‘‘"चम्पा अथवा वियतनाम" में, हिन्दू-बौद्ध विरासत की एक झलक !



जिस समय फूनान अथवा कम्बोडिया, श्याम (थाईलैण्ड़) आदि देशों में हिन्दू धर्म एवं भारत के लोग जाकर अपनी संस्कृति और धर्म को स्थापित करने के लिये संघर्ष कर रहे थे। ठीक उसी समय चम्पा में भी, जिसकों हम वर्तमान में वियतनाम देश के नाम से परिचित है और इसकी राजधानी हनोई है। यह एशिया के दक्षिणी -पूर्वी भाग में स्थित है। यह पर भी कम्बोडिया के जैसे ही हिन्दू राज्य की स्थापना हो रही थी। पर यह किस समय और किसके द्वारा वास्तविक रूप से की गई, इस संबंध में अभी मतभेद है। परन्तु यह निश्चित है कि लगभग दूसरी शताब्दी में वियतनाम अथवा चम्पा में भारतीय नागरिक बस चुके थे। इसका प्रमाण सन् 192 ई.वी. का एक शिलालेख खुदाई के दौरान मिला है, जिसमें यह उल्लेख है कि "श्रीमार" का शासक चम्पा में राजा हुआ करता था।

हिन्दू राज्य वियतनाम में स्थापित होने के पूर्व दो प्रकार के लोग वह पर रहा करते थे, जिनकों हम मूल निवासी भी कहाँ सकते है। यह मूल निवासी चम और जंगली के नाम से जाने जाते थे। दोनों में अपनी-अपनी संस्कृति को लेकर विवाद हुआ करते थे। चम लोग जंगली लोगों को पंसन्द नही किया करते थे, इसलिये यह चम इनके लिये "म्लेच्छ" कहते थे। यह शब्द हिन्दू धर्म के ग्रंथों में कई बार पढ़ने को मिलते है। भारत में भी शुद्रों को म्लेच्छ नाम से पुकारा जाता था। तब क्या यह कहां जा सकता है कि वियतनाम अथवा चम्पा में शुद्र लोग सदियों से बसा करते थे या भारत से किन्ही कारण वश पलायन कर चम्पा में दूसरी शताब्दी के पूर्व से ही बस चुके थे।

वियतनाम अथवा चम्पा देश में ऐसा कोई राजाओं का शुरूआती इतिहास प्राप्त नही हुआ, परन्तु इतना स्पष्ट अवश्य होता है कि‘"हाँन" वंश की शक्ति कमजोर होने पर चम्पा में एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना हुई थी और श्रीमार ही चम्पा का प्रथम हिन्दू सम्राट् था, जिसकी पुष्टि वोचह पर्वत पर प्राप्त लेख से की जा चुकी थी। हाँन वंश का संबंध सम्भवतः चीनी शासकों से रहा होगा। इसके बाद सन् 380 ई.वी. में भद्रवर्मा वियतनाम का शासक बना, इसके भी कई लेख प्राप्त हुये है। इसके लेख के अनुसार इसका पूरा नाम धर्मराज श्री भद्रवर्मा था। यह सबसे शक्तिशाली शासक रहा है। इसने वियतनाम के "मीसम" स्थान पर विशाल शिव मंदिर का निर्माण करवाया था, जिसे भद्रेश्वरस्वामी के नाम से जाना जाता था और यही मंदिर आगे चलकर चम्पा अथवा वियतनाम का राष्ट्रीय तीर्थ स्थल बन गया। भद्रवर्मा के लेखों से स्पष्ट होता है कि इसका उत्तराधिकारी गंगाराज को चारों वैदों का ज्ञान था। हिन्दू धर्म का बहुत बड़ा उपासक था, इसलिय अपने जीवन के अंतिम समय में बनारस के पास गंगा नदी के किनारे सारा राजपाट छोड़कर चला आया था।

