भारत की कहानी, अरबों की जुबानी


लेख अंक-2

अखण्ड़ भारत में सिन्ध प्रांत, भारत और पाकिस्तान की आजादी सन् 1947 के पूर्व भारत का एक विशेष महत्वपूर्ण प्रांत था, जो आज पाकिस्तान की सीमा में है। हमको यह भी ज्ञात होना चाहिए कि सिन्ध प्रांत का नाम ‘‘सिन्ध’’ इसलिए पड़ गया था; क्योंकि यह भू-भाग सिन्ध नदी के क्षेत्रों में आता था और यह वही नदी है जिसकों अरब के लोगों ने ‘‘सैहून’’ कहां है। कुछ लोग इसको गंगा भी कहते है। प्राचीनकाल में सिन्ध नदी के आसपास ही भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता का विकास हुआ है, जैसा कि हम जानते है कि मोहेंजोदड़ो हड़प्पा की प्राचीन सभ्यता के अवशेष भी सिन्धु नदी के क्षेत्रों में उत्खनन के दौरान पाये गये है, जो एक विकसित नगरीय सभ्यता के प्रमाण है। बाद में इसी क्षेत्र में हज़ारो वर्ष बाद वैदिक सभ्यता का उदय हुआ, जो ग्रामीण सभ्यता के प्रमाण है।

अखण्ड़ भारत के सिन्ध प्रांत का इतिहास जानने से पहले हमको यह जानना अति आवश्यक है कि कुछ ही हजार अरबों की जो सेना इतनी दूर से चलकर आयी थी उसने एक ही आक्रमण में कैसे सिन्ध और इस देश पर अधिकार कर लिया और सिन्ध के निवासियों की हार का कारण क्या था ? अरबों के विवरण से यह बात स्पष्ट रूप से सिद्ध होती है उस समय अर्थात हिजरी पहली शताब्दी के अंत और ईसवी आठवीं शताब्दी के आरम्भ में सिन्ध प्रांत के निवासियों का धर्म और संस्कृति क्या थी ? क्या आठवीं शताब्दी के आरम्भ में सिन्ध प्रांत और उसके आसपास के क्षेत्रों में धार्मिक संघर्ष चल रहा था, जिस वजह से इसी का लाभ लेकर अरब एवं अन्य क्षेत्रों के रहवासियों ने अपने घोड़ों का रूख सिन्ध और भारत की ओर मोड़ दिया। अखण्ड भारत के सिन्ध प्रांत में लगभग 7 वी. शताब्दी के प्रारम्भ में जब भारत के सम्राट हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद उसके आधीन आने वाले सभी सुबेदार एवं प्रांतपतियों ने अपने आप को स्वतंत्र करना घोषित कर दिया था। इनमें अधिकांशतः वे प्रांतपति शामिल थे, जो बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार से नाखुश थे एवं गौतम बुद्ध की विचारधाराओं को स्वीकार नही करते थे; क्योंकि बुद्ध की विचारधारा समानता, स्वतंत्रता का समर्थन करती थी और वह प्रजा तंत्र एवं गणतंत्र को मानने वाली थी। यही वजह रही कि राजतंत्र विचारधारा को समर्थन करने वाले प्रांतपतियों ने बौद्ध धर्म के स्थान पर ब्राहम्ण धर्म अर्थात हिन्दू धर्म को पुनः स्थापित करने के लिए राजकीय समर्थन एवं घोषणाऐं करना प्रारम्भ कर दी। इसके साथ-साथ कई धार्मिक पुस्तकों का भी लेखन प्रारम्भ किया गया, जिसमें बौद्ध धर्म को केवल मात्र इसलिए निंदा की गई; क्योंकि वह पाखण्ड़वाद, कर्मकाण्ड़वाद एवं बहुदेवताओं का विरोध कर एक ईश्वर विचारधारा को मानने वाला था।

