कारागार का इतिहास एवं संवेदनाएँ !


कारागार का इतिहासः-

अपराध एक सार्वभौमिक प्रक्रिया है, इसलिये अपराध हर युग एवं हर समाज में किसी न किसी रूप में पाया जाता है अथवा इसको देखा जा सकता है। कभी-भी कोई समाज प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक एवं वर्तमान में अपराध मुक्त नही रहा है। इसलिये समाज को अपराधियों से एवं अपराध से सुरक्षा देने के लिये एक ऐसे स्थान का चयन किया गया, जिसमें अपराध करने वाले व्यक्तियों को एक स्थान पर रखा जा सके, जिससें की इनको अपने कृत्य पर पायश्चित करने का पर्याप्त अवसर मिल सके। इन स्थानों को कारागार, जेल अथवा बंदी गृह आदि नामों से पुकारा जाता है। यह वह स्थान है, जहां पर अपराधियों को रोका जाता है। जैसा कि सन् 1894 ई.वी. के अधिनियम में बंदीगृह की परिभाषा इस प्रकार की गई है- "बंदीगृह राज्य सरकार द्वारा परिभाषित वह स्थान है जहाँ बन्दियों को स्थायी अथवा अस्थायी रूप से रखा जाता है।"


1. फेयरचाइल्ड- एक दण्ड़ देने वाली संस्था जिसका संचालन या तो राज्य अथवा संघीय-सरकार करती है और जिसका उपयोग केवल प्रौढ़ अपराधियों के लिये होता है, जिनकी सजा एक वर्ष से अधिक की होती है।


2. सेथना- कारागृह (अर्थात कैदखाना) कारावास के लिए होते हैं। वे व्यक्ति भी, जिन पर मुकदमा चल रहा है, कारागार में रखे जाते हैं। इन स्थानों में अपराधी को सुधार के लिए रखा जाता है।

"सरल शब्दों में बन्दीगृह एक दण्ड-संस्था है जो राज्य द्वारा संचालित होती है तथा जिसमें रखकर अपराधियों को दण्ड दिया जाता है और उन्हें सुधारा जाता है।" बंदीगृह नामक दण्ड संस्था का विकास क्यों हुआ, अपराधियों एवं आरोपियों को बंदीगृह में क्यो रखा जाता है? क्या बंदीगृह मात्र दण्ड की संस्था है या इसका अपराधियों के सुधार से भी संबंध है?बंदीगृह में रहने वाले अपराधियों एवं आरोपियों का पुनर्वास करना भी उद्देश्य है, ऐसे अनेक प्रश्न जिनके उत्तर में बंदीगृह का इतिहास और उद्देश्य छुपा हुआ है। बंदीगृह का मुख्य उद्देश्य शासन अथवा शासक की शक्ति को प्रदर्शित करना है और वह इसके माध्यम से वह जब चाहे, जब भी चाहे,जब भी जैसा चाहिऐ आरोपियों को दण्ड़ दे सकता है। परन्तु शासक का दूसरा उद्देश्य यह भी होता है कि वह अपराधी को पश्चताप करने के लिये भी समाज से अलग कर बंदीगृह में रख देता हैं,जिससें की उसको अपने कृत्य पर पश्चतावा हो सकें और उस व्यक्ति को अपनी गलती की अनुभूति होने पर वह स्वयं में सुधार ला सकता है, जिससें की पुनः अपराध की ओर प्रेरित न हो सके।

