कम्बोडिया में शिव एवं बुद्ध के उपासक!


"भारत की एक जाति बहुत दूर कंबुज में निवास करती है।’’

मसुही अरब यात्री


ईसा की प्रथम शताब्दी में कई देशों में हिन्दू राज्य एवं बुद्ध के विचारों को एवं भारतीयों की सत्ता दिखाई देती है। वियतनाम, थाईलैड़ं, चीन, मलाया, जावा और भी कई पश्चिमी एवं पूर्व के देशों में हिन्दूस्तान की संस्कृति और साहित्य की झलक आज भी देखी जा सकती है। ऐसे कई खण्ड़र भवन है, जो भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति की कहानी स्वयं कह रहे हो। ऐसा ही एक देश कम्बुज है,जिसे वर्तमान में कम्बोडिया के नाम से जाना जाता है। कम्बुज, कम्बोडिया का प्राचीन नाम था। इस देश में भगवान शिव की पूजा बहुत प्रचलित थी। नटराज के रूप में शिव को पूजा जाता था और आज भी कम्बोडिया में पूजा जा रहा है। कम्बोडिया का वास्तिविक नाम क्या था यह सभी तक ऐतिहासिक खोज का विषय बना हुआ है, लेकिन चीन के लोग कम्बोडिया को "फूनान" के नाम से पुकारा करते थे।

ऐसा कहाँ जाता है कि फूनान की स्थापना दक्षिण भारत के "कौन्डिन्य" नामक एक ब्राह्मण ने की थी। स्थापना के पूर्व यहां के लोग नागों की पूजा किया करते थे अर्थात नाग पूजक थे। कौन्डिन्य ने इन्हे परास्त कर सोमा नामक एक लड़की से विवाह किया और यही से एक नये वंश की स्थापना हुई। जिसको सोमवंश कहाँ गया अर्थात यह कहाँ जा सकता है कि कम्बोडिया में महिलाओं की नाम से वंश की स्थापना होती रही होगी। इस वंश ने अपनी फूनान अर्थात कम्बोडिया की राजधानी, जो मेकाड् नदी के तट पर बनाई थी। फूनान की स्थापना दक्षिण भारत के लोगों ने ही की थी। कुछ प्रमाणो से स्पष्ट किया जा सकता है।

दक्षिण भारत में पल्लव वंश के शासक अपने नाम के पीछे वर्मा लगाया करते थे। ठीक वैसे ही कम्बोडिया के शासक भी अपने नाम के पीछे वर्मा लगाकर गौरान्वित महसूस करते थे। जैसे- चन्द्रवर्मा, जयवर्मा, रूद्रवर्मा आदि। कम्बोडिया में अड्कोरवत् और बेयान के मंदिरों पर दक्षिण भारत की कला का प्रभाव है और यह दक्षिण भारत के गोपुरों से बहुत मिलती-जुलती है। शिव के उपासक दक्षिण भारत में नटराज के रूप में पूजा-पाठ करते है। ठीक यही प्रथा कम्बोडिया में भी प्रचलित थी। वहां के आज भी कई ऐतिहासिक खण्ड़रो में नटराज की बहुत-सी मूर्तियाँ उपलब्ध है। इससे स्पष्ट है कि दक्षिण भारत के लोग भी कम्बोडिया में नटराज को ले गये थे। दक्षिण भारत के ही नही उत्तर भारत के लोग कम्बोडिया में पहुंचे। इसका एक प्रमाण यह है कि दसवीं शताब्दी में भट्टदिवाकर यमुना के किनारे से कम्बुज पहुँचा था।

