गौतम बुद्ध की विचारधारा से, हुआ चीन का विकास !


भारत के इतिहास में दो ऐसे महापुरूषों ने जन्म लिया, जिन्होने महलों के सुख, सुविधाओं एवं अधिकारों को त्यागकर ऐसा जीवन जीने का संकल्प लिया, जिसमें कठिनाईयों और पीड़ा के सिवा कुछ नही था; क्योंकि यह दोनों सुधारवादी महापुरूषों ने जीवन जीने का जो रास्ता चुना था। वह अपने पूर्वजों के द्वारा स्थापित धर्म में सुधार एवं शोषित समाज का पुनर्वास करने वाला था। इनके द्वारा जिस सामाजिक सुधार आन्दोलन को चलाने का संकल्प एवं निर्णय लिया था। वह सनातन धर्म की विचारधारा को प्रभावित करने वाला था; क्योंकि उनके द्वारा हिन्दू धर्म में जो बुराईयो, कुरीतियो, कुपरम्पराऐं, अंधविश्वास एवं अडम्बर आदि के विरोध में समाज को जागरूक करने का शुभ काम इन दोनों महापुरूषों के द्वारा भारतीय इतिहास में पहली बार किया गया। इसलिए प्राचीनकाल में दोनों महापुरूषों को वैदिक धर्म विरोधी नाम देकर सामाजिक रूप से बहिष्कृत किया गया, क्योंकि दोनों वैदिक धर्म में उल्लेखित कमीयों को समाज के सामने प्रस्तुत कर रहे थे; क्योंकि बौद्ध एवं महावीर काल का समाज अशिक्षा एवं अंधविश्वासी था।

शाक्यमुनि गौतम बुद्धएवं महावीर दोनों ही केवल सामाजिक सुधार आन्दोलन को ही जन्म नही दिया, बल्कि दोनों विश्व के प्रथम मानव अधिकारों की रक्षा करने वाले युवराज थे। गौतम बुद्ध के विचारों एवं शिक्षाओं को मानने वालों को बुद्ध अथवा बौद्ध धर्म का अनुयायी माना जाता है। ऐसे ही महावीर अथवा जैन धर्म के अनुयायी कहां जाता है। जैन एवं बौद्ध धर्म में केवल अंतर इतना है कि जैन धर्म की विचारधारा उनके अनुयायीयों ने भारत तक ही सीमित रखी, परन्तु बौद्ध धर्म के अनुयायीयों ने गौतम बुद्ध की विचारधारा को भारत की सीमाओं से बाहर पहुंचाने का कार्य किया, जिससें भारत की संस्कृति एवं साहित्य भी विदेशों में पहुंचा एवं जिसको अपनाकर आज चीन,कोरिया, जापान, कंबोडिया, थाईलैण्ड, श्रीलंका जैसे आदि देशों ने अपना सामाजिक, धार्मिक एवं आर्थिक रूप से अपने देशों को सम्पन बनाया।


चीन-शाक्यमुनि के चरणों में:-

महात्मा बुद्ध के जीवनकाल में उनकी शिक्षा एवं ज्ञान भारतवर्ष के कुछ क्षेत्रों में ही सिमटा हुआ था। गौतम बुद्ध ने भी बौद्ध धर्म के प्रचार के लिये सम्पूर्ण भारत वर्ष का भ्रमण नही किया था, इसलिये भी यह सम्पूर्ण भारत वर्ष में नही फैल सका था। परन्तु गौतम बुद्ध से दीक्षा लेने के पश्चात् उनके समकालीन मगध के राजा बिम्बीसार ने अपने राज्य में बौद्ध धर्म को राजकीय धर्म घोषित कर संरक्षण दिया था। इसके बाद राजा बिम्बीसार का उत्तराधिकारी एवं पुत्र अजातशत्रु ने भी बुद्ध की दीक्षा ग्रहण कर गौतम बुद्ध की शिक्षाओं को अपना लिया था। यह एक बहुत बड़ी घटना थी कि किसी राजा ने अपने पूर्व धर्म को त्यागकर बुद्ध के जीवनकाल में ही उनके समक्ष ही उनकी शिक्षा एवं विचारधारा को राजकीय संरक्षण दिया हो और यह विचारधारा केवल वैदिक धर्म के विरोध में ही थी। इसके बाद कई शासकों ने बौद्ध धर्म को स्वीकार किया। यदि बुद्ध की विचारधाराओं को विदेशों में भेजने वाला कोई शासक था, तो वह केवल विखंड़ित भारत को एक करने वाला सम्राट् अशोक ही था। इसके पहले किसी शासक ने भारत की सीमा के बाहर पैर नही रखा था।

