थाईलैण्ड़ में भारतीय संस्कृति का उद्वभव!


थाईलैण्ड़ में एक कहावत है कि "स्यामी संस्कृति, भारतीय संस्कृति की एक विरासत है।" जिस समय वियतनाम, चीन, कम्बुज आदि देशों में भारतीय संस्कृति का बीज भारतीयों के द्वारा रोपा जा रहा था। लगभग ठीक इसी समय थाईलैण्ड़ में भी भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता की स्थापना की जा रही थी। उत्तर-पश्चिम में प्राचीनकाल में स्थापित देश स्याम को आज थाईलैण्ड़ में नाम से जाना जाता है। इस देश में भारतीय सभ्यता किस प्रकार पहुंची, इस संबंध में अभी-भी इतिहासकारों में मत भेद है और यह सभी एक मत नही है। स्याम देश की स्थापना के संबंध में एक दन्तकथा प्रचलित है, जिसका उल्लेख बृहत्तर भारत के लेखक चन्द्रगुप्त वेदालंकार साहब ने किया है कि-

‘‘ इस प्रकार निर्वासित हुये लोगों ने स्याम देश को आवासित (बसाया) कर अपनी शक्ति का विस्तार आरम्भ किया। वहां इन्होने एक नगर और बहुत मंदिरों का निर्माण किया। तदनन्तर जूडिया नामक स्थान आवासित किया गया। यहां भी एक छोटा सा देवालय बनाया गया। यह आज भी विद्यमान है। उस समय वहां सात तपस्वी रहते थे। ये सातों परस्पर भाई थे और आकृति में एक समान थे।"

यदि उक्त दन्तकथा को स्वीकार करते है तब यह निश्चित ही थाईलैण्ड़ में भारतीयों के जाने से पहले चीनी लोग वहां पहुंच गये थे; क्योंकि थाईलैण्ड़ चीन के नजदीक है। इसलिये चीनी लोगों ने अपने उद्योगों को स्थापित और विकसित करने के लिये थाईलैण्ड़ अर्थात स्याम देश में कई बस्तीयों को बसाया, जिसके प्रमाण थाईलैण्ड़ में देखे जा सकते है। लेकिन इसके बाद भारतीयों ने भी अपने व्यापार एवं संस्कृति को थाईलैण्ड़ में स्थापित करने के लिये आने-जाने लगे। इस प्रकार भारतीयों का संबंध थाईलैण्ड़ में चीनी व्यापारियों से भी स्थापित हो गया। इसके प्रमाण थाईलैण्ड़ में एक तामिल शिलालेख से स्पष्ट होते है और यह शिलालेख आठवीं शताब्दी का है। यह शिलालेख दक्षिण भारत के विक्रमवर्मा के लेख तिरूवलम् से मिलता-जुलता है। इससे स्पष्ट हुआ है कि "मणिग्रामम्" व्यापारिक संघ के कुछ सदस्य थाईलैण्ड़ में निवास करते थे और यह "वैष्णव धर्म" को मानने वाले थे। यही वजह रही कि अपने आराध्य विष्णु की मूर्ति एवं मंदिर की स्थापना इस व्यापारिक संघ के द्वारा थाईलैण्ड़ में लगभग आठवी शताब्दी के अंत में कराई गयी होगी।