वियतनाम के राजा गंगाराज के भारत चले जाने के पश्चात् देश में अव्यवस्था फैलने लगी। इस अशांति का लाभ लेकर सन् 420 ई.वी. में यड् वंश के चीनी शासक ने वियतनाम अथवा चम्पा पर आक्रमण कर दिया। परन्तु इनको वापिस लौटना पड़ा। इसके बाद 446 ई.वी. में चीनी सेनाओं ने फिर आक्रमण किया और इन्होने वियतनाम के चम सेनापति को मार दिया, जो गंगराज के जाने के बाद देश की व्यवस्थाओं का संचालन कर रहा था। यही नही चीनी राजा ने वियतनाम के 15 वर्ष की आयु से ऊपर के लोगों का कत्ल करवा दिया। सोन-चांदी, बहुमूल्य रत्नों को लूट लिया और चम्पा की राजधानी चंपापुर को भी बर्बाद कर दिया। मंदिरों को गिराया, मंदिरों में रखी हुई सोने-चांदी की मुतिर्यो को तोड़कर गलाया गया। इस प्रकार वियतनाम में स्थापित भारतीय हिन्दू सभ्यता को चीनी शासकों के द्वारा नष्ट करने का कृत्य किया गया। परन्तु समय के साथ हिन्दू संस्कृति में एक बार पुनः वियतनाम में अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को प्राप्त किया।


राजा गंगराज के वंशज:-

गंगराज के भारत की तीर्थ यात्रा पर चले जाने के बाद 529ई.वी. में श्री रूद्रवर्मा चम्पा का शासक बना। यह ब्राहम्ण अथवा क्षत्रिय दोनों में से किसी एक वर्ग का था। इसने भद्रेश्वरस्वामी के मंदिर को, जो आग से जल गया था उसका जीर्णोदय करवाया था। इसके बाद रूद्रवर्मा शासक बना। इसने भी कई मंदिरों का जीर्णोदय करवाया। फिर शम्भुवर्मा एवं बाद मे प्रकाशवर्मा शासक बना, जो बाद में प्रकाशधर्मा के नाम से शासन किया। इसके बाद विक्रान्तवर्मा नाम रख लिया। इसने विष्णु, शिव और कुबेर के मंदिरों का निर्माण करवाया। इसके लेख से स्पष्ट होता है कि इसके शासनकाल में देश का वैभव एवं उन्नति हुई।

पांडुरंग के वंशजः-

चम्पा अथवा वियतनाम में गंगाराज के वंश के बाद पांडुरंग वंश की स्थापना हुई। इस वंश की स्थापना पृथिवीन्द्रवर्मा ने की थी। इसके लेख स्पष्ट होता है कि इसने अपने पराक्रम से चम्पा को जीता था। जैसा की इसके लेख से स्पष्ट होता है कि इसने पांडुरंग नाम से नये वंश की स्थापना की थी। इसके विषय में एक लेख प्राप्त हुआ है कि

‘‘"श्रीमात्ररेन्द्रः पृथिवीन्द्रवर्मा ख्यातस्खवंशैर्जगति प्रभावैः।

ह्यस्तीति लोके स भुनक्ति भूमिं शक्तया च निर्जित्यरिपून्ह्सिर्वान्।।"

इससे स्पष्ट होता है कि इसने अपनी शक्ति और बल से चम्पा देश को जीता था और इसने इस देश में सेंध लगाने वाले चारों और डाकूओं का भी दमन किया था। इसके बाद सत्यवर्मा चम्पा का राजा बना। इसके समय में भी कई समुद्री डाकूओं पर हमला किया, जो जावा देश के रहने वाले थे। इन डाकूओं ने चम्पा के मुखलिंग मंदिर पर भी आक्रमण किया था। इस मंदिर को जलाकर मुर्ति समुद्र में फैंक दी थी, परन्तु सत्यवर्मा ने एक बार फिर नये मंदिर का निर्माण किया। इसके बाद इन्द्रवर्मा शासक बना और यह सम्पूर्ण चम्पा देश का राजा बन गया। जैसा कि इसके लेख से स्पष्ट होता है कि -

व्यरोचत महाप्राज्ञो राजा शूर समन्वितः।

राज्ये हि धर्मसयुक्तो धर्मराज इवाभवत्।।

इसने कई मंदिरों का निर्माण करवाया, कई दुश्मनों को पराजित किया। विशेषतौर पर वीरपुर में इन्द्रयोगेश्वर, शंकर तथा नारायण के मन्दिर बनाये गये। इस वंश का अन्तिम राजा विक्रान्तवर्मा था। इसने भी मन्दिरों का निर्माण कराया था।

