भारत की कहानी, अरबों की जुबानी लेख अंक-03


भारत का वैभव एवं व्यापार, पर्यटन

भारत के पश्चिमी भाग के ठीक सामने अरब बसते है और इनके देश अरब को तीन ओर से समुद्र ने घेर रखा है, यह प्रकृति की अरबवासियों को सबसे बड़ी सौगत एवं उपहार है। परन्तु इस देश के निवासियों के सामने उनके हिसाब से उतना उत्पादन नही होता था अर्थात उपज नही होती थी, जितनी की उनको उनकी जनसंख्या के हिसाब से आवश्यकता होती थी। इसलिए अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए यह के निवासी अधिकतर स्वाभाविक रूप से अपने पड़ौसी देशों पर ही निर्भर रहा करते थे। इसलिए यह के व्यापारी इराक, मिस्त्र , अफ्रीका , भारत और ईरान देशों से व्यापारिक संबंध स्थापित करने के लिए उत्सुक हुआ करते थे। परन्तु यह विशेषतौर पर भारत से संबंध बनाने के लिए विशेष दल भारत की रियासतों एवं राज दरबारों में भेजा करते थे। मुख्य रूप से अरब लोग भारत के उन रियासतों से ज्यादा संबंध स्थापित रखते थे, जो समुद्री तटों से लगी हुई थी और यह भारत के समुद्री तटों से जहांज में उत्पाद लादकर यह जहांज चलकर यमन के बंदरगाहों पर पहुँचते थे और इस बन्दरगाह से लादे गये उत्पाद ऊटों के माध्यम से जमीन के रास्ते लोहित सागर के किनारे-किनारे मिस्त्रऔर शाम (उज़्बेकिस्तान, कज़ाकिस्तान आदि) जाता था और इन स्थानों से यह उत्पाद, यहाँ अरब व्यापारी लाभ कमाने के लिये यूरोप भी भेजते थे। इसका उल्लेख पुस्तक ‘‘तौरात या तौरेत’’ में भी किया गया है।

हजरत इब्राहीम के दो ही पीढ़ि बाद हजरत यूसुफ के काल में अरब व्यापारी दल को भी इसी मार्ग से जाते हुये पाया और यह वही व्यापारी दल है जो अरबों के कारोबार में लगा हुआ था। इसी दल ने हजरत यूसुफ को मिस्त्र पहुचाया करता था और इस मार्ग का उल्लेख यूनानी इतिहास के लेखकों ने भी किया है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि पैगम्बर हजरत यूसुफ के समय से लेकर मार्की पोलो और वास्को डि गामा के समय तक भारत के व्यापार पर अरबों का एकाधिकार था; क्योंकि वास्को डि गामा 1498 ई.वी. में पुर्तगाल देश से आया था। भारत से व्यापारिक संबंध स्थापित होने की वजह से ही अरब व्यापारी धनवान होते जा रहे थे और उनके बाजारों की रौनक केवल इसलिए बड़ रही थी; क्योकि इनकी दुकानों में भारत का उत्पाद भरा हुआ था। इस संबंध में इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका में ‘‘अरब’’ नामक निबन्ध का लेखक लिखता है-

‘‘उस दिनों दक्षिण-पश्चिमी अरब (हजरमौत और यमन) के सम्पन्न होने का सब से बड़ा कारण यह था कि मिस्त्र और भारत के बीच का व्यापारिक द्रव्य पहले समुद्र के मार्ग से यहाँ आता था और फिर स्थल के मार्ग से पश्चिमी समुद्र-तट पर जाता था। उस समय यह व्यापार बन्द हो गया, क्योंकि मिस्त्र के बतलीमूसी बादशाहों ने भारत से इसकन्दरिया तक एक सीधा मार्ग बना लिया था।’’ इस संबंध में यूनानी इतिहासकार आगा थरशीदस लिखता है कि महात्मा मसीह से दो शताब्दी पहले भारत के जहाज समुद्री तट से यमन (सबा) आते है और वह से मिस्त्र पहुँचते है। इसी प्रकार आर्टीमिडोरस, जो ईसा से 100 वर्ष पहले हुआ था वहाँ कहता है कि-

