संत शिरोमणि रैदास जी महाराज जन्मोत्सव !



भारत की सभ्यता-संस्कृति को सवारने तथा सुरक्षित रखने में संत-महात्माओं की अग्रणी भूमिका रही है। मध्यकालीन भक्ति आन्दोलन के अनेकानेक संत-महात्माओं की भूमिका न केवल धार्मिक कूरीतियों एव अंधविश्वास को तोड़कर एक स्वच्छ समाज एवं मानवतावादी विचार धाराओं को आगे बढ़ाया। मध्यकाल के संतों में संत शिरोमणी का वही स्थान आज भी है, जो लगभग 600 वर्ष पूर्व था। वह इसलिए की संत शिरोमणी ने एक ऐसे वर्ग में जन्म लिया था, जिसको कई हिन्दू ग्रंथों में अछूत और शुद्र कहां जाता था, जो ऋग्वेदकालीन वर्ण व्यवस्था के अनुसार चोथा वर्ण था, जिसे लिखने, पढ़ने की आजादी नही थी। शिक्षा पर केवल एक सीमित वर्ग का ही अधिकार था। परन्तु मध्यकाल में इस परम्परा और मिथक को तोड़कर रविदास जी ने अपने अध्यात्मिक एवं सामाजिक ज्ञान से एक ऐसे वर्ग को स्वीकार करने के लिए विवश किया, जो कभी-भी शुद्र वर्ग एवं छोटी जातियों का सम्मान नही करते थे, इसलिए पुरानी परम्पराओं का, जो साहस रविदास जी ने किया, इसलिए मध्यकाल युग में सभी संतों ने इन्हे संत शिरोमणी एवं संतो का "धुव्र तारा" कहकर केवल मात्र रविदास का ही सम्मान ही नही किया, बल्कि संत शिरोमणी की वजह से उनके अनुयायीयों का भी सम्मान हुआ, जिसे हम ‘‘चमार,’’ ‘‘बैरवा’’, ‘‘कोरी’, ‘‘जागड़ा’’, ‘‘मोची’’, ‘‘अहिरवाल’’, ‘‘जटीया’, ‘‘चमकटिया’’, यहां तक की ‘‘खटीक’’ कहते है, जिनकों बुन्देलखण्ड़, मध्यभारत एवं हिमाचल प्रदेश के क्षेत्रों में चमड़े का व्यवसाय करने वालों को आज भी ‘‘सोनकर’’ कहां जाता है। संत शिरोमणी ने उस काल में जब जातिवाद और छूआछूत का बोल बाला था। लोग शुद्र की परछाई से भी दूर रहा करते थे, ऐसे समय में शिरोमणी ने इन सामाजिक बुराईयों को चुनौती के रूप में स्वीकार किया एवं निडरता के साथ उन वर्गो का केवल मात्र अपनी लेखनी से क्रांतिकारी बदलाव करने का साहस यदि किसी ने किया, तो वह रविदास ही थे। इन्होने मध्यकाल में ही यह समझ लिया था कि अंधविश्वास, कर्मकाण्ड़, स्वर्ग एवं नरक की मनगढ़त कहानियां सुनाकर समाज को ठगने का कुछ लोग वैसे ही कार्य कर रहे है जैसे की ठग। संत शिरोमणी ने अपनी वाणी में छूआछूत एवं जातिवाद से किस प्रकार धर्म का विनाश हुआ है, उन्होने यह भी कहां कि कुछ धूरतों की चतुराई एवं हठधर्मिता ने ही धर्म को मिट्टी में मिला दिया। उनकी लिखी हुई वाणी से ही स्पष्ट होता है। रविदास के जन्म के संबंध में सभी विद्वान एक मत नही है परन्तु यह निश्चित है कि उनका जन्म माघ शुक्ल पूर्णिमा दिन रविवार को हुआ था। इस संबंध में सिक्खों के दसवें गुरू गोविन्दसिंह के समकालीन संत करमसिंह का निम्न दोहा प्रचलित है।

‘‘ चैदह सौ तैंतीस की, माघ सुदी पंदरास।

दुखियों के कल्याण हित, जन्में श्री रैदास ।।’’