फूनान के अर्धभारतीय राजाओं ने कई बार भारत के राजाओं एवं व्यापारियों से संपर्क करने के लिये दल भेजे। सन् 240 ई.वी. में चन्द्रवर्मा नामक शासक ने भारत से संबंध स्थापित करने के लिये एक दूत मण्ड़ल भेजा था। यह मण्ड़ल भेजने का श्रेय भारतीय व्यापारी, जिसका चीनी नाम ‘‘कै-सड्-लि’’ को जाता है। इसने ही फूनान और भारत की दूरी को बताया था। इसका उल्लेख भी चीनी पुस्तकों में पाया जाता है। चीनी विवरण के अनुसार ‘‘एक वर्ष से अधिक समय व्यतीत होने पर, बहुत सी खाडि़यों को पार करने के पश्चात्, यह दूतमण्ड़ल भारत की एक नदी के मुहाने पर पहुंचा। इस नदी में सात हजार चलने के उपरांत यह भारत आया। भारतीय राजा ने दूतमण्ड़ल को देख कर महान् आश्चर्य प्रकट किया,और कहां, क्या भारत से बहुत दूर देश में भी हमारे जैसे ही आदमी रहते हैं "सम्भवतः भारतीय नरेश को फूनान के हिन्दूराज्य का ज्ञान नही था। राजा ने दूतों का खूब स्वागत किया, और फूनान के राजा को धन्यवाद देते हुए कि उसने भारत के विषय में इतना अनुराग प्रकट किया हैं, एक दूतमण्ड़ल फूनान भेजा।’’

चीनी वृतान्तों के अनुसार कौन्डिन्य भारत का एक ब्राहम्ण था। इस समय भारत में पल्लव वंश का शासन था। इनके द्वारा हिन्दू धर्म के देवी-देवताओं एवं हिन्दू धर्म लगभग राजकीय धर्म की मान्यता दी थी। यही वजह रही कि हिन्दू धर्म को अन्य देशों मे स्थापित करने के लिये भारत से फूनान पहुंचा था और यह सबसे पहले फूनान के ‘‘पन-पन’’ नामक स्थान पर पहुंचा। इसकी योग्यता को देखकर उस क्षेत्र के लोगों ने उसे अपना राजा बना लिया। राजा बनते ही इसने फूनान के सभी नियमों को रद्द कर दिया और उसके स्थान पर भारतीय नियमों को लागू करने का आदेश दिया।

पाठको यह पढकर आश्चर्य होगा कि लगभग 300 वर्ष पश्चात् भी एक कौन्डिन्य ही भारतीय सभ्यता को पुनः स्थापित करने के लिये कम्बुज अर्थात कम्बोडिया पहुंचा था और इसने कम्बोडिया की बागडोर अपने हाथ में संभाली। निश्चित ही दक्षिण भारतीय शासकों का सहयोग इसको मिला होगा। इसने यह पर खानपान से लेकर रहन-सहन, सामाजिक गठबंधन, राज्य प्रबंधन आदि सभी क्षेत्रों में भारतीय सभ्यता का अनुसरण किया। पाँचवी शताब्दी में फूनान में कौन्डिन्य जयवर्मा राज्य करता दिखाई देता है। इसके समय में सन् 484 ई.वी. में प्रसिद्ध भारतीय बौद्ध भिक्षु नागसेन को एक दूतमंड़ल के साथ चीन भेजा गया। यह आकर नागसेन ने चीनी शासकों से कहां कि ‘‘फूनान में महेश्वर’’ अर्थात शिव की पूजा होती है और यह स्थान मोतन पर्वत पर है। यही वजह है कि वह पर उत्पादन अधिक होता है। नागसेन ने हाथी दांत के बने छोटे-छोटे स्तूप भी चीनी राजा को भेंट किये थे और यह भी अनुरोध किया था कि चीन में बौद्ध धर्म के प्रचार की अनुमति दे।