‘‘यमन देश (सबा की जाति) लोग आस पास के लोगों से व्यापार की वस्तुएँ मोल लेते हैं और अपने पड़ोसियों को बेचते है; और इसी प्रकार हाथों हाथ वे वस्तुएँ शाम और टापू तक पहुँच जाती है।’’ और यह आसपास के कोई लोग और कोई नही भारत के निवासी थे। भारत और अरब का दूसरा व्यापारिक रास्ता, जो फारस की खाड़ी ( ईरान) में से होकर जाता था और यह सदा खुला रहता था और समुद्री तटों पर रहने वाले पारसी और अरब व्यापारी जल और जमीन के रास्ते सदा अपनी वस्तुएँं लाते ले जाते रहे। यह भारत के समुद्री तटों के सभी व्यापारिक केन्द्र और भारतीय महासागर के एक-एक समुद्री टापूओं को देखते हुये बंगाल और असम होकर भारत के भू-भागों से निकलकर चीन आया जाया करते थे और इस मार्ग का महत्व आज भी है और इसी मार्ग की वजह से ही इतिहास में बहुत बड़े परिवर्तन हुये। यह मार्ग एक समय केवल मात्र अरबों के हाथों में था। ईसा से 300 वर्ष पूर्व जब यूनानीयों ने मिस़्त्र पर अधिकार किया, तब इस समुद्री मार्ग पर यूनानियों का भी अधिकार हो गया और ईसा के 600 वर्ष बाद जब इस्लाम धर्म चला और अरबों की उत्पति हुई, तब छटी शताब्दी ई.वी. में यूनानी लोग मिस़्त्र से लेकर स्पेन तक अपना एकाधिकार कर लिया। इसका परिणाम यह हुआ कि इस मार्ग पर अरब व्यापारीयों की पकड़ कम हो गई। 14 वी. ई.वी. शताब्दी में यूरोप की ईसाई जातियों ने रूमी प्रदेशों से अरबो को निकालने का पूरा प्रयत्न किया, जैसे भारत में आज विदेशियों को निकालने का किया जा रहा है। पर ठीक समय वे लोग स्पेन और उतरी अफ्रीका में सफल रहे थे और रास्ते साफ कर रहे थे, उसी दौरान एशियाई कोचक से तुर्को ने सिर निकाला और फिर रूम सागर का यह मार्ग मुसलमानों के हाथ में रह गया। इसलिए यूरोप की जातियों को भारत पहुचने के लिए दूसरा मार्ग ढूंढने के लिए विवश कर दिया।

यूरोप वासियों ने नया मार्ग उत्तरी अफ्रीका और रूम सागर को छोड़कर दक्षिण अफ्रीका के रास्तों से हिन्दुस्तान का पता लगाने के लिए समुद्री यात्राऐं करने लगे और यह मार्ग में सबसे पहले डच, पुर्तगाली ही थे, लेकिन बाद में अंग्रेज और फ्रांसिसि भी मिल गये। यह मार्ग इसलिए खोजा जा रहा था क्योंकि भारत के व्यापार पर केवल अरब नागरिकों एवं व्यापारियों का एकाधिकार था। अब यह यूरोपवासी इन अरब व्यापारियों से लड़कर भारत के व्यापार पर अपना एकाधिकार करना चाहते थे और इस छिना छपटी मेें भारत के समुद्री तटों एवं समुद्री के पास बसी हुई रियासतों पर पश्चिम वाले और पूरब वालों दोनों के बीच में एक बड़ी समुद्री लड़ाईयां होने लगी और इसमें पूरब वालों की हार हुई। इस लड़ाई में मिस्त्र , अरबी, दक्षिण के विभिन्न हिन्दू राजा और मुसलमान राज्यों के जहाजों के बेडे एक साथ मिलकर यूरोप की समुद्री यात्रा करने वाली जातियों से संघर्ष होने लगा। इस हार का परिणाम हुआ कि भारत के समुद्री टापूओं पर यूरोप वालों का कब्जा हो गया। मद्रास में बसे हुये अरब व्यापारियों के जहाजोें को पूरी तरह नष्ट कर दिया गया। मद्रास के अरब व्यापारियों को ‘मोपला’ कहते थे, जो उस समय भारत में स्थापित टापूओं के मालिक थे।

