बौद्ध संगिती अथवा सभाऐं


(प्रतियोगिता परीक्षा के लिए उपयोगी !)


कपिलवस्तु के राजा शुद्धोदन के यहां एक ऐसे चमत्कारी बालक का जन्म हुआ, जिसनें भारत में सबसे पहले धार्मिक एवं सामाजिक बुराईयों के खिलाफ आंदोलन छेड़ा। इनके पूर्व ऐसा कोई भी संत एवं राजकुमार नही था, जिन्होने आडम्बर, कर्मकाण्ड़, बलि प्रथा के खिलाफ आंदोलन किया हो। इन्होने बल्कि भारत में एक ऐसी विचारधारा को जन्म दिया, जो भेद-भाव एवं पक्षपात रहित थी। इन्होने पहली बार इस देष के लोगों को समानता, भाईचारा एवं शोषण के विरूद्ध संघर्ष करने का साहस इस देष के गरीब लोंगो को देने वाला कोई और नही बल्कि कपीलवस्तु का राजकुमार गौतम बुद्ध थे। आज भी उनके अनुयायी जो विष्व में एक तिहाई भाग पर बसे हुये है, उनका नाम लेकर आध्यात्मिक एवं मानसिक शांति प्राप्त करते है। यह और कोई नही बल्कि समाज को नई दिशा देने वाले शुद्धोदन एवं महामाया के पुत्र थे और आज भी दबे -कुचले, गरीब, शोषणयुक्त समाज के दिलो में राज करते है। यह गौतम बुद्ध का ही कमाल है कि सैकड़ो वर्ष बाद भी उनकी विचारधारा गरीबों को शोषण से मुक्ति दिलाने के लिए आज भी उतनी ही प्रभावषील है जितनी पहले थी।

इन्होने ‘गया’ में ज्ञान प्राप्त करने के बाद पहला उपदेश अपने शिष्यों को दिया था। बौद्ध धर्म के इतिहास तथा भारतीय संस्कृति के विस्तार की दृष्टि से इसका बहुत महत्व है। यही से धर्म चक्र प्रारंभ हुआ और यह उपदेश उन्होने सबसे पहले अपने पाँच शिष्यों को दिया था, जो जाति से ब्राह्मण थे और कर्मकाण्ड का पालन किया करते थे, परन्तु बुद्ध की विचारधारा एवं उनके उपदेषों ने इन कर्मकाण्डी ब्राह्मणों को नई राह एवं दिषा देने का कार्य किया और यह बुद्ध के अनुयायी बन गये।

इन्ही पाँच शिष्यों ने बुद्ध की विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए कई दिशाओं में प्रस्थान किया। बुद्ध का उपदेश था कि व्यक्ति को वीणा के तारों के जैसा होना चाहिए, यदि वीणा के तार ज्यादा ढीले हो जाने पर उनके सुर सुरीले नही होते, यदि इन तारो ंको ज्यादा खिच दिया जाये, तो यह बेसुरे हो जाते है, ऐसे ही बुद्ध ने संदेश दिया कि शरीर को न ज्यादा कष्ट देना चाहिए और न ही ज्यादा आराम देना चाहिए। अर्थात इन्होने इसी वजह से माध्यम मार्ग विचारधारा को अपनाया। बुद्ध ने जो प्रथम उपदेश अपने शिष्यों को दिया था, बुद्ध को माध्यम मार्ग की विचारधारा अपनाने का विचार तब आया, जब नवविवाहित सुजाता मधुर गान करते हुए बुद्ध की तपो भूमि के पास से निकल रही थी।

प्रथम उपदेष था कि ‘‘भिुक्षुओं ! अब तुम लोग जाओं और बहुतों के कुशल एवं भलाई के लिए संसार पर दया के निमित, देवताओं और मनुष्यों की भलाई, कल्याण और हित के लिए भ्रमण करो। तुम उस सिद्धांत का प्रचार करो जो आदि में उत्तम है, मध्य में उत्तम है और अंत में उत्तम है। सम्पन्न, पूर्ण तथा पवित्र जीवन का प्रचार करो।’’

