांधीवादी विचारधारा कभी नहीं मर सकती शायद गांधीजी के आवास हो गया था कि कभी भी उनके साथ किसी भी प्रकार की घटना घट सकती है | 19 -10- 20 21 संतोष कुमार लडिया प्राचीन एम् ए इतिहास सागर युनिवर्सिटीमप्र अगला अंक गांधीओर दलित 19 30 -19 50

  • अशोक ''ka'' धर्म

    प्रियदर्शी अशोक सम्राट कि कलिंग विजय मगध की राजधानी पाटलिपुत्र थी जिसकों हम आज पटना के नाम से जानते हैं इस पर सम्राट अशोक के दादा चंद्रगुप्त मौर्य उसके पता बिंदुसार ने शासक के रूप में और अधिक प्रभावशाली बनाया था| बल्कि बिंदुसार के समय में उत्तर से दक्षिण तक मोर्य शासन स्थापित हो चुका था बिंदुसार के तीन सन्तान थी अशोक दूसरा सुशिम था, एक बहन इंद्रा भी थी| बिंदुसार ने सुशिम को अफगानिस्तान का राज्यपाल बनाकर भेजा था और अशोक के लिए दक्षिण भारत में राज्यपाल पद पर भेजकर साम्राज्य विस्तार का दायित्व सौंपा था अशोक दक्षिण भारत में विदिशा के बाद लगभग 11 वर्षों तक उज्जैन में रहा यहाँ रहकर ही उसने विदिशा की राजकुमारी देवी से विवाह किया था और इससे अशोक के दो संतानें उत्पन्न हुई थी एक का नाम राहुल दूसरी पुत्री का नाम संघमित्रा था लगभग 11 वर्षों तक उज्जैन रहकर उसने कई ऐतिहासिक भवनों का निर्माण किया जिनके अवशेष आज भी खंडर के रूप में देखे जा सकते हैं|जो अशोक कहानी कह रहें हे, बिंदुसार की मृत्यु के बाद शुसिम और अशोक दोनों के बीच में उत्तराधिकारी का संघर्ष चल रहा था| परन्तु अशोक के साथ की दरबारी, सामन्त , मंत्री जुड़े हुए थे इसलिए पिता के देहांत के बाद यह सभी चाहते थे कि अशोक ही पाटलिपुत्र का सम्राट बने इसलिए दक्षिण से तुरंत पाटलिपुत्र अशोक पहुंचे और उन्होंने पाटलिपुत्र का शासक रूप में कार्यभार ग्रहण किया ऐसा भी कहा जाता है कि अशोक ने अपने 99 भाइयों को मारकर राजगद्दी हासिल की थी परन्तु यह कहाँ तक सत्य है ये कहा नहीं जा सकता लेकिन ये निश्चित ही सही है कि वह आसानी से पाटलिपुत्र का शासक नहीं बना होगा मौर्य वंस का शासक बनने के बाद उसने चारो तरफ विकास कार्य एवं लोक कल्याणकारी योजनाओं को लागू किया जिसकी प्रशंसा आज भी भारतीय इतिहासकार किया करते हैं पाटलिपुत्र का शासक बनने के बाद उसने अपना राजधर्म बौद्ध धर्म को घोषित कर दिया था और ये स्वयं धर्म के प्रचार के लिए यात्रा करने लगा बौद्ध धर्म शांति एवं अहिंसा का रास्ता था परंतु ये रास्ता उसने क्यों अपनाया उसकी भी एक कहानी है जब सम्राट अशोक ने अपनी तलवार की दम पर कई रियासतों का अपने राज्य में विलय कर लिया था परन्तु एक राज्य ऐसा भी था जिसमें बौद्ध धर्म की सत्ता को स्वीकार नहीं किया | उसका राजधर्म सनातन था यह कलिंगराज राज्य था हे|इसको अशोक के पिता एवं दादा कभी भी पराजित नहीं कर सके इसलिए इस को पराजित करना अशोक ने अपनी प्रतिष्ठा मान लिया था| इसलिए 261 बीसी में