भारत की कहानी, अरबों की जुबानी ! अंक-1

प्राचीनकाल से ही भारत न केवल एक जमीन का टुकड़ा इस देश के निवासियों के लिए नही था बल्कि भारत एक गौरव एवं आत्म-सम्मान तथा विश्व गुरू के रूप में विश्व में जाना जाता था। सदियों से भारत की भौगोलिक एवं आर्थिक सम्पन्ता से प्रभावित होकर कई विदेशी नागरिकों ने भारत की ओर अपना रूख किया। पाठको को विदित है कि आर्य नागरिको से लेकर युनानी, शक, कुषाण आदि जातियों ने भारत में आकर अपनी राज सत्ता स्थापित की और यही की संस्कृति में रच बस गये। ऐसे ही अरब, यूनान, तुर्क आदि अरब देशों के व्यापारियों ने भी भारत की भौगोलिक, आर्थिक, चिकित्सा, साहित्य, गणित, व्यापार, ज्योतिष, विषविद्या आदि में क्षेत्रों में भारत में व्यापार करने आये। अरब व्यापारी, यात्री आदि ने भारत के कई क्षेत्रों में घूम-घूमकर तत्कालीन समय के भारत का इतिहास आँखों देखा, लिखा है। इनमें भारत के अरब यात्री और भूगोल के लेखकों की भूमिका अति महत्वपूर्ण है- जैसे इब्ने खुर्दाजबा, सुलैमान सौदागर, अबूजैद हसन सैराफी, अबू दल्फ मुसइर बिन मुहलहिल यंबूई, बुजुर्ग बिन शहरयार, मसऊदी, इस्तखरी, इब्न हौकल, बुशारी मुकइसी, अलबेरूनी, इब्न बतूता एवं दूसरे इतिहास के लेखक और भूगोल लेखक आदि।

भारतवर्ष और अरब दोनों देश संसार की दो विशाल तथा महान जातियों के धार्मिक तीर्थ और उपासना का मंदिर हैं और दोनों अपने-अपने स्थान पर अपनी-अपनी जातियों के लिए, पवित्र और श्रद्धा का स्थल हैं और दोनों की अपनी -अपनी संस्कृति है। कई अरब निवासियों का कथन है कि भारतवर्ष के साथ उनका संबंध केवल कुछ वर्षो एवं हजारों का नही है बल्कि मानव जाति की उत्पत्ति से ही यह देश उनका पैतृक स्थान रहा है। इसको और अधिक स्पष्ट करने के लिए यात्रियों ने हजरत आदम की कथा का उल्लेख किया है, जो हदीसों और कुरान की टीकाओं आदि में है। कथा में उल्लेख है कि जब हजरत आदम आकाश की जन्नत या स्वर्ग से निकाले गए, तब वे इसी देश की जन्नत या स्वर्ग में, जिसका नाम ‘‘हिन्दोस्तान जन्नतनिशान’’ या स्वर्गतुल्य भारत है, उतारे गए थे। सरन्दीप (स्वर्गद्धीप या लंका) में उन्होने पहला चरण रखा, जिसका चिन्ह वहाँ के पर्वत पर अब तक वर्तमान है। इब्ने जरीर, इब्ने अबह हातिम और हाकिम’ का कहना है कि भारतवर्ष के जिस प्रदेश में हजरत आदम उतरे थे, उसका नाम ‘दजनाय’ है। क्या यह कहां जा सकता है कि यह दजनाय भारतवर्ष का दखिना या दक्खिन है जो भारतवर्ष के दक्षिणी भाग का प्रसिद्ध नाम है ? अरब देश में अनेक प्रकार के सुगन्धित द्व्य तथा मसाले इसी दक्षिणी भारत से जाते थे और फिर अरब निवासियों के द्वारा वे समस्त संसार में फैलते थे, इसलिये उनका कथन है कि ये सब द्रव्य उन उपहारों के स्मृतिचिन्ह है, जो हजरत आदम अपने साथ जन्नत से लाए थे। इन उपहारों में से छुहारों के अतिरिक्त दो फल अर्थात नीबू और केले भारतवर्ष में ही वर्तमान में है। एक और प्रवाद यह है कि अमरूद भी जन्नत का मेवा था, जो भारतवर्ष में पाया जाता है। ऐसा भी कहां जाता है कि स्वर्ग अथवा जन्नत में से चार नदियां भी निकली हुई है, जिसे नील, फुरात, जैहून और सुहैन। नील मिस्श्र में बहती है यह खेती का सारा काम करती है, वह के नागरिकों का पेट भरती है। इसी प्रकार इराक की फुरात नदी, तुर्कीस्तान की जैहून तथा सैहून नदी के संबंध में कहां गया है कि यह भारतवर्ष की नदी है क्या? यह वही नदी है जिसको भारत के स्वर्ग गंगोत्री से निकली हुई है, यह चैथी नदी गंगा ही हो सकती है, लेकिन कुछ अरब यात्रियों ने सिन्धु को भी चैथी नदी ‘‘सैहून’’ माना है।