बुद्ध के जीवनकाल में ही उनकी शिक्षाऐं प्रचलित होने लगी थी, परन्तु बुद्ध कभी भारत से बाहर षिक्षाओं का प्रचार करने नही गये और भारत में भी बुद्ध के जीवनकाल में शायद ही उनकी विचारधारा पूरे भारत में नही फैल सकी थी। इसकी एक वजह और थी कि गौतम बुद्ध के समकालीन दो सम्प्रदाय और तत्कालीन समाज के अंहिसा एवं कर्मकाण्ड के विरोध में लोगो को जागृत कर रहे थे। इसलिए शायद धार्मिक विचारों की प्रतिद्वंता होने की वजह से बुद्ध के जीवनकाल में उनकी षिक्षाओं का लाभ सभी भारतीयों का न मिल सका। परन्तु 544 ई.पू. में जब कुशीनारा में बुद्ध का देहान्त हुआ और उनके द्वारा अपना कोई उत्तराधिकारी घोषित न होने की वजह से बौद्ध संघ में बुद्ध की षिक्षाओं को लेकर आंतरिक झगड़े होने लगे, परन्तु यह झगड़े केवल मात्र वैचारिक थे। बुद्ध के विचारों एवं षिक्षाओं की विवेचना हर स्थान पर अलग-अलग होने लगी, क्योंकि बुद्ध की षिक्षाओं को लिपिबद्ध नही किया गया था। वह केवल स्मृति के आधार पर ही एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरित हुई। इसलिए शायद संघ का मुखिया नही होने की वजह से बुद्ध के विचारोें में उनके निर्वाण के बाद विचारों में कुछ मिलावट होना स्वाभाविक था और स्थानीय बुद्ध अनुयायीयों ने भी उन्ही विचारों को स्वीकार कर लिया, जिन्हे बौद्ध आचार्यो एवं भिक्षुओं के द्वारा दी जा रही थी।

मगध सम्राट् बिम्बसार, जिसकी राजधानी मगध थी, यह शायद बुद्ध से 20-25 वर्ष उम्र में बड़ा था और यह वैदिक धर्म का अनुयायी था। कर्मकाण्ड़, अंधविष्वास को मानने वाला था, परन्तु जब गौतम बुद्ध की षिक्षाओं एवं उनके उपदेषों के बारे में बिम्बसार ने सुना तब बिम्बसार ने गौतम बुद्ध को राजगृह में आमंत्रित किया और उनकी आगवानी कर उपवन में ठहरा दिया। वह, बुद्ध की विचारधारा एवं उपदेशों से इतना प्रभावित हुआ कि उसने अपना पूर्व धर्म छोड़कर अंहिसावादी, परोपकारी, मानवतावादी एवं दयावान बौद्ध धर्म को स्वीकार कर बुद्ध के चरणों में अपना मुकुट को रख दिया। यह बुद्ध की विचारधारा का ही परिणाम था कि उसने बुद्ध के संघ में षामिल होकर अपने राज में राजकीय घोषणा कर बौद्ध धर्म को ‘राजधर्म’ घोषित कर दिया था। बुद्ध का मानना था कि मानसिक नियंत्रण, शारीरिक एवं बाहरी नियंत्रण से अधिक प्रभावषील होता है, इसलिए बुद्ध ने कभी-भी कठोर नियमों में छूट देने का भी विचार रखा हुआ था।

