छत्रपति शिवाजी के ‘‘हिन्द स्वराज्य’’ में, एवं मित्रों की भूमिका !



‘‘छत्रपति शिवाजी के शासनकाल में हिन्दू और मुसलमानों दोनों के साथ एक ही न्याय प्रणाली अपनाई जाती है।’’

‘‘मुल्ला हैदर अली काजी’’

किसी विद्वान ने कहां है कि कभी व्यक्ति बुरा नही होता हैं, व्यक्तिवाद बुरा होता है,कभी जाति नही, जातिवाद बुरा होता है,इसी प्रकार ब्राह्मण नही ब्राह्मणवाद बुरा है। ऐसे छत्रपति शिवाजी इस्लाम के नही, बल्कि कट्टर इस्लामवाद के विरोधी थे, परन्तु इस्लाम एवं इस्लाम अनुयायीयों के खिलाफ कभी -भी छत्रपति शिवाजी की विचारधारा नकारात्मक नही थी, बल्कि छत्रपति शिवाजी की सेना में जितनी छोटी जातियां-जैसे कोली,कुनबी, चमार,महार, लुहार,सुतार,सुनार, मावले,मुस्लिम, कायस्थ आदि थी, वैसे ही मुसलमानों की भी सेना में संख्या कम नही थी। मुसलमानों ने भी हिन्द स्वराज्य को स्थापित करने में छत्रपति शिवाजी का न केवल साथ दिया, बल्कि कदम-कदम पर उनके साथ रहे। यहां तक की जब छत्रपति शिवाजी के पुत्र शम्भाजी गुमराह होकर मुगल सुबेदार दिलेर खाँ के साथ चले गये थे,तब औरंगजेब ने दिलेर खाँ को यह आदेश दिया था कि शम्भु भौंसले को बन्दी बनाकर दिल्ली दरबार में पेश करे। इस प्रकार जब शम्भु एवं शम्भु की बड़ी बहन को जान का खतरा था, तब भी एक मुसलमान ने ही मुगल सेना से बगावत कर छत्रपति शिवाजी के पुत्र शम्भु की जान बचाकर पन्हाला किले तक सकुशल पहुचाया था। जहां पर छत्रपति शिवाजी ठहरे हुये थे। यही नही अफजल खाँ से छत्रपति शिवाजी की जान बचाने वाला भी मुसलमान था एवं जब शिवाजी औरंगजेब के शिंकजे से आगरा से भागने में सफल हुये, इसमें भी छत्रपति शिवाजी का साथ देने वाला कोई और नही मुसलमान था। यही वजह रही कि जितना सम्मान हिन्द स्वराज में हिन्दूओं का था इससे कम सम्मान मुसलमान प्रजा का नही था, बल्कि छत्रपति शिवाजी के हिन्द स्वराज में कई मुस्लिम वैसे ही ऊँचे पदों पर आसीन थे जैसे हिन्दू अधिकारी थे। यदि हम राजनैतिक चश्मा उतार कर छत्रपति शिवाजी के व्यक्तित्व को देखे तब,हमें शिवाजी महाराज लोक कल्याणकारी,शासक के रूप में दिखाई देगे। छत्रपति शिवाजी का शासन राजतंत्र होते हुये भी लोक कल्याणकारी प्रजातंत्र के सिद्धांत हिन्द स्वराज में लागू थे।