मीर आजाद बिलग्रामी ने ‘‘सुब्हतुल् मरजान फी आसारे हिन्दोस्तान’’ में भारतवर्ष के महत्व के विषय में खूब लिखा है। बिलग्रामी ने यहां तक कहां है कि जब हजरत आदम सबसे पहले भारत में ही उतरे और यही पर उनके पास ईष्वरी आदेष आया था। इससे यह अर्थ निकलता है कि ईष्वर का सबसे पहले संदेश यही पर आया। तो यह माना जाये कि हजरत मुम्महद साहब का प्रारम्भिक अवतार या प्रकाश भारतवर्ष में ही हुआ था, इसलिए इन्होने कहां मुझे भारतवर्ष की ओर से इश्वरी सुगन्धी आती है। इस प्रकार हम कह सकते है कि भारत में मुसलमान लोग महमूद से सैकड़ो वर्ष पहले आ चुके थे और जगह-जगह उनके उपनिवेश बन चुके थे यह न केवल स्थल मार्ग से आये बल्कि दक्षिण भाग से इनका समुद्री मार्ग से आना-जाना बड़ी तादत में लगा रहा।

इस्लाम के उपरांत अरबों और मुसलमानों में कुलीनता के विचार से सबसे बड़ा स्थान सादात अर्थात सैय्यदों का है। वर्तमान सैय्यद वंशो का बहुत बड़ा भाग हजरत इम्मान हुसैन के पुत्र ‘हजरत ईमान जैनुल आबिदीन’ के वंशजों में से है और जैनुल आबिदीन की माता अरब की नही थी। ईरानी यह दावा करते है कि वे ईरानी थी और राजवंश परिवार से थी। परन्तु यह मत सर्वमान्य नही है। कुछ इतिहास लेखकों ने उन्हे सिंध की बतलाया हैं। यदि हम इसको सही माने तो यह स्वीकार करने में क्या आपत्ति हो सकती है कि अरब तथा इस्लाम के सबसे सर्वश्रेष्ठ और पवित्र वंश भारतवर्ष का अंश था और यह कहना भी उचित होगा कि चाहे और मुसलमान हो या न हो, लेकिन जैनुल आबिदिन की संतान सैय्यद लोग आधे भारतीय है।

हिन्दुस्तान और अरब विश्व के वह बड़े देश है, जिनको एक प्रकार से पड़ोसी ही कहां जा सकता है क्योंकि दोनों के बीच में केवल एक समुद्र ही है और दोनों के समुद्री तट आमने-सामने है। दोनों के बन्दरगाह में ठीक आमने-सामने है। यदि इस विशाल समुद्र का एक हाथ अरबों के देश कावे की भूमि का पल्ला पकड़े हुये है तो इसी समुद्र का दूसरा हाथ आर्यवत् के चरणों को छूता है। यही पहला संबंध है, जिसने हिन्दू और मुसलमानों को एक दूसरे से परिचित करवाया। इसी समुद्री मार्ग से हजारो वर्ष पहले अरब के व्यापारी भारत की उपज को मिश्र, यूरोप, चीन, जापान तक भारत के पदार्थो को ले जाकर व्यापार किया करते थे इन्ही अरब व्यापारियों ने भारत को अपनी आँखों से भारत में इस्लाम आने के पूर्व से ही हजारों वर्षो से देखा और लिखा है। यह सिन्ध के बंदरगाह देवल (कराची) से चलकर गुजरात, कठियावाड़, थाना महाराष्ट्र से आगे बड़कर खम्बात तक चले जाते थे। यही नही समुद्री मार्ग से ही यह कालीकट, कन्याकुमारी तक पहुचते थे। इनका मुख्य पड़ाव मद्रास के तटों पर होता था और यह कभी-कभी श्रीलंका (सरन्दीप), अडमान होकर मद्रास के अनेक बन्दगाहों का चक्कर लगाकर बंगाल की खाड़ी में प्रवेश करते थे और यही से बर्मा, चीन चले जाते थे। यह अरब व्यापारियों का मुख्य रास्ता था।