बुद्ध के बहुत से अनुयायी एवं उपासक बुद्ध संघ में आने से पहले विभिन्न दर्षानिक सम्प्रदायों एवं धर्म को मानने वाले थे, जैसे वैदिक धर्म, जैन धर्म, आजीवक आदि। यह सभी बुद्ध की विचारधारा से प्रभावित होकर संघ में शामिल हुये थे। इनमें कुछ ऐसे उपासक भी थे, जो ‘‘राजकीय सुविधाओं’’ के लालच में आकर स्वार्थवष संघ में षामिल हो गये थे। इसलिए यह बुद्ध सम्प्रदाय के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित नही हो सके। इसका जीता जागत एक उदाहरण बौद्ध साहित्य में मिलता है कि गौतम बुद्ध के निर्वाण के कुछ ही दिन बाद ‘सुभद्र’ नामक भिक्षु ने अन्य भिक्षु से कहां कि - ‘‘अच्छा हुआ कि बुद्ध मर गये, हम लोग उनके चगुल से छूट गये। अब हम स्वतंत्रता के साथ जो चाहेगे सो कर सकेगे।’’ ऐसे कई बौद्ध भिक्षु जिनका आचरण विनयशील नही था, बौद्ध धर्म में फैली अव्यवस्था को दूर करने के लिए बौद्ध आचार्यो ने संगितियों अर्थात सभाओं को आयोजन किया, जिनको हम बौद्ध संगति कहते है। संगति एवं सभाओं का आयोजन इसलिए किया कि बुद्ध के विचारों एवं षिक्षाओं को लिपिबद्ध किया जा सके तथा इन षिक्षाओं को केवल भारत की सीमाओं तक ही बांध कर न रखा जा सके, बल्कि यह विदेषों में भी पहुॅचे, जिससें की बुद्ध की षिक्षाओं को अपनाकर वहां के लोग भी मानसिक शांति एवं अंहिसा के मार्ग अपनाकर देष और समाज का विकास कर सके।


प्रथम बौद्ध सभा:-

सम्राट् बिम्बसार का पुत्र आजातषत्रु जो अपने पिता को उनके जीवनकाल में ही बंधक बनाकर राज पर कब्जा कर लिया था, परन्तु बुद्ध की षिक्षाऐं एवं उनके उपदेषों को मानकर उसने अपने पिता को बंधन से मुक्त कर बौद्ध धर्म को स्वीकार कर राजकीय सुविधाऐं बौद्ध अनुयायीयों एवं भिक्षुओं को वैसे ही देने लगा जैसे कि बिम्बसार दिया करता था एवं अपनी बहन पदमावती का भी सम्मान करने लगा। यह बुद्ध की षिक्षाओं एवं उनके ज्ञान से इतना प्रभावित था कि उसने अपने राज में बुद्ध की षिक्षाओं को लिपिबद्ध करने एवं परस्पर बौद्ध आचार्यो के मतभेदों को दूर करने के लिए आजातषत्रु ने बुद्ध की मृत्यु के पश्चात् राजगृह के पास ‘सप्तपर्णि गुहा’ में हुई थी। इस सभा में 500 बौद्ध आचार्य एकत्रित हुये थे और इनका प्रधान ‘महाकश्यप’ ब्राह्मण था, जो वैदिक कर्मकाण्डों को छोड़कर बुद्ध का उपासक हो गया था। यह बुद्ध से बहुत अधिक स्नेह रखता था एवं उनका उपासक था। बुद्ध की षिक्षाओं को सम्पूर्ण भारत में प्रचारित करने के लिए महाकष्यप ने ही सम्राट् आजातषत्रु को बौद्ध सभा आयोजित करने के लिए प्रेरित किया था। इस सभा में सभी जातियों के उपासकों को आमंत्रित किया था, जो बुद्ध के जीवनकाल में उनके साथ कदम-कदम पर एक साये की तरह रहे। महाकष्यप की अध्यक्षता में यह अधिवेशन लगभग 07 माह से अधिक समय तक चलता रहा। इस सभा में बुद्ध का प्रिय षिष्य उपाली भी शामिल था, जो जाति से शुद्र नाई था। उपाली और आनंद की सहायता से ही विनय पिटक एवं अधिधम्म पिटक की रचना की, जिसमें बुद्ध के उपदेशों का संग्रह किया गया था। विनय पिटक उपाली में संघ के नियमों के लिए बनाई थी एवं आनंद ने अधिधम्म पिटक बौद्ध धर्म की षिक्षाओं से संबंधित था। इस प्रकार इस सभा में बुद्ध के उपदेशों का संग्रह किया, इसलिए इसको प्रथम बौद्ध संगति अथवा सभा कहां जाता है। आजातषत्रु एवं महाकष्यप ने बुद्ध के निर्वाण के बाद पहली बार संघ का संचालन करने के लिए नियमों की रचना की एवं बुद्ध की षिक्षाओं में किसी भी प्रकार की मिलावट न हो, इसलिए उनके प्रिय षिष्य आनंद ने, जो गौतम बुद्ध के अंतिम समय तक उनके साथ रहे, उनकी षिक्षाओं को लिपिबद्ध किया। इस आजातषत्रु के सभा कराने के पश्चात् कई राजा-महाराजा वैदिक धर्म को त्याग कर बौद्ध के उपासक हो गये।