1.मुगल दरबारी मदारी मेहत्रर:-

दिल्ली के बादशाह औरंगजेब जब छत्रपति शिवाजी को अपने सुबेदार एवं सेनानायकों के द्वारा पकड़ने में असफल रहा,तब छत्रपति शिवाजी ने राजपूत अमीर शासक मिर्जा राजा जयसिंह और दिलेर खाँ को दक्षिण का सुबेदार बनाकर भेजा। औरंगजेब की राजपूत और मराठाओं को आपस में लड़ाने का यह षढ़यंत्र किया गया था। वहाँ यह जानता था कि यदि मराठा और राजपूत एक साथ होकर मुगलों के खिलाफ युद्ध करते है तो निश्चित ही एक दिन मुगलों को भारत से जाना ही पड़ेगा, इसलिये मिर्जा राजा जयसिंह को छत्रपति शिवाजी को पकड़ने के लिये दक्षिण का सुबेदार बनाया। इस चालाक राजा ने छत्रपति शिवाजी के परिवार को बन्धक बना लिया था, इसलिये मजबूरी वश छत्रपति शिवाजी को 1665 ई. में पुरन्दर की संधि करने के लिये विवश होना पड़ा। इसमें छत्रपति शिवाजी को अपने 07 वर्ष के पोता शम्भाजी को गिरवी रखने के लिये विवश होना पड़ा एवं समझौते के अनुसार आगरा दरबार में छत्रपति शिवाजी और शम्भु जी 14 मई 1665 ई. को आगरा पहुँचे, परन्तु आगरा में छत्रपति शिवाजी के असम्मानजनक व्यवहार हुआ,जब इन्होने इसका विरोध किया, तब जयसिंह के पुत्र रामसिंह और अन्य लोगों ने छत्रपति शिवाजी को गिरफ्तार कर आगरा के पास जयसिंह के भवन में कैद किया और चारों ओर पहरा लगा दिया।

परन्तु छत्रपति शिवाजी एवं शम्भाजी को औरंगजेब की कैद से भगाने में किसी और की नही मुस्लिम मदारी मेहत्रर की बहुत बड़ी भूमिका थी, जिन्होने हिन्द स्वराज के रक्षक छत्रपति शिवाजी को रायगढ़ किले का रास्ता दिखाया।


2. मुस्लिम अधिकारी रूस्तमे जमा :-

यह छत्रपति शिवाजी के अति विश्वासपात्र थे,इसलिये छत्रपति शिवाजी भी इनके द्वारा दिये गये सुझाव को गुण-दोषों के आधार पर स्वीकार किया करते थे। यह वही रूस्तमे जमा है,जिन्होने बीजापुर के अफजल खाँ से छत्रपति शिवाजी की जान की रक्षा की थी। जब चतुर और धोखेबाज अफजल खाँ ने छत्रपति शिवाजी से मिलने के लिये शर्तो के आधार पर निहत्थे मुलाकात करने का निश्चिय किया था, तब अफजल खां से मिलने छत्रपति शिवाजी जा रहे थे, उसी समय रूस्तमे जमा ने छत्रपति शिवाजी से कहां कि अफजल खाँ शारीरिक दृष्टि से लम्बा, चौड़ा हष्ट-पुष्ट है और वह आपको गले मिलते समय नुकसान पहुँचा सकता है। इसलिये आप अपने हाथों में लोहे का पंजा पहन ले जो आपकी सुरक्षा करेगा। छत्रपति शिवाजी ने रूस्तमे के सुझाव को मानकर वैसा ही किया। जब छत्रपति शिवाजी अफजल खाँ से मिले और अफजल खाँ ने उन्हे गले लगाने का आग्रह किया। छत्रपति शिवाजी अफजल खाँ से गले मिलने लगे। अफजल खाँ ने छत्रपति शिवाजी को अपनी बाहों से दबाने लगे। शिवाजी को रूस्तमे की दी हुई सलाह याद आयी और उन्होने अफजल खाँ के पेट में हाथ डाल दिया। अफजल खाँ घायल हो गया और बाद में उसकी मौत हो गयी।

छत्रपति शिवाजी ने एक राजा के कर्तव्यों का दायित्व निभाते हुये,अफजल खाँ की सामाधी प्रतापगढ़ के किले में शिवाजी ने बनवाई। इस प्रकार दुश्मन का भी सम्मान भी शिवाजी ने किया।


3. काजी हैदर मुल्ला साहब :-

किसी भी लोकप्रिय शासक का लोक कल्याणकारी राज्य तभी स्थापित हो सकता है जब उसकी न्याय व्यवस्था धर्मनिरपेक्ष हो। छत्रपति शिवाजी इसलिये भी लोकप्रिय शासक थे;क्योंकि उन्होने बुद्धीमान,लोगों को न केवल आश्रय दिया, बल्कि अपने प्रशासन में नियुक्त किया। इनमें से एक काजी मुल्ला साहब भी थे। इसकी सफेद लम्बी दाढ़ी पर महाराज को अत्याधिक विश्वास था। राज्य के एक नेक न्याय दाता के रूप में मुल्ला साहब मुसलमानों से भी अधिक मराठी प्रजा में लोक प्रिय थे, इसलिये विवादित प्रकरण हैदर मुल्ला साहब ही निपटाया करते थे।