संत करमसिंह के दोहे से स्पष्ट हो रहा है कि रैदास ने चर्मकार कुल में केवल जन्म इसलिए लिया, जिससें की गरीब, दुखी एवं समाज के वंचित वर्ग का कल्याण कर सके, जो सदियों से दबे-कुचले थे, जिनका शोषण समाज के वहां वर्ग कर रहा था, जिसको समाज में जाति उच्चता के आधार पर सम्मान एवं आदर दिया जाता था, लेकिन रविदास ने मध्यकाल में पहली बार एक सल्तनत जन्म के आधार पर जाति उच्चता को चुनौति दी और यह चुनौति तलवार एवं हिंसा के आधार पर नही बल्कि अपने ज्ञान एवं बुद्धी के बल पर दी थी। रविदास खुद एक गरीब एवं चमड़े का छोटा-मोटा व्यवसाय कर ही अपना जीवन यापन करते थे, आर्थिक स्थिती उनकी दयनीय थी। फिर वह कैसे दुखियों का कल्याण कर सकते थे, जबकि वह स्वयं गरीब थे। परन्तु संत करमसिंह जी ने अपने दोहे में दुखियों का कल्याण केवल अर्थ से नही बल्कि ज्ञान से होता है और रैदास ने दबे-कुचले एवं शोषित वर्ग को, जिसे हम शुद्र भी कह सकते है, इनके लिए बुद्धी के जैसे ही एक ज्ञान की रोशनी करने के लिए इनके बीच दीपक जलाने का कार्य किया, जैसा कि इन्होने अपने दोहे से स्पष्ट किया कि ज्ञानवान कोई जन्म से नही होता है, बल्कि उसकी मेहनत, ईमानदारी तथा श्रम से ही समाज में स्वीकार होना चाहिए, जो लोग केवल जन्म के आधार पर ब्राहम्ण को देवता मानकर पूजते है एवं ज्ञानी, अछूत शोषित व्यक्तियों को केवल जाति के आधार पर उनका अपमान करते है वह कभी रैदास एवं बुद्ध के उपासक नही हो सकते है। रविदास जी कहते है कि समाज में जो बुद्धीमान है चाहे वह किसी भी जाति, वर्ग का हो उसका सम्मान होना चाहिए। उन्होने तुलसीदास की जन्मजात के आधार पर होने वाले सम्मान को भी चुनौति दी थी, जैसा कि तुलसीदास जी ने अपने दोहे में कहां था कि (रामचरित मानस के कलि महिमा उतराखंड) में देखें-

2. ‘‘जे बरनाधम तेलि कुम्हारा।

स्वपच किरात कोल कलवारा।

नरि मुई गृह संपति नासी।

मूड मुडाई होई सन्यासी।’’

अर्थातः तेली, कुम्हार, चाण्डाल, भील कोल, कलवार आदि जो जाति में नीच हैं। स्त्री के मरने पर अथवा घर की सम्पति नष्ट हो जाने पर सिर मुंडाकर सन्यासी होने का नाटक करते हैं, परन्तु रैदास ने बड़ी विनम्रता से तुलसीदास जी के विचारों से सहमत न होकर कहा।

3. ‘‘ रैदास बाह्मन मति पूजिए, जउ होवे गुनहीन।

पूजिहिं चरन चंडाल के, जउ होवे गुन परवीन।।’’

रविदास जी इससें भी दुखी थे, कि जातिवाद एवं छूआछूत न केवल समाज एवं परिवार व्यक्ति को नष्ट कर रहा है बल्कि वह उस धर्म का भी नष्ट कर रहा है, जिसे ईष्वर ने ही स्थापित किया। इस छूआछूत फैलाने वाले एवं इसका पालन करने वालों को रैदास धूर्त कहते है, जिन्होने बड़ी चतुराई से ही अपने स्वार्थो की पूर्ति करने के लिए वैदिक धर्म को नुकसान पहुंचा रहे है, जैसा कि उनके दोहे से स्पष्ट होता है।


4. ‘‘छुआछूत कर बने सब आरत, वैदिक धर्म कर दीना बारत।

से है! धूरतों की चतुराई, रणु में दिया धर्म मिलाई।।’’

शिरोमणी ने नकारा एवं निकम्मे लोगों पर, जो आलसी एवं श्रमहीन होते है,ऐसे लोगों को भी यह हिदायत दी है, कि श्रम अथवा अपने मेहनत से कमाया हुआ ध नही उसके काम आयेगा, मक्कारी एवं धोखेबाजी से कमाया हुआ धन उसके विनाष की वजह बनेगा। इस प्रकार षिरोमणी ने श्रम के महत्व को समझा और अपने समाज को यह संदेष दिया कि श्रम ही सब कुछ है, इसलिए रविदास जी ने अपनी वाणी में कहां है कि -

