क्या चूका पाएंगे बौद्धिक ऋण ,हिन्दुस्थान का , अरब मुस्लिम देश ?




अंक - 5

भारत की संस्कृति] सभ्यता] तकनीक] विज्ञान और यहाँ के साहित्य] ज्योतिष आदि कलाओं से अरब और मुस्लिम देशों के नागरिक बहुत अधिक प्रभावित ही नही थे] बल्कि भारत के प्रति सम्मान प्रदर्शित किया करते थे। कई संस्कृत गंzथों का अरबी एवं फारसी भाषा में अनुवाद कर भारत की विधाओ को अरब एवं मुस्लिम देशों तक पहुँचाया। पिछले अंक में अरब और भारत के व्यापारिक संबंधों का विवरण किया गया था। भारत और अरब के बीच केवल व्यापारिक संबंध ही स्थापित नही थे बल्कि और कई उद्देश्यों एवं परस्पर आवश्यकताओं की वजह से पहली हिजरी शताब्दी के आखरी में (लगभग 612 ई.वी.) ही लोगों का भारत में आना-जाना बहुत अधिक बढ़ गया था। सन् 93 हिजरी अर्थात 612 ई.वी. के आसपास जब मोहम्मद बिन कासिम ने सिन्ध के एक छोटे से नगर में पहुंचा, तब उसे यह पता चला कि यहाँ के निवासी "बौद्ध धर्म"को मानने वाले थे।


संस्कृत से अनुवाद का प्रारम्भः-

अरब देश के लोगों ने सबसे पहले पहली हिजरी शताब्दी के बीच में ही दूसरी भाषाओं के ग्रंथों को अरबी भाषा में अनुवाद करने का निर्णय लिया और प्राथमिकता से भारत में लिपिबद्ध ग्रंथ संस्कृत को इन्होने अपनाया। इस समय अरबों का प्रशासनिक मुख्य केन्द्र शाम था और यहाँ "अब्बासी"वंश का दूसरा खलीफा मंसूर सन् 136 हिजरी में बादशाह हुआ था। यह विद्या, कला प्रेमी के साथ-साथ दूसरे देशों की संस्कृति को जानने के लिए इच्छुक था, इसलिये इसकी चर्चाऐं चारों तरफ होने लगी थी। सन् 154 हिजरी (771 ई.वी.) में गणित और ज्योतिष आदि का एक बहुत बड़ा पंड़ित अपने साथ कई ग्रंथ और सिद्धांत लेकर बगदाद पहुंचा। इसका उल्लेख बैरूनी की पुस्तक- "किताबुल हिन्द" में मिलता है, जिसका सम्मान खलीफा के द्वारा किया गया और खलीफा के दरबार में ही नियुक्त गणितज्ञ "इब्राहीम फिजारी"की मदद से पंड़ित ने अरबी में गणित के सिद्धांत का अनुवाद किया। यह एक तथ्य स्पष्ट करना आवश्यक है कि अरब लोग भारत के सभी विद्वान को पंड़ित कहाँ करते थे। पंडित से तात्पर्य जाति से नही विद्वान व्याक्ति से है और यह पहला अवसर था कि अरब के लोगों का सामना भारत के योग्य और अनुभवी विद्वानों से हुआ। इसके बाद लगातार चिकित्सा,ज्योतिष, वैध, गणितज्ञ, विष विज्ञान, सांपो की विद्या, संगीत शास्त्र, युद्ध विद्या, रसायन, तर्क शास्त्र, अलंकार शास्त्र, इन्द्रजाल, सदाचार और नीति, खेल, मंनोरंजन,धार्मिक संबंधी आदि पुस्तकों का अनुवाद हुआ।


भारत का गुणगान करने वाले अरबी विद्वान् :-

इन्ही सब वजहों से अरबों के हृद्रय में भारत के लिए बहुत अधिक आदर एवं भाव हुआ करता था। इस संबंध में पढ़ने वालों के लिए दो-तीन पुराने ग्रंथकारों के विचार बताना बहुत आवश्यक है। पहला व्यक्ति "जाहिज" है। यह अपने समय का प्रसिद्ध लेखक,दार्शनिक और तार्किक था। यह बसरे का निवासी था, इसलिए इसके भारत से घनिष्ठ संबंध थे और इसका देहांत 255 हिजरी (लगभग 872 ई.वी.) में हुआ और इसने भारत पर एक छोटा निबंध लिखकर भारत की विशेषताऐं दुनिया तक पहुंचाई। यह कहता है कि भारत में दो गोरी एवं काली जातियाँ पाई जाती है, परन्तु यह काली जातियों के पक्ष में था क्योकि इनके अधिकांश लोग शांति प्रिय एवं बौद्ध मत को मानने वाले थे। जाहिज इस संबंध में कहता है कि-