थाईलैण्ड़ में हिन्दू मंदिरों की स्थापना करने वाले मूलतः तामील भारतीय थे, जो समुद्र के रास्ते थाईलैण्ड़ अर्थात स्याम देश में व्यापार करने पहुंचे थे और यही पर बस चुके थे। व्यापार के साथ-साथ यहां रहकर भारतीय संस्कृति एवं मंदिरों की स्थापना भी करने लगे थे। भारत एवं थाईलैण्ड़ का संबंध केवल आठवीं शताब्ब्दी से ही नही बल्कि सैकड़ों वर्ष पूर्व थाईलैण्ड़ अथवा स्याम में बस चुके थे, क्योंकि थाईलैण्ड़ तत्कालिक समय में कंबुज अर्थात कम्बोडिया के आधीन था। इस प्रकार स्याम देश में लगभग तीसरी शताब्दी में भारतीयों ने अपने कदम रख दिये थे और यह पर नगरों को बसाना भी प्रारम्भ कर दिये थे जिनके नाम पूर्णतः संस्कृत भाष के ही थे, जो इस प्रकार है- रातपुरी (राजपुरी), अयुथ्या (अयोध्या), लोफाबुरी (नवपुर), फिक्सेई (विजय), सुखोथेई (सुखोदय), संघलोक (संघलोक), उत्तरदिथ (उत्तरतीर्थ) आदि। इन नामों से स्वतः स्पष्ट होता है कि थाईलैण्ड़ अथवा स्याम देश में भारतीय व्यापारियों एवं धर्म प्रचार करने वाले भी तदाद बहुत अधिक होगी। लगभग तेरहवीं शताब्दी तक थाईलैण्ड़ कम्बोडिया के आधीन रहा होगा। राजा इन्दादित्य ने थाईलैण्ड़ को सबसे पहले अपने आधीन किया। यह भारतीय प्रवासी कम्बोडिया का राजा था। शैव धर्म को मानने वाला था इसलिये इसने कम्बोडिया में शैव धर्म को राजकीय धर्म घोषित कर दिया था। कम्बोडिया के संबंध में विस्तृत लेख पृथक से अगले अंक में पढ़ने को मिलेगा।

हिन्दू धर्म के बाद थाईलैण्ड़ में धीरे-धीरे बौद्ध धर्म को मानने वालों की भी संख्या बड़ने लगी और कई बौद्ध प्रचारक, जो भारतीय और चीनी दोनों ही थे थाईलैण्ड़ में पहुचने लगे थे और यह पहुंचकर बौद्ध संघ की स्थापना की थी। स्याम देश का राजा श्रीसूर्य्यवंशराम ने स्याम देश के बौद्ध संघ को सिद्धी एवं ज्ञान के लिये श्रीलंका के संघराज को अपने यहां बुलाया था। इस प्रकार लगभग तेहरवीं शताब्दी से थाईलैण्ड़ में मुख्यतः बौद्ध धर्म के अनुयायीयों की संख्या सबसे अधिक हो गई थी। यही वजह रही कि थाईलैण्ड़ के निवासी बौद्ध धर्म के अनुयायी बन गये, जो भारत मां की भूमि से जन्मा हुआ धर्म था। इस प्रकार बौद्ध सम्प्रदाय के माध्यम से थाईलैण्ड़ में हिन्दू संस्कृति फलने-फूलने लगी थी।

थाईलैण्ड़ अर्थात स्याम देश की राजधानी प्राचीनकाल में स्थाई नही रही। पहले सुखोदय, फिर अयोध्या और बाद में बैंकांग हो गई। इस प्रकार थाईलैण्ड़ का इतिहास सुखोदय से ही प्रारम्भ होता है। सुखोदय का प्रथम राजा इन्दादित्य था और यह सन् 1218 ई.वी. के लगभग सिंहासन पर बैठा। इसने स्वतंत्र राज्य की स्थापना की और सन् 1376 ई.वी. तक शासन करता रहा। जैसा कि इसके लेख से स्पष्ट होता है। राजा इन्द्रादित्य के पश्चात् वान्-मुराण राजा बना। इसके समय के कई शिलालेख सुखोदय में प्राप्त हुये। राजा इन्द्रादित्य का तीसरा पुत्र रामखम्हे्ड्. की सहायता बनी रही। वह लिखता है कि- "मेरे पिता परलोकगामी हुए, इसके पश्चात् मैं अपने भाई के समीप रहने लगा और जिस भाव से, पहले अपने पिता की सेवा करता था उसी तरह उसकी सहायता करने लगा।"