चक्रवर्ती सम्राट् अशोक के द्वारा बौद्ध धर्म को राजकीय सहायता मिलने से एशिया, यूरोप, अफ्रीका तीनों महाद्वीपों में फैल गया। अशोक के बाद कुशान वंश का शासक राजा कनिष्क ने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिये कई प्रयास किये। इसने भी सम्राट् अशोक के जैसे ही पेशावर में, जो वर्तमान में पाकिस्तान में है, बौद्ध धर्म के प्रचार के लिये चोथी बौद्धों की आम सभा का आयोजन किया था। जिस समय पश्चिमी भारत में कुशान राजा राज कर रहे थे। इसी समय चीन में बौद्ध धर्म का प्रचार प्रारम्भ हो चुका था। कुशान राज्य में रहने वाले कई बौद्ध विद्वान,पंड़ित, अनुयायीयों ने चीन की ओर अपने कदम बढ़ाये।


सन् 65 ई.वी. में चीन:-

चीन में बौद्ध धर्म पहुंचने के पूर्व यह के लोग कन्फ्यूशस और ताऊ धर्म आदि के अनुयायी थे। बौद्ध धर्म किस समय और कैसे चीन में पहुंचा इस संबंध में इतिहासकारों में परस्पर मतभेद है। सभी इतिहासकारों के अपने-अपने तर्क है, परन्तु चीनी विवरण एवं पुस्तक ‘को-वैन-फिड्-चौ'' से ज्ञात होता है कि चीनी शासक ‘‘हान’’ वंशीय राजा मिड्ती ने 65 ई.वी. में बौद्ध धर्म की शिक्षा एवं उसकी सत्यता को जाँचने के लिये पहली बार 18व्यक्तियों का दूतमंड़ल भारत भेजा था। यही मंड़ल लौटकर वापिस गया, तब इनके साथ कई बौद्ध ग्रन्थ एवं 02 बौद्ध भिक्षु भी चीन पहुंचे। यही से चीन में बौद्ध धर्म का प्रवेश माना गया है और यह दल 11 वर्ष के बाद लौटा था। जो 02 भिक्षु चीन पहुंचे थे वह काश्यपमातड् और धर्मरक्ष थे। इनके साथ एक बुद्ध की प्रतिमा भी थी, जब यह दोनों चीन पहुंचे तब राजा मिड्ती ने दोनों का आगमन किया और मुर्ति स्थापित करने के लिये मंदिर का निर्माण करवाया। मंदिर का नाम ‘लोयड्’’ रखा गया।

भिक्षु धर्मरक्ष एवं काश्यपमातड्ढ दोनों ही मगध के रहने वाले था, जब इनके द्वारा चीन में बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार किया जा रहा था, तब कई चीनी लोगों ने इसका का वैसा ही विरोध किया, जैसा कि भारत में पाखंड़ी लोग कर रहे थे। चीन में कन्फ्यूशस और ताऊ धर्म वालों ने संगठित होकर बौद्ध धर्म के विरोध में आवाज उठाई थी, परन्तु चीन के राजा ने इनको शांत करवा दिया। यही नही चीन के राजा ने कई विहार एवं मंदिरों का भी निर्माण राजकीय धन से करवाया। इसके साथ-साथ कई संस्कृत एवं बौद्ध पुस्तकों का चीनी में अनुवाद किया। इस प्रकार चीन में बौद्ध धर्म की जड़े जम चुकी थी। बौद्ध अनुयायी धर्मरक्ष के द्वारा भारत में कई प्रकार के संदेश भेजे जा रहे थे।