भृगुवंशीय राजा:-

भृगु वंश का संबंध भी भारत वर्ष से ही रहा है। विक्रान्तवर्मा तृतीय के पश्चात् लगभग सन् 870 ई.वी. में एक नये वंश की स्थापना हुई। इसका संस्थापक इन्द्रवर्मा द्वितीय था। यह लक्ष्मीचन्द्रभूमेश्वर ग्राम स्वामी के नाम से चम्पा अथवा वियतनाम में प्रसिद्ध हुआ। दड्-दोड् के लेख में इसकी बहुत प्रशंसा हुई; क्योंकि यह बौद्ध धर्म के प्रति सरल था। इसने बौद्ध धर्म के मंदिर एवं भिक्षुओं को रहने के लिये विहार का निर्माण भी करवाया। परन्तु यह शैवधर्म का अनुयायी था। इसने एक शिव लिंग स्थापित करवाया, मंदिरों को दान दिया। सन् 911ई.वी. में इन्द्रवर्मा तृतीय राजा बना और यह अन्तिम शासक भी था। इसके कुल अभी तक 08 लेख प्राप्त हुये है। यह अपने समय का साहित्यक विद्वान था। यह जब यह अध्ययन करने में व्यस्त था उसी समय कबु जातिवासियों ने चम्पा पर आक्रमण कर दिया। मंदिरों को तोड़ा, विशेषकर पो-नगर के मंदिर में स्थापित भगवती की स्वर्ण मुर्ति को अपने साथ ले गये। बाद में इन्द्रवर्मा ने पत्थर की मुर्ति बनाकर मंदिर में स्थापित करवायी।


आक्रमणकारी अनामियों से बचाया चम्पा को:-

इन्द्रवर्मा तृतीय की मृत्यु हो जाने के पश्चात् अनामियों लोगों ने चम्पा पर कब्जा कर लिया। क्योंकि चीन से पराजित होने के बाद यह चम्पा की ओर बढ़े। चम्पा में आकर इन्होने स्थापित मंदिरों को लूटा। यह अपने साथ लूटकर सौ बौद्ध भिक्षुओ और स्त्रीयों को ले गये। परन्तु इसी समय चम्पा में एक योद्ध श्रीहरिवर्मा के नाम से कुछ भाग पर शासन करने लगा और इसने अपनी राजधानी विजय शहर को बनाया। सन् 1441 ई.वी. में जयसिंहवर्मा शासक बना। परन्तु यह सन् 1444 ई.वी. मे लड़ते-लड़ते मारा गया। इसके बाद सन् 1050 ई.वी. में जयपरमेश्वर-वर्मदेव ईश्वरमूर्ति के नाम से नये वंश की स्थापना हुईं और इसने बड़ी बहादुरी से आक्रमणकारियों को रोका और टुटे हुये मंदिरों का पुनः जीणोद्वार करवाया। इस वंश का अन्तिम शासक रूद्रवर्मा चतुर्थ था। इसके समय में भी अनामियों ने चम्पा पर आक्रमण किया था।

इसके बाद हरिवर्मा चतुर्थ के द्वारा चम्पा पर शासन किया गया। इसके लेखों से ज्ञात होता है कि इसने चम्पा के अलग-अलग प्रांत में मंदिर का निर्माण करवाया। मंदिरों में गायन, नृत्य और नौकर रखे, जिनकों शासन वेतन दिया करता था। धर्मशालाओं और आश्रम का निर्माण करवाया। नष्ट हुये नगरों, मार्गो और भवनों का भी निर्माण करवाया और सन् 1081 ई.वी. में हरिवर्मा चतुर्थ अपना शासन बड़े पुत्र को सौंपकर शिव की भक्ति में अन्तिम समय बिताने लगा। परन्तु यह एक साल बाद इसकी मृत्यु हो गयी और इसके साथ लगभग 14 रानीयां भी सती हो गयी। सन् 1113 ई.वी. में हरिवर्मा पाँचवा राजा बना और यह अंतिम शासक था।