एक प्रकरण इस प्रकार हुआ कि जब शम्भू राजा के विरोधी द्वारा फंसाने के लिये त्रम्बकराव और निवासराव दोनों ने षढ़यंत्र किया। रंगपंचमी के दिन राजगढ़ किले की तोपो में खुशहाली मनाने के लिये आवाजी बारूद लगाने का आदेश दिया था, परन्तु इसकी जगह त्रम्बकराव और उसके पुत्र ने आवाजी बारूद के स्थान पर मुगल दक्षिण के सुबेदार दिलेर खाँ से मिलकर तोपों में असली गोले लगा दिये थे। जब इसका खुलासा युवराज शम्भूराज ने किया, तब त्रम्बकराव ने युवराज पर यह आरोप लगाया कि युवराज ने उनकी बहू गोदू का अपहरण कर लिया है और वह अभी तक अपने कब्जे में रखे हुये है। परन्तु गोदू के द्वारा अपने ससुर एवं पति की गद्दारी का खुलासा युवराज शम्भाजी के सामने किया था,इसलिये स्वयं को बचाने के लिये झूठा आरोप लगा रहे थे। छत्रपति शिवाजी ने आरोपों की जाँच कराने के लिये मुस्लिम न्यायाधीश काजी मुल्ला साहब से करवाई, जिन्होने दूध का दूध और पानी का पानी करते हुये युवराज शम्भू पर लगाये गये झूठे आरोपों से बरी किया। इसके साथ-साथ त्रम्बकराव और उसके पुत्र निवासराव को झूठे आरोप लगाने का दोषी एवं देशद्रोही सिद्ध होने पर कारागार में डालने का आदेश दिया। जबकि अष्टप्रधान मंडल ने न्यायाधीश प्रहलाद मिराजी ने जाँच करने की सिफारिश छत्रपति शिवाजी से की थी, परन्तु हिन्द स्वराज्य के विद्धवान काजी हैदर मुल्ला साहब को ही छत्रपति ने जाँच के आदेश दिये। इस प्रकार निष्पक्ष न्यायाधीश के रूप में काजी हैदर मुल्ला साहब का सम्मान किया करती थी।


4. इब्राहिम खान, तोपखाना प्रभारी :-

किसी भी दुर्ग की रक्षा करने में जितनी जवाबदेही एवं जिम्मेदारी सेना की होती है। उससे कहीं गुना तोपखाना प्रभारी की होती है; क्योंकि तोपों के द्वारा ही युद्ध किये जाते है एवं जीते जाते है। तोपखाना प्रभारी की जरासी लापरवाही एवं गद्दारी सम्पूर्ण शासन को बर्बाद एवं नष्ट कर सकती है, इसलिये इस प्रकार का दायित्व राजा केवल उसी को सौपता है,जो उसका अति विश्वासपात्र एवं वफादार व्यक्ति हो। छत्रपति शिवाजी ने अपने दुर्ग की रक्षा करने के लिये इब्राहीम खान को दायित्व सौपा। यह छत्रपति शिवाजी की दुरद्रष्टि का ही परिणाम है कि इब्राहीम खान ने अपने सामने खड़े मुस्लिम सैनिको का वैसे ही सामना किया,जैसे अन्य हिन्दू सैनिक एवं अधिकारी किया करते थे। इब्राहीम का धर्म केवल राजधर्म था जिसका उसने पालन किया।