अरबों के विवरण से यह बात स्पष्ट रूप से सिद्ध होती है कि उस समय अर्थात हिजरी पहली शताब्दी के अंत और ई.वी. आठवी शताब्दी के प्रारम्भ में सिन्ध प्रांत में बौद्ध धर्म का ही बोल बाला था। हिन्दू धर्म के अनुयायी अल्प मत में थे एवं हिन्दू मंदिरों में यदाकदा ही लोगों को देखा जाता था। विवरण से यह भी स्पष्ट हुआ कि अरब नागरिको को बौद्ध धर्म के बारे में ज्यादा ज्ञान नही था, इसलिए यह बौद्ध अनुयायीयों को ‘समनियः’ कहा करते थे। यही नही भूगोल और इतिहास के सभी लेखकों ने भी यह खुले मन से स्वीकार किया कि इस काल में सिन्ध प्रांत और उसके आसपास के नागरिक बौद्ध धर्म के अनुयायी थे और कई बस्तीयां देखी जा सकती थी। कई बौद्ध विहार एवं उपासना केन्द्र थे, इसकी पुष्टि भी ‘चचनामें’ से होती है। इन बौद्ध विहारों के पुजारियों को अरब लोग समनियः कहा करते थे। यह अरब के लोग आगे यह भी लिखते है कि इन बौद्ध उपासको अथवा समनियः का यदि कोई विरोध करता था तो वह केवल मात्र ब्राहम्ण ही थे और इसकी पुष्टि ‘इलियट साहब’ भी करते है, जैसा कि वह कहते है कि-

‘‘ जब मुसलमानों को पहले पहल भारत की जातीयता से काम पड़ा, तब सिन्ध में बौद्ध मत का पूरी तरह से प्रचार था; इस लिये निश्चित रूप से इस नाम बुद् का मूल रूप ‘‘बौद्ध’’ है, न कि फारसी शब्द ‘‘बुद’’ (बुत) जो कदाचित् स्वयं भी बौद्ध शब्द का ही बिगड़ा हुआ रूप है।’’ इसके बहुत से प्रमाण आज भी मिलते है कि सिन्ध की तराई में बौद्ध धर्म फैला हुआ था और इसकी पुष्टि चीनी यात्री हुआन त्सांग एवं फहान तथा इब्न खुर्दाजिवा के वर्णन से होती है। अरब नागरिक यह भी उल्लेख करते है कि कुछ घराने, राजपरिवार एवं परिवार ऐसे थे, जो दोनों धर्म को मानने वाले थे। जैसे वह लिखते है कि सिन्ध का प्रांतपति हिन्दू ब्राहम्ण राजा चच ब्राह्मण धर्म का अनुयायी था, परन्तु उसका भाई चन्द्र राजा बौद्ध धर्म का कट्र समर्थक था। जब राजा ‘चच’ की मृत्यु के बाद उसका भाई ‘चन्द्र’ सिन्ध का प्रांतपति बना, तब उसने सिन्ध में बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार ही नही किया बल्कि बौद्ध धर्म को राजकीय धर्म वैसे ही बना दिया जैसे एक समय सम्राट् अशोक ने अपने सम्राज्य में राजकीय धर्म बौद्ध धर्म को मान्यता दे दी थी।

राजा चच के भाई प्रांतपति चन्द्र से कई सनातनी ब्राहम्ण केवल इसलिए द्वेष भावना रखने लगे; क्योकि वह अपने भाई चच की नीतियो एवं अधिकारियों को बदलकर ऐसी नीतियां निर्मित कर रहा था और ऐसे अधिकारियो को शासन में नियुक्त कर रहा था, जो बौद्ध धर्म की विचारधारा से प्रभावित थे और बौद्ध धर्म का प्रचार कर रहे थे। इन असंतुष्ट बौद्ध विरोधियों ने बुद्ध समर्थक राजा चन्द्र के स्थान पर राजा चच के पुत्र ‘दाहर’ को प्रांतपति बनाने के लिए षड़यंत्र करने लगे एवं बुद्ध अनुयायीयों को प्रताड़ित किया जाने लगा और हिन्दू एवं बौद्ध धर्म में वैचारिक एवं शारीरिक संघर्ष होने लगे। इस परस्पर विवाद होने की वजह से कुछ विदेशी सरदारों ने इसका लाभ लेने के लिए भारत के दरवाजे सिन्ध प्रांत की ओर अपने घोड़ों को मोड़ दिया। जिस समय मुसलमान लोग सिन्ध की सीमा पर आ पहुंच थे, उस समय भारत में इन दोनों धर्मो में भारी लड़ाई हो रही थी बौद्ध लोग एवं ब्राह्मणों का सामना धार्मिक उच्चता को लेकर हो रहा था। बुद्ध उपासक कुछ ब्राह्मणों से अत्याधिक पीड़ित थे और जब सिन्ध के बौद्धों ने एक और मुसलमानों को और दूसरी और ब्राह्मणों को तोला और दोनों में अंतर देखा, तब बुद्ध उपासकों को तत्कालीन समय में मुसलमानों का आचरण ब्राह्मणों की तुलना में उचित प्रतीत हुआ। इसकी एक वजह और भी थी, कि पहली तुर्कीस्तान और आफगनिस्तान के बुद्ध उपासकों अथवा समनियः के साथ वहां के मुसलमानों ने जो अच्छा व्यवहार किया था और उनमें से बहुत से बुद्ध अनुयायीयों ने अच्छे आचरण एवं ब्राह्मणों की प्रताड़ना से बचने के लिए इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया था। उसका प्रभाव भी इस देश के बुद्धों पर पड़ रहा था; क्योंकि कई बुद्ध उपासक बुद्ध विरोधियों की प्रताड़ना से तंग आकर भारत से पलायन करने लगे थे, जिससें की बुद्ध की विचारधारा को न केवल बचाया जाये, बल्कि विदेशों में भी घर-घर बुद्ध की विचारधारा को स्थापित किया जा सके।