वियतनाम अथवा चम्पा में हिन्दू धर्म:-

चम्पा अथवा वितयनाम में लगभग वही शासन प्रणाली अपनायी जा रही थी, जो सैकड़ो वर्षो से भारत के राजा-महाराजाओं की थी। यह भी राजसत्ता कायम थी। राजा सर्वोच्च शक्ति समझा जाता था। उसको भी देवी अधिकार थे। चम्पा के राजा की जो स्थिति थी, वह मनुस्मृती में लिखित आधार पर ही प्रतीत होती है। चम्पा के राजा इन्द्रवर्मा प्रथम के लेखों में राजा को इन्द्र, अग्नि, यम, कुबेर आदि नामों से पुकारा जाता था और इस प्रकार का वर्णन मनुस्मृती में भी राजा के लिये मिलता है। राजा को धर्म का रक्षक समझा जाता था। आश्रमों और नागरिकों की रक्षा करना उसका दायित्व था। भारत के राजाओं के जैसे वियतनाम अथवा चम्पा का राजा भी दरबार लगाया करता था। वह स्वयं ऊचें स्थान पर बैठता था, बाकि लोग उससे नीचे बैठते थे, राजा को झुकर प्रणाम किया जाता था। चम्पा का भ्रमण जब मार्कोपोलो ने किया, तब वह लिखता है कि - कोई भी स्त्री तब तक विवाह न कर सकती थी जब तक राजा उसे न देख लेता था। यदि राजा उससे प्रसन्न हो जाता था तब वह उसे अपनी रानी बना लेता था। दूसरी दशा मे वह दहेज देकर उसे दूसरा वर चुनने की अनुमति देता था। राजा की मृत्यु होने पर उसकी रानियों में सबसे अधिक कृपापात्र को उसके साथ सती होना होता था। शेष रानियां उसके प्रति विश्वासपात्र रहती हुई, धार्मिक जीवन व्यतीत करती थी। कुछ राजा ऐसे भी हुए,जिन्होने "वार्द्ध के मुनिवृतीनाम्" के आदर्शानुसार राज्य छोड़कर वानप्रस्थ ग्रहण किया था। गंगाराज राज्य त्याग कर अन्तिम दिन गंगा के किनारे व्यतीत करने के लिये भारत चला आया था।

चम्पा के शासक शैव धर्म को मानने वाले थे। चम्पा के प्राचीन लेख में कहां गया है कि चम्पापुर शिव के चरणों से उठी किरणों से बना है। यह पर महेश्वर, महादेव अधीश, अमरेश, शभु, ईशान आदि कई नामों से शिव को पूजा जाता था। यह लोग शिव को देवाधिदेव मानते थे। चम्पा निवासियों को विश्वास था कि वह उनकी सभी समस्याओं को हर लेगे। कई राजा तीर्थ यात्रा के लिये चम्पा अथवा वियतनाम से भारत आये। जिस प्रकार हिन्दू लोग भारत में शिव की पूजा करते है उन्ही धर्म शास्त्रों के अनुसार चम्पा अथवा वियतनाम के लोग सैकड़ों वर्षो से शिव की पूजा करते आ रहे थे।