द्वितीय बौद्ध सभा:-

इस सभा का आयोजन प्रथम बौद्ध संगति के लगभग 100 वर्षो के बाद हुआ था, जिसे द्वितीय बौद्ध संगती अथवा सभा कहते है। इसका संयोजक स्थविर ‘‘यश’’ था और यह सभा 08 माह तक चलती रही। इस सभा का स्थान वैशाली गणराज्य था। इस संगति का मुख्य उद्देश्य केवल वैशाली के बौद्ध भिक्षुओं में उठे विवादों को दूर करने के लिए था, इसलिए बौद्ध आचार्यो के द्वारा यह सभा बुलाई गई थी। वैषाली के भिक्षुओं में धार्मिक विवाद, दर्षानिक सिद्धांतों के विषय में नही था बल्कि यह बुद्ध संघ के नियमों के संबंध में था। क्योंकि बुद्ध के निर्वाण के बाद वैषाली के भिक्षुओं में उनकी नियमों को लेकर बहुत बड़ा विवाद छिड़ गया था। थेर लोगा का आरोप था कि वैशाली के बौद्ध भिक्षु बुद्ध की विचारधाराओं एवं नियमों का उल्लघंन कर रहे है। ऐसा आरोप थेरो का था। थेर कहते थे कि वैशाली के भिक्षु खाद्य सामग्री जानवरों के सींग में एकत्रित कर रहे है, जिसमंे नमक भी शामिल है, वह एक से अधिक बार भोजन करते है, एक ही दिन में दूसरे गांव जाकर भोजन करते है, पन्द्रह दिन तक एक ही स्थान पर ठहरते है, नियम विरूद्ध कार्य करने के बाद उसकी अनुमति लेते है, भोजन के बाद लस्सी पीते है, यही नही मादक द्वव्यों का सेवन करते है और उपासकों से सोना, चाॅदी भी उपहार के रूप में ग्रहण कर लेते है, इसके आलावा इनमें कुछ सैद्धांतिक मतभेद थे। वैशाली के भिक्षु कहते थे कि गुरू के बिना कोई व्यक्ति अर्हत अर्थात भिक्षु नही बन सकता है, अर्हत पूर्ण नही है, वह अज्ञान में पाप कर सकता है, गुरू के बिना उसे सिद्धांतों में संदेह भी हो सकता है, ऐसे ही विवादों को दूर करने के लिए इस संगति का आयोजन किया गया था। इसमें 700 भिक्षु आचार्य शामिल हुये थे और इस सभा में यह निर्णय लिया गया कि वैशाली के भिक्षुओं को संघ से बहार निकाल दिया जाये और यही हुआ। ‘‘बुद्ध के 10 थेर थे, यह सब एक-एक अपने-अपने विषय में विद्वान होकर महारत् हासिल किये हुये थे, इसलिए थेरों के द्वारा वैषाली के भिक्षुओं का विरोध किया जा रहा था।’’