अब यह प्रश्न उठता है कि यह समुद्री व्यापार करने वाली पहली जाति कौन थी ? जिसने इतना साहस दिखाकर हजारो कि.मी. समुद्र को चीरती हुई पूरे विश्व में एक देश से दूसरे देशो तक समुद्री रास्तों पर वर्षो तक निडरता से व्यापारिक आवागमन करती रही। इस संबंध में ‘मौलान सैयद सुलैमान नदवी’ लिखते है कि ‘‘फिनीशियन’’ पहली जाति थी, जो समुद्री व्यापार करने में महारत् हासिल थी और यह यूनानी नाम से जाने जाते थे। इब्रानी भाषा में इनका नाम ‘कनआनी’ था और इनको ‘आरामी’ भी कहां जाता है। इन फिनीशियनों को अरब के लोग ‘‘इरम’’ कहते है और यही नाम कुरान में भी पाया जाता है। एक स्थान पर आया है कि -‘‘आदे इरम जातुल इमाद’’ अर्थात बड़े-बड़े स्तम्भों और भवनों वाले इरम के वंशज आद लोग। और इसी साम्य के कारण उर्दू तथा फारसी भाषा में भी ‘‘बहिश्ते इरम’’ कहते है। कई अरब यात्रीयों के विवरणों के आधार पर मौलाना सैयद सुलैमान नदवी लिखते है कि महाभारत के समय मे भी भारत में ऐसे लोग थे जो अरबी भाषा जानते थे और समझते थे। परन्तु इस बात पर विष्वास करना थोड़ा कठिन है। लेकिन ‘‘सत्यार्थ प्रकाश’’ के लेखक स्वामी दयानंद जी ने पहला पर्व, अध्याय 47 में लिखा है कि -‘‘महाभारत में जब कौरवों ने लाख का घर बनाकर पांडवों को उसके अन्दर जलाकर फूंक देना चाहा, तब विदुर जी ने युधिष्ठिर को अरबी (यवन) भाषा में बतलाया; और युधिष्ठिर ने उसी अरबी भाषा में उन्हे उतर दिया।’’ यदि यह बात ठीक हो तो अरबों और हिन्दुओं का सम्बन्ध कितना पुराना ठहरता है।