शैव धर्म के अतिरिक्त वैष्णव धर्म को मानने वाले चम्पा में थे। विष्णु को पुरूषोत्म, नारायण, हरि, गोविन्द, माधव आदि कई नामों से जानते थे। यही नही राम एवं कृष्ण को भी विष्णु का अवतार मानकर इनकी पूजा किया करते थे। इसके अतिरिक्त ब्राहमा, इन्द्र, यम, सूर्य, कुबेर, आदि भगवानों का भी उल्लेख मिलता है। वियतनाम में मृतक संस्कार भी हिन्दू रीति-रिवाज से किये जाते थे और इनके साथ वह सभी सामग्री रखी जाती थी, जो उनके दैनिक जीवन में काम आती थी। कहीं-कहीं शव को पानी में बहाने का उल्लेख भी मिलता है। वियतनाम के चम लोगों ने भारतीय कला एवं उनकी घर-मकान अनुदरण किया। भारत से जाने वाले वियतनात में किस प्रदेश से गये थे इस पर भी इतिहाकार एक मत नही हैं परन्तु प्राचीन शिलालेखों की शैली एवं उनके रहन-सहन तथा भाषा के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि भारत से वियतनाम जाने वाले एवं हिन्दू संस्कृति को स्थापित करने वाले वियतनाम में हिन्दू मंदिरों, विष्णु, ब्रह्मा, महेश, गणेश, शिव आदि की मुर्तियों का निर्माण करने वाले महाराष्ट्रीयन लोग थे। इन्होने न केवल वियतनाम में राज किया बल्कि वहां के चम लोगों को चार वेद, षड्दर्शन, रामायण, महाभारत, जैनदर्शन, महायान, साहित्य, शैव और वैष्णव साहित्य, काशिका सहित व्याकरण, ज्योतिषशास्त्र, मनु, नारद और भृगुस्मृति, पुराण तथा संस्कृत काव्य और गद्यग्रन्थों से भली प्रकार परिचत करवाया।


वियतनाम में मंगोल का आक्रमण:-

लगभग 12 वी. शताब्दी के अंत में मंगोल अपने घरों से निकलकर विश्व के कई देशों में उत्पाद मचा रहे थे एवं हिंसा का सहारा लेकर इस्लाम धर्म को इन्होने घर-घर पहुंचाने के लिये कृत्य एवं कुकृत्य कर रहे थे। मंगोल सरदार चंगेज खां ने यूरोप एवं एशिया का एक भाग जीत कर मंगोल सम्राज्य की स्थापना की। सन् 1207 ई.वी. में कुबलेई खां उत्तराधिकारी हुआ। जिसने भारत पर भी लगभग इसी समय आक्रमण किया था। इसी कुबलेई खां को उसके एक सरदार ने बताया कि भारत के जैसे ही एवं भारत के लोगों में ही चम्पा में कई मंदिरों का निर्माण किया है, जिसमें बहुत संपत्ति रखी हुई हैं और इस समय यह का राजा इन्द्रवर्मा था। राजा के लिये कुबलेई ने अपना एक संदेश की वह मंगोलों की आधीनता को स्वीकार कर ले और चम्पा को मंगोल राज्य का हिस्सा मानकर अपने आप को प्रतिनिधि घोषित कर दे। परन्तु चम्पा दरबार में से इन्द्रवर्मा के पुत्र हरिजीत ने मंगोलों को राजदूत को लौटा दिया। इससे रूष्ट होकर सन् 1282 ई.वी. मंगोलों ने चम्पा पर आक्रमण कर दिया और हरिजीत को गिरफ्तार कर लिया। परन्तु बाद में हरिजीत को रिहा कर उसको चम्पा का राजा बना दिया। बाद में सन् 1312 ई.वी. में महेन्द्रवर्मा ने चम्पा पर शासन किया। परन्तु अनाम लोगों ने चम्पा को जीत लिया और यह अनामी शासक राज करने लगे। बाद में अनामी लोग एवं चम मूल निवासी के बीच भारी युद्ध हुआ। सन् 1380 ई.वी. जयसिंहवर्मादेव पुनः चम्पा का शासक बना, बाद में 1505 ई.वी. में "शा-कू-पू-लो"ने राज किया, जिसकी मृत्यु सन् 1545ई.वी. में हो गई।