भारत में बंदीगृह का इतिहास अत्यंत प्राचीन हैं और इनमे समय-समय पर बदलाव किये गये। वैदिक युग में किसी भी प्रकार से जेलों का उल्लेख तो नही पाया जाता है, परन्तु उस समय का मानव समाज का इतिहास सत्य और असत्य,पाप और पुण्य के संघर्ष की कहानियाँ एवं इस प्रकार की विचारधारा पर आधारित था। वैदों में परमात्मा को न्यायाधीश की संज्ञा दी गई हैं। अच्छे कर्म करने वालों को स्वर्ग एवं बुरे कर्म करने वालों को नर्क में रखने का उल्लेख मिलता हैं, इसलिये शायद नर्क के स्थान को ही कारागार की संज्ञा दी गई होगी। स्मृति युग में कौटिल्य के अर्थशास्त्र से ज्ञात होता है कि कैदी से निष्क्रय लेकर रिहा कर दिया जाता था, जैसे सेवा, बेगार, शारीरिक दण्ड या जुर्माने के रूप में होता था, परन्तु आज के जैसे कारागार का उल्लेख नही मिलता है। महाकाव्य युग, रामायण और महाभारत के अध्ययन से भी ज्ञात होता है कि उस युग में भी कारागार की व्यवस्था नही थी। महाभारत में इस बात का स्पष्ट उल्लेख है कि देवकी और वासुदेव को राजा कंस ने बंदीगृह में ही रखा था और भगवान कृष्ण का जन्म भी मथुरा के कारागार में हुआ था। परन्तु बंदीगृह नही थे, यह केवल मात्र किलों के अन्दर बने हुये गुप्त तहखाने थे, लेकिन इनको कारागार नही कहाँ जा सकता हैं। ऐसे ही रामायण काल में भी रावण ने सुर्य,चंद्र, वायु तथा अन्य देवी-देवता भी बंदी बनाकर ऐसे स्थान पर रखे हुये थे, जिनकों बंदीगृह नही कहां जा सकता है। कंस ने अपने पिता उग्रसेन को भी बंदी बनाकर रखा हुआ था, जिनकों भगवान कृष्ण से कंस का वध करने के बाद मुक्त कराया था। अशोक वाटिका को भी बंदीगृह नही कहां जा सकता है, जिसमें सीताजी को रखा गया था। परन्तु पूर्व -बौद्धिक युग में कुछ हद तक बंदीगृह का अस्तिव मिलता है। उस समय के बंदीगृह अत्यंत कष्टदायक एवं पीड़ायुक्त थे। इनमे अपराधियों को बाँधकर रखा जाता था और उन्हें कभी-भी वजन के नीचे भी दबाने का उल्लेख मिलता है। जैसा कि डाँ. सेथना ने पूवै बौद्धिक युग के बंदीगृहों का वर्णन करते हुए लिखा है कि - "भारतवर्ष में बुद्ध के समय से पूर्व कारागृह निश्चित ही भयानक होते थे। उस समय जेल-कोठरियाँ होती थीं और बंदियों को जंजीरों और भारी वजनी पत्थरों से बाँधकर रखा जाता था और उन्हें किसी भी साधाराण बहाने पर कोड़े लगाए जाते थे।" अपराधियों एवं आरापियों को रखने के लिये विशेषकर पुराने किलों को चयन किया जाता था। यह इन स्थानों से भाग न सके, इसलिये इनको लोहे की जंजीरों, हथकड़ियों एवं बेड़ियों से लाँद दिया जाता था, जिसका वजन आपराधी व्यक्ति के समान या ज्यादा होता था; क्योंकि इस प्रकार के अपराधी देशद्रोही अथवा आक्रमणकारी, राज विरोधी हुआ करते थे और इनकों कई प्रकार की यातनाऐं भी दी जाती थी। इस प्रकार प्राचीन कारागार, जो किले का रूप हुआ करते थे, इनमें ही अपराधियों को रखा जाता था। उत्तर वैदिक काल एवं धर्म-शास्त्र कालीन युग में कारावास की चर्चा की गई है। इनमें आजीवन कारावास वाले बंदियों को रखा जाता था। विष्णुपुराण में किसी की आँख निकाल लेने एवं 03 बार से अधिक एक ही अपराध करने पर आजीवन कारागार का दण्ड देने का प्रावधान था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी कारागार व्यवस्था को उल्लेख मिलता है यही नही कारागारों का निर्माण कैसे किया जाये, इसका पहला उदाहरण कौटिल्य ने ही मोर्य काल में किया था; क्योंकि इस काल में कई विदेशी आक्रमणकारियों ने भारत में डेरा डाल लिया था। जिसका सामना नंदवंश का शासक घनानंद नही कर पा रहा था, जो जाति से नाई था। मोर्यवंश की राजधानी पाटलीपुत्र में स्त्री एवं पुरूषों को अलग-अलग रखने की व्यवस्था थी। यह कारागार किलों में बनी काल कोठरी एवं अंधकारमय हुआ करते थे, किसी भी प्रकार की रोशनी एवं सुख-सुविधाओं से पूर्णतः वंचित थे। मनु स्मृति में भी उल्लेख किया गया है कि कारागार का निर्माण राजमार्गो पर ही किया जाना चाहिए, जिससें की आने-जाने वाले नागरिकों को अपराध के प्रति भय उत्पन्न हो सके एवं लोगों में यह भावना भी उत्पन्न की जा सके कि अपराध सही रास्ता नही है।