लगभग पाँचवी शताब्दी में फूनान (कम्बोडिया) में हिन्दू एवं बौद्ध धर्म दोनों के अनुयायी देखे जा सकते थे। भारतीयों के पहुंचने के पूर्व फूनान में क्या धर्म था? इस संबंध में एक चीनी लेखक ने स्पष्ट किया है कि ‘‘फूनान के लोग विचित्र देवों की पूजा करते थे। यह देवों की मूर्तिया बनाते थे। इसमें किसी के दो और किसी के छः हाथ हुआ करते थे। और चाँद और सूर्य की पूजा करते हुये देखे गये। इस प्रकार के देवी-देवतोओं का भारत में भी प्रचलन है। कम्बोडिया एक भारतीय उपनिवेश था, जिससे आर्यो ने अपने बहुबल से जीतकर बसाया था। ‘‘वक्से-शड्-रड्’’ के लेखानुसार कम्बुज का प्रथम भारतीय शासक श्रुतवर्मा था और यह फूनान के राजा का सामन्त था। इसके बाद श्रेष्टवर्मा कम्बुज का राजा बना। कंबुज के प्राचीन लेखों में रूद्रवर्मा की बहुत प्रशंसा की गई है और इसको राजा विष्णु की तरह अजेय माना गया है। इसी के शासन काल में भारतीय चिकित्सा का प्रचार-प्रसार कम्बोडिया में किया गया। इसके समय में कई भारतीय चिकित्सक कम्बोडिया पहुंचे। ‘‘अड्-शुमनिक’’ में प्राप्त लेख के अनुसार रूद्रवर्मा के राजदरबार में ब्रहादत और ब्रह्मसिंह दे भाई रहतें थे। ये दोनों कोई साधारण वैध नही थे। रूद्रवर्मा के बाद भववर्मा शासक बना। इसने कम्बोडिया की सीमा में विस्तार किया। चीनी विवरणों के अनुसार भववर्मा का भाई चित्रसेन ने इसकी शुरूआत की और चित्रसेन ने ही पड़ोसी राजाओं पर आक्रमण किया था। भववर्मा शैव धर्म का अनुयायी था और शैव धर्म को इसने राष्ट्रीय धर्म बना लिया था। इसलिये शिव मंदिरों, शिव लिंगों के साथ-साथ कई स्थानों पर बड़े-बड़े मंदिरों का निर्माण किया। शैव और वैष्णव में जो इर्ष्या भारत में थी वह कम्बोडिया में देखने को नही मिलती थी। इसने कम्बोडिया में शिव और विष्णु दोनों की सम्मिलित पूजा प्रारम्भ की थी। भारतवर्ष में इसे हरिहर पूजा कहाँ जाता है।

कम्बोडिया में रामायण, महाभारत आदि पुराणों का भी पठन-पाठ किया जाने लगा था। देखते-देखते ही कम्बोडिया हिन्दू संस्कृति का महान केन्द्र बन चुका था। सन् 604 ई.वी. में महेन्द्रवर्मा राजा बना। इसके शासनकाल में भी शैव धर्म को आश्रय दिया गया। और यह शिव एवं पार्वती की पूजा करता था। इसके समय में भी कम्बोडिया में शैव एवं वैष्णव दोनों धर्म प्रचलित थे। सन्यासीयों के लिए मठ बनवाये गये,इसी के शासनकाल में ही दोनों ईश्वर को एक ही पत्थर पर उकेरा गया। सन् 665 ई.वी. में जयवर्मा प्रथम शासक बना और यह बौद्ध धर्म का अनुयायी था। इसके द्वारा सातवी शताब्दी में गौतम बुद्ध की शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार करवाया गया। और इसके दरबार में ही रत्नभानु और रत्नसिंह,दो बौद्ध भिक्षु नियुक्त थे।

