भारत की कहानी, अरबों की जुबानी लेख अंक-04


दक्षिणी भाग से , भारत में इस्लाम का प्रवेश !

भारत और ईरान में लगभग एक ही समय में मुसलमानों का प्रवेश हुआ था, जैसे भारत में छटवी शताब्दी केे प्रारम्भ में इस्लाम का प्रवेश हुआ ठीक वैसे ही ईरान में भी लगभग इसी समय इस्लामी आक्रमण हुये और यह आक्रमण धर्म प्रचार के लिये कम आर्थिक दृष्टि से अधिक हुये है। जैसा कि सिन्ध प्रांत एवं उत्तर भारत का सबसे पुराना इतिहास यदि कहीं मिलता है तो उस पुस्तक का नाम ‘चचनामा’ है, जैसा कि इतिहासकार ईलियट साहब ने कहा है। चचनामा मूलतः अरबी पुस्तक है, जिसको तारी खुस् सिन्द बल हिन्द भी कहां जाता है। मुहम्मद अली बिन हामिद बिन अबूबकर कूफी ने नासिरूद्दीन कवाचा के शासनकाल में सिन्ध के उच नामक शहर में इसका ( सन् 613 हि. या सन् 1216 ई.) फारसी अनुवाद किया था।

सामान्यतः इतिहास को पढ़ने पर यह देखने में जान पड़ता है कि महमूद गजनवी के समय पर एक भी मुसलमान म्लेच्छ का पैर भारत की पवित्र भूमि पर नही पड़ा था। हिन्दू और मुसलमानों में परस्पर किसी भी प्रकार का संबंध स्थापित नही था। दोनों में न किसी भी प्रकार की जान पहचान थी और न ही आना जाना था। ऐसा सच नही है; क्योंकि महमूद गजनवी के पहले भी कई मुसलमनों का प्रवेश हो चुका था। भारत और खैबर की घाटी के, उस पार के देशो में सदा से बराबर लड़ाईयां होती रही और आपस मे मेल-मिलाप भी चलते रहे। भारत में इस्लाम के पहले इन देषों की यह स्थिति थी कि जब अफगानिस्तान काबुल का बादशाह शक्तिशाली हो गया, तब उसने वैहिन्द और पेशावर तक अधिकार कर लिया। ऐसे ही जब भारत के शासकों ने अपना बाहुबल दिखाकर काबुल और कंधार को अपनी सीमा में मिला लिया जाता था, कभी किसी समय ईरान के बादशाह नेे मकरान से सिन्ध नदी तक अपना अधिकार कर लिया था और कभी सिन्ध के राजा ने वलोचिस्तान और मकरान, यहाँ तक की ईरान की सीमा से अपनी सीमा मिला ली थी और सातवीं शताब्दी तक ऐसा ही चलता रहा।

मुसलमानों ने भारतीय शासकों के साथ, जो युद्ध किये थे वे केवल धार्मिक नही थे बल्कि आर्थिक और राजनैतिक विचारधारा से प्रेरित थे और इनमें आपसी विवाद शताब्दीयों से ही चला आ रहा है। भारत में बाहरी लोग, केवल इसलिये आये, क्योंकि सत्ता प्राप्ति के संघर्ष में राजा और मंत्री आपस में ही लड़ रहे थे, जैसे बघेल राजा और उसके मंत्री माधव के आपसी विवाद और मनमुटाव के कारण और शत्रुता की वजह से ही सन् 1296 ई.वी में अलाउद्दीन खिलजी गुजरात का हाकिम बन गया था और धीरे-धीरे समुद्र के किनारे-किनारे कोरोमंडल तक अपना अधिकार कर लिया था और उसकी विजयों का क्रम उस जहाज की तरह था जो अपने बल से समुद्र का कलेजा चिरता हुआ आगे बड़ता है। उसी तरह अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली से आकर दो-ढ़ाई हजार किलोमीटर दूर दक्षिण भारत के केरल तक पहुॅच गया। अलाउद्दीन खिलजी के सैनिक अधिकारी मलिक कपूर ने कर्नाटक को सन् 1309 में जीत लिया था, परन्तु दक्षिण भारत में ही विजय नगर साम्राज्य एक ऊँची दिवार के जैसे मुस्लिम आक्रमणकारियों का मुकाबला कर रहा था और दक्षिण भारत में विजय नगर साम्राज्य ही इतना शक्तिशाली था कि वह मुस्लिम एवं उसकी संस्कृति से लोहा ले रहा था। परन्तु मलिक काफूर ने कोरोंमडल एक छोटा सा मुस्लिम राज्य स्थापित कर लिया था परन्तु यह स्थाई नही रहा, क्योंकि लगभग 40 वर्ष बाद मलिक काफूर के द्वारा स्थापित किये गये साम्राज्य को अपने विजय नगर के द्वारा पुनः अपने साम्राज्य मे मिला लिया गया था।