‘‘ "परन्तु हम देखते है कि भारत के निवासी ज्योतिष और गणित में बढ़े हुए है और उनकी एक विशेष भारतीय लिपि है। चिकित्सा में भी वे आगे है और इस शास्त्र के वे कई विलक्षण भेद जानते है। उनके पास भारी रोगों की विशेष औषधी होती है। फिर मूर्तियाँ बनाने, रंगों से चित्र बनाने और भवन आदि बनाने में भी वे लोग बहुत अधिक योग्य होते हैं। शतरंज का खेल उन्ही का निकाला हुआ है, जो बुद्धिमता और विचार का सब से अच्छा खेल है। वे तलवारें बहुत अच्छी बनाते है और उनके चलाने के करतब जानते हैं। वे विष उतारने और पीड़ा दूर करने के मन्त्र जानते है। उनका संगीत भी बहुत मनोहर है। उनके एक साज का नाम "कंकलः" है, जो कद्दू पर एक तार को तानकर बनाते है और जो सितार के तारों और झाँझ का काम देता है। उनके यहाँ सब प्रकार का नाच भी है। उनके यहां अनेक प्रकार की लिपियाँ है। कविता का भण्ड़ार भी है और भाषओं का अंश भी है। दर्शन,साहित्य और नीति के शास्त्र भी उनके पास है। उन्हीं के यहां से कलेला दमना नामक पुस्तक हमारे पास आई है। उनमें विचार और वीरता भी है, और कई ऐसे गुण है जो चीनियों में भी नहीं है। उनके स्वच्छता और पवित्रता के भी गुण है। सुन्दरता लावणय, सुन्दर आकार और सुगन्धियाँ भी है। उन्हीं के देश से बादशाहों के पास वह ऊद या अगर की लकड़ी आती है, जिसकी उपमा नहीं हैं विचार और चिन्तन का विद्या भी उन्हीं के पास से आई है। वे ऐसे मंत्र जानते है कि यदि उन्हे विष पर पढ़ दें तो विष निरर्थक हो जाय। फिर गणित और ज्योतिष विद्या भी उन्हीं ने निकाली है। उनकी स्त्रियों को गाना और पुरूषों को भोजन बनाना बहुत अच्छा आता है। सर्राफ और रूपये पैसे का कारबार करने वाले लोग अपनी थैलियाँ और कोष उनके सिवा और किसी को नही सौंपते। जितने (इराक में) सर्राफ है, सब के यहाँ खजानची खास सिन्धी होगा या किसी सराफी का काम करने का स्वाभाविक गुण होता है। फिर ये लोग ईमानदार और स्वामिनिष्ठ सेवक भी होते है।"

भारत के गुणगान करने वाला दूसरा व्यक्ति याकूबी था, यह यात्री, इतिहासकार एवं लेखक विद्वान था। ऐसा कहा जाता है कि यह भारत में 278 हिजरी एवं लगभग 945 ई. पूर्व भारत में आया था। यह अपने इतिहास में भारत की कहानी सा पढ़ने वाला इतिहासकार था, यहाँ कहता है कि -

‘‘ "भारतवर्ष के लोग बुद्धिमान और विचारशील हैऔर इस विचार से वे सब जातियों से बढ़कर है। गणित और फलित ज्योतिष में इनकी बाते सब से अधिक ठीक निकलती है। सिद्धांत उन्हीं की विचारशीलता का परिणाम है, जिससे यूनानियों और ईरानियों तक ने लाभ उठाया है। चिकित्सा शास्त्र में इनका निर्णय सब से आगे है। इस विद्या पर इनकी पुस्तक चरक और निदान है। चिकित्सा शास्त्र की इनक और भी कई पुस्तकें है। तर्क और दर्शन में भी इनके रचे हुए ग्रन्थ हैं और इनकी बहुत सी रचनाएँ हैं,जिनका बहुत बड़ा विवरण है।"