अशोक के शासनकाल में भी कारागार का उल्लेख मिलता है,लेकिन यह भी वैसे ही थे, जैसे पूर्व में निर्मित किये गये थे। किसी प्रकार का बदलाव नही किया गया। मध्यकाल में भी पुराने किलों को ही कारागार के रूप में परिवर्तित किये गये,इनमें भी किसी भी प्रकार की रोशनी एवं सुविधाऐं नही रखी गई थी और यह अत्यंत कष्ट् दायक हुआ करते थे। परन्तु जैसे-जैसे समाज शिक्षित एवं विकसित हुआ,वैसे-वैसे जेलों का स्वरूप भी बदलता गया; क्योंकि गांवों का नगरीकरण एवं औद्योगिककरण से कई प्रकार की गड़बड़ीयां होने लगी,इसलिये वह लोग भी कारागारों में आने लगे,जिन्हे समाज में सम्मान प्राप्त था। वैसे सन् 1597ई.वी. से पूर्व जेलों का इतिहास व्यवस्थित रूप से उल्लेखित नही है,परन्तु यह स्वीकार करना होगा कि किसी न किसी रूप में जेले अस्तित्व में थी। परन्तु यह भी सच है कि आखेट अवस्था में जेलों का अस्तित्व बिलकुल नही था। भारत में मोर्यकाल के समय से ही पुरूष एवं महिलाओं को अलग-अलग स्थानों पर रखने का उल्लेख स्वयं अर्थशास्त्र के लेखक कौटिल्य ने किया है, परन्तु ऐसा विदेशों में नही था। वहां पर पुरूष, महिलाऐं एवं बच्चे एक साथ ही एक ही स्थान पर रखे जाते थे एवं किसी भी प्रकार का बंदियों का वर्गीकरण नही किया गया था। सभी प्रकार के अपराधों में निरूद्ध बंदी एक स्थान पर ही रखे जाते थे,परन्तु सन् 1593ई.वी. में इस बात को महसूस किया गया था कि स्त्री तथा पुरूष अपराधियों को एक साथ नही रखा जाये। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए सबसे पहले यूरोप के नीदरलैण्ड़ के ऐमस्टर्डम में स्त्रीयों के लिये पश्चिमी देशों में पहली जेल खोली गई,परन्तु भारत में महिलाओं के लिये प्राचीन काल से ही अलग रखने की व्यवस्था की गई थी, जैसे कि अशोक वाटिका में सीताजी को भी अलग रखा गया था। यही नही इनकी सुरक्षा के लिये महिलाओं को ही नियुक्त किया गया था। इस प्रकार हम कह सकते है कि महिलाओं के प्रति संवेदनाऐं और समर्पण की विचारधारा प्राचीनकाल से ही चली आ रही है।