भारतीयों एवं विदेशी मुसलमानों के बीच सत्ता एवं संपत्ति के लिये, जो संघर्ष चल रहा था आपस में लड़ाई-भिड़ाई हो रही थी और रियासतों की सीमाओं पर चढ़ाईयां हो रही थी। इन विवादों से दूर कुछ ऐसे विदेशी अरब मुसलमान और ईराकियों की बस्तीयां थी, जो उत्तर भारत से चल कर दक्षिण में भू-मार्ग से नही आये थे बल्कि यह भारतीय रियासतों से व्यापार करने के उपद्देश्य से समुद्री जहाजों के रास्ते दक्षिण भारत में कई बस्तीयां बसाकर बसे हुये थे। इनको चल रही आपसी विवाद से किसी भी प्रकार का मतलब नही था और न ही किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप करते थे। इन लड़ाईयों के बीच में यहाँ बराबर अरब आते-जाते थे। उत्तरी भारत से पहले दक्षिण भारत में मुसलमानों ने अपने उपनिवेश स्थापित कर बस्तीयां बसाई थी और इनका संबंध असल में व्यापार के लिये ही देशी रियासतों से था, और इनसे प्रभावित होकर ही भारतीयों ने इस्लाम को स्वीकार करना प्रारम्भ कर दिया। इसके आर्थिक, धार्मिक एवं राजनैतिक कारण हो सकते थे।


भारत में इस्लाम का पहला केन्द्र:-

मालाबार क्षेत्र दक्षिण भारत में स्थित हैं, जिसका अधिकांश भाग समुद्रीय सीमाओं को छूता है। यही वजह रही कि समुद्री मार्गो से कई गैर भारतीय विदेशी लोग इस क्षेत्र में आया जाया करते थे और इसे भारत का अंतिम तट भी कह सकते है। इसको हिन्दूओं के शासनकाल में केरल भी कहते थे और आज भी केरल ही कहते है। लेकिन कही-कही इस क्षेत्र को मालाबार भी कहा जाता है। मालाबार इसलिए कहां जाता है कि यह मलय पर्वत इस प्रदेश में है। अरबी एवं भूगोल के लेखकों ने इसकी सीमा गुजरात की अंतिम सीमा से लेकर कोलम नामक स्थान तक बताई है। जो आज टवणकोर में स्थित है। अरबी पुस्तक तोहफतुल् मुजाहिदीन में एक प्रवाद है, जिसे ‘फरिश्ता’ ने उद्घृत किया है और जो इस प्रकार है-

‘‘ इस्लाम से पहले और इस्लाम के बाद यहूदी और ईसाई व्यापारी केरल में आया करते थे और यहाँ रहने लग गए थे। जब इस्लाम का प्रचार हुए दो सौ बरस बीत गए, तब अरब और अजम (फारस) प्रदेश के कुछ मुसलमान फकीर, जो हजरत आदम के चरण-चिन्हों के दर्शन करने के लिये सरन्दीप, जिसे लंका कहते है, जा रहे थे। संयोग से उन लोगों का जहाज हवा के झोके से बहक कर मालाबार के कदनकोर (कडंगानोर) नामक नगर के किराने आ लगा। नगर के राजा जैमोर (सामरी) ने इसकी बहुत आव भगत की। बातों बातों में इस्लाम की चर्चा आई। राजा ने कहा कि मैंने यहूदियों और ईसाइयों के मुँह से तुम्हारे पैगम्बर और धर्म का हाल सुना है। अब तुम आप सुनाओं। उन फकीरों ने इस्लाम धर्म के तत्व ऐसे प्रभावशाली रूप में बतलाए कि उस पर राजा मोहित हो गया। राजा ने उनसे वचन ले लिया कि लौटते समय भी वे इसी मार्ग से जायेगे। अपने वचन के अनुसार लौटते समय भी वे वहाँ आये। राजा ने सब अमीरों को बुलाकर कहा कि अब मैं ईश्वर का स्मरण करना चाहता हूँ। यह कहकर उसने सारा देश अपने कर्मचारियों में बराबर बाँट दिया और आप छिपकर उन फकीरों के साथ अरब चला गया। वहाँ जाकर वह मुसलमान हो गया; और उसने उन फकीरों से कहा कि मालाबार में इस्लाम का प्रचार करने का उपाय यह है कि तुम लोग मालाबार से व्यापार करना आरम्भ करों। और अपने अमीरों के नाम उसने इस आशय का एक पत्र लिखकर उन लोगों को दे दिया कि इन विदेशी व्यापारियों के साथ सब प्रकार से दया और अनुग्रह का व्वहार किया जाए औश्र हर अच्छे काम में इनकी सहायता की जाय। इन्हे अपने उपासना-मन्दिर बनाने की आज्ञा दी जाय; और इनके साथ ऐसा अच्छा व्यवहार किया जाए कि ये लोग वहीं रहने लगे और उसी देश को अपना देश बनाने की इच्छा करें। उसी समय से अरब यात्री इस देश में आने जाने और रहने सहने लगे।’’