उबला बन्दरगाहः-

सन् 14 हिजरी में इराक पर अरबों का अधिकार होने से पहले ईरानीयों के समय में भारत के लिये फारस की खाड़ी का सबसे बड़ा और प्रसिद्ध बन्दरगाह उबला ही था और यह बसरे के पास था। भारत और उबला बन्दरगाह के बीच इतना अधिक आवागमन था कि अरब के लोगों को यह भ्रम था कि उबला बन्दरगाह भारत का ही हिस्सा है अर्थात फारस में बसा हुआ उबला बन्दरगाह को वह भारत का ही मानते थे। इस बन्दरगाह की एक विशेषता यह थी कि चीन और भारत से आने वाले यही पर ठहरते थे और यही से ही चलते थे। भारत के व्यापार और उसकी उपज का अरबवासियों की दृष्टि में कितना अधिक महत्व था इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि ‘‘ एक बार हजरत उमर ने एक अरब यात्री से पूछा था कि भारत के संबंध में तुम्हारी क्या राय है ? इतना सुनकर यात्री ने तीन संक्ष्प्ति वाक्य बोलकर एक र्मािर्मक उतर दिया और इससे अधिक कोई हो नही सकता। वह कहता है कि- ‘‘भारत की नदियाँ मोती है, पर्वत लाल है और भारत के वृक्ष (वन) इत्र है।’’ इराक को जीतने के बाद हजरत उमर को चिन्ता हुई कि इराक का यह बन्दरगाह अरबों के हाथो में आ जायेगा, इसलिए सन् 14 हिजरी में उमर ने उबला बन्दरगाह पर अधिकार करने की आज्ञा दी। और लिखा कि -‘‘ इसको मुसलमानों का व्यापारिक नगर बना दिया जाय।’’ उस समय से लेकर सन् 256 हिजरी तक यह बन्दरगाह बना रहा। जंगियों की लड़ाई मेें सन् 256 हि. में यह नष्ट हो गया। इराक का दूसरा प्रसिद्ध बन्दरगाह अरबों ने सन् 14 हिजरी में बसरे के नाम से बनाया था; पर उबला की व्यापारिक मर्यादा को हजरत उमर नष्ट नही कर सका और यह हुआ कि बसरे व्यापारिक केन्द्र होने के बदले अरबों को सैनिक और राजनैतिक केन्द्र अधिक हो गया। हिजरी पहली शताब्दी के अन्त मे सिन्ध प्रांत अरबों का अधिकार हो जाने के कारण यह भारत आने जाने का केन्द्र बन गया। इसका परिणाम यह हुआ कि बगदाद के खलीफा की आय बहुत अधिक बड़ गई। जैसा कि सन् 306 हिजरी में मुकतदिरबिल्लाह के समय में वहाँ की वार्षिक आय 22575 दीनार रह गई थी।

सैराफ बन्दरगाह:-

सैराफ बन्दरगाह का महत्व भी उबला बन्दरगाह से कम नही था। भारत आने-जाने के लिये फारस की खाड़ी का सबसे बड़ा बन्दरगाह सैराफ ही था और यह बसरे से सात दिन बाद ईरान की सीमा पर पहुँचता था। यहां भी बड़े-बड़े समुद्री जहाजों से भारत के रास्ते अरब व्यापारी चीन जाया करते थे और चीन से आने वाले जहाज भी सैराफ बन्दरगाह पर ठहरते थे। जैसा की 3 हिजरी शताब्दी में इस बन्दरगाह के संबंध में अबूजैद लिखता है कि ‘‘ यह फारस का बहुत बड़ा बन्दरगाह है और बहुत बड़ा नगर भी है। जहाँ तक निगाह काम करती है, केवल इमारतें ही इमारतें दिखलाई पड़ती है। यहाँ खेती नही होती, बल्कि सब चीजें समुद्र के मार्ग से बाहर से आती है।’’