5. ‘‘रविदास श्रम कर खाइहिं, जौ लौ पार बसाय।

नेक कमाई जऊ करई, कबहूं न किहफल जाय’’।।

संत शिरोमणी ने एक ऐसा समाज और शासक तथा उस शासक का राज कैसा होना चाहिए, यहा भी उन्होने तत्कालीन समय के राजा एवं रानियों को कड़ा संदेष दिया कि एक शासक का राज ऐसा होना चाहिए, जिसमें कोई भूखा न रहे, सब के लिए भोजन की व्यवस्था हो एवं समाज में जन्म के आधार पर कोई छोटे-बड़े का भेद न हो, सब एक समान हो। किसी भी प्रकार का भेदभाव नही हो। जैसा कि उनके द्वारा बोलने वाले का स्पष्ट होता है।

6 ‘‘ऐसा चाहुं राज मैं, मिलै सवन को अन्न।

छोटे बड़ों सब सम बसै, रविदास रहे प्रसन्न।।’’

रविदास जी ने हमेशा ज्ञान एवं तप को ही महत्व दिया, उन्होने मंदिरों और मस्जिदों के सामने षीष झुकाने बेकार तब तक माना जब तक की शीष झुकाने वाले का हद्रय निर्मल एवं पाकसाफ न हो। क्योंकि रैदास कहते है कि वह जिस ईष्वर की खोज मोझ के लिए कर रहे है वह किसी निष्चित स्थान पर नही हैख् वह सर्वव्यापी है। हर जगह उसके अस्तित्व को देखा जा सकता है। केवल आपके अच्छे कर्म वाले ही ईष्वर के एहसास को अनुभव कर सकते है। वह सर्वव्यापी निर्गुण है, वह दीन-दुखी मनुष्य की सेवा भाव में ही है। इसलिए गरीब, वंचित, दुखियों की सेवा में ही मन का आत्मसंतोष प्राप्त कर ईष्वर को पाया जा सकता है। जैसा कि रैदास जी के दोहे से स्पष्ट होता है-

7. ‘‘ मसजिद सो कछु घिन-नहीं, मंदिर सो नहीं पिआर।

छोउ मंह अल्ला राम नहिं, कह रैदास चमार।।’’

भारतीय समाज में किसी भी प्रकार का विखण्ड न हो, और वह यह अनुभव करते थे कि भविष्य में कुछ लोग हिन्दु-मुस्लिम, गंगा-यमुनी संस्कृति को अपने स्वार्थ पूर्ण करने के लिए इन दोनों के बीच द्वेष भावना फैलाने के लिए दुष्प्रचार भी कर सकते है। हिन्दू और मुसलमानों के झगड़ों को किस शालीनता से बौद्धिक कसौटी पर सुलझाने का प्रयास किया, ऐसा लगता है कि यह संदेष संत रैदास ने उस वर्ग को दिया था जिसको गुमराह कर मुसलमानों से धर्म के नाम पर झगड़ा करने के लिए उकसाया करते थे। इसलिए इन्होने अपनी वाणी से संदेष दिया कि हिंदू और मुसलमानों में कोई भेद नहीं है क्योंकि दोनों का जन्म एक ही स्थान माता के गर्भाष्य से ही होता है और दोनों के पिंड रूपी जीवाणु में प्राण, खून और मांस रूपी अंष एक ही हैं। फिर झगड़ा कैसा ? उनका जीवन मूल्य दीन, दुखी लोगों की सेवा ही था और इसी सेवा के प्रतिबिंब में वह अपने सतनाम का वास समझते थे। दूसरे की पीड़ा को न समझने वाला, साधु की श्रेणी में नहीं आता।

8 ‘‘हिन्दू तुरक मंह भेद, दुइ आयहू एक द्वार।

परान पिंड लोहू मांस एकइं, कहि ‘रैदास’ विचार।।’’