सन् 175 से 300 ई.वी.-

चीन में बौद्ध धर्म की जड़ पकड़ते हुये कई भारतीय पंड़ित एवं बौद्ध भिक्षु अपनी विचारधारा लेकर बड़ी संख्या में चीन जाने लगे। प्रथम मंड़ल में आर्यकाल, श्रमण सुविनय, स्थविर, चिलुकाक्ष आदि पहुंचे। दूसरी शताब्दी के अन्त से पूर्व महावल चीन पहुंच गया था। इसने भी चीन के लोयड् विहार में रहकर संस्कृत गंथों का चीनी में अनुवाद किया। तीसरी शताब्दी में धर्मपाल चीन गया और यह अपने साथ कपीलवस्तु से कई बौद्ध पुस्तके ले गया था। इसने भी207 ई.वी. में ‘‘महायान इत्युक्तिसूत्र’’ का अनुवाद किया था। इसने ही चीनी लोगों को विनय के नियमों से परिचित करवाया था। तीसरी शताब्दी समाप्त होते ही कल्याणरन,कल्याण और गोरक्ष चीन पहुंचे और यह भी अनुवाद कार्य में जुट गये। चीन के दक्षिणी भागों में गौतम बुद्ध की शिक्षा का प्रसार करने लगे, इस बीच लगभग 250बौद्ध ग्रंथों का चीनी भाषा में अनुवाद कर चीनी लोगों को उपलब्ध कराये गये थे।

तीसरी शताब्दी के अंत में चीन पर शासन करने वाले हान वंश जो बौद्ध धर्म को संरक्षण दे रहा था, इसकी शासन शक्ति ढीली पड़ गई और यही वजह रही कि सारा चीन तीन भागों में बट गया। क्रमशः यह राज्य वी, वू, शु के रूप में उभर कर आये। इस समय लोयड् ‘वी’ राज्य की राजधानी थी। जहां पर कई बौद्ध मंदिरों एवं विहारों का निर्माण किया जा चुका था। इन मंदिरों के निर्माण में प्रचारक काश्यपमातड की भूमिका थी और यह गंधार से चीनी दूत मंड़ल के साथ चीन पहुंचा था। चीन में ‘वू’ राज्य की राजधानी नानकिड्. थी यह पर भी कई अनुवादक रहा करते थे। चीन में फैली अव्यवस्थाओं के कारण सन् 265 ई.वी. में चीन की राजगद्दी ‘चिन'' वंशीय राजाओं के हाथों में आ गई और इनके शासन काल में सारा चीन एक होकर इनके आधीन हो गया और इनके कार्यकाल में बौद्ध धर्म बहुत विकसित हुआ एवं उन्नती की। इन्होने ही 381 ई.वी. में चीनी राजा ‘‘हैउ-वु’’ ने नानकिड्. शहर में एक विशाल बौद्ध मंदिर का निर्माण करवाया था। यही नही उत्तरी चीन में बड़े-बड़े विहार का निर्माण भी करवाया था। इनके काल में अधिकांश चीनी नागरिकों ने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया था एवं शांति और अंहिसा का रास्ता अपनाकर हिन्दूस्तान की बौद्धिक सम्पदा का उपयोग कर अपने राष्ट्र एवं परिवार की उन्नति करने लगे।