भारत के बन्दरगाह:-

भारत के बन्दरगाहों के नाम हिजरी पहली शताब्दी से स्पष्ट रूप से मिलने लगते है और यह तीसरी शताब्दी तक बन्दरगाहों का विस्तार और अधिक हो चुका था। अरब नागरिक और व्यापारियों के लिये फारस की खाड़ी के बाद, सबसे पहले अखण्ड़ भारत का भू-भाग रहा वलोचिस्तान में ‘‘तेज’’ नामक बन्दरगाह एवं सिन्ध में ‘‘देवल’’ बन्दरगाह उत्तरी भारत में सबसे अधिक प्रसिद्ध था और दक्षिण भारत में थाना, खम्बात, सौपारा, जैमूर, मद्रास, कोलंबमली, मालाबार, कन्याकुमारी आदि व्यापारिक केन्द्र एवं बन्दरगाह थे। अरबी भूगोलों, इतिहास में इन्ही बन्दरगाह का उल्लेख किया गया है। जैसा कि इब्न हौकल दसवी ईसवी शताब्दी में लिखता है कि ‘‘सिन्ध के बन्दरगाह व्यापार की बहुत बड़ी मंडी है और यह अनेक प्रकार के व्यापारी आते है।’’ तीसरी शताब्दी के प्रारम्भ में इब्न खुर्दाजबा लिखता है कि- ‘‘जद्दा के बाजारों में भारत के सिन्ध, जंजीबार, हब्श और फारस की वस्तुऐं ही मिलती है।’’

मिस्त्र , शाम, इराक, ईरान, रूम सागर, लाल सागर और भारतीय महासागरों पर अरब नागरिक एवं व्यापारियों का अधिकार हो जाने के बाद भी पश्चिम का व्यापार एवं व्यापारियों का आना-जाना पूर्णतः बंद नही हुआ था, लेकिन यह सही है कि मुसलमान व्यापारी यूरोप नही जाते थे और वह भी इन देशों में नही आते थे। परन्तु अरब नागरिकों एवं यूरोप वालों के बीच में एक जाति ऐसी थी जो दोनों के बीच में मध्यस्थता बनाने का काम करती थी। इसको हम यहूदियों के नाम से परिचित है, जो वर्तमान मे इजरायल नामक देश में सबसे अधिक पाई जाती है। मुसलमान ओैर ईसाई व्यापारियों का मिलने का एक मात्र केन्द्र तराबजन्द्र नामक नगर था। परन्तु यहूदी व्यापारी बहुत आसानी और सरलता से इस्लामी और ईसाई दोनों के नगरों में व्यापार किया करते थे। जैसा कि इब्न खुर्दाजबा लिखता है कि - ‘‘ ये लोग अरबी, फारसी, लैटिन, फिरंगी, स्पेनी और स्लव भाषाएँ बोलते हैं। ये पूरब से पश्चिम और पश्चिम से पूरब जल और स्थल में दौड़ते फिरते हैं। ये दासियाँ, दास, दीबा (बहुत बढ़िया रेशमी कपड़े), समूर, पोस्तीन और तलवार बेचते है। ये फिरंगिस्तान से सवार होकर रूम सागर के मिश्रवाले तट पर आते है। वहाँ स्थल पर उतरकर व्यापार की सामग्री पशुओं की पीठ पर लादकर लाल सागर लाते हैं। वहाँ से फिर जहाज पर बैठकर जद्दा आते हैं। और वहाँ से सिन्ध, भारत और चीन जाते हैं। वहाँ से फिर इसी मार्ग से लौट आते हैं। इनका दूसरा मार्ग यह है कि यूरोप से चलकर रूम सागर से निकलकर एन्टोकिया (शाम) आते हैं और फिर स्थलमार्ग से जाबिया (इराक) चले जाते हैं वहाँ से फिरात की नहर में सवार होकर बगदाद आते हैं। फिर जहाज पर बैठकर दजला के मार्ग से उबला पहुँचते हैं और वहाँ से उमान, सिन्ध, भारत और चीन चले जाते है।’’

भारतीय महासागरों में जहाजों का मेला लगा रहता था, इनमें व्यापारिक एवं सामरिक जहाजों के अतिरिक्त कुछ ऐसे जहाज भी थे, जिनमें अरब यात्री एवं अन्य देशों के लोग भारत भ्रमण एवं पर्याटन के लिये आया करते थे; क्योंकि यह भारत की सुन्दरता और उसकी संस्कृति से बहुत अधिक प्रभावित थे। जैसा कि अरब यात्री मसऊदी ने भारत के संबंध में लिखा है कि- ‘‘ हमारे यहाँ (कदाचित् बगदाद) की और भारत की ऋतुओं में अन्तर है। गर्मी के दिनों मं लोग हमारे यहाँ से भारत की सरदी बिताने के लिये वहाँ जाते हैं। जून के महीने में भारत की ओर कम जहाज जाते हैं; और जो जाते भी हैं, वे हल्के होते है और उनमें अधिक समान नहीं लादा जाता। उन जहाजों को तीरमाही (जूनवाले) जहाज कहते हैं।’’ परन्तु अबूजैद सैराफी लिखता है कि बरसात के दिनों में जहाजों का आना-जाना बन्द था, इसलिये भारतवासी इन दिनों में बैठकर केवल कृषि कार्य एवं कृषि उत्पादन किया करते थे। इन दिनों में किसी भी प्रकार का व्यवसाय नही किया जाता था और इस ऋतु में अपना जीवन यापन करने के लिये चावल का उत्पादन अधिक मात्रा में किया करते थे, जो उनका मुख्य भोजन था। सैराफी के कथन से यह स्पष्ट होता है कि मुख्यतः यह दक्षिण भारत के संबंध में लिखा है। वर्षाकाल में जहाज, इसलिए भी बन्द हो जाया करते थे; क्योेंकि समुद्री डाकूओं के द्वारा इन दिनों में अधिक लूटपाट की जाती थी, जिनको अरबवासी ‘‘बवारिज’’ कहाँ करते थे।