रैदास ने उन ढोंगी एवं लालची संतों पर भी समाज को एक संदेष दिया कि साधु कभी लालची एवं धन का भूखा नही होता है उसे किसी भी प्रकार की धन-दौलत से खरीदा नही जा सकता है। संत केवल ज्ञान का भूखा होता है और यदि कोई संत लालची है, धन की मांग करता है, वह साधु नही हो सकता है, ऐसे नकली साधु-संतों से दूर रहना चाहिए। शायद संत रैदास को यह अभास हो गया था कि भविष्य में नकली एवं ढोंगी साधु-संतों की भरमार हो सकती है और उनकी दूरदृष्टि सोच आज सकार दिखाई दे रही है। जैसा कि उन्होने कहां था कि -


9. ‘‘साधु भूखा ज्ञान का, धन का भूखा न ही।

जो धन का भूखा होई वह साधु न होई।।’’

यही नही संत रैदास ने यह भी कहां कि सभी दुखों का एक ही कारण है धन का संचय है। वह कहते है कि यदि धन का संचय आवष्यकता से अधिक है तो वह धन के साथ वह कृत्य करने लगता है जिसकी इजाजत समाज एवं धर्म स्वीकृति नही देता है। अधिक धन लोगों में अनैतिक कार्य करने के लिए प्रेरित करता है इसलिए रविदास जी कहते है कि संचय किया हुआ धन लोगों के परोपकार एवं गरीब शोषित लोगों के लिए खर्च करना चाहिए।

संत यह भी कहते कि संसार में मोह माया त्याग कर ईष्वर की आराधना और उनके ध्यान में लगाना चाहिए। सभी प्रकार की माया, कल्पना, लालच आदि का त्याग करना चाहिए। यह कभी भी तुम्हारा भला नही कर सकती। केवल दुनिया में ईष्वर ही मनुष्य का भला कर सकता है, इसलिए भी धन संचय न कर मोह, माया का त्याग करना चाहिए।

10. ‘‘ धन संचय दुख देत है, धन त्यागे सुख होय।

‘रविदास’ सीख गुरू देव की, धन मति जौरै कोय।।

ममता छोड़ो जग की, कर ईष्वर का ध्यान।

सब विधि त्यागों कल्पना, भलि करें भगवान।।’’

जैसा कि संत षिरोमणी ने आज से 600 वर्ष पूर्व कहां था कि दीन दुखियों की ही सेवा करने में ही मोझ की प्राप्ति होगी।

11. ‘‘ दीन दुखी करि सेव महिं, लागी रहो रैदास।

निसि बासर की सेव सो, प्रभु मिलन की आस।।’’

‘‘ रैदास सोई साधु भलो, ज-जानहि पर पीर।

पर पीरा कहुं पेखि के, रहवे सदहि अधीर।।’’


संत शिरोमणी कहते है कि दबे-कुचले एवं पीड़ित वर्ग को किसी भी प्रकार का अपनी मुक्ति के लिए संघर्ष न कर सके, वह एकजुट न रह सके, इसलिए चतुर एवं धूर्त लोगों के द्वारा एक ही जाति एवं वर्ग के लोगों मे फूट डालने के लिए एक जाति को कई जातियों में विभाजित करने का कृत्य किया गया है और यह सही भी है कि क्योंकि ऋग्वेद में शुद्र का अर्थ शायद चमड़े से जुड़े व्यवसायों के लिए किया जाता था और यह चमड़े से जुड़े व्यवसाय बाद में अपना व्यवसाय बदलने की वजह से व्यवसाय के नाम पर ही उनकी पहचान होने लगी अर्थात व्यवसाय ही उनकी जाति बन गई।एक ही जाति के वर्ग को बड़ी चतुराई से कई जातियों में विभाजित वैसे ही कर दिया, जैसे कि किले में कई भाग होते है। और यह जाति इसलिए बांटी थी कि वह आपस में उलझे रहे, इस जातिवाद ने मानुसता एवं भाईचारे को दीमक की तरह लग कर खत्म कर दिया है। जैसे रविदास जी ने स्पष्ट किया है कि-

12 ‘‘जात जात में जात है, ज्यों केलन में पात।

‘रविदास’ न मानुष जुड़ सकैं, जो लौं जात न जात।।’’

‘‘जात-पांत के फेर मंहि, उरझि रहई सभ लोग।

मनुसता कूं खात हइ, ‘रैदास’ जाति का रोग।।’’

‘‘जंन्म जाति मत पूछिए, का जात अझ पात।

उपिज सभ एक बूंद से, का बाह्मन का सूद।।’’