सन् 300 से 450 ई.वी:- बौद्ध अनुयायीयों पर अत्याचार

इस समय भारत में केन्द्रीय शासन गुप्त साम्राज्य का था,इसी काल में राजकीय स्तर पर वैष्णव एवं शैव धर्म को संरक्षण दिया जा रहा था। इसी काल में लगभग 405 ई. वी. में भारतीय पंड़ित एवं बौद्ध अनुयायी चीन पहुंचे, इनके साथ कुमारजीव भी पहुचा। यह अपने समय के बहुत बड़े विद्वान थे। इनके पिता कश्मीर राज्य में मंत्री हुआ करते थे। केवल 07 वर्ष की आयु में इन्होने बौद्ध धर्म की दीक्षा प्राप्त कर ली थी। इनके गुरू जाने-माने आचार्य बुद्धदत्त थे। बाद में कुमारजीव को "कूचा" के राजा ने अपने देश बुला लिया था और इसी कुचा प्रांत पर चीनी सेनाओं ने आक्रमण कर दिया था। आक्रमण केवल इसलिये किया गया था;क्योंकि ख्याती प्राप्त बौद्ध भिक्षु को चीन लाया जा सके। कुमारजीव को बंदी बनाकर चीनी दरबार में आदर के साथ राजा के समक्ष पेश किया और यह अनुरोध किया कि वह चीन में भी कूचा के जैसे ही बौद्ध धर्म की शिक्षाओं एवं शाक्यमुनि के अंहिसावादी सिद्धांतों को चीन में घर-घर पहुचायें, जिससे की आपसी संघर्ष समाप्त हो सके। राजा का अनुरोध स्वीकार कर कुमारजीवि ने 12 वर्ष में भारतीय ज्ञान की लगभग 100 पुस्तकों का चीनी भाषा में अनुवाद किया, जो धर्म के अतिरिक्त विज्ञान, गणित एवं अर्थ से संबंधित थी। कई विद्वानों ने यह खुले मन से स्वीकार किया कि कुमारजीव की भाषा चीन से भारत आये हेन्-त्साड्. (430 ई.वी.) से भी उत्कर्ष एवं श्रेष्ठ थी। इसके द्वारा लिखी गई अश्वघोष एवं नागार्जुन की जीवनी बहुत ही मनोरंजक थी। कुमारजीव के द्वारा खींचा गया स्वर्ग का चित्र चीनी राजाओ एवं प्रजा ने बहुत अधिक प्रशन्न किया गया था। सघभट्ट,गौतमसघदेव, धर्मप्रिय और बुद्धभट्ट यह सभी इसके सहयोगी थे। ऐसे प्रमाण भी है कि कम से कम एक हजार चीनी बौद्ध भिक्षु कुमारजीव के शिष्य थे। जिस समय कुमारजीव चीन में थे। लगभग इसी काल में "फाहियान" (399 ई.वी.) बुद्ध की जन्मभूमि एवं भारत में तीर्थ स्थानों की यात्रा कर रहा था। कुमारजीव के बाद धर्ममित्र ने लगभग 20 वर्षो तक भारतीय पुस्तकों का चीनी में अनुवाद किया और यह पुस्तकें तक्षशीला एवं नालंदा के विश्वविद्यालयों से बौद्ध भिक्षु और चीनी यात्री समय-समय पर चीन ले जाते रहे हैं।

सन् 420 ई.वी. में चिन वंश का पतन हो गया और एक बार पुनः चीन कई भागों में विभक्त हो गया। चीन के उत्तर में तातार् लोगों ने कब्जा कर लिया और यहीं लोग आगे चलकर ‘वी’ वंश के नाम से चीन में विख्यात हुये। दक्षिण में ‘‘सुड्.’’ वंश ने शासन करने लगे और यह दोनों ही वंश ही बौद्ध धर्म के कट्टर विरोधी एवं शत्रु थे। जैसे कि भारत में ब्राहमण राजा पुष्पमित्र शुंग था। जिस प्रकार पुष्पमित्र शुंग ने बौद्धों पर अत्याचार किया था ठीक वैसे ही ‘वी’ एवं सुड्. वंश चीन में अत्याचार करने लगे। इन्होने मुर्ति निर्माण तथा मंदिरों के निर्माण पर शासकीय रोक लगा दी थी, बौद्धधर्म के अनुयायीयों पर भीषण अत्याचार किये। चीनी जनता के द्वारा बौद्ध भिक्षु को दी जाने वाली खाद्य सामग्री पर रोक लगा दी गई। सन् 426ई.वी. में बौद्धमुर्तियां और पुस्तकें रखना अपराध घोषित कर दिया, बौद्ध भिक्षुओं को कत्ल किया जाने लगा, परन्तु तातार नृपति के बड़े पुत्र, जो बौद्ध धर्म के अनुयायीयों के साथ सहानुभूति रखते थे इन्होने यह सब रोकने का प्रत्यन्न किया, परन्तु असफल रहे।