अरब और हिन्दुओं के संबंध का एक उदाहरण यह भी है कि ईरान के बादशाह अर्थात राजा का प्रायः बलोचिस्तान और सिन्ध पर अधिकार रहा करता था, इसलिए सिन्ध के कुछ लड़ाके ईरानी सेना में शामिल थे। यह लड़ाके कौन थे इसका उल्लेख अरबों ने किया, वह दोनों कबीले जाट (जत) और मेंड़ या मीड़ है। यह दोनों सिन्ध की प्रसिद्ध बहुसंख्यक जातियां थी। एक हसीद में यह भी कहां गया है कि ‘अब्दुल्लाह बिन’ मसऊद सहाबी ने हजरत मुहम्मद साहब के साथ एक विशेष आकार के लोगों को देखा था, जिनके सम्बन्ध में उन्होने बतलाया था कि उनका चेहरा जाटों की तरह था।’’ इसका अर्थ यह है कि अरब के लोग छठी शताब्दी में जाटों को जानते थे। परन्तु जब ईरानी और मुसलमानों में युद्ध हुआ और ईरानी लोग हारते गए, तब इन बहादुर जाटों ने हवा का रूख देखकर कुछ शर्तो के साथ मुसलमानों के लश्कर में मिल गए अर्थात सेना में शामिल हो गये। जाटों की बहादुरी को देखकर मुसलमान सेनापति इनका बहुत सम्मान करते थे। इनकी बहादुरी को देखकर मौलान सैयद सुलैमान नदवी लिखते है कि ‘‘हजरत अली ने जमल वाले युद्ध के अवसर पर बसरे का खजाना इन्ही जाटों की रक्षा में छोड़ा था।’’ अमीर यही नही मुआवियों ने रूमियों का मुकाबला करने के लिए इन्ही जाटों को ले जाकर शाम देष के समुद्र तट के नगरों में बसाया था और वलीद बिन अब्दुल्मलिक ने अपने समय में इन्ही जाटों को अन्ताकिया में ले जाकर बसाया था। इससे यह स्पष्ट होता है कि बहादुर जाटों की बदोलत ही मुसलमानों ने अपने कई विरोधियों को युद्ध के मैदान में धुल चटाई।


हिन्दुस्तान पर अरबो का आक्रमण-

मौलाना सैय्यद सुलैमान नदवी लिखते है कि मुसलमानों के आने से पहले इस पूरे देश का कोई एक नाम नही था पूरा भारत कई भागों में बटा हुआ था। हर प्राप्त का अलग-अलग नाम था। उसकी अलग संस्कृति, धर्म, सामाजिक व्यवस्थाऐं, परम्पराऐं, नीतिया और इनकी राज्यों की राजधानी भी अलग-अलग थी। जब फारस वालों ने इस देश के एक प्राप्त पर अधिकार किया, तब यह लोग इस क्षेत्र में बहने वाली सिन्ध नदी को ‘‘हिन्दो’’ कहने लगे। अरब की भाषा में जिसको ‘‘महरन’’ कहां जाता है। अरब व्यापारियों का लगातार आना-जाना लगा रहा, इसलिए इस्लाम के बाद अरबों का ध्यान भारत की ओर झुका और इन्होने ईरान को जीतने के बाद इसके उपनिवेशो और दूसरे स्थानों को अपने व्यवहार में लाना आवश्यक समझा। इस प्रकार मकरान और बुलचिस्तान के बाद अरबों की निगाह सिन्ध की सीमा पर आ टीकी। इसका मुख्य वजह यह थी कि अरब के व्यापारियों एवं उनके जहाजों और माल की सुरक्षा के लिए भारत के किसी समुद्र तट के बन्दरगाह की तलाश अरबों के द्वारा की जाने लगी। यही वजह रही कि ‘‘हजरत उमर’’ के शासनकाल में भारत के किसी भी बन्दरगाह पर अधिकार करने के लिए भारत की समुद्री सीमाओं पर मडराने लगे, जिससें की वह भारतीय बन्दरगाह का उपयोग अपने व्यापारियों के लिए कर सके और इन्होने पहली बार बंबई के पास पश्चिम के दक्षिण भाग में जो ठीक अरब के सामने ही था, जिससें थाना के नाम से जानते थे, यह एक छोटा बन्दरगाह था और आज भी है। सबसे पहले हजरत उमर ने 636 ई.वी. (15 हिजरी) में इस पर कब्जा करने की रणनीति बनाई। इसके लिए हजरत उमर ने बहरैन के शासक की आज्ञा से थाना बन्दरगाह पर पहली बार चढ़ाई की। इसके बाद इन्होने गुजरात के भड़ोच एवं इसी समय मुगारा नाम के एक दूसरे शासक ने सिन्ध के ‘‘देवल’’ पर कब्जा कर लिया, जो वर्तमान में कराची के पास है।

