छत्रपति शिवाजी ka दृष्टिकोण !





छत्रपति शिवाजी ने देखी ‘‘गौहरबानो’’ में माँ की छबि:-

शिवाजी के दादा मालोजी राव बीजापुर के सुल्तान के यह सेना में बड़े अधिकारी के पद पर थे। इनकी बहादुरी और साहस की वजह से बीजापुर में हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही सम्मान किया करते थे। सुल्तान के यह अति विश्वासपात्र होने की वजह से मालोजी के पुत्र शाहजी का विवाह बुल्डाना के शासक राजा लखोजी जाधव की पुत्री जीजाबाई से हुआ था। इस समय जीजाबाई की उम्र 06 वर्ष शाहजी की उम्र 08 वर्ष के लगभग थी। अपने पिता के जैसे ही शाहजी भी बहादुर और साहसी मराठा होने से बीजापुर के सुल्तान ने इनको अपना राजनायक बनाया था। शाहजी ने सुल्तान के लिये कई युद्ध किये और कई क्षेत्रों को बीजापुर के आधीन करने की वजह से इनके कई विरोधी जन्म ले चुके थे। वही दूसरी और शाहजी को बहादुरी का इनाम देते हुये कई जागीरे भेंट स्वरूप दी गई थी, इनमें से एक शिवनेरी का दुर्ग भी शामिल था, जो पूना के समीप है।

शिवनेरी दुर्ग ही शिवाजी का जन्म स्थान है, यही पर जीजाबाई ने छः पुत्री और दो पुत्रों को जन्म दिया। शिवाजी का जन्म 16 अप्रैल 1627 ई. को द्वितीय पुत्र के रूप में हुआ था। शाहजी ने अपने परिवार को इस दुर्ग में मात्र इसलिये रखा था कि कोई दुश्मन या विरोधी उनके परिवार को नुकसान न पहुंचा सके। जब शिवाजी का जन्म हुआ, तब शाहजी शिवनेरी दुर्ग में नही थे; क्योंकि मुस्तफा खान ने इनको बंदी बना रखा था। शाहजी की मृत्यु युद्ध में हो जाने की वजह से जीजाबाई सती होने का मन बना चुकी थी, परन्तु शिवाजी के अनुरोध पर जीजाबाई ने अपना मन बदल लिया और उन्होने शाहजी के अधूरे कार्यो को पूरा करने का संकल्प लिया। शिवाजी अपनी माँ जीजाबाई से बहुत अधिक प्रभावित थे, वह अपनी माँ को मार्गदर्शक, मित्र एवं प्रेरणादायक मानते थे। शिवाजी की माँ महाराष्ट्र में महिलाओं के उत्थान एवं उनके साथ हो रहे अमानवीय व्यवहार से दुखी हुआ करती थी, इसलिये इनकी सामाजिक स्थिति को बदलने के लिये अपने क्षेत्र में कई परिवर्तन किये। यह सब शिवाजी बचपन से ही देख रहा था, यही वजह है कि 17 वर्ष की उम्र से ही शिवाजी के द्वारा कई लड़ाईयों में भाग लिया गया एवं कई लड़ाईयों में नेतृत्व किया, परन्तु अपने अभियान के दौरान शिवाजी ने कभी-भी बच्चों, स्त्रीयों एवं किसानों को प्रताड़ित नही किया। बीजापुर के शासक आदिल खाँ ने दिल्ली के बादशाह शाहजहाँ से मैत्री कर ली थी, इसलिये चाकन और कोंकर्ण के क्षेत्रों को शाहजहाँ के लिये सौप दिया था। यह कभी दोनों क्षेत्र निजाम-उल-मुल्क के अधिकार में हुआ करते थे। इन्हीं क्षेत्रों से लगे पूना और सूपा दो परगने शाहूजी भौंसले की जागीर थी और इसका प्रबंध शिवाजी के हाथों में था। जब बीजापुर के सुल्तान आदिल खाँ बीमार पड़ गये और शासन के अधिकारियों में अराजकता फैलने लगी, तब इसका लाभ उठाते हुये शिवाजी ने कुछ इलाके अपने कब्जे में कर लिये और अपनी शक्ति बड़ाने का प्रयास किया। यही नही दक्षिण के तोरण दुर्ग पर भी शिवाजी ने कब्जा कर लिया, बाद में राजगढ़ दुर्ग भी शिवाजी के हाथ में आ गया। आदिल खाँ की मौत के बाद अफजल खाँ ने एक बड़ी सेना लेकर शिवाजी पर हमला करने के लिये गया, परन्तु अफजल शिवाजी को धोखे से मारना चाहता था, इसलिये उसने निश्चित स्थान पर शिवाजी को बुलाकर मारने की रणनीति बनाई, परन्तु शिवाजी अफजल खाँ से मुलाकात करते इसके पहले ही शिवाजी के मित्र एवं अधिकारी रूस्तमे जमा ने शिवाजी को यह सलाह दी कि ‘‘अफजल खाँ चतुर, चालाक और धोखेबाज है, लम्बा, चैड़ा एवं हस्ट-पुष्ट है, वह आपको गले लगाने के बहाने दबा सकता है इससे आपकी जान भी जा सकती है महाराज! इसलिये आप हाथों में उंगलियों में लोहे का पंजा लगाकर जाये। शिवाजी ने उसकी बात मानी और जैसा रूस्तमे जमा ने कहाँ था अफजल ने वैसा ही किया, परन्तु शिवाजी ने अफजल के पेट में हाथ डाल दिया, जिससे वह घायल हो गया और शिवाजी भागने में सफल हो गये, बाद में अफजल की मौत हो गई।’’