‘‘जन्म जात मत पूछिए, का जात अरू पाज।

रैदास’ पूत सभ प्रभु के, कोउ नहिं जात कुजात।।’’

संत शिरोमणी यह भी कहते है कि कोई जन्म से नीच एवं छोटा नही होता, क्योंकि किसी भी व्यक्ति का किसी परिवार में जन्म लेना उसके हाथ में नही रहता। व्यक्ति केवल अपने गुणों, मानव सेवा एवं अपने कर्मो की वजह से ही छोटा-बड़ा, ऊँचा-नीचा होता है। व्यक्ति के ओछे कर्म ही उसको छोटा करते है, इसलिए उन्होने कहां कि किसी भी व्यक्ति को जन्म के आधार पर महान बताना गलत है। इसलिए रविादास जी की वाणी का पालन करते हुए हमे कर्मशील व्यक्ति का सम्मान करना चाहिए, तभी संत के अनुयायी माने जावेगे, जैसे कि उन्होने स्वयं स्पष्ट किया है।


13. ‘‘रविदास’ जनम कै कारनै, होते न काउ नीच।

नर कूं नीच करि डारि है, ओछे करम कौ कीच।।

संत ने पराधिनता और पराधीन व्यक्ति को एक प्रकार से अभिषाप और पाप के समान माना है उनका कहना है कि गुलाम व्यक्ति हमेषा अपने अधिकारों की मांग नही करता है, क्योंकि वह मन से ही डरा हुआ होता है। इसलिए सबल व्यक्ति निर्बल कों अधिकारों से वंचित कर देता है। यही वजह है कि उसका जीवन पशु के समान हो जाता है और वह एक गुलाम के जैसे ही जीवन व्यतित करता है इसलिए उससे कोई प्रेम नही करता है बल्कि सब उसका तिरस्कार करते है, हीन भावना से देखते है, तथा रविदास ने यह तक कहां कि विदेषियों की दास्ता भी एक पाप के समान है, इसलिए उन्होने स्वराज की विचारधारा को भी लोगों तक पहुंचाया। इस प्रकार उन्होने समाज के व्यक्तियों को आत्मनिर्भर बनने का संदेष दिया था जिससें की वह किसी के पराधीन न रहे। जैसा कि उन्होेने स्वयं स्पष्ट किया है।

14. ‘‘जो जन संत सुमारगी, तिन पांय लागो ‘रविदास’।’’

संत शिरोमणी के ज्ञान और तप को स्वीकारते हुए, झालावाड़ की रानी रत्न कुवारी एवं मीराबाई सहित कई राजाओं ने संत शिरोमणी को अपना गुरू स्वीकार किया। इन्होने गुरू की जाति नही, बल्कि उनके ज्ञान के सामने नत मस्तक होकर दंड़वत हुये, जैसा कि प्रियादासजी लिखते है कि

15 ‘‘बसत चितोर मांझ रानी इक झाली नाम,

नम बिन कान खाली आनि षिष्य भई है।

मीराबाई के जैसे ही संत रविदास जी की दूसरी शिष्या झाला की रानी थी, इसके प्रमाण भी नाभादास रचित भक्तमाला की प्रियदास टीका से होती है। राजस्थान के ऐतिहासिक विवरणों में झाला रानी को राणा कुंभा, राणा रायमल एवं राणा संगा के परिवार से बताया गया है। इस प्रकार हम कह सकते है कि ज्ञान, जातिवाद से ऊपर उठकर है। जैसे मीराबाई और रानी झाला ने जातिवाद की सीमाओं को तोड़कर रैदास को अपना गुरू बनाया। प्रसिद्ध इतिहासकार कर्नल टाड ने राणा कुंभा की पत्नि झाला की रानी को बताया। ऐसा कहां जाता है कि राणा रायमल की 11 पत्नि थी, उसमें से एक झाला भी थी। यही नही 1760 विक्रम संवत् में जन्म लेने वाले चरणदास के षिष्य संत नित्यानंद जी अपने ग्रंथ भक्तमाला में श्री रविदास कथा के तहत् द्रविड़ देश की रानी द्वारा संत रविदास का शिष्य बनने का भी उल्लेख किया है।