सन् 1283 ई.वी. में रामखम्हे्ड्.शासक बना और यहां थाईलैण्ड़ में रामराजा के नाम से प्रसिद्ध हुआ। थाईलैण्ड़ के शासकों में इसका नाम सबसे ऊँचा माना जाता है। सुखोदय का लेख इसके द्वारा ही पत्थर पर उर्त्कीण कराया गया था। इसने ही थाईलैण्ड़ में स्यामी वर्णमाला प्रारम्भ की थी। यह वर्णमाला पाली या सिंहली वर्णमाला के जैसे ही थी। यह अपने लेख में लिखता है कि प्रजा बुद्ध की भक्त हैं। नगरों में बुद्ध की बड़ी-बड़ी मूर्तियां, चित्र तथा मंदिर बने हुए हैं। राजधानी के पश्चिम में अरएयविहार है, जो श्रीधर्मराज से आये एक विद्धान को भेंट किया गया था, जिसने यहां आकर त्रिपिटक का अध्ययन किया था। यद्यपि मेरे देश में हिन्दूधर्म का विशेष प्रचार नहीं, तो भी कुछ लोग ऐसे हैं, जो देवों को पूजते हैंऔर जिन पर राज्य की समृद्धि निर्भर करती है। जब रामखम्हे्ड्. ने स्याम अर्थात थाईलैण्ड़ का शासक था उस समय थाईलैण्ड़ की राजधानी सुखोदय थी और यह अति सुन्दर नगर था। लगभग सारा नगर बुद्ध की प्रतिमाओं से एवं बौद्ध मंदिरो से भरा हुआ था। कई बौद्ध विहार भी यह बना रहे थे, इनमें कई बौद्ध भिक्षु एवं विद्धान निवास किया करते थे। राजा भी सुखोदय राजधानी में ही रहता था। थाईलैण्ड़ की प्रजा भी कभी-भी राजा से मुलाकात कर सकती थी, इस प्रकार राजा अपनी प्रजा के लिये बहुत ही सहज और सरल था। रामराजा ने अपने महल के सामने भारतीय राजाओं के जैसे ही एक घण्टा लटका कर रखा हुआ था। थाईलैण्ड़ की प्रजा कभी-भी इसको बजाकर राजा के पास पहुंच सकती थी। यह न केवल वीर और शक्तिशाली था, बल्कि ज्ञानी और विद्धान भी था।

सन् 1355 ई.वी. में सूर्यवंशराम थाईलैण्ड़ का शासक बना। इसको हद्रयराम, श्रीधर्मराज, श्रीधार्मिक तथा राजाधिराज आदि नामों से भी जाना जाता है। यह भी अपने पूर्व शासकों की तरह दायावान था इसके साथ-साथ भारतीय ज्योतिष विद्या में परांगत था यही वजह रही कि इसने थाईलैण्ड़ के तिथिक्रम का संशोधन किया था। इसने भी विहार, मंदिर, चैत्यों का एवं बौद्ध मूर्तिया स्थापित की थी। इससे स्वतः स्पष्ट होता है कि यह भी अपने पूर्व शासकों के जैसे बौद्ध धर्म का अनुयायी था, परन्तु सनातन धर्म की प्रति भी इसका झुकाव था। इसके द्वारा गौतम बुद्ध के विचारों का प्रचार-प्रसार करवाया गया। इसके शासनकाल में हिन्दू और बौद्ध दोनों धर्मो के विचारों एवं विद्धानों को आश्रय मिला। जितना सम्मान बौद्ध भिक्षुओं का होता था उतना ही आदर सत्कार ब्राह्मण विद्धानों का भी किया करता था। जिस स्थान पर बौद्ध मंदिरों, विहारों, चैत्यों का निर्माण करवाया, उसी स्थान पर विष्णु मंदिरों का भी निर्माण करवाया गया। बौद्ध साहित्य एवं हिन्दू शास्त्रों को भी कई भाषा में अनुवाद किया।

सुर्यवंशराम ने ही सन् 1352 ई.वी. में श्रीलंका से महाबोधि वृक्ष की शाखा थाईलैण्ड़ में लगाई थी और इसको राजधानी सुखोदय में स्थापित किया था। पाठको को यह याद होगा कि चक्रवर्ती सम्राट् अशोक की पुत्री सद्यमित्रा बोधि वृक्ष की शाखा भारत के "गया" से श्रीलंका ले गई थी। यही नही सूर्यवंशराम ने पटना से लाये गये अश्वशेषों पर एक चैत्य का निर्माण भी करवाया था। इसके शासनकाल में श्रीलंका से कई बौद्ध भिक्षु थाईलैण्ड़ आये थे। इसके शासनकाल में थाईलैण्ड़ में नगर के मध्य स्वर्ण बुद्ध की मुर्ति की स्थापना की गई थी। थाईलैण्ड़ में निर्मित हिन्दू एवं बौद्ध मंदिरों पर भारतीय वास्तुकला की छाप देखी जा सकती है। यह शासक सन् 1350 ई.वी. तक थाईलैण्ड़ का राजा रहा। इसके शासन की समाप्ति के बाद ही दूसरा वंश ने थाईलैण्ड़ पर राज्य किया। सूर्यवंशराम के समय ही सन् 1350 ई.वी. में रामाधिपति ने अयोध्या नामक नया नगर बसाया था, इसका प्राचीन नाम द्वारवती था।