भारत की विशेषताओं को बताने वाला तीसरा व्यक्ति अबूजैद सैराफी था। यह हिजरी तीसरी शताब्दी अर्थात 900 ई.वी. के लगभग भारत में आया था। इसने भी भारत के विद्वानों के संबंध में खुलकर विचार ही नही रखे बल्कि इनको स्वीकार भी किया। यह कहता है कि- भारत के विद्वान् लोग ब्राह्मण कहलाते है। उनमें कवि भी हैं,जो राजाओं के दरबारा में रहते है, और ज्योतिषी,दार्शनिक,फाल खोलनेवाले और इन्द्रजाल जाननेवाले लोग भी है। ये लोग कन्नौज में बहुत हैं, जो जौज के राज्य में एक बड़ा नगर है। तात्पर्य यह कि खलीफा मन्सूर और हारूँ रशीद के संरक्षणों और बरामकी की गुणग्राहकता और उदारता के कारण भारत के बीसियों पंड़ित और वैद्य बगदाद पहुँचे और राज्य के चिकित्सा तथा विद्या विभागों में काम करने लगे। उन लोगों ने गणित और फलित ज्योतिष,चिकित्सा, साहित्य और नीति के बहुत से ग्रन्थों का अरबी में अनुवाद किया। दुःख यह है कि उन पंड़ितों के भारतीय नाम अरबी रूप में जाकर ऐसे बदल गए है कि आज ग्यारह-बारह सौ बरसों के बाद उनका ठीक ठीक रूप और उच्चारण समझना एक प्रकार से असम्भव सा हो गया है। कदाचित् इसका एक कारण यह भी है कि मेरे विचार से इनमें से अधिक लोग बौद्ध धर्म के अनुयायी थेऔर उस समय के नामों के ढंग से आजकल के वैदिक नामों के ढंग से बिलकुल अलग है। फिर इनमें से कुछ नाम ऐसे भी हैं जो नाम ही नही, बल्कि उपाधि है। इन भारतीय नामों की अरबी में ठीक वैसी ही काया पलट हो गई है, जैसी अरबी नामों की युरोप की भाषाओं में हो गई हैं।


खलीफा द्वारा आमंत्रित भारतीय विद्वान् एवं उनकी पुस्तकों का अनुवाद:-

इस प्रकार अरबी इतिहासकारों,यात्रीयों, व्यापारियों, जो लगातार भारत में आया जाया करते थे इनके द्वारा भारत की विशेषताओं का न केवल वर्णन किया बल्कि अपने शब्दों में कागज के पन्नों पर बड़ी खूबसूरती से उकेरा। अरब इतिहासकारों के लेखों एवं विवरणों में भारत के कई विद्वानों के नाम आये है, इनमें चिकित्सक एवं वैद्य भी शामिल है। बहला, मनका,बाजीगर, (विजय कर) फलबरफल (कल्पराय कल), सिन्दबाद। ये सब नाम इतिहासकार जाहिज ने सन् 255 हिजरी अर्थात लगभग 872 ई.वी.में दिये और वह कहता है कि इन सबकों "यहिया बिन खालिद बरमकी"ने भारत से सम्मानपूर्वक बगदाद आमंत्रित किया था। ये सब चिकित्सक और वैद्य थे। बाद में मनका और बहला के पुत्र शायद मुसलमान हो गये थे, जिनका नाम सालह था। इब्न नदीम ने कहा है कि जो विद्वान भारत से गये थे यह तीनों बगदाद में प्रसिद्ध वैद्यों की गिनती में आया करते थे। यही नही इनके चिकित्सा और ज्योतिषी ग्रंथों का अरबी अनुवाद हुआ था। ये नाम इस प्रकार है- बाखर, राजा, मनका, दाहर, अनकू, जनकल, अरीकल, जब्भर, अन्दी, जबारी। इन सब का उल्लेख फेहरिस्त इब्न नदीम चिकित्सा और ज्योतिष के ग्रंथो में मिलता है।

मनका उर्फ माणिक्य नाम का वैद्य के संबंध में इब्न अबी उसैबअ ने अपनी पुस्तक तारीखुल् अतिब्बा में लिखा है कि मनका वैद्य चिकित्सा शास्त्र का बहुत बड़ा पंड़ित था। एक बार हारूँ रशीद बहुत बीमार पड़ा। बगदाद के सब चिकित्सक उसकी चिकित्सा कर के हार गए। तब एक आदमी ने भारत के इस चिकित्सक का नाम लिया। यात्रा का व्यय आदि भेजकर यह बुलाया गया। इसकी चिकित्सा से खलीफा अच्छा हो गया। खलीफा ने इसको पुरस्कार आदि देकर मालामाल कर दिया। फिर यह राज्य के अनुवाद विभाग में संस्कृत पुस्तकों के अनुवाद का काम करने के लिये नियत किया गया। क्या हम इस मनका नाम को माणिक्य समझे।