16. गुरू मिलिया रैदास जी, दीन्ही ज्ञान की गुटकी।।

राजस्थान एवं रविदासजी के दोहो से यह ज्ञात होता है कि मीरा, राणा दूदा की पुत्री व राणा जयमल की पत्नि थी। वह कृष्ण उपासक थी, इन्होने भी रैदास के जैसे सामाजिक बुराईयों को दूर करने के लिए कई प्रयास किये। इनका पितृ पक्ष मेड़तिया राठौड़ एवं ससुराल पक्ष सिसोदिया वंष का था। मीराबाई की भक्ति एवं रैदास की षिष्या होने की वजह से दोनों पक्ष मीरा का विरोध किया करते थे। परन्तु मीरा बाई रैदास को अपना गुरू मान चुकी थी। एक बार मीरा बाई ने अपने गुरू रैदास को भोज पर आमंत्रित किया। इनके साथ कई ब्राह्मणों को भी बुलाया, परन्तु जातिवाद व्यवस्था का पालन न करते हुए मीराबाई ने रैदास को न केवल भुलाये गये ब्राह्मणों के साथ बैठाया बल्कि अपना गुरू होने के नाते उनको उच्च स्थान पर बैठाया। इसका विरोध सभी ब्राह्मणों ने किया बल्कि कुछ ऐसे ब्राहम्णों ने किया जो रैदास की प्रतिष्ठा एवं उनके ज्ञान से र्दूभावना रखते थे, क्योंकि रैदास भक्तिकाल के उच्च गुरूओं में से एक थे। कुछ ब्राह्मण इसी वजह से जब उनके ज्ञान का मुकाबला नही कर पाते तब ऐसे कुछ लोग ही रैदास की जाति चमार के नाम पर उनको अपमानित करने का प्रयास करते थे। ऐसे ही कुछ लोगों को मीरा बाई ने खूब समझाया, परन्तु जब यह अपनी जिद्द पर कायम रहे, तब मीराबाई ने रैदास का पक्ष लिया और ऐसे ही कुछ ब्राह्मणों ने रैदास के विरूद्ध लोगों को भड़काने का कार्य किया। संत रविदास ने केवल अपनी वाणी के माध्यम से ही अपना पक्ष रखा, कभी-भी उनहोने चिढ़कर एवं हिंसा अपनाकर अपने विरोधियों को अपमानित नही किया। ऐसे ही रविदास जी से प्रेरणा लेकर हम लोगों को अपने ज्ञान एवं अनुभव से धेर्य पूर्वक अपने विरोधियों का सामना करना चाहिए, जैसे कि रैदासजी ने किया। हिंसा आपके परिवार एवं समाज का वैचारिक एवं आर्थिक नुकसान ही करेगी और न्यायालय, पुलिस आदि व्यवस्थाओं में आपका कमाया हुआ धन बर्बाद हो जायेगा, इसलिए षिक्षा ही शोषण का अंत कर सकती है।

17 जिस ग्रह पुत्र सुषील गुएा, मद मंगल अनुराग।

सुख सम्पति आनन्द अति, जानो पूरण भाग।

संत रविदास ने अपने पदों में यह भी बताया कि परिवार, पुत्र कैसा होना चाहिए। जिससें परिवार एवं समाज मे वह सकारात्मक कार्य कर सके। जिस घर में सुशील एवं गुणवान पुत्र हो तो आन्नद एवं मंगल का वातावरण बना रहता है। जिस परिवार में सुषील एवं गुणवान पुत्र हो वह संपत्ति एवं खुषीया बनी रहती है।


18 घर-घर विद्या पढ़ो सब कोई। कसमल भाव न प्रकट कोई।।


संत रैदास ने शिक्षा के महत्व को समझा, इसलिए षिक्षा और ज्ञान के बल पर ही अपनी योग्यता को स्वीकार करवाने के लिए समाज के उन वर्गो को विवष किया, जो जातिवाद के पोषक थे। रविादास जी कहते है कि घर-घर में षिक्षा को बढ़ाया जाये, घर-घर विद्या का विकास हो। तभी व्यक्ति के मन में बुरे एवं कसमल भाव प्रकट नही होगे, इसलिए जो रैदास जी को मानते है वह अपने बच्चों को षिक्षित करे। तभी हम रैदास के पद चिन्हों पर चलकर आगे बड़ेगे। इतना बड़ा संदेष लगभग 600 वर्ष पूर्व रैदास जी हमारे लिए छोड़ गये, लेकिन हम लोग ने षिक्षा के महत्व को नही समझ और आज भी अषिक्षा की वजह से हमार