सन् 1350 ई.वी. में अयोध्या नगर की स्थापना हो चुकी थी और राजधानी सुखोदय का स्थान अयोध्या नगर ने ले लिया था। परन्तु स्याम अर्थात थाईलैण्ड़ की संस्कृति में कोई विशेष परिवर्तन नही हुआ। अयोध्या का प्रथम राजा रामाधिपति था और इसकी उम्र 37 वर्ष की थी। इसने कुल 19 वर्षो तक शासन किया। इसने भी थाईलैण्ड़ में विहार, मंदिर, भवन, चैत्यों का निर्माण करवाया। मंदिरों को कई गांव दान में दिये थे। बुद्ध धर्म के प्रति इसकी आस्था इस कदर थी कि सब कुछ दान देने के बाद इसका मानना था कि अगले जन्म में वह बुद्ध बनकर पैदा होगा।

सन् 1470 ई.वी. में परमराजाधिराज शासक बना। इस काल का भी एक शिलालेख प्राप्त हुआ है, जो सुखोदय नगर के बुद्धपाद के नाम से प्रसिद्ध है और इसकी भाषा पाली है। इससे स्पष्ट है कि परमराजाधिराज भी बुद्ध का उपासक था। सन् 1548 ई.वी. में वरधीरराज थाईलैण्ड़ के अयोध्या का शासक बना। इसके शासक बनते ही वर्मी लोगों ने थाईलैण्ड़ को घेर लिया। फिर आक्रमणकारियों ने स्यामी अर्थात थाईलैण्ड़ के लोगों को परास्त किया। राजकुमार और राजा का साला को वर्मी लोगों ने कैद कर लिया। परन्तु वरधीरराज ने समझौता कर दोनों को छुड़ा लिया। बाद में इसकी मृत्यु हो गई और इसका उत्तराधिकारी महामहिन्द बना। वर्मी राजाओं एवं थाईलैण्ड़ के राजाओं ने युद्ध का मुख्य कारण सफेद हाथी थे, जो कि थाईलैण्ड़ में पाये जाते हो गये। वर्मी राजाओं ने अयोध्या नगर में लूटपाट की थी। इन्होने थाईलैण्ड़ पर तीन बार आक्रमण किये, जिससे नगर की व्यवस्था को क्षति हुई और बौद्ध धर्म के अनुयायीयों को भी जन-धन की हानि हुई।

सन् 1610ई.वी. में थाईलैण्ड़ का राजा इन्द्रराज हुआ और इस समय पूर्व में व्यापार करने का मार्ग खोजा जा चुका था। भारत के जैसे ही थाईलैण्ड़ में पुर्तगाली, डच, फ्रांसिसि और अंग्रेज भी थाईलैण्ड़ पहुंचने लगे थे। सन् 1604 ई.वी. में डच लोगों ने स्याम के अयोध्या नगर में अपनी कोठी बना ली थी। इसके बाद फ्रांसिसि, अंग्रेज और स्पेनिश लोग भी स्थाई बस्ती बनाने लगे थे। थाईलैण्ड़ में पहुंचने वाले व्यापारीयों के साथ कुछ पादरी भी ईसाई धर्म प्रचार करने के लिये पहुंचने लगे। सन् 1656 ई.वी. में स्याम अथवा थाईलैण्ड़ के राजा ने भी अपने बन्दरगाह के द्वारा भारत के जैसे ही विदेशियों के लिये खोल दिये थे। इससे कई विदेशीयों एवं पादरियों के आने से बौद्धधर्म की विचारधारा कम हुई और बौद्ध मंदिरों के स्थान पर धीमे-धीमे गिरजाघर बनने लगे और ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार होने लगा। जिस प्रकार भारत में इस्लाम मध्यकाल में हिन्दू धर्म पर अपनी विचारधारा जबरन थोप रहा था ठीक वैसे ही बुद्ध धर्म पर थाईलैण्ड़ में ईसाई धर्म के अनुयायी अपनी विचारधारा को जबरन थोप रहे थे।