अरब व्यापारी भारत से मुख्यतः मसाले, इत्र, मोती, सुगंधीत द्रव्य तलवारे, जूते, हाथी दांत, लौंग, कपूर, जायफल, बक्कम, चंदन, कस्तूरी, नारियल, मखमली कपड़े, रेशमी कपड़े, काली मिर्च, बांस, बैत, आदि का मुख्यतः व्यापार किया करते थे। काला नमक, गैंडे के सिंग, विशेषकर चीन जाया करते थे और गैडों के सिंगों से छोटी-छोटी पेटीया बना करती थी , जिसमें यह लोग इत्र रखा करते थे। हिजरी 303 में ‘मसऊदी और बुशारी’ दोनों ने ही खम्बात अर्थात काठियावाड़ की यात्रा की, यहाँ पर इन्होने बनने वाले जूतों की प्रशंसा की, जो यहाँ से बनकर विदेशों में जाया करते थे इसके साथ-साथ थाना बंबई के प्रसिद्ध कपड़ों का भी उल्लेख किया है। यही नही सन् 331 हिजरी में भारत आने वाला मुसइर बिन मुहलहिल ने दक्षिण भारत की यात्रा की और यह कोलम (ट्रावनकोर, मद्रास) का वर्णन करते लिखता है कि -‘‘ यहीं वे मिट्टी के बर्तन ‘‘राजायर’’ बनते है जो हमारे देश में चीनी बर्तनों के नाम से बिकते है; पर वास्तव में वे चीन के नहीं होते; क्योंकि चीन मिट्टी कोलम की मिट्टी से कडी होती है और आग पर अधिक समय तक नही ठहर सकती। कोलम की मिट्टी का रंग मैला होता है और चीनी मिट्टी सफेद या और रंगों की होती है। यहाँ सागौन की लकड़ी इतनी लम्बी होती है कि कभी कभी सौ हाथ तक पहुँच जाती है। इसके सिवा बक्कम, बत और नेजे की लकड़ी भी वहाँ बहुत होती है। रेवन्दचीनी और तेजपत्ता भी होता है, जो दूसरे स्थानों में बहुत कम मिलता है और जो आँखों के रोगों में बहुम लाभदायक है। व्यापारी लोग ऊउ, कपूर और लोबान भी यहाँ से ले जाते है। भारत से अरब व्यापारी जहर भी लेकर जायो करते थे जिसे ‘‘बेश’’ कहा जाता था और विष का बिगड़ा हुआ रूप है जिसे हिन्दी में जहर भी कहते है। भारत की प्रशंसा करते हुये सन् 303 हिजरी में इब्नुल फकीह हमदानी (सन् 330 हिजरी) लिखता है- ‘‘ भारत और सिन्ध को ईश्वर ने यह विशेषता दी है कि वहाँ सब प्रकार के सुगन्धित द्रव्य, रत्न, जैसे लाल, हीरा आदि, गैंडा, हाथी, मोर, अगर, अम्बर, लौंग, सम्बुल, कुलंजन, दानचीनी, नारियल, हर्रे, तूतिया, बक्कम, बेद, चन्दन, सागौन की लकड़ी और काली मिर्च उत्पन्न होती है।’’