सन् 451 से 800 ई.वी. तक:-

राजा सड्-वन्-ति के पिता की मृत्यु के बाद एक बार पुनः बौद्ध धर्म को चीन में संरक्षण दिया जाने लगा। राजा सड्-वन्-ति ने राजा बनते ही 451ई.वी. में प्रत्येक नगर में एक-एक बौद्ध मंदिर खड़ा करवा दिया और जिन मंदिरों को तोड़ा गया था उनका पुनः जीर्णोदय किया गया। और लगभग 50-100 पुरूषों को पुनः बौद्ध भिक्षु बनाकर चीन में धर्म प्रचार के लिये भेजा, जिससें की चीन की जनता को पुनः बौद्ध शिक्षाओं से परिचति करवाकर उनमें अंहिसा एवं त्याग की भावना पुनः जागृत हो सके, जिससे की राज्य का नुकसान न हो। कई पुस्तकों का पुनः चीन में अनुवाद किया गया। इस प्रकार के कार्यो की जब खबर भारत एवं मध्य एशिया के सभी राजाओं को लगी तब इन्होने न केवल राजा की प्रशंसा की बल्कि राजा के दरबार में कई दूतमंड़ल भेजकर महंगे उपहारों के साथ बधाई दी। इसी समय श्रीलंका का दूतमंडल भी चीन पहुंचा था। इस मंड़ल ने चीन के राजा के लिए एक संदेश भी भेजा था उसमें लिखा था ‘‘ यद्यपि हमारा देश इतनी दूर है कि वहां तक पहुंचने में 3 वर्ष लगते है।’’ परन्तु बौद्ध धर्म के प्रति श्रद्धा एवं प्रेम ने आप (चीन) तक प्रतिनिधि मंड़ल भेजने के लिये प्रेरित किया। चीन के उत्तर में ‘वी वंशीय’’ राजा ने बुद्ध की 35 फीट ऊँची मुर्ति बनवाकर स्थापित की । ऐसे ही दक्षिण के सुड् वंशीय राजाओं ने एक बहुत ही शानदार बौद्ध मंदिर बनवाया। इस प्रकार के कार्यो को देखकर एक बार पुनः भारतीय पंड़ित एवं बौद्ध धर्म के अनुयायी चीन की ओर जाने लगे; क्योंकि इन शासकों के द्वारा बौद्ध धर्म को संरक्षण दिया जा रहा था।

भारत से जावा देश पहुंचने वाला बौद्ध प्रचारक एवं विद्वान गुणवर्मन् और उसके साथी "जावा" होते हुये चीन पहुंचे। गुणवर्मन काश्मीर के राजघराने में पैदा हुआ था। इसने "जावा" और चीन पहुंचने के पूर्व श्रीलंका में भी धर्म प्रचार किया था। इससे ही "जावा" के राजकुमार ने बौद्ध धर्म की शिक्षा ग्रहण की थी। सन् 424 ई.वी. में चीनी राजा सड्-विन-ती ने गुणवर्मन को आमंत्रित किया था। सन् 431 ई.वी. में इसने चीन की राजधानी नानकिड्. में बौद्ध मंदिरों का जीर्णोदय करवाया था। इसके लिये चीन के राजा ने शासकीय मदद की थी। विगत 500 वर्षो से चीन में बौद्ध धर्म का अस्तित्व बना हुआ था, परन्तु इसके बाद भी बुद्धसंघ में महिलाओं को प्रवेश नही दिया जा रहा था, इसलिए चीनी महिलाऐं बुद्धसंघ में शामिल होने के लिये आन्दोलन कर रही थी। परन्तु बौद्ध भिक्षु एवं आर्चाय गुणवर्मन ने महिलाओं के आन्दोलन को समाप्त करवा कर इन सभी महिलाओं को बौद्धसंघ में प्रवेश देने का क्रांतिकारी निर्णय लिया और 67 वर्ष की आयु में गुणवर्मन की मृत्यु चीन में हुई। इसने में लगभग 30 भारतीय पुस्तकों का चीनी भाषा में अनुवाद किया।