सन् 1767 ई.वी. में फॉय-ताक नामक एक स्यामी अर्थात थाईलैण्ड़ के नेता ने बिखरी हुई थाईलैण्ड़ की सेनाओं को एकत्रित किया और विदेशियों से सामना करने के लिये उनको प्रेरित किया। अयोध्या नगर के पतन से बौद्धसंघ में बहुत गिरावट आ चुकी थी। फॉय-ताक नामक नेता ने बहुत अधिक सुधार किया और इसी ने देवनगर की स्थापना की। सन् 1728 ई.वी. में चाय-फॉय-चकी राजा हुआ था, इससे ही एक नये वंश की स्थापना हुई थी। फॉय-ताक नामक नेता भी इसी वंश का था। इस वंश का दूसरा राजा फ्र-बुद्ध-ल्-ला था। यह बहुत बड़ा कवि था और आज भी थाईलैण्ड़ में अपनी कविताओ की वजह से जाना जाता है। इसलिये इसकी तुलना भारतीय सम्राट् हर्षवर्धन से की जाती है। इसके बाद सन् 1851 ई.वी. में मोड्-कुट् शासक बना और यह अपने वंश का चौथा शासक था। इसने भी 17 वर्ष शासन किया। गणित और ज्योतिष का इसको काफी अच्छा ज्ञान था। यह अपनी प्रजा के लिये सूर्य और चंद्रग्रहण का ज्ञान भी करवाता था। इसने कई धर्मो का एवं शासकों का अध्ययन कर रखा था। इसकी गणना भी थाईलैण्ड़ के प्रसिद्ध शासकों में की जाती है और यह देवनगर का मुख्य शासक भी माना गया है। इसने थाईलैण्ड़ को आधुनिक बनाया, दास प्रथा, शराब और अफीम पर प्रतिबंध लगाया। स्त्रीयों के पुनर्वास एवं सुधार में बहुत अधिक महत्वपूर्ण निर्णय लिये। यह 26 वर्षो तक बौद्ध भिक्षु का जीवन जीता रहा और इसने भिक्षु काल में ही एक नया पंथ चलाया था। कई राष्ट्रों के साथ थाईलैण्ड़ के विकास के लिये इसने समझौते किये।

सन् 1838 से 1911 ई.वी. तक थाईलैण्ड़ का शासक चूडालंकार रहा। यह उदार और शिक्षित था। इसने बौद्ध धर्म के प्रसिद्ध ग्रंथ त्रिपिटक को स्यामी भाषा में छपवाया और कई बौद्ध भिक्षुओं को विश्व वितरित किये। गरीबों को पढ़ने के लिये पाठशाला खोली, परन्तु इसी समय अंग्रेज और फ्रांसिसियों ने कुछ प्रदेशों पर कब्जा कर लिया। सन् 1911 से 1926 ई.वी. तक बजीराबुध ने थाईलैण्ड़ पर शासन किया। इसी ने सन् 1914 में राम की उपाधि धारण की थी और इस वंश के राजा अपने नाम के पीछे उपनाम राम लगाया करते थे। और यह अपने वंश का छटवा शासक था। इसलिये यह अपने आप का षष्ट राम कहां करता था और सन् 1935 ई.वी. में भारत के सभी तीर्थ स्थानों की यात्रा की थी। और यह थाईलैण्ड़ का प्रथम शासक था, जो भारत आया था। इसके बाद आनंद उत्तराधिकारी हुआ, यह नबालिग था। आज स्याम अर्थात थाईलैण्ड़ का शासक एक रीजेन्ट कौसिल के द्वारा होता है।