एक प्रमाण और मिलता है कि जिसको फरिश्ता ने ही लिखा है- इसमें कहां गया है कि ‘‘जैमूर के मुसलमान होने की घटना स्वयं पैगम्बर मुहम्मद साहब के समय में हुई थी।’’ इस प्रवाद के अनुसार ये फकीर लोग फिर मालाबार लौट आए। उन्होने कदनकोर में मस्जिद बनवाई। उनमें से कुछ लोग तो वहीं रह गए और कुछ लोग वर्तमान ट्रावन्कोर के कोलम नगर में चले गए। वहाँ भी उन्होने मस्जिद बनवाई। फिर हेली, मारावी, जरपट्टन, फन्दरनिया (पंडारानी), चालियात, फाकनौर और मंगलौर में मस्जिदें बनवाई और उपनिवेश स्थापित किए।’’ फरिश्ता के कथन का जो सारांश है वह मूलतः तोहफतुल् मुजाहिदीन के विवरणों पर आधारित है और यह मालाबार के ऐतिहासिक जानकारी भी देते है। पर इसमें और भी ऐसे कई उदाहरण है जो लगभग एक हजार वर्ष पुराने है और यह तत्कालीन समय की संस्कृति और उसके इतिहास और रंग ढ़ंग का वर्णन करते है। यहाँ इस प्रकार है कि ‘‘ मालाबार के यही मुसलमान अरब व्यापारी, जो अपना देश छोड़ कर यहाँ आकर बस गए थे, भारत में मोपला और नायत के नामों से प्रसिद्ध हैं। पुर्तगालियों के आने से पहले तक समुद्र का सारा व्यापार इन्हीं लोगों के हाथ में था। उस देश के जो निवासी पीछे से मुसलमान हो गए थे जो लोग उनके साथ ब्याह शादी करके उनकी बिरादरी में हो गए थे, वे भी उन्ही लोगों में मिल गए है। इस प्रकार अरब लेखकों ने मालाबार को इस्लाम का तीसरा केन्द्र बताया है और यह पर अधिकतर अदन देश के जहांज आया करते थे। और यह के व्यापारी तथा मुसलमानों ने एक अपना मोहल्ला बसा लिया था, इसलिये एक मस्जिद का निर्माण भी किया। अरब के लोग कोलम को ‘मसालेंवालें’ देश का अंतिम नगर भी कहते थे। मालाबार में हूनोर से इब्न बतूता का जहाज इसके तट पर आकर रूका था और वह इस इलाके में दो माह तक यात्रा करता रहा। इब्न बतूता कहता है कि यह काली मिर्ची वालों का देष है। इसमें छोटे और बड़े मिलाकर कुल 12 हिन्दू राजा शासन करते है। बड़े राजाओं के पास पचास-पचास हजार तथा छोटे राजाओं के पास तीन-चार हजार की सेना जमा है। सभी की सीमाऐं आपस में छूती है महल के दरवाजे लकड़ी के है जिन पर राजाओं के नाम लिखे है। परन्तु इब्न बतूता एक महत्वपूर्ण बात यह भी लिखता है कि यह भी हिन्दू राजा मुसलमनो का बड़ा आदर किया करते थे। लकड़ी की दुकान और चबूतरे बने हुये थे, इनमें हिन्दू और मुस्लिम व्यापारी तथा अन्य देषों के व्यापारी भी ठहरते थे औश्र विश्राम किया करते थे। दुुकान और मकानों के पास पानी के लिये कुआ था। हिन्दू सब लोग मुसलमान और विदेषियों को भी इस कुअें से पानी पिलाते थे। परन्तु हिन्दू लोग मुसलमानों को अपने घरो में अन्दर नही आने देते थे, जिस बर्तन का उपयोग मुसलमान करते थे हिन्दू लोग उसी को दान कर देते थे। लेकिन कई मुसलमान बर्तनों में भोजन नही करते थे वह केलों के पत्तों पर भोजन करते थे। जो भोजन बच जाता था उस भोजन को पशु-पक्षी के लिये उपयोग करते थे। यदि हिन्दू राजा मुसलमान व्यापारियों का सहयोग नही करते, तो उनका व्यापार करना कठिन हो जाता है।