मुस्लिम महिला गौहरबानो को शिवाजी ने दिया माँ का दर्जा:-

जैसा कि हम पढ़ चुके है कि शिवाजी के दादा और पिता शिया मुस्लिम शासक बीजापुर के सुल्तान के यह उच्च पदों पर थे और इन्हीं ने ही दादाजी और पिता जी को जांगीरे भेंट की थी। शिया मुस्लिम, सुन्नी मुसलमानों की अपेक्षा विश्वासपात्र एवं नरम स्वाभाव वाले होते है। यह शिवाजी ने बचपन से ही देखा और अनुभव किया। दिल्ली का सुल्तान शाहजहाँ बीमार पड़ने की वजह से एवं दिल्ली की सत्ता शिथिल हो जाने के कारण शाहजहाँ के चार पुत्र दाराशिकोह, सूजा, मुरादबख्श और औरंगजेब में सत्ता का संघर्ष आपस में चल रहा था। शाहजादा औरंगजेब दिल्ली की सत्ता हथियाने के लिये सन् 1658 और 1659 ई. के दो वर्षो तक चारों भाईयों में संघर्ष होता रहा, इसलिये शाहजादा औरंगजेब भी अपने भाई मुरादबख्श को लेकर दक्षिण भारत से उत्तर भारत की ओर जा चुके था। इसलिये शिवाजी को अब किसी का डर भी नही था और इसके अलावा शिवाजी को चुनौती देने वाली कोई रियासत दक्षिण में नही थी। शिवाजी ने अपने राज्य का विस्तार करने के लिये बीजापुर की और निगाहा डाली, जो रियासते कभी मुगल बादशाह शाहजहाँ के प्रभाव में थी। बीजापुर मुगलों से हार चुका था, इसलिये हार का कारण बीजापुर के मंत्री और अफसरों में भारी मनमुटाव एवं लड़ाई-झगड़े हो रहे थे, दोनों ही एक-दूसरे पर हार का ठीकरा फोड़ रहे थे। अर्थात दोनों ही एक-दूसरे पर हार का आरोप लगा रहे थे।

बीजापुर के प्रधानमंत्री खान मुहम्मद का बीजापुर में हत्या कर दी गई थी, इस वजह से चारों ओर अफरा-तफरी अर्थात खींच-तान मची हुई थी। शिवाजी ने इस खींच-तान का लाभ उठाते हुये पश्चिमी घाट के पार उत्तर कोंकर्ण वर्तमान में थाना जिले में जा घुसे और बीजापुर के हाथों से कल्याण एवं भिवंडी नामक दो शहर छीनकर अपने कब्जे में करने की योजना बनाई। यह 24 अक्टूबर 1657 ई. की घटना है। इसके लिये शिवाजी ने अपने सेनापति आबाजी सोनदेव को आक्रमण करने के लिये भेजा। आक्रमण करने के पूर्व शिवाजी ने सभी सैनिकों एवं सेनापतियों को यह कड़ा संदेश दिया था कि आक्रमण के दौरान केवल पुरूषों को ही कैद किया जाये। किसी महिला एवं बच्चों को तथा बीमार व्यक्ति को कैद न करे। विशेष रूप से यह आदेश सेनापति आबाजी को दिया था कि वह मराठा शासन के नियमों का पालन अपनी सेना से करवायें। शिवाजी ने सबको यह संदेश भी दिया कि ‘‘शत्रु के देश की स्त्रीयों का किसी भी तरह अपमान नही होना चाहिए। उन्हे माँ और बहनों के समान आदर एवं पूज्य समझकर उनकी इज्जत करना चाहिए, बच्चों को कभी-भी उनके माता-पिता से जुदा मत करो। गाय मत पकड़ों, कुरान की उतनी ही इज्जत होना चाहिए, जितनी भवानी माँ की पूजा की या गुरू रामदास की वाणी की। मस्जिद का दरवाजा उतना ही पवित्र है, जितना की तुम्हारे मंदिर का कलश। शिवाजी को इस्लाम धर्म उतना ही पूज्य है जितना की सनातन धर्म, जमींन पर गिरा कुरान का एक-एक पन्ना इज्जत से एकत्रित कर मौलवीयों के सिर पर रख दो, मुझे सनातन धर्म एवं मुस्लिम धर्म में कोई फर्क दिखाई नही देता।’’ इसलिये आक्रमण करते समय इन पर कठोरता न बरती जाये।