थाईलैण्ड़ पर भारतीय संस्कृति का प्रभावः-

थाईलैण्ड़ में एक कहावत है कि स्यामी संस्कृति भारतीय संस्कृति की एक विरासत है। थाईलैण्ड़ अर्थात स्याम के धर्म, भाषा, रीति-रिवाज, यहां तक की खानपान पर भारत का प्रभाव है। यह के संस्कार भी ठीक भारत के संस्कारों के जैसे ही है, यहां का शासक अपने नाम के पीछे राम लगाता है। राजा, मंत्री और थाईलैण्ड़ के लोगों के नाम भी भारतीय नाम जैसे ही रहा करते है। थाईलैण्ड़ में प्रारम्भ से लेकर आज तक राजतंत्र है और यह का राजा अपने का "थेई लोगों का प्रभु" कहता है। यह राजा के साथ-साथ धार्मिक नेता भी होता है, जो राज्य में धर्म की रक्षा करने के लिये नीति-नियम बनाता है और अपने का धर्म का रक्षक कहता है। इसको मुस्लिम खलीफों के जैसे ही अधिकार है। जिस प्रकार खलीफा राजनेता एवं धार्मिक नेता दोनों ही होता है।ठीक वैसे ही थाईलैण्ड़ का राजा को भी दोनों अधिकार होते है। राजा का एक राजगुरू भी होता है। इसके साथ-साथ एक उप राजा भी होता है, जिसको द्वितीय राजा एवं सेनापति भी कहां जाता है। यह राजा के परिवार से ही चयनित किया जाता है। थाईलैण्ड़ में राजा की मदद के लिये नौ सदस्यी समिति होती है और इनके नाम भी भारतीयों के जैसे ही रखे जाते थे जैसे मंत्री, पुरोहित, खडगाही, अमाध, कोषाध्यक्ष, महासेनापति आदि।

थाईलैण्ड़ के राजा में एक प्रथा है कि वे दिवाली के लगभग वर्ष में एक बार तीर्थ यात्रा जाया करते है, जैसे कि भारत में सम्राट अशोक और हर्षवर्धन बौद्ध स्थानों पर जाया करते थे। वर्तमान में थाईलैण्ड़ अर्थात स्याम का धर्म बौद्ध धर्म है। राजा और प्रजा दोनों ही बौद्ध धर्म के अनुयायी है। ऐसा माना जाता है कि सन् 422 ई.वी. में थाईलैण्ड़ बौद्धमय हो चुका था। परन्तु 13 वी. शताब्दी में मुस्लिम आक्रमणों की वजह से बौद्ध धर्म कमजोर पड़ गया। इससे पहले हिन्दू धर्म भी थाईलैण्ड़ में अपना प्रभाव जमाये हुये था, परन्तु धार्मिक कट्रता और अंधविश्वासों की वजह से इसका स्थान बुद्ध और ईसाईयों ने ले लिया। सन् 1510 ई.वी. में शिव मुर्ति पर खुदे एक लेख से प्रमाणित होता है कि राजा धर्माशोक ने अपने राज्य में शिव की पूजा प्रचलित की थी। यह बौद्ध एवं हिन्दू धर्म दोनों का आदर करता था। "तकोपा" लेख में उपलब्ध आठवी शताब्दी के लेख से ज्ञात होता है कि उस समय थाईलैण्ड़ में एक विशाल विष्णु मंदिर बनवाया गया था और आज भी हिन्दू धर्म का प्रभाव थाईलैण्ड़ में देखा जा सकता है। आज भी शिव, लक्ष्मी, गणेश, कार्तिक आदि की मुतियां देखी जा सकती है।

देवगनर के राजकीय मंदिरों की दिवारों पर रामायण की कथा चित्रों मे अंकित है । स्यामी कलाकार आज भी यमराज, इन्द्र आदि देवी-देवताओं की मूर्ति बनाते है। शिव पूजा के प्रमाणित तौर पर लिंग आज भी कही मंदिरों मे पाये जाते है। नामकरण, मुण्डन, संस्कार, इतना ही नही स्याम अर्थात थाईलैण्ड़ में आज भी कुछ ब्राह्मण निवास करते है जिन्हे वहां के लोग "फ्रम्स" कहां करते है। फ्रम ब्राहम्ण का अपभ्रश है। राजा के यह इनके बहुत मान-सम्मान है। यह अपने आप को प्राचीन ब्राहम्णों का वंशज बताते है। जो पाँचवी-छटी शताब्दी में भारत से आकर थाईलैण्ड़ में बसे थे। देवनगर में इनकी एक छोटी से बस्ती है और यह पर हिन्दू मंदिर भी है। यह थाईलैण्ड़ में ज्योतिष का काम करते है एवं बौद्ध विहार में शिक्षक के रूप में नियुक्त है।