जयवर्मा के बाद कम्बोडिया में अराजकता फैल गई और कम्बोडिया को दो भागों में बाट दिया गया। एक का नाम शम्भुपुर और दूसरे का नाम व्याघपुर रखा गया। यह अव्यवस्था नौवी शताब्दी तक चलती रही। परन्तु सन् 802 ई.वी. में जयवर्मा द्धितीय ने बटे हुये कम्बोडिया को पुनः मिलाकर एक कर दिया। जयवर्मा द्वितीय के पिता का नाम राजेन्द्रवर्मा था और यह शम्भुपुर का राजा था। इसने अपनी माता की सहायता से व्याघपुर को शम्भुपुर मे मिला लिया था। माता का नाम नरपतीन्द्रदेवी था। नई राजधानी महेन्द्र पर्वत पर बनाई गई और यही पर रहने के लिये राजमहल भी बनवाया गया। इसके आज भी अवशेष ‘‘वैड्-मिलिआ’’ में उपलब्ध है। आगे चलकर यही राजधानी यशोधरपुर कहलाने लगी। जिसका वर्तमान नाम अड्कोरधाम है। ऐसे भी उल्लेख मिलते है कि कम्बोडिया कुछ सालों तक जावा के आधीन भी रहा। सन् 870 ई.वी. में इन्द्रवर्मा प्रथम कम्बोडिया का राजा बना। यह आदर्श भारतीय राजा समझा जाता था और कम्बोडिया के निवासी इसे साक्षात मनु मानते थे। शिव का उपासक था। इन्ही के नाम पर शिवपुर नगर बसाया। सन्यासियों के निवास के लिये इन्द्राश्रम नाम से दो आश्रम बनाये थे।

सन् 886 ई.वी. में यशोवर्मा कम्बोडिया का शासक बना, इसने 21 साल तक शासन किया। इसके शासनकाल में ही हिन्दू देवी-देवताओं के मंदिर बनाये गये। इसके समय में हिन्दू देवी-देवताओं के साथ बुद्ध की भी पूजा की जाती थी। इसने चार प्रतिमाऐं स्वयं बनाकर मंदिरों में स्थापित की थी। यशोवर्मा ने कम्बोडिया में पुनः हिन्दू वर्ण व्यवस्था को स्थापित करने का प्रयत्न किया और इसने कम से कम सौ आश्रमों का निर्माण भी करवाया। यह एक कुशल चिकित्सक भी था। इसके साथ-साथ शिल्प भाषा लिपि में भी परांगत था और यह धर्म प्रचार के लिए सबसे पहले स्वयं आगे आया। इसके द्वारा एक नगरी को भी बसाया गया था, जो इसकी राजधानी बनी। इस नगरी का नाम यशोधरपुरथा, जिसके अवशेष आज भी अड्कोरथोम् में देखे जा सकते है। यही पर विश्व का प्रसिद्ध विष्णु मंदिर भी स्थित है, जिसे अंगरकोट (अड्कोरवत्) मंदिर कहां जाता है।


कम्बोडिया में हिन्दू मंदिर:-

यद्यपि इस समय यह बौद्ध मंदिर बन गया है। परन्तु पहले यह एक वैष्णव देवालय था। मन्दिर का निर्माण सूर्यवर्मा द्वितीय ने करवाया था या उदयादित्यवर्मा द्वितीय ने, यह बात अभी तक संदिग्ध है। मन्दिर के समीप ही एक लेख प्राप्त हुआ है, जिसमें सूर्यवर्मा द्धितीय को महान् भवन निर्माता कहाँ गया है। इसमें यह भी लिखा है कि यह विष्णु का अनन्य भक्त था। इससे यही परिणाम निकलता है कि सूर्यवर्मा द्वितीय ने ही यह मन्दिर बनवाया था।

इस मन्दिर में प्रत्येक पदार्थ महापरिमाण में है। जिस खाई ने इसे चारों ओर से घेरा हुआ हैं, वह एक झील सी जान पड़ती है। खाई की चैड़ाई 700 फीट है। अडरोवत् ‘‘नगरवत’’ का अपभ्रंश है, जो कि संस्कृत ‘‘नगरवाट’’ से बना है। नगरवाट का अर्थ हैं- राजधानी का बौद्धविहार। इसलिये अड्कोरवत का अर्थ हुआ- राजधानी का चैत्य।