साहले बिन बहला यह भी भारतीय चिकित्सा शास्त्र का पंडित था। यह अपने हुनर में माहिर होने की वजह से इब्न अबी उसैअब ने भारत से बुलाया था। बगदाद पहुंचकर एक अवसर पर जब खलीफा हारूँ रशीद के चचेरे भाई को मिरगी का रोग होने की वजह से बहुत परेशान थे,तब दरबार के प्रसिद्ध युनानी ईसाई चिकित्सक जिबरईल बखतीशू ने यह कहां था कि अब यह ज्यादा दिनों तक जीवित नही रह सकते। तब जाफर बरमकी ने इस भारतीय चिकित्सक को दरबार मे उपस्थित किया और साहले चिकित्सक के उपचार से मिरगी का रोग खत्म हो गया,तब दरबार में खलीफा हारूरशीद ने चिकित्सक का सम्मान किया।

इब्न दहन यह भी विद्वान चिकित्सक था और इसने संस्कृत से अरबी में अनुवाद करने का काम किया। जैसा कि फ्रेहरिस्त इब्न नदीम में इसका उल्लेख है। प्रो. जखाऊ ने "इंडिया" नामक ग्रंथ की भूमिका में इस दहन का मूल रूप जानने की कोशिश की। इसके अनुसार दहन को धन्य् या धनन कहाँ और यह नाम भारतीय चिकित्सक धनवन्तरि से मिलता जुलता है, जो मनु के धर्म शास्त्र में देवी-देवताओं का वैद्य कहा गया है। इसका उल्लेख भी फ्रेहरिस्त इब्न नदीम पृ. 243 में किया गया है। इस प्रकार गणित, ज्योतिष, फलित ज्योतिष, चिकित्सा, नीति संबंधी कथाऐं, राजनीति, खेल और तमाशे आदि संस्कृत पुस्तकों का अनुवाद दहन अर्थात धन्य ने अरबी में किया। यह चिकित्सक बरमकियों के चिकित्सालय का प्रधान था। इसका उल्लेख पृथक से अगले अंक में किया जावेगा।


भारत से सीखा अंक गणित, चिकित्सा, जोतिषी आदि :-

अरब वालों एवं अरब के नागरिकों ने यह स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि उन्होने 1 से 9 तक के अंक, लिखने के ढंग और तरीका केवल हिन्दू से सिखा है। यही वजह है कि अरब वाले उक्त अंकों को हिन्दसा और इस प्रणाली को हिसाब हिन्दी या हिन्दी हिसाब कहते है। यही नही इस प्रणाली को अरबों से यूरोप की जातियों ने सीखा। यह स्पष्ट तो नही है कि अरबो ने यह ढंग हिन्दूओं से कब सीखा और समझा। फिर भी सन् 176 हिजरी अर्थात 773 ई.वी. के लगभग सिन्ध से, जो पंड़ित सिद्धांत लेकर मन्सूर के दरबार में बगदाद गया था उसी ने अरबों को अंक लिखने का ढ़ंग सीखाया। यही नही इब्न नदीम ने इन भारतीय अंकों को सिन्धी अंक कहकर उद्वत किया है और हजार तक लिखने का ढंग बतलाया। इससें स्पष्ट होता है कि अरबी में यह ढंग सिन्धी पंड़ितों के द्वारा ही चला है। अली बिन अहमद नसवी वह दूसरा व्यक्ति था, जिसने मुसलमानों में भारतीय गणित का प्रचार किया। इस प्रकार मुसलमानों में भारतीय गणित की प्रतिष्ठा और आदर में किसी भी प्रकार की कमी नही हुई। इस को पढ़कर लोगों को यह आश्चर्य होगा कि भारतीय गणित अरबवासियों के घर-घर में जा चुका था। प्रसिद्ध मुसलमान हकिम और दार्शनिक "वूअली सैना" ने सन् 428 हिजरी अर्थात 1015 ई. में भारतीय हिसाब एवं अंक एक "कुँजड़" से सीखा था, जो भारतीय गणित का जानकार था।