वियतनाम अथवा चम्पा में बौद्ध धर्म:-

चम्पा में हिन्दू धर्म के साथ-साथ भारत में ही जन्म लेने वाला बौद्ध धर्म की विचारधारा भी फल-फूल रही थी। चम्पा में बुद्ध-लोकेश्वर, लोकनाथ, सौगत, शाक्यमुनि, वज्रपाणि, प्रमुदितलोकेश्वर आदि कई नामों से स्मरण किया जाता था। समझा यह जाता था कि बुद्ध सर्वशक्तिमान् है। वह कई योनियों में पहिले भी पैदा हो चुका है। वह दुखियों के प्रति संवेदना और दरिद्रों के प्रति दया धारण करता है। उसकी आत्मा में प्राणिमात्र के प्रति कल्याणमयी भावना जागृत है। ऐसा प्रतीत होता है कि राजा की ओर से भी बौद्धधर्म को संरक्षण प्राप्त था। राजाओें और नागरिकों-दोनों ने बुद्ध के मंदिर बनवाये थे। दड्.-दाड्. का उत्कीर्ण लेख बताया है कि जयइन्द्रवर्मा ने लोकेश्वर की मुर्ति बनवाई थी। चम्पा में बुद्ध की बहुत सी मुर्तियां मिली हैं। एक में वह शेषनाग पर आसीन है। मिट्टी की कुछ मोहरें मिली हैं जिन पर बुद्ध की मूर्तियां बनी हुई हैं। इन सब बातों से यही परिणाम निकलता है कि चम्पा में बौद्धधर्म का पर्याप्त प्रभाव था।

इस प्रकार भारत के दक्षिण से महाराष्ट्रीय नागरिक चम्पा अथवा वियतनाम पहुंचे। जहां पर इन्होने हिन्दू धर्म को स्थापित किया एवं भारत के जैसे ही मंदिरों का निर्माण करवाया। इनमें अपने इष्ट देव ब्रह्म, विष्णु, महेश, गणेश, बौद्ध की मुर्तिया स्थापित की। भारत के जैसे ही सामाजिक संगठन स्थापित किया। यह पर भी समाज को चार वर्णो मे बांटने का काम किया। यह पर भी सती प्रथा के लेख मिलते है। राज सर्वशक्तिमान था। सेना में क्षत्रिय थे। समुद्र के किनारों वियतनाम होने की वजह से यह के ब्राह्मण मछली एवं शराब का नशा करते थे। चम्पा में भारत के जैसे ही त्यौहारों को मनाया जाता था। दुर्गा पूजा हुआ करती थी। मृतक संस्कार भी भारत के जैसे ही हुआ करते थे। मंदिरों का निर्माण भी भारत की वस्तुकला के आधार पर किया गया था, जिसके टूटे अवशेष आज भी भारतीय संस्कृति की कहानी कह रहे हो। वर्तमान में कई हिन्दू आज भी वियतनाम में बसे हुये है और यह लगभग उन्ही के वंशज है जिन्होने चम्पा में हिन्दू धर्म को स्थापित किया था।

हमारे पूर्वजों के द्वारा चम्पा में न केवल बौद्ध धर्म बल्कि हिन्दू धर्म की विचाराधारा को स्थापित किया। वियतनाम का इतिहास 2700 वर्षो से भी अधिक प्राचीन है। यह पर चम लोग बसा करते थे। शायद इसी लिये ही चम्पा कहां गया। इन्होने ने भी शैव सम्प्रदाय को स्वीकार कर लिया था। दूसरी शताब्दी में स्थापित चम्पा भारतीय संस्कृति का प्रमुख केन्द्र था। इस शताब्दी मे लगभग सभी चम लोगों ने भारतीय धर्म, भाषा, सभ्यता को ग्रहण कर लिया था और आप लोगों को यह भी बताना चाहता हूँ कि सन् 1825 ई.वी. में चम्पा के महान हिन्दू राज्य का अंत हो गया। सन् 380-443 के चीनी इतिहास फन-हु-ता के अनुसार श्री भद्रवर्मन् चम्पा का प्रसिद्ध शासक था।

बाद में किन्ही कारण वश चम्पा के लोगों ने इस्लाम धर्म को भारत के जैसे ही स्वीकार करने लगे। परन्तु कई चम लोगों ने भारत के बौद्ध एवं हिन्दू धर्म को नही छोड़ा। आज भी हिन्दू एवं बौद्ध संस्कृति की झलक चम्पा अथवा वियतनाम में देखी जा सकती है। अपने पूर्वजों की विरासत को वियतनाम मे देखा जा सकता है। इसलिये सरकारों की एक ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिये कि भारतीय वियतनाम में जाकर हजारों वर्षो से स्थापित बौद्ध एवं हिन्दू संस्कृति को देखकर गौरव का अनुभव कर सके।

लेखक

संतोषकुमार लड़िया

एम. ए. प्राचीन इतिहास

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