अड्कोरधोम् से दक्षिण की ओर अड्कोरवत् का प्रसिद्ध मन्दिर विद्यमान है। इसके चारों ओर 700 फीट चैड़ी खाई है खाई को पार करने के लिये पश्चिम में एक पुल है। पुल पार करने पर अड्कोरवत् मन्दिर का मुख्य द्वारा मिलता है। मन्दिर की प्रत्येक दिशा में एक-एक विशाल द्वार है। इनमें से उत्तर, दक्षिण और पूर्व के द्वार कुछ छोटे हैं। पश्चिम द्वारा एक भव्य मन्दिर सा जान पड़ता है। इसकी चौडाई खाई से अधिक है। इसमें तीन मार्ग पैदलों के लिये और दो, रथ और हाथियों के लिये हैं। मन्दिर निर्माण मे भारतीय विधि का प्रयोग किया गया है। दक्षिण-भारत में अड्कोरवत् के समान ही आयताकार मन्दिरों की श्रृंखला मिलती है। कम्बुज के मन्दिर निर्माताओं के सम्मुख दक्षिण भारत के मन्दिर विद्यमान थे। जिस भारतीय कारीगर ने अड्कोरवत् का नक्शा तैयार किया और उसे पूर्ण किया, उसने दक्षिण भारत की मन्दिर निर्माण विधि को ही विकसित किया। कम्बुज की वास्तुकला पिरामिड आकृति की है। परन्तु अड्कोरवत् के मन्दिर में पिरामिड आकृति कुछ अस्पष्ट रह गई है, क्योंकि चैड़ाई के अनुपात में ऊँचाई कम है, और स्तम्भों की पक्तियाँ बहुत लम्बी हैं। इनसे प्रतीत होता है कि इसके निर्माण में किसी दूसरी ही पद्धति का अनुकरण किया गया है, और वह पद्धति भारतीय है। अड्कोरवत् के मध्य मीनार की चोटी भूमि से 180 फीट ऊँची है। इस प्रकार यह जावा के प्रसिद्ध मन्दिर ‘‘वोरो-बुदूर’’ से 80 फीट अधिक ऊँचा है। इसकी चित्रशालाओं के चित्र जगद्विख्यात है। इसमें तीन चित्रशाला पूर्व से पश्चिम की ओर 265 गज और उत्तर से दक्षिण की ओर 224 गज है। दूसरी चित्रशाला के प्रत्येक सिरे पर एक-एक मीनार है। इस सब चित्रशालाओं में रामायण, महाभारत और हरिवंश पुराण के कथानक चित्रों में अंकित है। अधिकांश चित्र वैष्णव है, लेकिन कुछ शैव भी है।

‘‘सिओडिस" ने 1911 ई.वी. में अडकोरवत् के तीस चित्रों का पता लगाया था। इन चित्रों में महाभारत का संग्राम, जिसमें अर्जुन और कृष्ण को दर्शाया गया है, रामायण की 11 घटनाऐं, इसमें से प्रमुख सीता की अग्नि परीक्षा, लंका युद्ध, राम-विभिषण मैत्री, कृष्ण के जीवन की पाँच घटनाऐं, स्वर्ग एवं नरक के चित्र, राम और लक्ष्मण को इन्द्रजीत द्वारा बंधक बनाया जाना, कुम्भकरण पर वानर सेना का आक्रमण, हनुमान का संजीवनी पर्वत को लाना, कृष्ण का गोवर्धन उठाना और असुरों के संग्राम का चित्रण अकोरवत् मंदिर में किया गया था, जिसके प्रमाण आज भी कम्बोडिया के इस मंदिर में देखे जा सकते है। प्रारम्भ में यह विष्णु मंदिर था, परन्तु बाद में इसमें विष्णु के स्थान पर बौद्ध की मूर्तिया भी स्थापित कर दी गई।