वैशाली के भिक्षुओं को बाहर निकालने के बाद इसका परिणाम यह निकला कि इन्होने सभा के निर्णय को मानने से इंकार कर दिया और पृथक से अपनी सभा स्थापित कर ली। इनकी संख्या भी बहुत अधिक थी, इनमें अर्हत और अर्हतभिन्न दोनों प्रकार के लोग सम्मिलित हुये थे। इनकी संख्या अधिक होने के वजह से ही महासंघिक नाम दिया गया, परन्तु बुद्ध संघ में किसी प्रकार का विभाजन नही हुआ था।


तृतीय संगति अथवा सभा:-

इस सभा का आयोजन भगवान बुद्ध के निर्वाण केे 236 वर्षो के बाद सम्राट् अशोक के द्वारा किया गया और यह 9 माह तक निरंतर चलती रही। इस सभा का आयोजनकर्ता मोद्रलिपुत्र तिष्य के द्वारा किया गया था, जिसके प्रभाव में आकर अशोक ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया था। जब अशोक ने बौद्ध धर्म को स्वीकार किया, उस समय भारत में बौद्ध धर्म का प्रभाव अधिक नही था। अषोक ने ही सांची में मोद्लीपुत्र की अस्थियों को कलष में रख कर स्तूप का निर्माण करवाया था। मोद्लिपुत्र तिष्य के ही आदेष से सम्राट् अषोक ने अपने पुत्र महेन्द्र एवं संघमित्रा को बौद्ध धर्म के प्रचार करने के लिए श्रीलंका भेजा था। यह मोंद्रलिपुत्र का ही प्रभाव था कि अशोक ने इसे इतना प्रबल, प्रोत्साहन दिया, कि उसके जीवनकाल में ही बुद्ध की शिक्षा केवल भारत में ही नही बल्कि विदेशों में भी फैलने लगी। तिष्य के निमत्रंण पर एक हजार भिक्षु आचार्य ‘अशोकाराम’ में एकत्रित हुये। इनकी उपस्थिती में ‘त्रिपिटक गं्रथ’ का संकलन किया गया था और बौद्धों के विवादों को दूर करने के लिए मोद्रलिपुत्र तिष्य में कथावत्थु की रचना की थी। यही से विदेशों में प्रचार करने के लिए 09 प्रचारक मण्डल तैयार किये गये, जिनका उल्लेख दीपवंश और महावंश में किया गया। अषोक के शासनकाल में बौद्ध धर्म एवं महात्मा बुद्ध की विचारधारा सात समुद्र पार दीन-दुखियों के कल्याण के लिए पहुॅची। अषोक के पहले ऐसा कोई भी शासक नही था, जिसने बुद्ध संदेष को विदेषों में पहुॅचाने में सफल रहा। अषोक ने केवल बौद्ध आचार्यो एवं बौद्ध भिक्षुओं को राज शासन से आर्थिक मदद देकर भेजा था। बल्कि उसने अपनी माता, भाई, यहां तक की अपने पुत्र एवं पुत्री महेन्द्र, संघमित्रा को श्रीलंका भेजकर बुद्ध की विचारधारा को भेजने में सफल रहा, इसलिए सम्राट् अषोक धर्म प्रचार की नीति अपनाकर लोगों के दिल, डर एवं भय से नही बल्कि बुद्ध की समानता एवं दयालुता की नीति अपनाकर जीतना चाहता था और वह इसमें सफल हुआ। अषोक के प्रचारक मण्डलों में अपने मिषन में आषा से अधिक सफलता प्राप्त की और इसी का परिणाम है कि चीन, जापान, कोरिया, तिब्बत, भूटान, मलेषिया, श्रीलंका, सीरिया, युनान, मिश्र जैसे आदि बड़े देषों में बुद्ध की विचारधारा का परचम फहराया, जिसकी पुष्टि अषोक के तेरहवी षिलालेख से होती है।