भारत में इस्लाम का दूसरा केन्द्र:-

भारत में इस्लाम एवं प्रचार का दूसरा केंद्र कोरोमंडल या माबर था। मद्रास में मालाबार के सामने दूसरी और जो समुद्री तट है, इसको अरब लोग माबर कहते थे और आजकल इसको कोरोमंड़ल के नाम से जाना जाता है। अरब यात्रीयों और व्यापारियों ने कोरोमड़ल विशेष रूप से प्रसिद्ध था और इस क्षेत्र की ख्याति, प्रसिद्धी अन्य भू भागों से अधिक थी। इसलिए कोरोमंडल आने वालों की तदात अन्य क्षेत्रों से अधिक थी। इस संबंध में इब्न सईद मगरिबी ने हिजरी छठी शताब्दी के अंत में कोरोमड़ल का वर्णन इस प्रकार किया है कि यह कोलम के पूर्व में है और तीन-चार दिन के रास्ते पर दक्षिण की ओर झुका हुआ है। दूसरे जकरिया कजविनी ने हिजरी सातवी शताब्दी में कोरोमंडल का नाम ‘मन्दल’ लिखा है। और यह भी लिखा है कि इस क्षेत्र की लकड़ी बहुत मजबूत और टिकाऊ होती है। यह यहाँ कहता है कि इसके पास कन्याकुमारी नामक स्थान है , जिसको उसने ‘रास कामरान’ लिखा है। समुद्र तट का यह भाग कुछ शताब्दीयों के बाद अरबो के काम में आने लगा था और हिजरी सातवीं शताब्दी से यह अरबों का अच्छा अधिकार दिखने लगा था एवं बहुत अधिक तदाद में अरब लोग यह आने जाने लगे थे। वस्साफ ( मृत्यु सन् 728 हि.) और जामे उतवारीख के लेखक रशीदुद्दीन (मृत्यु सन् 718 हि.) ने हिजरी आठवीं शताब्दी के अन्त में अपनी पुस्तकें लिखी है। यह काल भारत में जलालुद्दीन फिरोजशाह खिलजी का समय था। दोनों ने लगभग एक-सा ही कोरोमड़ल के बारे में लिखा है कि - ‘‘मअबर देश कोलम से लकर सेलवार (नीलौर) तक समुद्र के किनारे तीन फरसंग लम्बा है। इसमें बहुत से नगर और गाँव हैं। यहाँ के लोग अपने राजा को देवार कहते हैं, जिसका अर्थ है धनवान। चीन के बड़े-बड़े जहाज, जिनको जंक या जनक कहते हैं, चीन, माचीन, सिन्ध और भारत के देशों से बहुत से बहुमूल्य पदार्थ और कपड़े यहाँ लाते है। माबर से रेशमी कपड़े और सुगन्धित लकड़ी ले जाते हैं। यहाँ के समुद्र से बड़े-बड़े मोती निकाले जाते है। यहाँ होनेवाली चीजें, इराक, खुरासान, शाम, रूम और युरोप तक जाती है। इस देश में लाल और सुगन्धित घासें उत्पन्न होती है। माबर मानों भारत की कुंजी है। कुछ वर्ष पहले सुन्दर पाॅडे यहाँ का दीवान था। उसने अपने तीन भाईयों के साथ मिलकर भिन्न-भिन्न दिशाओं में अपना अधिकार बढ़ाया था। मलिक तकीउद्दीन बिन अब्दुल रहमान बिन मुहम्मद उत् तैयबी, जो शेख जमालुद्दीन का भाई है, इस राजा का मंत्री था। राजा ने पट्टन और मली पट्टन (पट्टन और मलयपट्टन) और बादल की रियासत उसे सौंप दी थी। माबर में घोड़े अच्छे नही होते; इस लिये इन दोनों में यह समझौता हो गया कि जमालुद्दीन इब्राहीम केश (कैस) नामक बन्दरगाह से चैदह सौ बढ़िया अरबी घोड़े दीवान को ला दिया करे। हर साल फारस की खाड़ी के कतीफ, इलहसा बहरीन, हुममुज आदि बन्दरगाहों से दस हजार घोड़े आते थे और हर घोड़े का दाम दो सौ बीस चाँदी के सिक्के (दीनार) होगे। सन् 692 हि. (1293 ई.) में दीवान मर गया और उसकी सम्पति उसके मंत्रियों, परामर्शदाताओं और नाइयों (नायकों) में बँट गई। शेख जमालुद्दीन उसका उतराधिकारी हुआ। कहते है कि उसे सात हजार बैलों का बोझ सोना और जवाहिरात मिले। और पहले जो समझौता हो चुका था, उसके अनुसार तकीउद्दीन उसका नायब नियुक्त हुआ। ’’