कम्बोजिया अर्थात कम्बोडिया के अंतिम राजाओं में जयवर्मा सप्तम था। इसके समय तक यह देश कमजोर नही हुआ परन्तु इसके बाद तेरहवी शताब्दी से कम्बोडिया धीरे-धीरे शक्तिहीन होने लगा; क्योंकि इस पर पड़ौसी देश थाईलैण्ड़ अर्थात स्याम ने आक्रमण करना प्रारम्भ कर दिया था। इन आक्रमणकारियों ने चोदहवी शताब्दी के आसपास अडोरधोम में भारी लूटपाट की और इस विष्णु अथवा बौद्ध मंदिर को काफी क्षति पहुँचाई। जबकि आक्रमणकारी भी लगभग बौद्ध धर्म की विचारधारा को ही मानने वाले थे। निरन्तर थाईलैण्ड़ के आक्रमणों से तंग आकर कम्बोडिया के निवासियों ने अडोरधोम् से राजधानी बदलकर नवीन राजधानी ‘‘लोवक’’ बन गई और 17 वी. शताब्दी के आसपास यूरोपवासियों ने भी कम्बोडिया पर अपना आधिपत्य जमाना प्रारम्भ कर दिया।

अडोरधोम् मंदिर के अलावा भी कम्बोडिया में एक और प्रसिद्ध मंदिर है, जिसे शिव मंदिर कहां जाता है और इसको ‘‘बेयन’’ का शिवमंदिर भी कहते है। यह राजधानी का सबसे बड़ा मन्दिर था, और पिरामिड आकार का है। इसके तीन खण्ड है। प्रत्येक खण्ड पर एक ऊँची मीनार है। बीच का मीनार यद्यपि बहुत भग्रावस्था में है, तथापि वह अब तक खंडर है। इसकी उंचाई 150 फीट है। यहां से चालीस अन्य मीनार दिखाई पड़ते है। प्रत्येक मीनार के चारों ओर श्रेष्ट कलायुक्त एक-एक नरमूर्ति बनी हुई है। ये समाधिस्थ शिव की मूर्तियां है। इनके मस्तक में तृतीय नेत्र विराजमान है। ‘‘शिओ-ता-कान्’’ तब कम्बुज आया था तब इनकी जटाओं पर सेना मढ़ा हुआ था। मीनार के नीचे का मन्दिर इस समय खाली पड़ा हुआ है। यद्यपि यह अडकोरवत् से छोटा है पर सुन्दरता में उससे कहीं-कहीं बढ़कर है।

इस प्रकार यशोवर्मा, का मंत्री सत्याश्रय था। जो स्वयं शैव एवं वैष्णव धर्म को मानने वाला था। यशोवर्मा के बाद जयवर्मा, सन् 968 ई.वी. में राजा बना। इसने हिन्दू धर्म को राजकीय धर्म बना लिया था। इसके ही शासनकाल मे भारतीय संगीत को भी कम्बोडिया में स्थापित किया गया। सभी प्रकार के वाद्य यंत्र कम्बोडिया पहुंचे। कम्बोडिया के शासको एवं भारत के लोगों के साथ वैवाहिक संबंध भी स्थापित हुये, जैसे जयवर्मा की बहन इन्द्रलक्ष्मी का विवाह यमुना तटवासी भारतीय युवक भट्टदिवाकर से हुआ था। भट्टदिवाकर 10 वी. शताब्दी में मुस्लिम आक्रमणकारियों से प्रताडि़त होकर कम्बोडिया बस गया था। इसने कम्बोडिया में जाकर जयवर्मा पंचम के समय हिन्दू धर्म का प्रचार-प्रसार किया था।