आचार्य गुणवर्मन के देहांत के बाद ‘‘गुणभद्र’’ मध्य भारत सम्भवतः साँची अथवा सतधारा (मध्यप्रदेश) से चीन पहुंचा था। यह महायान सम्प्रदाय का इतना बड़ा विद्वान था कि बौद्ध के अनुयायी एवं भिक्षु इसको महायान नाम से भी पुकारा करते थे। सन् 435 ई.वी. में चीन पहुंचने पर इसने भी संस्कृति एवं प्रकृति भाषाओं की पुस्तकों का चीनी अनुवाद करना प्रारम्भ कर दिया था। इसने कुल 78 पुस्तकों को अनुवाद किया था। इनमें से 28 पुस्तकें आज भी चीन के संग्रहालय में रखी हुई है। इसका भी 75 वर्ष की आयु में चीन की भूमि पर ही देहांत हो गया। इसके बाद 481 ई.वी. में ‘धर्मजालयशस्’’ नामक एक बौद्ध पंड़ित चीन पहुंचा था और यह भी मध्य भारत का रहने वाला था। इसने भी ‘अमितायुष सूत्र’’ अनुवाद किया। यह भी 27 वर्षो तक चीन में रहा और 30 पुस्तकों का चीनी में अनुवाद किया। इसकी मृत्यु चीन में ही हो गया।

इस प्रकार भारतीय विद्वानों को एक के बाद एक दल चीन पहुंच रहे थे। तथा चीनी राजा भारतीय ग्रंथों का अनुवाद भी करा रहे थे। चीनी विवरणों से ज्ञात होता है कि लगभग तीन-चार हजार भारतीय विद्वान चीन पहुंचे और वही पर बौद्ध धर्म का प्रचार करते-करते वही बस गये। इनके निवास के लिये चीनी राजा ने सुन्दर भवन, मंदिर, बुद्ध विहार, गुफाऐं आदि का निर्माण करवाया था। इनमें से लोयड् शहर में सर्वाधिक विद्वान थे,जिसका वर्तमान नाम ‘हो-नान्-फू’’ है। इसी प्रकार सन् 508 ई.वी. में उत्तरी चीन के राजा ने चीनी यात्री ‘‘सुड्युन्’’ को बौद्ध ग्रन्थ लाने एवं शिक्षा प्राप्त करने के लिये भारत भेजा था। जब यह वापिस लौटा तब इसके साथ 175 ग्रंथों के साथ चीन पहुंचा। इस समय दक्षिणी चीन में सुड् वंश समाप्त हो गया था। इसके स्थान पर लेड् वंश शासन कर रहा था।