5. मुनासिब खान:-

मुनासिब खान मूलतः बीजापुर रियासत को छोड़कर दक्षिण के मुगल सुबेदार दिलेर खाँ से मिले थे, ताकि इनको और ऊँचा पद प्राप्त हो सके। बीजापुर रियासत सिया पंथी मुसलमानों की थी, जो सुन्नी मुसलमानों की अपेक्षा अधिक उदार होते है। इसी मुनासिब खान ने छत्रपति शिवाजी पुत्र शम्भु की उस समय जान बचाई थी, जब शम्भु गुमराह होकर सुबेदार दिलेर खाँ के साथ मिल गया था एवं औरंगजेब को जब सुबेदार दिलेर खाँ ने युवराज शम्भु की जानकारी दी थी। तब तुरंत मुगल सुल्तान ने शम्भु को गिरफ्तार कर दिल्ली बुलवाने की योजन बनाई थी। इस योजना को सफल करने के लिए लगभग 1 लाख सैनिक दक्षिण दौलताबाद की ओर निकल चुके थे, परन्तु इसकी खबर जैसे ही युवराज शम्भु को मिली, उन्होने दिलेर खाँ के चंगुल से भागने का प्रयास किया और वह सफल भी हो गये, परन्तु मुगल सेना ने पुनः शम्भु को पकड़कर गिरफ्तार कर लिया। शम्भु को अधमरा कर दिया और बांधकर पुनः मुगल क्षेत्र मं ले जा रहे थे, इसी दौरान मुनासिब खान ने शम्भु को मुगल सेना सेमुक्त कराया:क्योंकि मुनासिब खान यह जानता था कि यदि युवराज शम्भु गिरफ्तार होकर दिल्ली चले जाते है तब छत्रपति शिवाजी का उत्तराधिकारी कोई नही रहेगा। इसका लाभ मुगल उठा सकते है। इसके बाद पापी मुगल दक्षिण पंथी शिया मुसलमानों की बीजापुर और गोलकुण्ड़ा रियासते निगलने का काम करेगे; क्योंकि दक्षिण मुगल सुबेदार दिलेर खाँ ने बीजापुर के क्षेत्रों के कई शिया मुस्लिम पुरूष, महिलाओं और बहनों पर इतना अत्याचार कर रहा था कि कईयों ने आत्महत्या कर ली थी, लेकिन मुगल औरंगजेब दक्षिण में अपनी सत्ता का विस्तार करता है तो आने वाला समय और अधिक भयानक होगा। इसलिये मुगलों से लोहा लेने वाले मराठाओं का उत्तराधिकारी शम्भुजी की जान बचाने में मुनासिब खान ने अपनी जान को दाव पर लगा दिया।


6.याकूब औलिया बाबा:-

तुकाराम और रामदास के साथ-साथ छत्रपति शिवाजी महाराज याकूब औलिया बाबा को भी अपना गुरू मानते थे और जब भी वह युद्ध के लिये निकलते थे, तब मंदिर एवं अपनी माँ जीजाबाई की समाधि के साथ-साथ याकूब बाबा औलिया की मजार पर भी जाया करते थे। जितनी श्रद्धा छत्रपति शिवाजी को मंदिर में थी, उतनी ही औलिया बाबा की दरगाह पर भी थी। यही नही छत्रपति शिवाजी की सेना में मुस्लिम लड़ाके भी शामिल थे,जिन्होने कई बार छत्रपति शिवाजी के लिये विजय प्राप्त करने में अपनी जान न्यौछावर की थी। यही वजह रही कि छत्रपति शिवाजी ने मुस्लिम अनुयायीयों की धार्मिक आस्था को ख्याल रखते हुये, रायगढ़ के पास मस्जिद का भी निर्माण करवाया गया था। इसकी सुरक्षा भी वैसे ही की जाती थी जैसे सनातनी मंदिरों की। छत्रपति शिवाजी के देहांत के बाद युवराज शम्भाजी जब रायगढ़ के राजा घोषित हुये,तब शम्भाजी भी याकूब औलिया बाबा की दरगाह पर जाना नही भूलते थे,बल्कि दो-तीन दिनों तक याकूब औलिया बाबा की दरगाह पर उनका पड़ाव ठहरा रहता था। इनकी दरगाह का निर्माण भी छत्रपति शिवाजी ने सरकारी खजाने से करवाया था। यह उनकी धर्म निरपेक्षता का स्पष्ट उदाहरण है। मुसलमान याकूब बाबा केलशी के निवासी थे, जब शिवाजी ने तुकारामऔर रामदास के जैसे याकूब औलिया बाबा को भी स्वयं छत्रपति शिवाजी ने महाराज गुरू माना तब भी नीलो पन्त और अण्णाजी पन्त को बहुत आपत्ति हुई थी।