सन् 350 हिजरी में इब्न हौकल लिखता है कि सिन्ध और गुजरात की उपज और व्यापार की ख्याती कई देशों में थी, जैसा कि वह लिखता है मन्सूरा इसका पुराना नाम ब्राम्हणवाद था, यहाँ पर नींबू, आम, गन्ने की फसल गुणवत्तापूर्ण होती थी और सस्ती मिलती थी। आलोर- यह मुलतान के समान था। नगर के चारों पर परकोटा था, सिन्ध नदी के किनारे थे। यहाँ की फसल भी प्रसिद्ध थी। देवल सिन्ध नदी के पूरब समुदी के किनारे, यह बहुत बड़ी मंडी थी अनेक प्रकार के व्यापार होते थे, मुख्यतः अनाज का व्यापार यहाँ होता था और यह बस्ती केवल व्यापार के लिये प्रसिद्ध थी। काम्हल - यह बौद्ध और मेदियों का देश था यहाँ पर दो कूबड़ वाले ऊॅट होते थे और इन ऊॅटों की मांग ख्ुारासान और फारस में अधिक थी। जैमूर और खम्भायत (गुजरात और काठियावाड़)-

यहाँ से चावल और शहद अरब व्यापारी ले जाया करते थे। कलवान - यहाँ अनाज और पशुओं का व्यापार होता था। कनजपूर - मकरान का सबसे सबसे बड़ा नगर है, यहाँ गन्ने और छूआरे होते थे, जो यह से सारे संसार में जाते थे। कन्दाबील - यह भारत क अनाजों की सबसे बड़ी मंड़ी है। कन्नौज- मुल्तान के पास वाला बड़ा नगर था, चारों और परकोटा था, यह मांस की मंडी थी परन्तु यह गेहूॅ का व्यापार होता था।

हिन्दूस्तान के बुने कपड़ों में लिपटी मिस्त्र की ममीयां:-

यही नही मसऊदी ने भारत के बारिक कपड़ो की हमेशा प्रशंसा की थी और वहा लिखता है कि भारत में बहुत ही बारिक कपड़े बुने जाते है जिसकी गुणवत्ता अच्छी होती है। कहा जाता है कि मिस्त्र में जो ममी या पुराने मृत शरीर मिलते हैं, वे जिन कपड़ों में लपेटे हुए मिलते हैं, वे भारत के ही बने हुए हैं। खैर! यह जो अनुमान ही है ! पर ईसवी आठवी शताब्दी का अरब यात्री सुलैमान एक स्थान के संबंध में लिखता है -‘‘ यहाँ जैसे कपड़े बुने जाते हैं, वैसे और कहीं नहीं बुने जाते; और अतने बारीक होते हैं कि पूरा कपड़ा ( या थान) एक अंगूठी में आ जाता है। ये कपड़े सूती होते हैं और हमने ये कपड़े स्वयं भी देखे हैं।’’

अरबों में से मसऊदी ने भारत के पान की बहुत तारिफ की और यह तारिक आज से 1000 वर्ष पहले कहा था कि पान एक प्रकार का पत्ता है, जो भारत में उत्पन्न होता है और भारत के लोग इसको चूना और डली मिलाकर खाते है और इनके दांत अनार की तरह हो जाते है। पान खाने के बाद मुहॅ सुगन्धीत हो जाता है और भारत से ही यमन, हजाज और मक्के के लोग पान में डली मिलाकर खाने लगे। हिजरी तीसरी शताब्दी अर्थात नौवी शताब्दी सिन्ध के सोने के सिक्कों की मांग बहुत अधिक थी। मिश्र सें भारत में पन्ने की अंगूठी बनकर आया करती थी, जो बड़ी सुन्दर डिब्बीयों में रखी होती थी। मूंगा एक साधारण पत्थर है जिसको दहंज भी कहां जाता है और इसकी मांग भारत में इसलिए थी, क्योंिक भारत के लोग इसे धार्मिक श्रद्धा से देखते थे। यही नही समूर और पोस्तीन तथा तलवारे भी विदेषों से राजा-महाराजा मगाया करते थे। भारत में खजूर बसरे से आया करता था और यह सिन्ध के देवल बन्दरगाह पर एकत्रित होते थे। भारत के शासको में अरबी घोड़ों की बहुत अधिक मांग थी, इसलिए अरब से जहांजों में भरकर घोड़े लाया करते थे। विषेषकर कोरोमण्ड़ल मे अरबी घोड़ों की बहुत अधिक मांग थी। भारत में फारस में बनने वाला गुलाब जल की बहुत अधिक मांग थी।