इसी समय के आस पास जब मार्को पोलो यहाँ आया था, तब उसने देखा कि यहाँ का राज्य पाँच हिन्दू राजाओं के हाथ में था। पर यहाँ का व्यापार उस समय भी पूरी तरह से मुसलमानों के ही हाथ में था; और अरब से यहाँ घोड़े आया करते थे। वह लिखता है - ‘‘ इस देश में घोड़े नही होते। हुरमुज और अदन के बन्दरगाहों से व्यापारी लोग हर साल यहाँ घोड़े लाते है और पाँचों राज्यों में हर साल दो-दो हजार घोड़े खरीदे जाते है। एक एक घोड़े का मूल्य पाँच-पाँच सौ दीनार तक दिया जाता है।’’ उसने यहाँ के मोतियों और रत्नों की असीम सम्पति का भी उल्लेख किया है।

इस प्रकार भारत में इस्लाम एक चरणबद्ध तरीके से व्यापार के रूप में सबसे पहले दक्षिण भारत में आया था और यह किसी भी प्रकार की तलवार एवं जंग के सहारे नही बल्कि भारत की संस्कृति एवं उसकी एैतिहासिकता तथा भारत में उत्पादित होने वाले मसाले, औषधिया, फल, आदि किसी उत्पादन से आकर्षित होकर अपने जहांजों का मुख भारत की ओर मोड़ दिया। और कही विदेषी नागरिकों ने भारत को ही अपना घर बना लिया। और हमेषा-हमेषा के लिए भारत में बस गये और आज भी कही अरबीयों, ईरानियों तथा तुर्क की वंशज दक्षिण भारत में ही नही बल्कि उत्तर भारत में भी देखे जा सकते है। यह सही है कि उत्तर भारत से आने वाली मुसलमानों के हाथों में तलवारे थी, लेकिन ये तलवारे सभी उत्तर भारत से होने वाले आक्रमण के आक्रमणकारियों के हाथो में नही थी बल्कि कुछ विदेशी उत्तर भारत से भी व्यापार करने के उद्देश्य से भारत में आये थे।


भारत में इस्लाम का तीसरा केन्द्र:-

मालाबार एवं कोरोमण्ड़ल के बाद इस्लाम का तीसरा सबसे बड़ा केन्द्र गुजरात था, क्योकि इसका भी एक बड़ा भू-भाग समुद्री सीमाओं से लगा हुआ है जिस पर बड़े-बड़े बन्दरगाह आज ही नही सिन्धु सभ्यता के समय से ही थे, इसके प्रमाण भी पुरात्तविक उत्खनन से प्रमाणित हुये है कि हड़प्पा काल में लोथल बन्दरगाह सबसे महत्वपूर्ण बन्दरगाह था। इससे यह सिद्ध होता है कि भारत के संबंध विदेषियों से आज ही नही बल्कि हजारों वर्षो से स्थापित है। अरबों का भी तीसरा सबसे बड़ा केन्द्र भारत में गुजरात, कठियावाढ़, कच्छ और कोंकन था। इस काल मे यह का सबसे प्रतापी राजा वल्लभराय था, जिसके किस्से, कहानिया, विेदेषों में प्रचलित थी। और यह अरब यात्रीयों और व्यापारियों का सबसे प्रिय राजा था। इसकी राजधानी वल्लभीपुर में थी, जो आज के भावनगर के पास एक बहुत बड़ा नगर था और अरब लोग इस नगर को सुदामानगर या महानगर कहा करते थे। आज की भाषा में यह कह सकते है कि राजा वल्लभराय की मेट्रोसिटी थी। पुरात्तविक दृष्टि से यह प्रमाणित होता है कि यह नगर पाँच मीलों तक फैला हुआ था। अध्ययन से यह भी प्रमाणित होता है कि गुजरात में कुछ राजा बौद्ध तथा कुछ राजा जैन थे, दोनों के आपसी झगड़े में ही इस नगर का विनाष हुआ। अरब के लोग चैमूर का जो बन्दरगाह है उसको सैमूर कहा करते थे। गुजरात का यह सबसे बड़ा बन्दरगाह था। इसके बाद खम्भात आदि का स्थान आता है।