7.गौहरबानो:-

कल्याण एवं भिंवडी पर जब छत्रपति शिवाजी के सुबेदारों ने हमला किया और कल्याण के शासक के पराजित होने के बाद उसकी पुत्रवधू गौहरबानों को सेनापति आबाजी ने बंदी बनाकर इस उम्मीद से छत्रपति शिवाजी के समक्ष पेश किया कि शिवाजी दक्षिण भारत में ख्याती प्राप्त गौहरबानो को पाकर खुश होकर आबाजी के पद में बढ़ोत्तरी कर देगे। पर शिवाजी ने गौहरबानो को बंदी बनाने वाले सेनापति आबाजी को फटकार लगाई और सम्मान के साथ गौहरबानों को पुनः भेजा।


8.मियाँ खान:-

हिन्द स्वराज्य के मुखिया छत्रपति शिवाजी पुत्र शम्भाजी की पुत्री की अभिरक्षा करने वाले मिया खान ही थे। शम्भु की दूसरी पत्नि दुर्गाबाई एवं शम्भु की बड़ी बहन राणूदीदी मुगल सुबेदार दिलेर खाँ की बंदी बनी हुई थी। इसी दौरान दुर्गाबाई ने एक पुत्री को जन्म दिया था। जो औरंगजेब की कैद में ही पल रही थी, परन्तु औरंगजेब ने इनको प्रताड़ित नही किया। शम्भु का परिवार अहमद नगर के किले में ही कैद था, जिसकी परवारिश मिया खान के द्वारा की जा रही थी। साथ ही शम्भु को अपने परिवार की पूरी जानकारी गुप्त रूप से पत्रों के माध्यम से दिया करता था। इस प्रकार हिन्द स्वराज्य के मुखिया शिवाजी के परिवार की रक्षा करने में भी इसकी बड़ी भूमिका थी।


9. जंगेखान एवं दौलतखानः-

यह अरब का रहने वाला था,परन्तु छत्रपति शिवाजी और शम्भुजी ने इसके मधुर संबंध थे। इसके द्वारा मराठा साम्राज्य के कारीगरों को जहाज किस प्रकार तैयार किया जाये,इस प्रकार का प्रशिक्षण लुहारों,सुनारों, चमारों एवं महारों को दिया करता था। इसके द्वारा अरबी जहाजों के जैसे ही जहांज तैयार करवाये जाते थे, जिससें की मराठाओं की नौसेना शक्ति और अधिक शक्तिशाली हो सके। इसके द्वारा इस प्रकार का भी प्रशिक्षण दिया जाता था कि समुद्र के खारे पानी से जहांजों को कैसे बचाया जाये ? छत्रपति शिवाजी के जैसे ही शम्भु युवराज के संबंध में जंगेखान से मधुर रहे। अरबों के सेनाधिकारी जंगेखान ने अपने मित्र मराठाओं का हमेशा साथ दिया और जंजीरा क्षेत्र के सिद्धयों एवं मुगलों के बहकावे में कभी भी नही आये। इस प्रकार अरब और मराठाओं का कई प्रकार के परस्पर संबंध स्थापित रहे। दौलतखान भी मराठा सेनाओं की ओर से युद्ध किया करता था। उंदेरी टापू जो कि जंजीरा दुर्ग के पास स्थापित है, यहां के सिद्दी भाई खैरियत खान और कासिम खांन दोनों के द्वारा मराठा क्षेत्र की लड़कीयाँ एवं युवाओं को उठाकर अंग्रेजों के बेच दिया करते थे। इस दोनों भाईयों के विरूद्ध शम्भाजी के द्वारा जो युद्ध किया जा रहा था, इसमें भी जंगेखान और दौलतखान ने मराठाओं का साथ दिया था न कि कासिम और खैरियत खान का। सम्भवतः इनके पूर्वज अफ्रीकन मुसलमान थे। इनके द्वारा ही जंजीरा दुर्ग का निर्माण करवाया गया था। इस दुर्ग पर छत्रपति शिवाजी ने 08बार आक्रमण किये, परन्तु यह दुर्ग समुद्र की तराई में स्थापित होने की वजह से जीत नही पाये,परन्तु इन पर नियंत्रण रखने के लिये छत्रपति शिवाजी ने सिन्धु दुर्ग का निर्माण करवाया था। जंजीरा किला सिद्दी बन्धुओं का एक व्यापारिक केन्द्र था इनके संबंध पुर्तगालियों, फ्रांसिसि एवं अंग्रेजों से थे। समुद्र में स्थापित होने की वजह से जंजीरा दुर्ग अजेय रहा, परन्तु छत्रपति शिवाजी पुत्र शम्भाजी ने इन भाईयों की नाक में दम कर रखा था।


