प्रकाश पर्व गुरू नानक एवं संत रैदास


संत गुरू नानक का जन्म 15 अप्रैल 1469 ई.वी. में तलवंडी नामक स्थानपर हुआ था, जो वर्तमान ननकाना साहिब के नाम से पाकिस्तान में आता है। इनके द्वारा सिक्ख पंथ की स्थापना की थी। इनकी जीवन साथी सुलक्खनी देवी थी, इनके पिता का नाम लाल कल्याण राय एवं माता तृप्ता देवी थी। नानक जी की प्रथम भक्त उनकी बहन नानकी थी, इनके द्वारा एक ईश्वर की आराधना पर बल दिया गया। इन्होने ईश्वर की उपस्थिती प्रत्येक प्राणी और हर स्थान पर पाई जाने का उल्लेख किया है। नानक जी ने हमेशा सत्य और ईमानदारी पर चलने की शिक्षा दी है, वह सदैव ईमानदारी और परिश्रम से ही लोगों को अपना पेट भरने की सीख देते थे। इसके साथ-साथ इन्होने हमेशा कहां कि सांसारिक बातों में इतना मोह न लगाएं की ईश्वर को याद करने का समय भी न मिल सके। लोभ और लालच से हमेशा दूर रहने का भी संदेश इन्होने समाज के हर वर्ग को दिया। सिख सम्प्रदाय का प्रथम मुख्य धर्म ग्रंथ गुरू ग्रंथ साहिब है, इसका संपादन सिक्ख संप्रदाय के पाँचवें गुरू अर्जुनदेवजी के द्वारा किया गया और 16 अगस्त 1604 ई.वी. को हरि मंदिर साहिब अमृतसर में गुरूग्रंथ साहिब का पहला प्रकाश पर्व हुआ था। गुरू ग्रंथ साहिब में कुल 1430 पृष्ठ है। गुरू ग्रंथ साहिब में सभी धर्मों की वाणी सम्मिलित है। इसमें जयदेव परमानंदजी जैसे ब्राह्मण भक्तों की वाणी को स्थान दिया गया है वैसे ही शुद्र वर्ग से आने वाले रैदास की वाणी को स्थान देकर समाज को एक क्रांतिकारी संदेश दिया। यही नही पाँचों वक्त नमाज पढ़ने वाले शेख फरीद के कई श्लोकों को भी गुरू ग्रंथ साहिब में स्थान दिया गया। परन्तु मुख्य रूप से सिख समाज में जितनी आस्था संत गुरू नानक के प्रति उतनी ही आस्था संत रैदास के प्रति भी प्रदर्शित की गई है, इन्होने ने भी समाज को संत गुरू नानक के जैसे ही संदेश दिया। सिख धर्म के संस्थापक ने कहा था कि ‘‘धर्म शमशानों या मजारों में भटकने या साधना की मुद्रा में बैठने से नही होता।’’ इसलिये सिखों के दस गुरूओं में से एक गुरू श्री अमर दास जी ने सिक्खों के हरिद्वार, बनारस, इलाहाबाद आदि स्थानों पर जाने से रोकना चाहा। परन्तु गुरू नानक देख स्वयं आजोधन के शेख फरीद की मजार पर पहुंचकर समाज को एकता का संदेश दिया, यही नही गुरू नानक देव ने हरिद्वार, कुरूक्षेत्र, पुरी, रामेश्वर, वाराणासी, कैलाश, उज्जैन आदि हिन्दू तीर्थो की यात्रा की, लेकिन इन्होने ऐसा अर्थहीन संस्कारों, अडम्बर एवं अंधविश्वासों पर प्रहार करने के उद्देश्य से की थी, जिससें की समाज को अडम्बरों एवं अंधविश्वासों से दूर रखा जा सके।