यूनान पर बौद्ध धर्म का बहुत अधिक गहरा प्रभाव था। सम्राट् अषोक के 250 वर्षो के बाद इसी यूनान प्रदेष में ईसा से जन्म लिया था। इनकी षिक्षाओं पर बौद्ध विचारधारा का प्रभाव देखा जा सकता है। इनकी पूजा, गाथाऐं, विहार एवं उपासना की विधियो में काफी समानता दिखाई देती है। तिब्बत के विहारों को देखकर यूरोप के निवासी यह समझ बैठे कि यह रोमन कैथालिक चर्च है, जबकि यह बौद्ध विहार थे। मिश्र के लोग भी भारतीय थेरों की जीवनषैली से बहतु अधिक प्रभावित थे। अषोक के द्वारा यूनानीयों कई बौद्ध चिकित्सक भी भेजे गये थे। यहां तक की भारतीय व्यापारियों ने यह पर अपनी बस्तीयां बसा ली थी और व्यापार करने लगे थे। आदि प्राचीन ईसाई लेखकों का यह तक कहना है कि सिकन्दरिया में भारतीयों के कई सम्प्रदाय दिखाई देते थे। यही वजह थी कि मिश्र का शासक टाल्मी भी भारतीय ग्रंथों का अनुवाद करवा रहा था। यह सब पुष्टि यूनानी जगत के प्रमाणों के द्वारा होती है। अषोक के प्रचार मण्डलों का जो प्रभाव तत्कालीन समय में था वह आज भी देखा जा सकता है। अषोक बौद्ध धर्म और अपने भगवान गौतम के विचारों का प्रचार करते-करते 236 ई.पू. परलोकगामी हो गये, लेकिन उनके लोक कल्याणकारी कार्य आज भी उनके षिलालंेखों, जो पाली भाषा में लिखे गये थे, यह सब सम्राट् अषोक को अमर करने के प्रमाण है।

गौतम बुद्ध जब अपनी विचारधारा को समाज के बीच फैला रहे थे, उस समय भी अन्य दो विचारधारा भी भारत वर्ष मे फलफूल रही थी। एक जैन धर्म, जो महावीर के द्वारा संचालित की जा रही थी, दूसरी आजीवक सम्प्रदाय था जिसके संस्थापक मखलिपुत्र गोसाल थे। परन्तु दोनों विचारधाराओं से अधिक बौद्ध विचारधारा लोगों में अधिक स्वीकार की जाकर अपनाई जा रही थी। क्योंकि यह जैन एवं आजीवक विचारधारा से अधिक सरल और सहज थी। गौतम बुद्ध कभी-भी अपनी विरोधी विचारधारा के व्यक्तियों का सम्मान किया करते थे, उन्होने कभी-भी कटाक्ष नही किया। इसके विपरित जैन उपासक एवं आजीवकों के बीच में गाली-गलौज भी हो जाया करती थी। विष्व के इतिहास में शायद बहुत कम ही ऐसे उपासक होगे, जिन्होने अपनी सुख-सुविधा, ऐषों-आराम को त्यागकर आजीवन अपने सगे-संबधीयों को छोड़कर सेवा, प्रेम, त्याग का संकल्प लेकर बुद्ध के आदेष का पालन कर घर त्याग दिया। यह हिमालय, पर्वत, नदिया, जंगल, समुद्र को छोटी-छोटी सी नाव के सहारे अपने जीवन को संकट में डालकर बुद्ध की विचारधारा को कई देषों में स्थापित किया। ऐसे अनुयायी ने ही बौद्ध को कई देषों में स्थापित कर दिया। इन अनुयायीयों ने बुद्ध की षिक्षा को जन-जन तक पहुचाया। जैसे अंधविष्वास, समाज में फैली कुरीतिया, यज्ञों में नर एवं पशु बलि, तांत्रिक क्रियाऐं एवं उस काल में शुद्र एवं आदिवासियों पर जो अत्याचार एवं दुराचार किये जा रहे थे, इन्होने यह सब समाज से मिटाने के लिए बुद्ध के विचारों को लोगों के बीच रखा, जिसका जन समर्थन न केवल शुद्र वर्ग से मिला बल्कि उस समय के महापण्ड़ित एवं विद्वानों ने भी बुद्ध की विचारधारा का समर्थन किया। यही वजह रही कि बुद्ध के प्रथम पाँच षिष्य ब्रहाम्ण वर्ण से थे। महान वैदिक विद्वान महाकष्यप ने भी बुद्ध का उपासक बन कर बुद्ध की विचारधारा को आगे बढ़ाया। बुद्ध ने पहली बार भारतीय समाज को यह बताया कि कोई जन्म से नही बल्कि कर्म से महान होता है। इस विचारधारा ने सामाजिक क्रांति में भूचाल ला दिया। बुद्ध की उदारवादी एवं अहिंसावादी विचारधारा को आज भी उतनी ही प्रसांगिक है, जितनी आज से सैकड़ो वर्ष पूर्व थी।