सन् 1704 ई.वी. में पोप क्लेमेंट 11 वें. ने बंदीगृह के सुधार की और ध्यान दिया था और उसने पहली बार बंदीगृह को अस्पताल कहकर पुकारा था। इनका मानना था कि जिस प्रकार बीमार व्यक्ति को अस्पतलों में भर्ती करके उसका उपचार किया जाता है,ठीक उसी प्रकार अपराधी भी बीमार व्यक्ति है और बंदीगृह ऐसा स्थान है जहां उसकी सहानुभूति, उसकी समस्याओं का भी समाधान किया जाना चाहिए। जेलों में अपराधियों को किसी भी प्रकार की यातनाऐं नही देना चाहिऐ। यातनाऐं देना बदले की भावना को जागृत करता है न कि सुधार की भावना। इस प्रकार महान सुधारवादी बैकेरिया ने भी जेलों में सुधार पर बल दिया। इनके अनुसार जेले केवल अपराधियों को कुछ समय तक रोकने का स्थान है, जहां उन्हे रोककर उनमें अपराध के प्रति घृणा पैदा की जाना चाहिए, जिससें की वह पुनः अपराध न कर सके। इसी प्रकार 18 वी. शताब्दी के मध्य इंग्लैण्ड के बडे पादरी ने इस बात पर बल दिया कि यदि समाज में अपराध कम करना है, तब अपराधियों को जेलों में दण्ड़ न देकर बल्कि उनका सुधार किया जाना चाहिए।

जैसाकि पढ़ चुके है कि प्राचीन काल से लेकर मध्यकाल तक किले एवं काल कोठरी ही जेलों के रूप में परिवर्तित की गई थी। इनमें छोटी-छोटी कोठरियां भी हुआ करती थी, जिनकी दिवारें 05-07 फीट चौड़ी एवं इनमें इतना स्थान हुआ करता था कि वह ठीक से सो भी नही सकता था। किले की दिवारें ऊँची एवं डरावनी होने पर यह केवल बंदीयों को शारीरिक कष्ट् ही नही बल्कि मानसिक तनाव भी देती थी, इसलिये बदलती हुई परिस्थितियों में जेलों का निर्माण भी आधुनिक रूप से किया जाने लगा। भारत, ब्रिटेन का उप निवेश देश था, इसलिये ब्रिटेन में किये जा रहे सुधारों को भारत में भी लागू करने का प्रयास किया गया। सन् 1773 ई.वी. में जॉन हावर्ड ने जेलों की भयानक दशाओं की ओर ध्यान आकृर्षित किया था। अपराधियों की इस भयानक दशाओं का वर्णन उन्होने अपनी पुस्तक "The State of Prisons in England and Wales" में किया था। कुछ विद्वानों का यह तक कहना था कि जॉन हावर्ड ने अपराधियों एवं कारागार के सुधार के लिये ही अवतार लिया था, जिन्होने पहली बार अपराधियों को वर्गीकरण कर रखे जाने की पैरवी की थी। इनकी पुस्तक के प्रकाशन होने के बाद ही लोगों का ध्यान जेलों की ओर गया। इसका परिणाम यह हुआ कि बंदीगृह सुधार करने के लिये कई लेखकों और विद्वानो की आवाजे उठने लगी। यही वजह रही कि जॉन हावर्ड ने जेलों से संबंधित एक अधिनियम तैयार किया था, जिसका नाम पश्चाताप संबंधी अधिनियम (Penitentiary Act of 1779) था। इस अधिनियम में हावर्ड ने कई प्रकार के सुधार किये थे, जैसे बंदीगृहों में स्वच्छता एवं साफ-सफाई, बंदीगृहों का निरीक्षण, जिससें की बंदीगृहों की कमी दूर की जा सके, बंदियों द्वारा दी जा रही फीस का विरोध भी करना था क्योंकि अपराधियों से फीस ली जाती थी, निरूद्ध बंदियों से कृषि कार्य करवाया जाना, जिससें की उनको स्वस्थ्य भोजन प्राप्त हो सके। अपराधियों को अपराध की प्रकृति, लिंग आदि के आधार पर अलग-अलग रखा जाये। इस प्रकार के सुझावों ने पहली बार बंदियों को रखने वाले स्थानों एवं सुधार किये।