सेनापति आबाजी ने कल्याण और भिवंडी पर जब आक्रमण किया, तब इसने दोनों क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया एवं भारी मात्रा में धन-दौलत, घोड़े, हाथी को अपने कब्जे में कर लिया। मराठों के डर से भारी संख्या में लोग शहर छोड़कर भागने लगे। बीजापुर के सेनापति मुस्तफा खाँ की फौज ने कल्याण और भिंवडी को बचाने का भरसक प्रयास किया, परन्तु वह सफल नही हुये। इसका एक कारण यह भी था कि मुस्तफा सेनापति की फौज में मुसलमान और मावला (मावला प्रांत के सैनिक निवासी, जो पूना के पश्चिम में रहते थे) दोनों ही थे। इसी प्रकार शिवाजी के सेना में भी मुसलमान और मावला ही थे, इसलिये शिवाजी का सेनापति आबाजी मुस्तफा खाँ पर भारी पड़ गये और मुस्तफा खाँ को भागना पड़ा। सेनापति आबाजी ने धन दौलत लूटने के साथ-साथ, शिवाजी को खुश करने के लिये कल्याण के सुबेदार मुल्ला अहमद की पुत्रवधू ‘‘गौहरबानो’’ को भी बंदी बना लिया और यह केवल सेनापति आबाजी ने इसलिये किया कि यदि शिवाजी गौहरबानों को पाकर खुश हो जायेगे, तो वह खुश होकर मराठों का पेशवा जैसा पद उसे मिल जायेगा।

गौहरबानो की सुन्दरता के चर्चे न केवल बीजापुर में थे बल्कि मराठाओं के क्षेत्र में भी गौहरबानो की सुन्दरता पर लोग प्रशंसा किया करते थे। यही वजह रही कि शिवाजी के आदेश का उल्लघंन कर सेनापति आबाजी ने महिला गौहरबानों को बंदी बनाकर अपने साथ ले आये और अपने घर में उसको रख लिया। जब शिवाजी के समक्ष कल्याण और भिंवडी से प्राप्त संपत्ति को रखा गया, सूचीयाँ बनाई जा रही थी उसी समय सेनापति ने शिवाजी से अनुरोध किया कि महाराज! धन-दौलत के अतिरिक्त एक ऐसी वस्तु भी लाया हूँ जो आपको स्वीकार करना होगी और यह केवल आपके लिये ही लाया हँ। शिवाजी को यह ज्ञात नही था कि सेनापति किस वस्तु की बात कर रहा है उन्होने सेनापति के आग्रह को स्वीकार कर वस्तु को पेश करने का आदेश दिया। आदेश पाते ही सेनापति ने जब कल्याण के सुबेदार मुल्ला अहमद की पुत्रवधू को बंदी बनाकर शिवाजी के पास पेश किया, शिवाजी गौहरबानों को देखकर आश्चर्य चकित हो गये और सेनापति की ओर देखने लगे। गौहरबानो अपना चेहरा ढके हुये थी। गौहरबानो शिवाजी के चरित्र एवं उनके लोककल्याण की चर्चा हमेशा अपने पति से सुना करती थी, परन्तु जब शिवाजी के सामने गौहरबानों को प्रस्तुत किया तब उसको लगने लगा कि जो उसने सुना था वह सब झूठा, प्रचार था, परन्तु गौहरबानो सच्चाई से कोसों दूर थी।