सन् 1002 ई.वी. में सूर्यवर्मा शासक बना। इसकी 1046 ई.वी में मृत्यु के बाद उदयादित्य वर्मा शासक हुआ। इसके शासनकाल में ही सेना ने विद्रोह किया। इसके द्वारा भी कई हिन्दू देवी-देवताओं की मुर्तियों की स्थापना की गई। सन् 1112 ई.वी. सूर्यवर्मा द्वितीय शासक बना। जैसा कि लिख चुके है कि अड्कोरवत् का प्रसिद्ध मंन्दिर इसके द्वारा ही निर्माण करवाया गया था। कम्बोडिया का प्रधान देवता शिव ही माने जाते थे और इन्हे राज्य देवता भी माना जाता था। इसके अलावा इनको परमेश्वर, शम्भु, शिव, त्रयम्बक, विभु, गिरीश, जगतपति, शंकर, हर, रूद्र, ईश, पशुपति, चन्द्रेश्वर, भव, त्रिपुरदहनेश्वर, शूलधर, ईश्वर, श्रीकण्ठ आदि विविध नामों से पुकारा जाता था। परन्तु कम्बोडिया में शिव के पश्चात् दूसरा स्थान विष्णु का था। विष्णु को भी हरि,चतुभुर्ज, नारायण, उपेन्द्र, केशव, मुरारी आदि नामों से जाना जाता था और इनको गरूड़ के उपर बैठाकर मूर्तियों में गढ़ा गया। भारत में विष्णु की मुर्ति के चार हाथ वाली देखी गई है परन्तु बैकांग के सन्दर्भ में विष्णु की एक पीतल की प्रतिमा जिसके दस हाथ के रूप में बनाई गई और यह आज भी थाईलैण्ड़ में कुड्देव अर्थात नगर देवता के रूप में वहां के लोग जानते है। इसके अतिरिक्त ब्रहा की मूर्ति भी खुदाई में मिली है। जिनके चार हाथ एंव चार मुख दर्शाये गये है।


कम्बोडिया में बौद्ध धर्म:-

शैव एवं वैष्णव सम्प्रदाय के साथ-साथ महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं का प्रचार करने के लिये कई बौद्ध भिक्षु छटवी शताब्दी से ही कम्बोडिया पहुंचे थे। बौद्ध धर्म की हीनयान शाखा के द्वारा प्रचार-प्रसार किया जा रहा है। सबसे पहलें सन् 665 ई.वी के आसपास बौद्ध विवरणो से विदित होता है कि जयवर्मा प्रथम के शासनकाल में रतनभानु और रतनसिंह नामक दो भिक्षु निवास करते थे और यह दोनों ही सबस पहले कम्बोडिया पहुंचे थे। 10 से 13 वी. शताब्दी तक जब हिन्दू धर्म, मुस्लिम आक्रमणों से संघर्ष कर रहा था इसी अवधि में कम्बोडिया में बौद्ध धर्म का प्रचार जोर शोर से चल रहा था। और इसी समय कई राजाओं कें मंत्रीयों ने हिन्दू धर्म को छोड़कर बौद्ध धर्म स्वीकार किया। सत्यवर्मा, कवीन्द्ररिमथन और कीर्ति पंडित इन दो मंत्रीयों ने बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार किया। राजा यशोवर्मा ने हिन्दू देवी-देवताओं के साथ बौद्ध विहारों का भी निर्माण किया। जयवर्मा पंचम के समय कीर्तिपंडित ने बौद्ध धर्म के प्रचार में बढ चढ़कर भाग लिया। इसी के द्वारा कई बौद्धिक साहित्य ग्रन्थ कम्बोडिया में लाये गये। सन् 1185 ई.वी. में जयवर्मा के समय बौद्ध धर्म राजकीय धर्म बन गया था। सन् 1296 ई..वी. में ‘‘चा-ता-कान्" नामक एक चीनी यात्री कम्बोडिया पहुंचा, जिसने वहां जाकर बौद्ध धर्म के अनुयायी के संबंध में लिखा है कि