चीनी शासक वूती इस वंश का प्रथम साम्राट् था। यह पूर्व में कन्फ्यूशस धर्म का अनुयायी था,परन्तु यह एक बौद्ध भिक्षु के संपर्क में आकर इसने भी बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया था। इसने भी नानकिड् शहर में विशाल बौद्ध मंदिर बनवाया, पशु बलि बंद कर दी। यहां तक की कपड़ों पर भी पशुओं के चित्र बनाने पर पाबंदी लगा दी। इसके समय में भी सन् 518 ई.वी. में त्रिपिटक का चीनी अनुवाद किया था और इसको प्रकाशित कर जन-जन तक पहुंचाने का कार्य किया। यह बौद्ध धर्म से इतना प्रभावित हुआ कि 26 वर्ष बाद राजा वूती बौद्ध भिक्षु बन गया। राज दरबार के वैभव को कम कर दिया। एक समय ऐसा आया कि उसने अपना राजपाठ छोड़कर बौद्ध विहार में रहने चला गया। इसका लाभ लेकर दूसरे राजा हाँचिड ने, जो वूती का शत्रु था। इसकी राजधानी नानकिड् शहर पर आक्रमण किया और वूती को बंदी बना लिया और इसके लिये राजधानी में गली-गली घुमाया। लोगों ने इसके शरीर को नोंच-नोंच कर खाने लगे; क्योंकि लोग उसे ईश्वर का दूत मानते थे। चीनी लोगों का मानना था कि वूती धर्मात्मा था, यदि इसके शरीर को खाया जाये तब इसका पुण्य लाभ उनको भी प्राप्त होगा, ऐसी अवधारणा तत्कालीन समय में चीनी समाज के बीच में रही होगी। भारत में भी इस प्रकार की परम्पराऐं असम के लोगों में देखने को मिलती थी, जो नदियों के आसपास एवं मंदिरों में पुजारियों के साथ भी राजा वूती जैसा आचरण करते थे।

राजा वूती के पश्चात् उसका पुत्र ‘‘याड्-ती’’ शासक बना इसने सन् 552 से 555 ई.वी. तक कुल तीन वर्ष शासन किया। यह बौद्ध धर्म का अनुयायी न होकर ताऊ धर्म का अनुयायी था और यह ताऊ मंदिरों में ही रहा करता था। ताऊ की विचार धारा का ही प्रचार एवं उनकी पुस्तकों का अध्ययन करता था। परन्तु ‘‘ची प्रांत’’ के शासक ‘‘वेन्-साड्-ती’’ के संपर्क में आकर इसने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया था।

छटी शताब्दी में बौद्ध भिक्षु भारत से चीन बहुत बड़ी संख्या में गये; क्योंकि इस समय भारत में भी बौद्ध अनुयायी शासक हर्षवर्धन का शासनकाल था। मुख्य रूप से जिनगुप्त, ज्ञानभद्र, जिनयश और यशुगुप्त आदि थे। जिनगुप्त पेशावर का रहने वाला था, जाति से क्षत्रिय था, इसके पिता का नाम वज्जसार था। इसने भारतीय संस्कृति को चीन में प्रचार-प्रसार करने का कार्य किया। भिक्षुओं को रहने के लिये मंदिर का निर्माण करवाया और यह कुछ ही समय में ‘‘यी’’ प्रान्त का मुख्य पंड़ित समझा जाने लगा। इसने 37 ग्रंथों का अनुवाद किया, कुछ समय बाद चीनी राजा ने जिनगुप्त को राजगुरू का दर्जा दे दिया। छटी शताब्दी के अंत में बनारस से गौतम-धर्मज्ञान नाम का बौद्ध भिक्षु चीन पहुंचा। इसी समय चीन में ‘थाड्वंश’’ का शासनकाल प्रारम्भ हुआ था।

सन् 620 ई.वी. में चीन में नये राजवंश की स्थापना हुई, जो थाड्वंश के नाम से जाना गया। इस समय तक लगभग 550वर्ष चीन में बौद्ध धर्म को स्थापित हुए पूर्ण हो चुके थे, इसलिये आपस में भाईचारा एवं धार्मिक सहिष्णुता दिखाई दे रही थी। परन्तु चीनी जनता में बौद्ध धर्म पूर्णतः स्थापित नही हो पाया था। अब भी बौद्ध, कन्फ्यूशस एवं ताऊ आदि के बीच में धार्मिक उच्चता स्थापित करने के लिये परस्पर संघर्ष हो रहे थे और यह संघर्ष सूड्. वंशीय राजाओं के समय तक चलता रहा। थाड्वंश के शासकों में भी बौद्ध धर्म को स्वीकार किया। परन्तु 550 वर्ष के बाद राजा के-ओ-सु , यह बौद्ध धर्म का कट्टर विरोधी था और कन्फ्यूशस धर्म को मानने वाला था। इसने बौद्ध मंदिरों को बंद करवा दिया, भिक्षुओं का जबरन विवाह करवा दिया, बौद्ध मंदिरों में जाना प्रतिबंध कर दिया एवं बौद्ध मंदिरों को कन्फ्यूशस मंदिरों में परिवर्तित करना प्रारम्भ कर दिया। इस राजा की मृत्यु के बाद उसकी रानी भी बौद्ध धर्म की कट्टर विरोधी थी, परन्तु इसके बाद राजा थाई-सूड् बना। इसने भी बौद्ध धर्म को संरक्षण दिया।