तेरहवी. शताब्दी में जब स्याम अर्थात थाईलैण्ड़ स्वतंत्र हो गया था तब से ही बौद्ध धर्म एवं हिन्दू धर्म का प्रभाव थाईलैण्ड़ में रहा। स्यामी लोग महात्मा बुद्ध के भक्त है। ऐसा कहां जाता है कि जब तेरहवी शताब्दी में बौद्ध धर्म थाईलैण्ड़ में संकट में था तब बौद्ध भिक्षु उपाली ने बौद्ध धर्म को बचाया था। थाईलैण्ड़ के बौद्ध भिक्षु आज भी बौद्ध धर्म के जटील नियमों का पालन करते है। यह पर 16,503 बौद्ध विहार और 1,30,058 बौद्ध भिक्षु है। जो थाईलैण्ड़ में बौद्ध धर्म का प्रचार करते है, शिक्षक का कार्य करते है एवं बौद्ध मंदिरों का प्रबंधन एवं देख-रेख इन्ही की जवाबदारी रह गई है। बौद्ध विहार एवं भिक्षुओं को थाईलैण्ड़ सरकार के द्वारा आर्थिक मदद की जाती है। अन्य देशों के जैसे ही स्याम में भी त्यौहार मनाये जाते है। बौद्ध के जन्म से लेकर मृत्यु तक सभी घटनाओं को त्यौहार के रूप में मनाया जाता है। आज भी हिन्दूओं की श्रद्ध प्रथा थाईलैण्ड़ में देखने को मिलती है। संक्रांति उत्सव भी मनाया जाता है। मुड़न संस्कार, चन्द्रग्रहण एवं इसके साथ-साथ नामकरण आदि भी प्रथाऐं, परम्पराऐं थाईलैण्ड़ में देखी जा सकती है। इस प्रकार की परम्परा का प्रभाव राजपरिवार में भी देखने को मिलता है। भारतीय महिलाओ के जैसे ही कही-कहीं थाईलैण्ड़ की महिलाऐं अपने को को छिदवाती है। मृतक संस्कार भी भारतीयों के जैसे ही किया जाता है। थाईलैण्ड़ के विवरणों में बाली एवं सुग्रीव की घटनाओं का भी उल्लेख मिलता है। एक थाईलैण्ड़ की पुस्तक में बाली और सुग्रीव के साहसिक कृत्यों का उल्लेख है इस पुस्तक का नाम "फरिआ फालि-सुकीप" है। थाईलैण्ड़ साहित्य की कुछ पुस्तके महाभारत के जैसे ही है। इसने से एक का नाम "उन्मारूत" है। इसमें कृष्ण के पौत्र अनिरूद्ध का वर्णन है। यही नही थाईलैण्ड़ के लोग मनु स्मृति से भी परिचित थे। थाईलैण्ड़ की पुस्तक "पक्खवदि" में हिन्दूदेवी भगवती का उल्लेख है। ऐसा कहां जाता है कि थाईलैण्ड़ को चिकित्सा का ज्ञान सर्वप्रथम भारत से ही प्राप्त हुआ था। धार्मिक साहित्य की तरह थाईलैण्ड़ की भाषा पर भी भारत का प्रभाव दिखाई देता है जैसे

संस्कृत स्यामी (थाईलैण्ड़) संस्कृत स्यामी (थाईलैण्ड़)

आकार अकर अमरावती अमरवदि

अम्बर अम्फर आराम अराम

असुर असुर पत्र बत्र

जम्बुद्वीप छम्फु-थ्वीब चतुर जतुर

चैत्र जेत तुषित दुषित

हरि ह-रि ईश्रर इत्स्वर

इच्छा इत्छा कपिलवस्तु कबिल-वत्थु

कण्ठ कण्थ गमन खमन

कुशल कुसल ललाट ल-लाट

लाभ लाफ महा महा

मास मास मेघ मेक

मित्र मित नाग नाख

नालिका नलिक नमो नमो

निवेश निवेस बन्धु फन्थु

वेद फेत भिक्षु पिक्खु

बुद्ध फुत, फुत्थ भूमि फूमि

राहु रहु रामेश्रर रमेस्वन्

सहत्र सहस्त्र शाल साल

शील सिन, सील ताल तल

त्रिशूल त्रिसुर वरूण वरून्

योनि योनि यक्ष यक


उपरोक्त विवेचना से स्पष्ट है कि स्यामी और सं