चतुर्थ संगती अथवा सभा:-

चैथी बौद्ध संगती द्वितीय अषोक कहलाने वाले सम्राट् कनिष्क ने श्रीनगर के समीप कुण्डलवन में आयोजित की थी। यह बौद्ध आचार्य वासुमित्र एवं उपसभापति अष्वघोष के नेतृव्य में हुई थी। कनिष्क की राजधानी पेषावर थी और यह पहला विदेषी शासक था, जिसने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए सभा का आयोजन किया था। इसके द्वारा बुद्ध की कई मूर्तिया स्थापित की गई, जो गंधार शैली में है। कनिष्क ने पेषावर में तेरह मंजिला स्तूप का निर्माण करवाया था, जो लगभग 09-10 वी. शताब्दी तक अस्तित्व में था इसकी उँचाई लगभग 100 फीट थी। इस सभा में लगभग 500 बौद्ध आचार्य शामिल हुये और यह सभी हीनयान सम्प्रदाय को मानने वाले थे, जो बौद्ध षिक्षाओं की विचारधारा पर आधारित थे। कनिष्क एवं हषवर्धन के शासन काल के बाद बौद्ध धर्म का प्रभाव कम होने लगा, क्योंकि बौद्ध धर्म को राज आश्रय देने वाले शासकों में कमी आने लगी। वही बौद्ध धर्म के प्रचारक एवं आचार्य भिक्षु विदेषों में जाकर धर्म प्रचार करने लगे एवं वहां के शासकों को बौद्ध धर्म का उपासक बनाया, इसलिए यह अपने देष में ही बौद्ध धर्म की रक्षा न कर सके। क्योंकि बौद्ध धर्म की विचारधारा को प्रचारित करने वाले उपासकों में भी कमी एवं षिथिलता आने लगी एवं अंहिसा, समानता की धर्म नीति से तंग आकर कई ब्राह्मण एवं राजपूत शासकों ने बौद्ध धर्म के विरूद्ध क्रांति खड़ी कर दी। इसी समय मुस्लिम शासकों के आक्रमण की वजह से बुद्ध उपासक, आचार्य मारे गये, बौद्ध विहारो को तोड़कर अन्य स्थल बनाये जाने लगे, जो विचारधारा विष्व के एक तिहाई भाग में फैली हुई है, वही बौद्ध संस्कृति आज अपने ही देष में लुप्त हो गई है। परन्तु जैसे-जैसे समाज षिक्षित होगा, बुद्ध की अहिंसावादी एवं मानवतावादी, भेद-भाव रहीत विचारधारा एक दिन पुनः भारत में स्थापित होगी।


संतोष कुमार लड़िया

एम.ए. प्राचीन इतिहास

सागर विश्वविद्यालय

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