आधुनिक कारागार व्यवस्था वर्तमान में ब्रिटिश प्रशासन की देन है, क्योंकि सन् 1773 ई.वी. में "रेग्युलेटिंग एक्ट" पास होने के पश्चात् कलकत्ता में उच्चतम् न्यायालय की स्थापना की गई थी। इस अधिनियम के द्वारा ब्रिटिश सरकार ने कानूनों एवं नियमों का निर्धारण किया था। इसके बाद सन् 1833ई.वी. में ब्रिटिश सरकार ने भारत की संवैधानिक संरचना में अनेक परिवर्तन लाने के संदर्भ में एक अधिनियम पारित किया गया एवं वैधानिक नियमों की एक समान संहिता बनाने के लिये एक भारतीय विधि आयोग नियुक्त किया गया। सन् 1834 ई.वी. में भारतीय कारागार की स्थिती बहुत ही असंतोषजनक थी। इनमें बंदीयों के लिये न तो पर्याप्त स्थान था, कोठरियों में उजाला नही था, पर्याप्त भोजन की मात्रा नही थी एवं वस्त्र भी मौसम के अनुसार नही दिये जाते थे, चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नही थी। ईस्ट इंड़िया कंपनी जेलों में किसी भी प्रकार का सुधार कर अपना धन खर्च नही करना चाहती थी, इसलिये वह जेलों में सुधार करने की इच्छुक नही थे। सन् 1835 ई.वी. तक भारत में 43 सिविल, 75 क्रिमिनल एवं 68 संयुक्त कारागार थे। यह जेल जिला मजिस्ट्रेट के आधीन हुआ करती थी, इसलिये यह अधिकारी भी इन पर ध्यान नही देते थे। यही वजह रही कि जेले सुधार कम यातनाओं के केन्द्र अधिक बने रहे।