कुछ ही वर्षो के बाद हजरत उस्मान के समय में ही एक समुद्री टुकड़ी भारत इसलिए भेजी, क्योंकि वह भारत में कब्जे किये गये, बन्दगाहों की सुरक्षा एवं उनकी देखभाल कर सके। इसलिए सन् 660 ई.वी. (39 हिजरी) में हजरत अली के समय ही अरब के सरदारों के द्वारा इन प्रांतों की देखभाल के लिए नियमित तैनाती होने लगी। बाद में सन् 665 ई.वी. में सिन्ध की सीमा की रक्षा करने के लिए एक स्थाई पद भी बना दिया गया, जिस पर ‘अमीर मुआबिया ने मुहलिव’ नाम के एक सरदार को नियुक्त किया था। बाद में 705 ई.वी. (86 हिजरी) में जब दमिश्क के राजसिंहासन पर ‘‘बलीद अमबी’’ जो एक मुआविया अमीर के वंश का था, इसके बैठने के बाद उसने ‘हजाज’ नामक सरदार को ईराक, ईरान, मकरान और बलुचिस्तान तथा पूर्वी अधिकृत प्रदेशों का शासक बना दिया था और हजाज नामक सरदार ने भारत और उसके आसपास के क्षेत्रों में अपने पारस्पिरिक मजबूत संबंध स्थापित किये, इसलिए अरब व्यापारियों का भारत में आना जाना और अधिक बढ़ गया।


मोहम्मद बिल कासिम का सिन्ध में आनाः-

जब अरब यात्रीयों एवं व्यापारियो का भारत के पश्चिमी बंदरगाहों पर एवं श्रीलंका के बन्दरगाहों पर आना जाना बढ़ गया, व्यापारिक गतिविधियां संचालित होने लगी, इसी वजह से समुद्री डाकूओं का भी समूह सक्रिय होने लगा और यह समुद्री डाकू जहांजों में लूटपाट तथा हिंसात्मक गतिविधिया करने लगे, जिससें अरब व्यापारियों मे भारत एवं उनके शासको के प्रति अंसतोष उत्पन्न होने लगा। जैसा कि ‘अलबेरूनी’ के समय 1043 ई.वी. (सन् 424 हिजरी) तक सोमनाथ और कच्छ में इन समुद्री डाकूओं का सबसे बड़ा अड्डा बना हुआ था और यह समुद्री डाकू की वजह से ही हिन्दुस्तान के कई रियासतों के शासको की छबि खराब हुआ करती थी क्योंकि यह समुद्री डाकू घटना करते थे बदनाम भारत के शासक हुआ करते थे। ऐसा ही एक उदाहरण मौलान सैयद सुलैमान नदवी के द्वारा दिया गया कि श्रीलंका में कुछ अरब के व्यापारी व्यापार करने के उद्देश्य से बसे हुये थे और इनके साथ इनका परिवार भी श्रीलंका में ही रच बस गया था। किसी प्राकृतिक घटना में इनका देहांत हो गया, महिला और बच्चे ही शेष जीवित रह गये थे, इसलिए श्रीलंका के राजा ने इनको पुनः अरब भेजने का निर्णय लिया और एक जहांज में स्त्री और बच्चों को बैठाकर इराक की ओर भेज दिया। परन्तु रास्ते में सिन्ध के देवल नामक बन्दरगाह के पास समुद्री डाकूओं ने जहांज पर हमला कर लूटपाट की और अरब यात्रीयों की स्त्रीयों को अपने कब्जे में कर लिया। इन स्त्रीयों ने अपने इराक के शासक हजाज से मुक्त कराने के लिए प्रार्थाना की थी। हजाज को जब यह समाचार मिला कि उसके देश की स्त्रीयों को बंधक बना लिया है तब उसने सिन्ध के शासक ‘‘दहार’’ को संदेश भेजकर स्त्रीयों को मुक्त कराने का अनुरोध किया। परन्तु दहार ने इराक के शासक को यह संदेश भेज दिया कि समुद्री डाकूओं पर उसका कोई नियंत्रण नही है और वह हमारे अधिकार में भी नही है परन्तु इराक के शासक हजाज ने यह बात नही मानी और पुनः बंधक बनाई गई स्त्रीयो को मुक्त कराने के लिए पत्र भेजा। परन्तु इसी बीच एक ओर घटना घटित हुई कि मकरान से कुछ अपराधी और इराक के विद्रोहियों ने सिन्ध में आकर शरण ली और सिन्ध के शासक राजा दहार ने उनको अपने राज्य में शरण दे दी। इन्ही विद्रोही और अपराधियों ने हजाज के शासक से लड़ने के लिए एक जत्था बना लिया। इससें इराक का शासक और अधिक उतेजित हो गया, इसलिए उनसे अपने युवा भतीजे ‘मोहम्मद बिन कासिम’ के नेतृव्य में शीराज नामक स्थान से 6 हजार सैनिक सिन्ध की ओर भेजे और कुछ सैनिक समुद्री के रास्ते से भी भेज दिये गये। यही नही ईरान से भी कुछ सेनाऐं भेजी गई और 712 ई.वी. (93 हिजरी) के लगभग कासिम सिन्ध पहुच गया और लगभग 03 वर्ष के बीच में ही उसने छोटे काश्मीर अर्थात पंजाब की सीमा मुल्तान से लेकर कच्छ तक अपना अधिकार कर लिया। अनुवादक बाबू रामचन्द्र वर्मा लिखते है कि सिन्ध पर कब्जा करने के बाद उसने न्याय और शांति का राज्य स्थापित कर दिया। राजा दाहर के साथ मिलकर जिन भारतीय सैनिकों ने अरबों का सबसे अधिक मुकाबला किया था उनको ‘विलाजूरी’ ने 855 ई.वी. में लिखी गई पुस्तक में ‘‘तकाकिरा’’ बतलाया गया है, जो अरबी भाषा में ‘‘ठाकुर’’ शब्द का बहुवचन रूप है।