अशोक ने कलिंग पर आक्रमण किया परन्तु कलंक को लगभग चार महीने घेरा डालने के बाद भी जब वह इसको विजय प्राप्त नहीं कर सका तब अशोक को धोखा देकर कालिंग को जीतने का षड्यंत्र राजगुरु सम्पुष्ट आचार्य एवं अशोक की सौतेली माता बुद्धिमती के द्वारा किया गया इसमें कलिंग के प्रधानमंत्री विशाखदत की पत्नी प्रमिला भी शामिल थी| अशोक के पिता बिंदुसार की दो पत्नियां थीं है एक का नाम बुद्धिमती, दूसरी का नाम सुभंद्रगी था |यही अशोक की माँ थी| बुद्धिमती का एक पुत्र था जिसका नाम बीताशोक था ये अपने बड़े भाई अशोक से बहुत प्रेम करता था |परन्तु इसकी माँ अशोक से द्वेष भावना रखा करती थी इसका मुख्य कारण यह था कि वह अपने पुत्र बीताशोक के लिए पाटलिपुत्र का शासक बनाना चाहती थी| परन्तु बीताशोक की कभी यह इच्छा नहीं रही कि वह पाटलिपुत्र का शासक बने| इसलिए बुद्धिमती लगातार अशोक के खिलाफ षडयत्र किया करती थी परन्तु अशोक ने कभी भी बुद्धिमती के खिलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं थी अशोक के समय कलिंग का राजा मगेंद्र था और ये हमेशा अपने सैनिकों के साथ रहा करता था इसलिए कलिंग सेना का आत्मविश्वास और साहस मैं किसी प्रकार की कमी नहीं थी |यही वजह थी कि अशोक की सेना कलिंग को पराजित नहीं कर पा रही थी| जब अशोक कलिंग को पराजित नहीं कर सका तब उसने अपने छोटे भाई बीताशोक का विवाह कलिंग की राजकुमारी प्राणयिनी से करने का निश्चित किया |परन्तु मगेंद्र ने यह कहकर मना कर दिया कि वह अपनी राजकुमारी का विवाह बौद्ध धर्म के अनुयायियों से नहीं करेगा| अशोक जब अपनी योजनाओं में असफल होने लगा तब उसने कॉलिंग से अपनी सेना को वापस बुलवाने का निर्णय लिया परन्तु अशोक की सौतेली माँ एवं राजगुरु सम्पुष्टआचार्य इस पर तैयार नहीं हुए और अशोक पर दबाव बनाने लगे कि कॉलिंग राज्य आपके दादा और पिता विजय प्राप्त नहीं कर सके इसलिए इस पर विजय प्राप्त करना अत्यंत आवश्यक है ताकि पाटलिपुत्र का मान सम्मान बचा रहे| अशोक बौद्ध धर्म को मानने वाला था परन्तु अशोक का प्रधानमंत्री मोहन राधागुप्त था जो एक सनातन ब्राह्मण था इसको अशोक की सौतेली माँ एवं संतुष्ट आचार्य दोनों ही पसंद नहीं करते थे| वे लगातार प्रधानमंत्री पद से हटाने का दबाव अशोक पर बनाती थी परंतु अशोक ने कभी भी राधागुप्त को हटाने का आदेश नहीं दिया बल्कि लगातार राधागुप्त का समर्थन करते रहे क्योंकि राधा गुप्ता देशभक्त एवं देशभक्ति रखने वाला व्यक्ति था| अशोक राधागुप्त को चाचा कहकर पुकारा करते थे क्योंकि यह अशोक के पिता बिंदुसार के मित्र होने के साथ साथ उनके शासनकाल में उच्च पद पर भी कार्यरत थे इसलिए अशोक का समर्थन भी राधा गुप्ता द्वारा तब से किया जा रहा था जब सम्राट अशोक उज्जैन के राज्यपाल थे प्रधानमंत्री राधा गुप्ता को कोई पसंद नहीं करता था कलिंगराज का