इस काल में ही चीनी यात्री हेन-त्साड् भारत से चीन वापिस आया। जनता के द्वारा इसका सम्मान किया गया और राजा ने इसको उपाधि भी दी। 641 ई.वी. में भारत का सम्राट् हर्षवर्धन ने भी एक दूतमंड़ल चीन भेजा था, जब यह मंड़ल चीन से वापिस आया तब तक हर्षवर्धन की मृत्यु हो चुकी थी और भारत कई खंड़ों में विभाजित हो चुका था। 629 ई.वी. में हेन-त्साड् भारत आया और 641 ई.वी. के लगभग चीन पहुचा था। लगभग यह 12 वर्षो तक भारत में रहा, 05 वर्ष तक नालन्दा विश्वविद्यालय में अध्ययन किया। यह रहकर इसने कई पुस्तकों का अध्ययन किया। कई पुस्तके अपने साथ ले आया। 115 ग्रेन टुकड़े, व्रजासन के थे, 04 फीट की स्वर्ण प्रतिमा, 03 फुट की चांदी की प्रतिमा, चंदन निर्मित सामग्री और 657 बौद्ध ग्रंथ के साथ-साथ अन्य ग्रंथ भी भारत से चीन ले गया। इसके साथ अतिगुप्त, नदि, दिवाकर आदि बौद्ध भिक्षु भी चीन पहुंचे। थाईसुड् वंश का कार्यकाल स्वर्ण काल कहां जाता है जैसे भारत में गुप्त साम्राज्य को स्वर्णकाल का दर्जा प्राप्त है, इसलिये इसको पूर्व का आँगस्टस कहां जाता है।

आठवी शताब्दी में जैसे भारत में बौद्ध अनुयायीयों पर अत्याचार एवं अनाचार हो रहे थे, बौद्ध मंदिर और उनकी संस्कृति को नष्ट किया जा रहा था। ठीक वैसे ही इसी शताब्दी में कन्फ्यूशस धर्म के अनुयायीयों ने बौद्धों पर अत्याचार करना प्रारम्भ कर दिया और सन् 714 ई.वी. में यन्-सुड् राजा ने यह घोषणा कि बौद्ध धर्म चीन के लिये बहुत घातक है, इसलिये इसने चीन के बौद्ध मंदिरों पर ताले लगवा दिये। भिक्षु एवं भिक्षु महिलाओं को जबरन विवाह करने पर विवश किया, बुद्ध में मुर्ति बनाने पर प्रतिबंध लगा दिया, पुस्तकें लिखना एवं अनुवाद करवाना बंद करवा दिया, मंदिरों के दरवाजों पर दीवारे चुनवा दी गई एवं इन मंदिरों पर भद्दी- भद्दी चित्रकारी करवा दी गई। इस प्रकार बौद्ध धर्म को नष्ट करने के लिये चीनी राजा यन्-सुड् ने हर प्रकार की कोशिश की, परन्तु जैसा कि कहां जाता है कि हर समय एक-सा नही होता है। फिर एक बार बौद्ध धर्म को संरक्षण मिला और चीन में स्थापित हो गया।

सन् 756 ई.वी. सु-सुड्