10. छत्रपति शिवाजी के द्वारा मस्जिद का निर्माण:-

मराठा और कुछ कट्टर ब्राहम्ण यह तक की अष्टमंड़ल के अधिकारी भी छत्रपति शिवाजी से मन ही मन अंसतुष्ट रहने लगे थे;क्योंकि इनका मानना था कि काशी से बुलाये गये गगा भट्ट से राज्याभिषेक करवाया और उत्सव किया। इससे अंसतुष्ट हुये जब छत्रपति शिवाजी महाराज ने अपना पुनः अभिषेक तांत्रिक पुजारी ‘‘निश्चल गिरी गोस्वामी’’ से कराया और यही नही जब इनका आश्रम भी रायगढ़ में ही बनवा दिया गया, तब यह और अधिक छत्रपति शिवाजी ने द्वेष भावना रखने लगे। इनमें मुख्य रूप से अण्णाजी पन्त थे जो अष्टप्रधान मंड़ल को भड़काते रहते थे। इन सभी षढ़यंत्रकारियों को यह लगने लगा था कि भविष्य में इनका अस्त्तिव खतरे में है इसलिये यह कहने लगे थे कि वैदिक ब्राहाम्णो को भविष्य में रायगढ़ में आश्रय छीन सकता है, इनको इस बात की भी आपत्ति थी कि कायस्थ एवं छोटी जातियों के युवाओं को भी प्रशासनिक पदों पर बैठाया जाने लगा था। रायप्पा महार युवराज शम्भाजी का अति विश्वसनीय बन चुका था।

काजी हैदर अली की नियुक्ति से अण्णाजी पन्त एवं अन्य अंसष्तुट अष्टमंड़ल के लोगों को अधिक आपत्ति हुई, जबकि स्वयं छत्रपति शिवाजी ने काजी मुल्ला हैदर को न्यायाधीश के पद पर नियुक्त किया और महत्वपूर्ण प्रकरण हैदर ही निपटाया करता था। काजी हैदर अली के अनुरोध पर शिवाजी ने रायगढ़ पर एक छोटी सी मस्जिद बनाने की स्वीकृती काजी को दी थी यही नही बल्कि यह मस्जिद सरकारी खर्च से ही बनी हुई थी। काजी हैदर ने यह स्वयं स्वीकार किया था कि छत्रपति शिवाजी के दरबार में हिन्दू और मुसलमानों दोनों को समान रूप से न्याय मिलता था। यह कथन काजी हैदर अली ने सन् 1683 ई. को स्वयं दिल्ली के सुल्तान औरंगजेब के समक्ष दिया था। जब वह दक्षिण पर आक्रमण करने एक बार पुनः आया था। यही नही काजी ने यह भी कहां था कि छत्रपति शिवाजी जैसे राजा के यह हमे जो आश्रय मिला वह हमारा सौभाग्य था। आगे दुखी होकर कहने लगे कि बादशाह सलामत आज कल वह के कर्मचारी और अधिकारियों से इसलिये डर लगने लगा है कि शिवाजी के देहांत के बाद यह लोग और अधिक भष्टाचारी हो चुके है। यही नही युवराज शम्भाजी की सौतेली मां सौराबाई से मिलकर दो-दो बार कोशिश कर चुके है, इसलिये मैं रायगढ़ छोड़कर मक्का-मदीना जा रहा हूँ।