भारत में पहली बार कारागार सुधार का विचार सन् 1835 ई.वी. में लॅार्ड मैकाले ने दिया। जिन्होने भारत में पहली बार आधुनिक शिक्षा को भी लागू किया था। लॅार्ड मैकाले ने भारत सरकार का ध्यान भारतीय जेलों की खराब स्थिती की ओर आकर्षित किया और सुझाव दिये कि जेलों की स्थिती का अध्ययन किया जाये; क्योंकि इनमें सुधार की बहुत अधिक आवश्यकता है। 02 जनवरी 1836 ई.वी. को एक समिति का गठन किया गया, जिसने 1838 ई.वी. में अपना प्रतिवेदन भारत सरकार को प्रस्तुत किया। भारतीय कारागारों का अध्ययन कर अपना प्रतिवेदन देने वाली यह पहली समिति थी, जिसने बंदियों के अधिकारों का उल्लेख किया गया था। जिसने अपने प्रतिवेदन में जेलों में निम्न श्रेणी के कर्मचारियों के द्वारा भ्रष्टाचार, अनुशासन तथा उनमें पाई जाने वाली प्रशासनिक दुरव्यवस्था का उल्लेख भी किया था एवं केन्द्रीय कारागार की स्थापना का सुझाव देकर आधुनिक कारागार बनाने का भी उल्लेख किया। इस प्रकार सन् 1846 ई.वी. में आगरा में एक केन्द्रीय कारागार की स्थापना की गई और यह भारत का पहला केन्द्रीय कारागार था। इसके बाद 1848 ई.वी. में बरेली एवं इलाहबाद में, 1852 ई.वी. में लाहौर, 1857 ई.वी. मद्रास, 1864 ई.वी. मुंबई एवं अलीपुर, वाराणसी,फतेहगढ़ एवं 1867 ई.वी. में लखनऊ में स्थापित की गई। इनकी देख-रेख में संचालन करने के लिये पहली बार सन् 1844 ई.वी. में कारागार महानिरीक्षक (इंस्पेक्टर जनरल ऑफ़ प्रिजन्स) की नियुक्ति की गई। सन 1850 ई.वी. में भारत सरकार ने इस पद को जेलो में अस्थाई के स्थान पर स्थाई कर दिया एवं देश के सभी प्रान्तों में कारागार महानिरीक्षक की नियुक्तियां होने लगी। जिसको वर्तमान में डायरेक्टर जनरल ऑफ़ प्रिजन्स कहां जाता है। सन् 1862 पंजाब में, सन् 1854 में मुंबई एवं मद्रास तथा सन् 1862 में सभी केन्द्रीय प्रान्तों में महानिरीक्षक को नियुक्त कर दिया गया। इसी वर्ष 1862 में जिला कारागारों का संचालन करने के लिये अधीक्षक के रूप में सिविल सर्जनों की नियुक्तियां की गई, जिससें की जेलों में निरूद्ध बंदियों को सामुचित उपचार भी मिल सके; क्योंकि लम्बे समय से बंद रहने के दौरान कई प्रकार की शारीरिक एवं मानसिक बीमारीयां बंदियों में उत्पन्न होने लगी थी। यह प्रयोग इतना सफल हुआ कि भारत सरकार ने सन् 1864 ई.वी. में प्रान्तों के सभी जिला कारागारों के रूप में सिविल सर्जनों को नियुक्त करने के आदेश दे दिये।

इस प्रकार सन् 1858 ई.वी. के पश्चात् अगले तीन वर्षो में सिविल प्रोसिजर कोर्ड, भारतीय दंड संहिता, क्रिमिनल प्रोसिजर कोर्ड, कानून के रूप में सामने आये और यही से भारत में आधुनिक कारागार व्यवस्था का प्रारम्भ हुआ। इसके बाद यही से कारागार सुधार आन्दोलन का अभियान की भी शुरूआत का उल्लेख मिलता है। भारतीय कारागार प्रणाली में किसी भी प्रकार के सुधार नही किये गये,यह खेद का विषय है। ब्रिटिश साम्राज्य में पहली बार जेलों के स्वरूप को बदलने का उल्लेख मिलता है। सन् 1839 ई.वी. में जेल अनुशासन समिति,लंदन (Prison Discipline Society, London) के अध्यक्ष की हैसियत से क्रौफोर्ड (Crowford) ने कुछ सुझाव दिए थे। इनमें मौलिक तत्व यह था कि अपराधियों को अलग-अलग कोठरी में रखा जाए। सन् 1877 ई.वी. में इस व्यवस्था के अन्तर्गत ऐसा प्रावधान किया गया कि निरीक्षक अपराधियों की शिकायतों को सुन सकते थे। इसके साथ ही प्रत्येक अपराधी को अपनी कठिनाईयों से उन्हे अवगत कराने की पूर्ण स्वतन्त्रता थी। सन् 1894 ई.वी. में इंग्लैण्ड़ में ग्लैडस्टोन समिति (Gladstone Committee) की स्थापना की गई थी। इसी समिति ने अपराधियों और बन्दीगृह के सुधार के लिये कई सुझाव दिये जैसे- अनावश्यक श्रम को समाप्त कर श्रम के घण्टे नियत करना समिति का सुझाव था कि श्रम उत्पादक होना चाहिए न कि उनको सजा देने वाला कष्टदायक, अपराधियों को समूह में बाटकर काम करवाया जाने के स्थान पर अलग-अलग काम करवाने का सुझाव दिया गया, जिससें की वह अपने काम को पूर्ण कर मुक्त हो सके। पहली बार बाल अपराधियों के लिये सुधार गृहों की स्थापना का विचार भी इसी समिति के द्वारा दिया गया और कहा कि इनको दंड के स्थान पर सुधारात्मक कार्यशैली अपनाना चाहिऐ, जिससें की इनकी प्रतिभा को देशहित में इस्तेमाल किया जा सके। इन्ही सुझावों को स्वीकार करते हुये, सन् 1898 ई.वी. में बंदीगृह अधिनियम ब्रिटिश संसद में पारित किया गया था और इस अधिनियम के द्वारा जेलों की बनावट एवं इनमें कई परिवर्तन किये गये।