अरब नागरिकों ने अपनी आँखों देखी ऐसी कई बाते भारत के संबंध में लिखी है। ‘इब्ने खुर्दाजवा’ कहता है कि भारत में सात जातियां है, वह अलग बात है कि आज भारत में इन्ही सात जातियों में से सैकड़ो जातियां निकल आयी है। इब्ने लिखता है कि क्षत्रिय, ये उस देश के सम्पन्न और बड़े लोग है, इन्ही में से भारत में बादशाह होते है, इनके आगे सब लोग सिर झुकाते है लेकिन यह किसी के आगे सिर नही झुकाते है। ‘इब्ने’ यह भी लिखता है कि यह मांसाहारी नही बल्कि शाकाहारी होते है। दूसरी जाति इसने बराहमः अर्थात ब्राह्मण बताई है, यह शराब और नशे की चीजे नही पिते है, परन्तु इब्ने ने यह उल्लेख नही किया है कि यह शाकाहारी है अथवा मांसाहारी। तीसरी जाति कस्तरी अर्थात खत्री यह तीनों का एक साथ खानपान एवं उठना-बैठना था, यह तक की ब्राह्मण इनकी लड़कियों से विवाह कर लेते थे, परन्तु वह अपनी लड़की नही देते थे। चौथी जाति शुदर अर्थात शुद्र का उल्लेख किया गया है और यह जाति केवल खेती करने वाली थी। कृषि संबंधी एवं इससे जुड़े हुए छोटे-छोटे लघु उद्योग किया करती थी। पाँचवी जाति वैश्य थे, यह व्यापार करने वाले थे और इनका संबंध अरब व्यापारियों से अधिक था। छटवी जाति शन्दाल बताया है जिसको चण्डाल भी कहां है यह अधिकतर खिलाड़ी और कलाकार होते थे। इब्ने यह भी लिखता है कि इनकी स्त्रिया बहुत अधिक सुन्दर होती थी। सातवी जाति जम्ब (डोम) बताया गया है यह लोग गाते-बजाते थे। इसके साथ-साथ इब्ने यह भी लिखता है कि भारत में सातवी शताब्दी के लगभग 42 प्रकार के धर्म सम्प्रदाय प्रचलित थे। कोई एक ईश्वर को मानता था, कोई बहुवादी था, कोई यंत्र, तंत्र-मंत्र को मानने वाला था।