जनवरी-फरवरी के चंद्रमास (माघ) की पूर्णिमा के दिन चमार जाति के लोग संत रविदास या रैदास का जन्मदिन मनाते हैं। इनके जन्म के संबंध में इतिहासकारों एवं समाज सेवीयों में मतभेद है, परन्तु सभी का एक मत है कि इनका जन्म बनारस के पास ग्राम सीर गोबर्धनपुर, सन् 1377 ई.वी. में हुआ था, इनके पिता संतोख दास जी और माता का नाम कलसा देवी था। दादा का नाम कालूराम जगसल एवं दादी का नाम लखपति बाई था। यह चमार थे और कबीर के शिष्य थे। अपने गुरू की तरह उन्होंने भी अपने वचनों और पदों में हिन्दू और इस्लाम धर्मो की रूढ़ियों पर प्रहार किया, उन्होंने परमेश्वर के शाश्वत निराकार रूप की शिक्षा दी और उसके समक्ष सबके समान होने का उपदेश दिया और निश्चल भक्ति को मुक्ति का निश्चित मार्ग बताया। उन्होंने त्याग के दर्शन को अस्वीकार करते हुए निर्मल और सादे सांसारिक जीवन के महत्व की हिमायत की, जिसमें व्यक्ति अपने पारिवारिक जीवन, जातीय धंधों और उस निराकार परमेश्वर के प्रति समर्पित रहता है जो सभी धर्मो और सभी पंथों से आगे है। इन्होने हमेशा जाति-पाती निर्माताओं को अपनी वाणी के माध्यम से यह बताया कि नियम, न्याय, नीति ही सही है जाति-पाती, छूआ-छूत एवं धर्म से समाज को बांटना उचित नही हैं, क्योंकि शरीर से सभी एक जैसे है कोई अलग-अलग नही है। वह हमेशा समाज को जोड़ने एवं भाईचारे का संदेश दिया करते थे जैसे-

‘‘ जाति-पाती विरोधी मत होई, नीति न्याय बतावत सोई।

जाति एक जामे एकहिं चिन्हा, देह अवयव कोई नहीं भिन्ना।’’

भारतीय सामाजिक समाज को जाति के आधार पर तोड़ने का विरोध किया है। रविदास जी ने हिन्दू समाज में तथाकथित वर्ग जो समाज में स्वयं को श्रेष्ठ समझते हुए इसका प्रदर्शन करते है और स्वयं को जीता-जागता धरती का देवता होने का भी एहसास कराते है। रविदास जी ने इनकों लगभग 700 साल पूर्व अपने ज्ञान और निडरता से स्वयं को उस समाज में स्वीकार करने के लिये विवश कर दिया। इन्होने बहुदेवतावाद का खण्डन किया। यह हमेशा एक ईश्वर एवं अपने गुुरू के प्रति समर्पित रहे। इनकी गुरूवाणी में व्यक्ति अपने अच्छे एवं बुरे कर्मो से ही ऊँचा-नीचा होता है अर्थात जन्म के आधार पर कोई भी व्यक्ति छोटा-बड़ा नही होता है, जो लोग आज जन्म के आधार पर स्वयं को श्रेष्ठ मान रहे है। यह भी समाज में अशोभनीय कार्य करने से पीछे नही हट रहे है जैसा कि गुरूवाणी में रविदास जी उल्लेख करते है कि-

‘‘तुम पाण्डे हो निपट गंवारा, जानी नहीं कुछ विवेक विचारा।

विधि त्याग अविज्ञा छाई, भूल गये चाणक्य चतुराई।

चार खान उपजत जग सारा, ईश्वर एक सृजन हारा।’’

रविदास जी ने गुरूवाणी में कर्म-काण्डों का पूरजोर खण्डन किया, बाबा का कहना था कि व्रत, पूजा, माला, तिलक से कुछ भी होने वाला नही है और इससें आपकी मनोकामना भी पूरी नही होगी, जिसके लिये समाज में कर्म-काण्ड किये जाते है, इसके स्थान पर रविदास जी ने अपनी गुरूवाणी में कर्म को ही प्रधान माना है। और उन्होने कहां कि जैसा कर्म करोगे, वैसा ही फल मिलेगा, इसलिये व्यक्ति को कर्म पर ही विश्वास रखना चाहिए, कर्म के बिना कभी-भी किसी का भाग्य पूजा-पाठ से जागृत नही हो सकता है। रविदास जी ने अपनी गुरूवाणी में उल्लेख किया-

‘‘व्रत, पूजा, माला, तिलक, सर्रे नहीं कुछ काम,

मेरा ये पाषाण का सांचा सालगराम।।’’

‘‘माला तिलक और सालगरामा। इनसे सर्रे न कोई कामा।

पद्य पादिका रोली माला, पाण सुमणी कमट की माला।।’’

रविदास जी ने गुरूनानक के जैसे ही अपनी गुरूवाणी में ऐसे लोगों को संदेश दिया जो वैध एवं अवैध तरीकों से धन कमाते है, लेकिन वह उनको अच्छे एवं सद्कर्मो में खर्च नही करते हंै अर्थात सामाजिक उत्थान एवं गरीबों में दान करने के लिए साहस नही जुटा पाते, क्योंकि माया मोह इसमें बहुत बड़ी बाधा होती है। जैसा कि उन्होने गुरूवाणी में लिखा है कि - ‘‘धन संचय दुख देत है, धन त्यागे सुख होय। रविदास सीख गुरू देव की, धन मति जौर कोय।।’’