सन् 770 ई.वी. के लगभग सिन्ध से जो प्रतिनिधि मंड़ल बगदाद गया था इसके साथ प्रसिद्ध भारतीय गणितज्ञ भी था, जो अपने साथ एक गणित की पुस्तक लेकर गया था। संस्कृत इस पुस्तक का नाम "बृहस्पति सिद्धांत" था, जिसका अरबी में अनुवाद किया। यह पुस्तक "अस्सिंद हिन्द"के नाम से अरब में प्रसिद्ध हुई। इसके बाद संस्कृत की एक ओर पुस्तक का अरबी में अनुवाद किया गया,जिसकों नाम "अरजबन्द"रखा गया और यह शुद्ध रूप से संस्कृत रूप आर्यभट् के सिद्धांत का ही अनुवाद था। तीसरी पुस्तक "अरकन्द"थी और यह असल में संस्कृत भाषा की खंडन-खादाक का अरबी अनुवाद था। यही वजह रही कि अरबी लोग भी भारतीय विद्वानों के ज्ञान से प्रभावित होकर उनके शिष्य बनने लगे। इनमें से एक इब्राहीम फिजारी और दूसरा याकूब बिन तारिक था और इन्होने ही अपने अपने ढंग से अरबी रूप दिया। यही नही भारतीयों के ग्रह संबंधी ज्ञान भी अरबों ने भारत से ही सीखा। संस्कृत में ग्रहों को "कल्प" कहाँ जाता है,चन्द्र, सूर्य, शनि, बृहस्पति, आदि सातों सितारों, जिनको अरब लोग "सबअ (सात) सैयारा"कहते है। ब्रह्मगुप्त के हिसाब से एक कल्प में 4 अरब 32 करोड़ वर्ष होते है और फिर इन्ही से दिनों का हिसाब लगाया जा सकता है। अरबों ने इसी कल्प का नाम "सनी उस्सिंद हिन्द"सिद्धांत के वर्ष और दिनों का नाम "अय्यामुस्सिंद हिन्द" रखा।

अरब यात्रीयों एवं व्यापारियों को करोड़ों का हिसाब लगाना बहुत कठिन होता था इस लिए पाँचवी शताब्दी के अन्त में आर्यभट् ने सरलता के विचार से कल्प के कई हजार भाग कर लिए और उसीके अनुसार गणना स्थापित की। इन्हीं भागों का नाम युग और महायुग है। इस सिद्धांत का आर्यभट का जो ग्रन्थ है, उसका अरब लोग "अरजबहर"या "अरजबहज"और युग को "सनी अरजबहज" अर्थात आर्यभट के वर्प कहने लगे। सन् 161 हिजरी में याकूब बिन तारिक ने भारत से आने वाले किसी पंड़ित से अरकन्द अर्थात खंड़ या खंडीत पद्धति सीखी। यह भी भारत के विद्वान ब्रहागुप्त की रचना है। परन्तु कुछ ही इसके बाते अलग है और अरब वासियों ने जो पुस्तके संस्कृत से अरबी में की गई, इन्ही के सिद्धांतों का प्रचार-प्रसार किया। यही नही बाद में युनानी पुस्तकों का भी अनुवाद किया गया, जिसमें से मुख्य पुस्तक "मजिस्ती"हैं। इसका भी अनुवाद अरबी में किया गया था।