सन् 1811 ई.वी. में यह पेरिस में छपा, जिसका नाम ‘‘सिलसिल तुतवारीख’’ यह एक व्यापारी था, जो इराक के बंदरगाह से चीन तक यात्रा किया करता था। जो एक दुर्गम यात्रा हुआ करती होगी, यह यात्रा भारत के सारे समुद्रों के चक्कर लगाकर ही श्रीलंका के बाजू से निकलकर बंगाल की खाडी से होते हुये वियतनाम, चीन जाया करता होगा। इसने अपनी यात्रा को सन् 237 हिजरी में एक लेख लिखा था, जिसे आज 1200 वर्ष हो गये। इसके अनुसार भारतीय महासागर का नाम ‘‘दरियाए हरगन्द’’ मिलता है और हरगन्द, समुद्र के उस हिस्से को कहते थे, जो दक्षिणी भारत के किनारों पर बसे हुये थे, जैसे मंगलौर, गोवा, मुंबई, केरल आदि। सुलैमान कहता है कि इसमें 1900 के लगभग टापू थे और इन टापूओं पर एक स्त्री का राज्य था। इनमें अम्बर और नारियल के वृक्ष बहुत अधिक है। एक टापू दूसरे टापू से दो-तीन फरसख ( दूरी की एक नाम जो प्रायः साढ़े तीन मील के बराबर होती है। इसी का फारसी रूप फरसंग है।) की दूरी पर स्थित है। यहाँ के लोग बहुत कारीगर हैं। ये कुरता दोनों आस्तीनों, दामनों और गले के सहित बुन लेते हैं और इसी प्रकार जहाज बनाते है। सब से अन्तिम टापू का नाम सरन्दीप (श्रीलंका) है और इनमें से हर एक टापू का नाम दीप (द्वीप) है। इसी सरन्दीप में हजरत आदम के चरण चिन्ह है। इन सब के पीछे अंडमन टापू है। यहाँ के लोग जंगली हैं। ये कुरूप और काले होते है। इनके घुॅघराले बाल, डरावने चेहरे और लम्बे पैर होते है और ये नंग धड़ंग रहते हैं। ये जीते आदमी को पकड़ कर खा जाते हैं। कुशल यही है कि इनके पास नावें नहीं है, नही तो इधर से जहाजों का आना जाना कठिन हो जाता।’’ दक्षिणी भारत के कुछ तटों के निवासियों के सम्बन्ध में इसने लिखा है- ‘‘वे केवल एक लँगोटी बाँधते हैं।’’

सुलैमान सौदागर 1200 वर्ष पहले एक आश्चर्यजनक बात लिखता है कि यह भारतीयों और चीनीयों दोनों का कहना है कि 1200 साल पहले केवल चार ही बादशाह थे, इसने पहला अरब का बादशाह, जिसे इसने सब बादशाहों का बादशाह और सबसे अधिक धनवान बताया है और एक बड़े धर्म का बादशाह था। दूसरा इसने चीन के बादशाह को बताया, फिर रोम के बादशाह का और फिर भारत के राजा ‘बल्हरा’ का उल्लेख किया है, जो गुजरात के राजा ‘वल्लभराय’ भी कहा जाता है। ऐसा प्रतित होता है कि यह अरब यात्री समुद्र के किनारे गुजरात पहुॅचा और इसी ने गुजरात को पूरा भारत समझ लिया, इसलिए राजा बल्हरा को सब राजाओं का राजा कहां है। बाद में इसने जजर के बादशाह का भी उल्लेख किया है, जो गुर्जर वंश से संबंध रखता था और यह भी गुजरात का था। वह कहता है कि इस राजा के पास बहुत अधिक सेना थी और वह अरबों को बहुत बड़ा शत्रु मानता था। इसका देश भी समुद्र के किनारे था। इसके पास बहुत अधिक जानवर थे। यह पर किसी प्रकार की चोरी नही होती थी, इसके बाद इसने ‘ताफन’ के बादशाह का उल्लेख किया, इसका देश बहुत छोटा था परन्तु यहाँ की स्त्री बहुत सुन्दर थी। यहाँ का राजा सबसे मेल-जोल रखता था और अरबो से प्रेम करता था। कुछ विद्वानों ने ताफन को औरंगाबाद अथवा दक्षिण के पास का स्थान बताया है परन्तु कुछ लोग इसे कश्मीर भी कहते है। इसके बाद इसने रहमी के राजा का उल्लेख किया, इसके देश में ऐसे सूती कपड़े होते थे, जैसे और किसी जगह पर नही होते थे।