गुरूवाणी में रविदास जी ने समाज को यह संदेश दिया कि स्वाधीनता ही व्यक्ति का सबसे बड़ा आभूषण है और गुरू स्वाधीनता, स्वतंत्रता के पक्षधर थे, इसलिये गुरू ने पराधीनता और परतंत्रता को पाप और एक अभिशाप माना था। गुरू को यह विचार था कि पराधीनता व्यक्ति को दास बना देती हैं, और दास के समान ही जीवन व्यतीत करने के लिये मजबूर करती है। क्योंकि मालिक के सामने दास की सभी अधिकार समाप्त हो जाते है या हम दूसरे शब्दों में कहें कि दास के समस्त अधिकारों को मालिक छीन लेता है और उसको दरिद्रता पूर्ण दीन-हीन, पतित लचारी का जीवन व्यतीत करना पड़ता है और यह दासता धार्मिक, आर्थिक और सामाजिक राजनैतिक भी हो सकती है। इस दासता से मुक्त होने का संदेश गुरू के द्वारा मध्यकाल में दिया गया था। गुरू का संदेश था कि सब समान हो कोई किसी का मालिक न रहे, यही गुरू की स्वराज्य की कल्पना रही होगी। क्या आज हम आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, सामाजिक व्यवस्था के दास होकर तो नहीं रह गये ? क्या आज भी हम स्वतंत्र है, इस पर हमको स्वयं विचार करना होगा ? और गुरू के दिये संदेश का पालन कर दलित समाज, पिछड़ा वर्ग और आदिवासी समाज को स्वाधीन, समर्थ, स्वतंत्र समाज का निर्माण करना होगा।

‘‘ऐसा चाहों राज में, जहां मिलें सवन को अन्न।

छोटों, बड़ों सम-सम बसैं, रविदास रहें प्रसन्न।।’’

गुरूनानक के जैसे ही कबीर साहिब ने भी समाज को यह संदेश दिया कि ईश्वर प्राप्ति के लिये भौतिक वस्तुऐं एवं सामग्री की आवश्यकता नही होती है। प्रभु को सोने से तोलकर नही पाया जा सकता है उसको केवल अपनी श्रद्धा, मन एवं मानव की सेवा से ही प्राप्त किया जा सकता है, इसलिये मानव सेवा ही सर्वोपरि है। दूसरों को कष्ट देने वाले कभी-भी ईश्वर को प्राप्त नही कर सकते है जैसे कबीर साहिब ने कहां कि-

‘‘कंचन सिउ पाईए नही तोलि।।

मनु दे राम लीआ है मोलि।।’’

रविदास जी कहते है कि ‘‘जो दिन आवहि सो दिन जाही’’ गुरू कहते है जिस प्रकार दिन की एक सीमा होती है उसी प्रकार मनुष्य के जीवन की भी एक सीमा है। जिसका अंत हैं, यह सदा के लिये नहीं मिला हैं, इसलिये हम सबको सामाजिक एवं लोक कल्याणकारी कार्य करना चाहिये। क्योंकि मृत्यु से हम बच नही सकते। हमारा जीवन निश्चित है और यह हमको स्वयं ज्ञात है फिर भी हम अपने समाज को आगे नहीं बढ़ा कर या उस समाज को समाज आर्थिक दृष्टि से सहायता करने में पीछे है। यही कारण है कि आज भी हमारा समाज गैर बराबरी और भेदभाव का शिकार हो रहा है। मध्यकाल में सभी संतों ने पूर्ण साहस और दृढ़ता के साथ समाज को विघटन करने वाली विचारधारा जो गैर बराबरी, पूंजीवादी एवं परम्परागत रूप से रूढ़ीवादी विचार धारा रखने वाले लोगों का विरोध कर रहे थे। गुरू नानक साहिब के विचार एवं उनकी शिक्षाऐं आज भी उतनी ही सार्थक है जो कि सैकड़ो वर्ष पूर्व हुआ करती थी। गुरू नानक की शिक्षाओं एवं उनके विचारों को अपनाकर समाज एवं देश में उत्पन्न होने वाली कई प्रकार की समस्याऐं जैसे जातिवाद, अंधविश्वास, छूआ-छूत एवं अंहिसा जैसी घटनाओं का भी समाधान किया जा सकता है। इसलिये गुरू नानक की शिक्षाओं को घर-घर पहंुचाकर उनके प्रति सच्ची श्रद्धा एवं समर्पण होगा। इसी के साथ गुरू नानक जयंती अथवा प्रकाश पर्व पर सभी को हार्दिक शुभकामनाऐं।

संतोष कुमार लड़िया

उज्जैन (म.प्र.)