अरबों की ज्योतिष विद्या उनकी नई-नई जाँचों और अन्वेक्षणों की वजह से लगातार उन्नती की सीढ़ीयां चढ़ रही थी और इसका मुख्य कारण भारतीय ज्योतिष था यही वजह है कि अरबी ज्योतिष में संस्कृत का एक पुराना पारिभाषिक शब्द "कर्दज"हैं जिसका मूल संस्कृत रूप क्रमज्या है। परन्तु अब इसका उपयोग बहुत कम रह गया है। बाद में इसको अरबी भाषा में "वतर मुस्तबी"बना लिया। दूसरा शब्द अरबी गणित और त्रिकोणमीति में उपयोग होता है, जिसे "जैब"शब्द कहते हैं,जिसे अरबी लोग अरबी भाषा का ही समझते है, इसका अर्थ पहनने के कपड़े में "गला" होता है। यह संस्कृत शब्द "जीवा"का अरबी रूप है,बाद में इसी जैब शब्द से जेबुल्, तमाम, जयूब मन्कूसः, जयूब मब्सूतः और मजीब आदि पारिभाषिक शब्द बने है। इसी प्रकार संस्कृत का "उच्च"शब्द अरबी भाषा में "ओज"हो गया। इसी प्रकार भारतवासी यह समझते थे कि जो याम्योत्तर रेखा लंका में है, यही रेखा उज्जैयिनी मालवा की नगरी में भी होकर निकलती है, इसलिये सिद्धांत में इसी उज्जैन से देशांतर का हिसाब लगाया जाता हैं। अरब नागरिक भी उज्जैन को अपनी उच्चारण के अनुसार "उजैन"कहने लगे और यह इसी को पृथ्वी का गुम्बद या कुब्बतुल अर्ज मानते थे। बाद में अरब वासियों ने उज्जैन के जै शब्द को हटाकर उरैन कहकर संबोधित करने लगे। इसका विस्तृत उल्लेख मुसलमान दार्शनिक शरीफ जुरजानी ने अपनी पुस्तक "किताब तारीफात"में लिखा है कि- अरब के पुराने ज्योतिषियों ने एक और शब्द "बजमास"का व्यवहार किया है। यह संस्कृत के "अधिमास"शब्द से निकला है,जिसका अर्थ अधिक मास या वह चन्द्रमास है, जो दो संक्रान्तियों के बीच में पड़ता है। कुछ लोग भूल से यह समझते है कि अरबी में गणित और अंकों या उनके सांकेतिक चिन्हों का जो हिन्दसा कहते हैं, उसका कारण भी यही है कि इनका हिन्द अर्थात भारत से संबंध है। और आश्चर्य है कि विशेष विद्वता होने पर भी एक अँगरेज विद्वान भी जिसने मूसा ख्वारिज्मी की किताबुल् जब्र वल् मुकाबिला सन् 1831 ई. में लन्दन से प्रकाशित की है और जिसका नाम फ्रेडरिक रोसन है, इसी भ्रम में पड़ना चाहता है। वास्तव में यह फारसी का "अन्दाजा" शब्द है,जिसे यह अरबी रूप दिया गया है और जिसका अरबी में क्रिया का रूप "हन्दज"और "हन्दस" है। वास्तव में यह इंजीनिरिंग या वास्तुविद्या के अर्थ में है। पीछे से लोग भूल से फारसी और उर्दू में हिन्दसबोलने लगे और इससे संख्या आदि का अर्थ लेने लगे। और नही तो शुद्ध शब्द 'हिन्दस'नही बल्कि 'हन्दस'है। इसी लिये अरबी में "मुहन्दिस"इंजीनियर को कहते है,गणित जानने वाले को नही कहते।

अरबों ने भारतीय ज्योतिष शास्त्र के जो सिद्धांत अपने यहाँ लिए है, उनमें से दो बातें ऐसी हैं जो आजकल की जाँच में भी ठीक उतरी हैं। ब्रह्मगुप्त ने वर्ष 365 दिन, 6 घंटे, 12 मिनट और 9 सेकेण्ड़ निश्चित किए हैऔर आजकल की जाँच से 365 दिन,6 घंटे, 9 मिनट,9सेकेंड़ है। इसी प्रकार पृथ्वी की गति का प्रश्न है। आर्यभट और उसके पक्ष के लाग यह मानते थे कि पृथ्वी घूमती है और इस संबंध में आर्यभट पर जो आपत्तियाँ की जाती है, ब्रह्मगुप्त ने कहा कि वे आपत्तियाँ ठीक नही है और यही सिद्धांत आजकल भी ज्यों का त्यों लोगों में माना जाता है।

भारतवर्ष से अरबों को जो तीसरी विद्या मिली वह थी भारतीय चिकित्सा। इसकी कुछ पुस्तके उम्बी वंश के समय में सुरयानी और युनानी भाषाओं के द्वारा अरबी भाषा में हो चुकी थी। परन्तु जब इराक में अब्बासी वंश का राज हुआ तब चिकित्सा शास्त्र की बहुत अधिक उन्नती हुई थी, जैसा कि हारून रशीद का उपचार करने के लिए भारत से मनक (माणिक्य) नाम का वैद्य इराक बुलवाया गया था और इसके उपचार से ईराक का खलीफ स्वास्थ्य हो गया था। इसी लिये भारतीय चिकित्सा की ओर अरबों का विशेष ध्यान गया। यही वजह रही कि वहाँ के चिकित्सालय के प्रधान चिकित्सक भी भारतीय था। जैसा कि हम ऊपर पढ़ चुके है। बाद में याहिया बिन खालिद बरमकी ने अपना एक दल केवल भारत इसलिये भेजा कि वह भारत में आकर यहाँ की चिकित्सा को सीख सके एवं जड़ी-बूटीयों का ज्ञान हो सके। यही नही एक भारतीय वैद्य को ईराक के सरकारी भाषा अनुवाद विभाग का अधिकारी नियुक्त किया था, जो संस्कृत की चिकित्सा पुस्तकों का अरबी अनुवाद किया करता था।