अरब यात्रीयों ने यह भी लिखा है कि भारत में बहुत से कानून आदि लिपिबद्ध थे। उदाहरण के तौर पर उसने लिखा है कि ‘‘ जब एक दूसरे पर कोई अभियोग चलाता है, तब अभियुक्त के सामने लोहा गरम कर के रखा जाता है और उस के हाथ पर पान के सात पत्ते रखकर ऊपर से गरम लोहा रख दिया जाता है। वह उसको लेकर आगे पीछे चलता है। फिर वह उस लोहे को गिरा देता है और उसके हाथ को खाल की एक थैली में रखकर उस राजा की मोहर कर दी जाती है। तीन दिन के बाद धान लाकर उसको इस लिये दिए जाते है कि वह उनको छीलकर उनमें से चावल निकाले। यदि उसके हाथ पर गरम लोहे का कोई प्रभाव नही होता, तो वह सच्चा समझा जाता है; और मुद्दई पर जुरमाना कर के वह धन राजकोष में रखा जाता है। कभी कभी गरम लोहे के बदले ताँबे के बरतन में पानी गरम किया जाता है और उसमें लोहे की एक अँगूठी छोड़ दी जाती है। तब उससे कहा जाता है कि हाथ डालकर इसमें से अँगूठी निकालों।’’ सुलैमान कहता है कि मैने कुछ लोगों को देखा है कि उनके हाथ बिलकुल अच्छी दशा में निकल आए। वह यह भी कहता है ‘‘ यहाँ मुरदे जलाए जाते हैं। उसमें चन्दन, कपूर और केसर डालते है और उसकी राख हवा में उड़ा देते है। यहाँ यह भी नियम है कि जब राजा मरता है, तब उसके साथ उसकी सब रानियाँ भी जलकर सती हो जाती हैं। पर यह केवल उनकी इच्छा पर है, इसमें कोई जबरदस्ती नहीं है।’’ इससे स्पष्ट होता है कि पति के मरने के बाद जबरन सती करने का प्रचलन एवं परम्परा बाद में निर्मित हुई।

वह यह भी लिखते है कि यह के राज्य परम्परागत अनुसार पैतृक हुआ करते थे। इसका तात्पर्य यह हुआ कि यदि किसी शासक का लड़का पागल एवं मंदबुद्धी है तब उसको भी युवराज मानकर राजा बना दिया जाता था। वह यह भी लिखते है कि विवाह करने के लिये एक-दूसरे को जांचा-परखा करते थे, संदेश भेजा करते थे, एवं शादी-विवाह, जो अमीर लोग थे वो ढोल बजाकर किया करते थे। सारे भारत में व्यभिचार का दण्ड़ दोनों अपराधियों के लिये अर्थात महिला एवं पुरूष के लिये मृत्युदंड़ था और चोरी का दंड़ भी यही था। वह यह भी लिखता है कि अपराधियों को सात दिवस तक भोजन एवं पानी नही देते थे। डाकूओं के लिए भी वही दंड़ था, जो चोरी करने वाले और व्यभिचारी करने वाले महिला और पुरूष के लिये था। हिन्दू लोग भोजन करने के पहले नहाते थे, मुॅह साफ अच्छी तरह से करते थे, मुॅह साफ किये बिना भोजन नही करते थे।

अरब यात्रीयों के लिए सबसे आश्चर्य चकित बात यह थी कि इस देश में खाने के छुआरे का वृक्ष नही है और उनके पास इस प्रकार का कोई फल भी नही है, लेकिन भारत में सब फल पाये जाते है और वह यह भी लिखते है कि उनके पास एक फल ऐसा नही है, जो भारत में पाया जाता है, इसका नाम उसने आम बताया। एक व्यक्ति कई स्त्रीयां रख सकता था, जिसकी संख्या निश्चित नही थी, जो चाहे जितनी रख ले। इनका प्रिय भोजन चावल है और यह यहाँ भी लिखते है कि ‘‘चीन का धर्म भारत से ही निकला हैं।’’ वे गौतम बुद्ध की मूर्तियों की पूजा करते है। जानवरों मे यह गाय अधिक एवं घोड़े कम है। भारत का पहनावा यह है कि एक कपड़ा कमर से बाँधते है और दूसरा ऊपर डाल लेते है। पुरूष और स्त्रीयां अपनी क्षमता के अनुसार ही आभूषण पहनती है। पुर्नजन्म में विश्वास रखते है। भारत के पूजा स्थलों में देवदासिया पायी जाती है। सुलैमान ने यह देखकर बड़ा आश्चर्य किया कि भारत के दो आदमी भी एक साथ बैठकर खाना नही खाते और न केवल एक ही दस्तरखान पर बैठते है। वह यह भी लिखता है कि भारत के राजा अपनी रानियों से पर्दा नही कराते है, जो कोई उनके दरबार में जाता, उनको देख सकते है। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि सातवी-आठवी शताब्दी के लगभग किसी प्रकार की पर्दा प्रथा नही थी और महिलाऐं भी राज दरबार में बिना पर्दे के बैठती होगी, परन्तु बाद में रानी, राजकुमारीयों एवं महारानियों पर पर्दा प्रथा किस प्रकार थोपी गई, अगले अंक में पाठको को बताने का प्रयास किया जावेगा।


संतोष कुमार लड़िया

एम. ए. इतिहास

उज्जैन ;मध्यप्रदेश

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