11. सिद्धी सम्बल:-

छत्रपति शिवाजी के शासन काल में अंग्रेज एवं पुर्तगालियों से व्यापारिक प्रतिद्वंता थी इसलिये बन्दरगाहों की सुरक्षा के लिये नौसेना का निर्माण किया गया था और इसमें बड़ी संख्या में मुस्लिम सैनिक थे। यही नही नौसेना का मुखिया सिद्धी सम्बल नाम का अधिकारी था,जिसके हाथों में नौसेना की कमान थी। छत्रपति शिवाजी द्वारा जब जंजीरा दुर्ग पर आक्रमण किये, तब सिद्धी सम्बल ने शिवाजी का कदम से कदम मिलाकर साथ दिया।


12.मुस्लिम शासक अब्दुल्ला कुतुब-उल- मुल्क ने मुगलो के खिलाफ की शिवाजी की मददः-

एक मुस्लिम शासक औरंगजेब के आदेश से मिर्जा राजपूत राजा जयिसंह औरजसवन्तसिंह पकड़ने के लिये रणनीति बना रहे थे,वही दूसरी तरफ हैदराबाद का शासक शिवाजी की सहायता कर रहा था। इस प्रकार शिवाजी मथुरा से निकलकर बनारस, पटना और चंदा होते हुये अपने देश दक्षिण राजगढ, पूना़ जाने का मार्ग चुना, यह कहीं मुगल सेना के हाथों न पकड़ जाये,इसलिये भेष बदल-बदल कर एक स्थान से दूसरे स्थान पहुंचते रहे। अंत में यह हैदराबाद पहुंच, जहां इन्होने अब्दुल्ला कुतुब-उल- मुल्क से मुलाकात की थी, जिससे की हैदराबाद की मदद से वहां अपने खोये हुये किलों को प्राप्त कर सके। जो सन् 1665 ई. में मिर्जा राजा जयसिंह ने औरंगजेब का खास बनने के लिये छीन लिये थे। जब छत्रपति शिवाजी ने अब्दुल्ला कुतुब-उल- मुल्क से मुलाकात की तब अनेक दुर्गो पर आदिलशाहीयों ने कुतुबशाही सुल्तानों के क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया था और हैदराबाद के शासक मुल्क उनको पुनः वापिस करने के लिये प्रयासरत् थे। छत्रपति शिवाजी जैसा योद्धा का सम्मान करते हुये इन्होने कहाँ कि यदि वह बीजापुर को आदिलशाहीयों से छीने हुये किले वापिस करवाने का वचन छत्रपति शिवाजी से लिया। इस प्रकार छत्रपति शिवाजी के नेतृत्व में कुतुबशाहीयों को आदेश दिया कि वह छत्रपति शिवाजी के आदेशो का पालन करे। छत्रपति शिवाजी की सेना ने बीजापुर, सतारा, पन्हाला आदि को मिलाकर 10 से12 किले जीत लिये।

यही नही शम्भाजी दक्षिण में मैसूर के शासक चिक्कादेवराज से सन् 1683 ई. के लगभग युद्ध में फंसे हुये थे। जब उनकी सेना भागने लगी थी तब बीजापुर के मुस्लिम शासक ने ही चिक्कादेवराज के विरूद्ध युवराज शम्भाजी की मदद की थी। उन्ही की मदद की वजह से शम्भाजी ने कर्नाटक, तमिलनाडू के कई राज्यों को अपने आधीन किया था और अपने जीजा को दक्षिण का सुबेदार बनाने में सफल हुये थे।

इस प्रकार छत्रपति शिवाजी एवं शम्भाजी के शासन काल में कई मुस्लिम शासकों से मधुर संबंध थे एवं शासन में भी इनकी भागीदारी थी। इसलिये हम यह कतई नही कह सकते है कि हिन्द स्वराज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज एवं शम्भाजी इस्लाम विरोधी नहीं थे, बल्कि वह केवल ऐसे लोगों के खिलाफ थे जो कट्टर इस्लाम विरोधी थे,जिनके द्वारा इस्लाम की गलत व्याख्या कर प्रचार-प्रसार किया जा रहा था। वह छत्रपति शिवाजी अल्लाह के अनुयायियों का समर्थन किया करते थे,कुछ मुल्ला के अनुयायियों का नही।जो समाज को ब