शिवाजी के पेशवा मोरोपन्त, सरदार रघु बल्लाल, आबाजी, शम्भूजी को मंच हाल में बुलाया, जहाँ पर गौहरबानो खड़ी हुई थी और कहने लगे कि मराठों के देवता एवं उनके साहस की कहानियाँ न केवल दक्षिण भारत एवं उत्तर भारत के राजपूतो , यहां तक की मुगल भी मराठों की वीरता से प्रभावित है। यही वजह है कि कल्याण और भिंवडी नगरों को जीतने में सफल हुये। इससें दक्षिण भारत में हम लोगों का मान बढ़ा। माँ भवानी ने अनेक पहाड़ियो का निर्माण किया, जिसमें हमने किले बनाये। पेशवा मोरोपन्त से कहने लगे कि सेनापति आबाजी को मराठों के नियम, कायदे, कानून शायद भूल गये है कि स्त्री और बच्चों को कैद करना पाप है, मेरे आदेश के बाद भी कल्याण के सुबेदार, जो अरब जाति के रईस मुल्ला अहमद की पुत्रवधू गौहरबानो को बंदी बनाकर लाना गंभीर अपराध एवं मराठों के कायदे, कानून का खुला उल्लंघन है। शिवाजी ने गरज का आबाजी से कहाँ कि तुमको इस अपराध का दंड़ भुगतना होगा। यदि इस प्रकार का अपराध कोई छोटा-मोटा सैनिक एवं अन्य व्यक्ति करता, तो शायद उसको माफी मिल सकती थी; क्योंकि वह कायदे, कानून से अनभिज्ञन था। मंच हाल में खड़े सभी अधिकारियों के समक्ष शिवाजी कहने लगे कि यह गौहरबानो की सुन्दरता शिवाजी के ईमान एवं सच्चाई को हिला नही सकती। मेरे खानदान में स्त्रीयों का सम्मान किया, चाहे वह किसी धर्म एवं जाति की क्यों न हो। गौहरबानो में, मैं भवानी माँ और मेरी माँ की आकृति देख रहा हूँ। यह मुझे उतनी ही सम्मानीय और आदरणीय है, जितनी की मेरी माँ। शिवाजी आगे कहने लगे कि गौहरबानो को सम्मान के साथ जहाँ से लाये थे, वही छोड़कर आये। जैसे अपनी माँ जीजाबाई के चरणों में प्रणाम करता हूँ वैसे ही गौहरबानो को भी प्रणाम करते हुये सेनापति आबाजी के कृत्य के लिये क्षमा मांगता हूँ। गोहरबानो को वापिस करते समय शिवाजी ने उसके हाथों में एक तस्वीर भी भेंट की और यह तस्वीर किसी और की नही बल्कि राजमाता जीजाबाई की थी। तस्वीर भेेंट करते समय शिवाजी कहने लगे कि यह मेरी जिन्दगी में मुझे सबसे प्यारी है, इस तस्वीर की ताकत से ही मैं शिवा से शिवाजी बन सका। इस समय गौहरबानो की उम्र 18 या 20 साल की थी। शिवाजी के शासनकाल में हिन्दू हो या मुसलमान दोनों को न्याय के तराजू पर एक समान ही न्याय मिलता था। गौहरबानो के कहने पर सेनापति आबाजी का माफ किया और अंत में गौहरबानों के जाते समय कहने लगे कि यदि उनकी माँ जीजाबाई भी गौहरबानो के जैसे सुन्दर होती तो निश्चित ही शिवा भी एक सुन्दर सरदार अवश्यक होता। दोनों हाथों से गौहरबानो को प्रणाम करते हुये अपने अपराध की क्षमा मांगते हुये, मराठा परम्परा का पालने करते हुये गौहरबानो को सम्मान के साथ, बहुमूल्य वस्तुऐं देकर विदा किया। इस प्रकार शिवाजी का नारी जाति की मर्यादा का सम्मान किया। यही वजह है कि आज भी शिवाजी को न केवल भारत में बल्कि विश्व में आदर से देखा जा रहा है। यह कहना उचित नही होगा कि शिवाजी इस्लाम के विरोधी थे, शिवाजी केवल कट्र इस्लामवाद के विरोधी थे, राजनैतिक चश्मे वालों ने शिवाजी के व्यक्तित्व को सीमित करने का असफल प्रयास किया। शिवाजी की छबि राजधर्म के पालन करने वाले शासक के रूप में सदियों तक याद रखेगी।

अगला अंक 02:-आगामी अंक में छत्रपति शिवाजी के मुस्लिम अधिकारी !


लेखक

संतोष कुमार लड़िया

राज्य प्रशासनिक सेवा म.प्र.