भारत के जल एवं जमीन सब प्रकार के बाहरी व्यापार के संबंध में कई भी भारतीयों के नाम का उल्लेख नही आता है और न ही जहांज चलाने वालों में से, यूनानीयों से लेकर अरबों तक के इतिहास में सब जगह भारत के समुद्री व्यापारीयों के रूप में यूनानीयों, रूमियों और अरबों का नाम ही आता है। यहा तक की मार्को पोलों ने अपने यात्री विवरण में केवल अरबों का ही नाम है, इसी प्रकार एल्फिन्स्टन साहब ने भी अपने विचार प्रकट करते लिखा है कि- ‘‘ सिन्धु और गंगा नदी में नावों और डोगियों पर और समुद्र के किनारे एक बन्दरगाह से दूसरे बन्दरगाह तक जाने के सिवा हिन्दुओं ने समुद्र को पार करने का कभी साहस नही किया। यहाँ तक कि सिकन्दर के समय में भी सिन्ध में यूनानियों को न तो जहाज मिले और न जहाज चलानेवाले। छोटी-छोटी डोंगियों और नावों पर मछुए अवष्य उनको मिलते रहे। हाँ, कोरोमंडल के लोग अवष्य जावा टापू में जाने का साहस कर सके। स्वयं यूनानी लेखक एरियन सिकन्दर के प्रकरण में लिखता है- ‘‘भारत में उसको अपने जहाज स्वयं बनवाने पड़े।’’ पर साथ ही वह यह भी लिखता है -‘‘हिन्दुओं की चैथी जाति में वे लोग है जो जहाज बनाते हैं, चलाते है या खेते है। मल्लाह ऐसे है जो नदियों को पार कर लेते है।’’

भारतीय महासागर के व्यापार से हिन्दोस्तान और अरब दोनों देषों को बेशुमार लाभ हुआ करता था क्योकि अरब व्यापारी भारत के उत्पाद को कई देषों में बेचा करते थे इसका अनुमामन कुछ घटनाओं से लगाया जा सकता है। गुजरात के शासक बल्लभराय की राजधानी को 1000 साल पहले महानगर कहा जाता था। कई विदेषी व्यापारी इसको सोने की नगरी भी कहते थे इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि गुजरात को अरब व्यापारीयों से बेषुमार आय प्राप्त होती थी। इन बाजारो में लगभग 800 दुकान थी। अरब व्यापारियों की वजह से लाभ होने के कारण भारत के राजा उनका बहुत सम्मान करते थे। इस संबंध में इब्न बतूता ने दक्षिण भारत के समुद्रीय तटों की यात्रों करते हुये लिखा है कि यह हिन्दु राजा अरब व्यापारियों को इसलिए नराज नही किया करते थे क्योंकि राज्य की आय में अरब व्यापारियों का बहुत बड़ा हाथ था। कालीकट और कोरोमंडल के राजा समुद्रीय व्यापार की वजह से ही धनवान थे। कोरोमंडल के एक राजा के मरने के बाद एक मुस्लिम कर्मचारी को, जो सेाना और हिरे-मोती मिले थे, उसको उठाने के लिये उसने सात हजार बैलों को उपयोग में लिया। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि राजा के पास बेषुमार दौलत समुद्रीय व्यापार से एकत्रित की गई थी। इसी प्रकार अल्लाउद्धीन खिलजी के सेनापति मलिक कपूर को दक्षिण विजय में 96 हजार मन सोना और 500 मन मोती जवाहरात मिले थे। दक्षिण भारत के कोरोमड़ल का व्यापार सारा अरब, इराक, फारस के समुद्री तटों से होता था।

भारत और अरब की सम्पन्नता में तत्कालिन समय के राजा और व्यापारीयों का आपसी समन्वय था। किसी भी प्रकार का धार्मिक विवाद एवं कट्रता नही थी, यदि ऐसा होता तो लगभग 1000 वर्ष पहले भारत और अरब के व्यापारिक संबंधो की चर्चाऐं दुनिया में नही होती । आज भी हमको इतिहास से सीखना चाहिए, कि इतिहास ही हमारी कमियों को सुधारने का मौका देगा।



संतोष कुमार लड़िया

एम. ए. इतिहास

उज्जैन ;मध्यप्रदेश



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