हिजरी तीसरी शताब्दी में खलीफा मवफ्फिक बिल्लाह अब्बासी ने कुछ आदमी भारत भेजे थे, ताकि वह भारत की जड़ी बूटीयों और दवाओं की जांच करे। यह लेखक जाखऊ ने इंडिया की भूमिका नामक पुस्तक में इसका उल्लेख किया है। खलीफा मोतजिद बिल्लाह अब्बासी ने (सन् 279 हि.) ने अहमद बिन खफी दैलमी को जो गणित विद्या और तारों आदि की दूरी नापने का विद्वान था, इसको विशेष रूप से भारत भेजा था,बाद में इन्ही खलीफाओं ने सिन्ध के साथ विद्या विषयक् और दूसरी विद्याओं में संबंध स्थापित किये। सन् 280 हिजरी के शव्वाल मास में जब देवल (सिन्ध का बन्दरगाह) में बहुत बड़ा चन्द्रग्रहण लगा और साथ ही भूकंप आया। इसमें लगभग डेढ़ लाख आदमी दब कर मर गये। तब खलीफा को यह समाचार उनके भारत भेजे गये प्रतिनिधि मंड़ल ने तुरंत भेजा। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारत के शासकों और खलीफाओं के मधुर संबंध स्थापित थे। जिन संस्कृत की चिकित्सा सम्बन्धी पुस्तकों को अरबी में अनुवाद किया गया। उसमें से दो पुस्तके बहुत प्रसिद्ध है एक "सुश्रुत" जिसे अरब के लोग "ससरो"कहते है। इस पुस्तक में रोगों के लक्षण, उपचार और औषधियों का विवरण है इसका अनुवाद भी अरबी में याहिया बिन खालीद बरमकी की आज्ञा से पंड़ित मनका अथवा माणिक्य ने किया था। दूसरी पुस्तक चरक की है चरक संहिता है। यह भारतीय चिकित्सा शास्त्र का स्तम्भ है। इस पुस्तक को पहले फारसी में बाद में अब्दुलाह बिल अली ने इसका फारसी से अरबी अनुवाद किया।

अरबी भाषा में दो शब्द सब से बढ़कर विलक्षण है( जिनमें से एक जो दवा का नाम है और दूसरा खाद्य पदार्थ का। दवा में इतरीफल है, जो इतना अधिक प्रसिद्ध है और प्रत्येक चिकित्सक और रोगी जिसका व्यवहार करता है। हिजरी चोथी शताब्दी में मुहम्मद ख्वारिज्मी ने लिखा है- यह हिन्दी शब्द तिरीफल (त्रिफला) है। यह तीनो फलों अर्थात हर्र, बहेड़े और आँवले से बनता है।’’ इसी प्रकार की एक और दवा का नाम अंबजात है। ख्वारिज्मी कहता है- भारत में आम नाम का एक फल होता है। उसी को शहद, नीबू और हर्रे में मिलाकर ‘‘अंबजात’’ बनाते है।’’ सम्भवतः इसको गुडम्बा या आमों का अचार या मुरब्बा कहना चाहिए। लेकिन इन सब से बढ़कर विलक्षण शब्द ‘‘बहत’’ (या भतः है, जिसके सम्बन्ध में ख्वारिज्मी ने यह कहा है-‘‘ यह एक प्रकार का रोगियों का भोजन है। यह सिन्धी शब्द है। यह दूध और घी में चावल को पकाकर बनाया जाता है।’’ आप समझे यह हमारा हिन्दुस्तानी भात है, जो अरबों के विचार से रोगियो के लिये एक हल्का भोजन होगा। अब आप इसको चाहे खीर समझिए और चाहे फीरीनी।

अरब वासियों ने न केवल चिक