‘‘भिक्षु लोग सिर मुडाते है और पीले कपड़े पहनते है। ये अपना दायां कन्धा नंगा रखते है। नंगे पैर चलते हैं। इनके मन्दिरों की छतें खपरैल की है। मन्दिरों में केवल एक ही मूर्ति है, और वह महात्मा बुद्ध की है। इनके पूजास्थलों में घण्टे, झन्झे, नगाडे आदि कुछ भी नही है। ये दिन में केवल एक बार भोजन करते है। मछली और मांस तो खाते हैं, पर शराब नहीं पीते। बुद्ध के लिये भी मांस की भेंट देते है। ये लोग ताड़पत्रों पर लिखी हुई कुछ पुस्तकों का भी पाठ करते हैं। यहां पर बौद्ध भिक्षुकियां बिल्कुल नहीं है।’’

कम्बोडिया और थाईलैण्ड के संघर्ष के बाद आखरी थाईलैण्ड़ ने कम्बोडिया पर वियज प्राप्त की और सन् 1846 ई.वी. में थाईलैण्ड़ के राजा ने कम्बोडिया पर अपना अधिकार कर लिया। चुकि थाईलैण्ड़ का राजा बौद्ध धर्म को माने वाला था इसलिये कम्बोडिया में भी बौद्ध धर्म का प्रचार होने लगा। और बौद्ध धर्म ने कम्बोडिया पर अपना प्रभाव जमा लिया। इसी बीच फ्रांस और थाईलैण्ड़ के बीच एक समझौता हुआ। इससे फ्रांस का कब्जा कम्बोडिया पर स्वीकार कर लिया गया और फ्रांस का रेजीडेन्ट कम्बोडिया में रहने लगा। वर्तमान का कम्बोडिया प्राचीन कम्बोडिया से बहतु छोटा है; क्योंकि बटम्बंग और अड्कोर प्रान्त को सन् 1887 ई.वी. में थाईलैण्ड़ ने अपने कब्जे में कर लिये थे। बौद्ध विहारों में रहने वाले भिक्षु एवं अनुयायीयों का भरण-पोषण भी राजकीय संपत्ति से किया जाता था और आज भी कम्बोडिया सरकार के द्वारा बौद्ध विहार,मंदिरों को राजकीय सहायता दी जाती है। बुद्ध मंदिरों के चारों ओर विशेष उपवन लगाये जाते थे और गरीबों सहायता एंव चिकित्सा के लिए एक-एक चिकित्सालय का भी निर्माण किया जाता था।

इस प्रकार धार्मिक भाषा, रीति-रिवाज, मन्दिर, देवी-देवता, दाह-संस्कार, यहां तक की राजकीय नियमों, कानूनों पर भी भारतीय संस्कृति की गहरी छाप अब तक कम्बोडिया में दिखाई देती है। आज भी दीवानी और फौजदारी कानून मनुस्मृति के आंठवे और नौवे अध्याय पर आश्रित है। परन्तु इस प्रकार की व्यवस्था बौद्ध धर्म की वजह से बदल चुकी है। कंबुज अर्थात कम्बोडिया पर भारतीय संस्कृति का प्रभाव इतना प्रबल था कि सन् 903 ई.वी. का एक अरब यात्री जब कम्बोडिया पहुंचा था, तब उसने कम्बोडिया को भारत का उपनिवेश बताया। और लिखता है कि ‘‘कंबुज भारत का ही हिस्सा है। वहां के निवासी भारत से संबंध रखते है’’ सन् 943 ई.वी. में ‘‘मसुही’’ लिखता है ‘‘भारत बहुत विस्तृत देश है। भारत की एक जाति बहुत दूर कंबुज में निवास करती है।


लेखक

संतोष कुमार लड़िया

एम.ए. प्राचीन इतिहास