भारत में कारागार सुधार का दूसरा प्रयास कारागार प्रबंधन में सुधार लागने के लिये सन् 1864 ई.वी. में एक दूसरी समिति का गठन किया गया। इस समिति ने कारागार में प्रत्येक बंदी के लिये न्यूनतम स्थान देने की वकालत की, जिससें की उसको सोने के लिये पर्याप्त स्थान मिल सके। इस समिति ने बंदियों को भोजन, वस्त्र, बिस्तर और रहने की दशाओं में भी सुधार लाने का उल्लेख किया। इसने प्रतिवेदन में कहा कि केन्द्रीय कारागार में 15 प्रतिशत बंदियों के लिये एकान्तवास कोठरियों की व्यवस्था होनी चाहिए, जिससे की वह अपने कृत्य का पयश्चित कर सके। बाल अपराधी एवं व्यस्क अपराधियों को अलग-अलग रखकर इनके लिये शिक्षा का प्रबंध भी करने का सुझाव दिया गया। सन् 1870 ई.वी. में भारत सरकार ने देश में कारागार संबंधी कानूनों में संशोधन करने के लिये एक अधिनियम पास किया, इसके अन्तर्गत कारागार अधीक्षक, जिला चिकित्साधिकारी एवं जेलर तथा अन्य आवश्यक पदाधिकारियों व कर्मचारियों की नियुक्ति की व्यवस्था भी की गई। अधिनियम 1870 के सेक्शन 07 में इसका उल्लेख मिलता है। कारागार अधीक्षक को कारागार महानिरीक्षक के अनुमोदन से जेलर तथा उप जेलर नियुक्त करने के अधिकार दिये गये। इस प्रकार अधिनियम 1870 के अन्तर्गत कारागार अधीक्षक, जो चिकित्साधिकारी हुआ करता था, वह जेलर एवं उप जेलर की नियुक्ति करने में सक्षम था। इसी समय कई आन्दोलनकारी आजादी का संघर्ष करने के लिये जगह-जगह विद्रोह कर रहे थे, इसलिये जेलों में अधिकारी एवं कर्मचारियों की आवश्यकता होने से इस प्रकार के अधिकार स्थानीय अधिकारियों को दिये गये थे; क्योंकि आन्दोलनकारियों से जेले भरी हुई रहती थी। इसी अधिनियम के तहत् पुरूष व महिला एवं व्यस्क तथा बाल अपराधियों को अलग-अलग रखने की व्यवस्था की गई थी। दिवानी से संबंधित सभी बंदियों को अधीक्षक की आज्ञा से उनके नीजि व्यवसायों को करने की अनुमति दी जाती थी। इस प्रकार बंदियों के लिये उपयोगी कार्य तथा उनको दिये जाने वाले अमानवीय शारीरिक दंडों की व्यवस्था में सुधार लाने के प्रयत्नों को इस अधिनियम के अन्तर्गत मूर्तरूप प्रदान किया गया।


संतोषकुमार लड़िया

उप अधीक्षक (जेलर)

केंद्रीय जेल उज्जैन (म प्र )