भारत में पहली मस्जिदः-

इराक के शासक हजाज की मृत्यु के बाद उसके स्थान पर ‘सुलैमान’ बैठा, जो हजाज और उसके कर्मचारियों का घोर विरोधी था और हजाज से व्यक्तिगत शत्रुता रखता था। इसी वजह से सुलैमान ने हजाज के समय नियुक्त सभी कर्मचारियों एवं उसके वंश के लोगों को हटाकर अपने लोगों को नियुक्त कर दिया, जिससें की उसके खिलाफ कोई षढ़यंत्र न हो सके। यही नही सुलैमान ने इराक के बाहर नियुक्त किये गये, अरब सरदारों को भी वापिस बुला लिया। इनमें से सिन्ध में नियुक्त हजाज का भतीजा मोहम्मद बिन कासिम भी था और अंत में अपनी व्यक्तिगत शत्रुता लेने के लिए मोहम्मद बिन कासिम की हत्या करवा दी।

अनुवादक बाबू रामचन्द्र वर्मा लिखते है कि जब कासिम सिन्ध से लोट रहा था तब सिन्ध की प्रजा ने अपने सुशील एवं न्यायी विजेता के वियोग्य में आसू बहाये और उसकी स्मृति में उसकी मुर्ति बनाकर स्थापित की। इसके बाद सिन्ध में अरब के कई शासक आये और इराक के समाज्य में यह एक परिवर्तन हुआ कि शासन का केन्द्र दमिश्क से हटाकर बगदाद कर दिया गया। इस परिर्वतन से यह हुआ कि भारत को अरब सम्राज्य के केन्द्र से बहुत अधिक पास कर दिया और 759 ई.वी. में हिशाम नाम का सुबेदार सिन्ध का शासक होकर आया और इसने उमर बिन जमल नामक एक अधिकारी को जहांजो का एक बेड़ा देकर गुजरात की ओर भेज दिया, परन्तु वह थोडे दिनों में ही विफल होकर सिन्ध की ओर वापिस हो चले। इससें हिशाम का अपमान हुआ और अंत में वह स्वयं एक जहांजी बेड़ा लेकर भड़ोच के पास पहुंचा और अधिकार कर लिया। अपनी इस विजय को स्थाई रखने के लिए उसने भड़ोच में एक मस्जिद बनाई और यह गुजरात देश में इस्लाम का पहला चरण था और यह सिन्ध को छोड़कर बाकी ‘सारे भारत में पहली मस्जिद’ थी।

संतोष कुमार लड़िया

एम.ए. इतिहास

उज्जैन (मध्यप्रदेश)

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