प्रधानमंत्री विशाख देशभक्त था परंतु उसकी पत्नी प्रमिला कलिंग राज्य के शासक से दुष्भावना रखा करती थी क्योंकि वह कलिंग की राजमाता बनने का सपना देख रही थी इसलिए कल नरेश मृगेंद्र को मारने का षडयंत्र प्रधानमंत्री की पत्नी प्रेमिला के द्वारा किया जा रहा था और प्रमिला स्वयं बौद्ध धर्म को मानने वाली थी इसलिए पाटलिपुत्र के राजगुरु सम्पुष्ट आचार्य के संपर्क में रहती थी और इसने ही कलिंग राज्य की सभी गोपनीय जानकारी दिया करती थी यहाँ तक कि जब संतुष्ट आचार्य ने अशोक को बताए बिना ही कलंक सेना पर धोखे से हमला करवा दिया उसी समय प्रेमिला ने सभी चाबियां संतुष्ट चार को चुपचाप भिजवा दी और नतीजे यह हुआ कि कलिंग सेना को गोलाबारूद नहीं मिल सका और वह पराजित हुई चारो तरफ हाहाकार मच गया लाशों के ढेर लग गए इस प्रकार प्रमिला की धोखेबाजी कलिंग पराजय हुआ और प्रधानमंत्री विशाखदत्त कलिंगराज का शासक बन गया कलिंगों को धोखेबाजी से जीतकर अशोक बहुत अधिक दुखी हुआ दुखी हुआ और इसी युद्ध के बाद अशोक ने शांति का रास्ता अपनाया अहिंसा का रास्ता बनाया यह उसके शासन काल का आखिर युद्ध था इसके बाद कभी भी अशोक ने अपनी राज्य का विस्तार तलवार की दम पर नहीं बल्कि शांति और भाई चारे के द्वारा किया| कलिंग की पराजय के बाद राजपरिवार के सदस्य पलायन कर चूके थे परन्तु अशोक ने किसी भी व्यक्ति को कलिंग का शासक नहीं बनाया बाद में कलंक के सदस्यों को खोजकर उनको उनका राज्य वापस कर दिया| कलिंग राज्य के कुलगुरु चिदानंद स्वामी ने राजकुमार जितेन्द्र को शरण दी , स्वामी का आश्रम बनारस में था ,राजा महेंद्र की देहांत हो चुका था| जितेंद्र अपनी जान बचाने के लिए बौद् भिक्षु की शरण ली और उनके द्वारा इन तीनों की जान बचाने का वचन दिया| चिदानंद स्वामी कलिंगराज के राजा मृग्रेन्द्र के गुरु थे और इनकी इच्छा थी कि हिन्दू धर्म बचा रहे इसलिए राजा महेंद्र की मृत्यु के बाद जितेंद्र राजकुमार की जान की रक्षा करना इनका कर्तव्य था |इसलिए उन्होंने उनको बौद्ध भिक्षु बनने की सलाह दी ताकि राजकुमार जितेंद्र की जान बची रहे क्योंकि पाटलिपुत्र की राजगुरु एवं अशोक की सौतेली माँ राजकुमार को पता लगते ही कभी भी मरवा सकती थी है| परन्तु बाद में राजकुमार जितेन्द्र एवं उसकी माँ का पता लग गया, अशोक ने उसका राज्य विशाखदत्त से वापस लेकर उसको सौंप दिया, यह दबाव नहीं बनाया वे बौद्ध धर्म स्वीकार कर लें, इस प्रकार अशोक के शासनकाल में ही कॉलिंग राज्य सनातन धर्म का केंद्र बना रहा यदि अशोक के द्वारा उस समय सनातन धर्म को एवं उसके अनुयायियों को संरक्षण नहीं दिया होता, तब निश्चित ही सनातन धर्म उसी समय समाप्त हो जाता इस प्रकार अशोक ने धार्मिक सहिष्णुता का परिचय दिया इसलिए यह धर्म आज तक बचा रहा|

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