सबसे पहला अरब यात्री और व्यापारी, जिसने अपनी यात्रा का विवरण सन् 235 हि. में पुरा किया था, वह और कोई नही बल्कि सुलैमान था। इसने वल्लभराय राजा की बहुत प्रषंसा की और लिखा है कि यह और इसकी प्रजा अरबों और मुसलमानों से बहुत प्रेम करती है; और इसकी प्रजा का यह विष्वास है कि हमारे राजाओं की आयु इसी लिये अधिक होती है। कि वे अरबों के साथ प्रेम का व्यवहार करते है। इन उदाहरणों से यह पता चलता है कि अरब व्यापारियों औश्र नए बसे हुए मुसलमानों के साथ यहाँ के लोगों का बहुत अच्छा और मित्रतापूर्ण संबंध था। यही कारण था कि इस राज्य के नगरों में अरब लोग बहुत अधिक संख्या में बस गए थे और बिलकुल अन्त समय तक बसे रहे थे। इसी प्रकार ताकन या दक्षिण के राजा ओं के संबंध में सुलैमान का कहना था कि यह राजा भी अरब नागरिकों के साथ वैसे ही व्यवहार एवं आचरण करते है जैसे वल्हरा का राजा वल्लभराय अरबों से प्रेम करता है। परन्तु वह यहाँ भी लिखता है कि गूजर शासक अरबों के शत्रु थे।

हिजरी तीसरी शताब्दी के अन्त और चौथी शताब्दी के प्रारम्भ में जब बुर्जुग बिन शहरयार मल्लाह अपने जहाज इधर लाता था तब गुजरात, कठियावाढ़, कच्छ और कोंकन आदि प्रान्तों में अरबों और साधारण मुसलमानों की कई बस्तीयां बस चुकी थी और इन बस्तीयों को इन प्रान्तों के हिन्दू, जैन, बौद्ध शासक अथवा राजा कई प्रकार की सुविधाऐं दिया करते थे। इनको न केवल व्यापारिक स्वत्रंता थी बल्कि यह धार्मिक रूप से भी अपनी परम्पराओं का पालन करने के लिये स्वतंत्र थे। शहरयार को एक ऐसा हिन्दू मल्लाह भी मिला था, जो बाद में मुसलमान हो चुका था और उसने अपने जहांजों से बहुत धन कमाया। बाद में हज भी किया। सैराफ देष का मुहम्मद बिन मुसलिम नाम का एक व्यापारी की भी शहरयार से मुलाकात हुई थी, जो मुबंई के पास थाना नगर लगभग 20 वर्ष से अधिक समय तक रह चुका था। यही नही यह भारत केे कई नगरों में भ्रमण कर चुका था और इन नगरों की सभी विशेषताओं से परिचित था। मुहम्मद बिन की भी मुलाकात चैमूर में (गुजरात का सैमूर) में फसा (फारस का एक स्थान) का एक मुसलमान अबू बकर से भी हुई थी। सैमूर वल्लभराय के राज्य का बहुत बड़ा नगर था, इसमें अरब और वर्णसंकर मुसलमानों की बस्तीया दिन पर दिन बढ़ती जा रही थी। सन् 304 हिजरी में जब मसऊदी भारत आया था, तब केवल एक नगर में दस हजार मुसलमान बसा करते थ। मसऊदी 303 हिजरी में खम्भात भी आया था, और यह भी दक्षिण तथा गुजरात के कई नगरों में घूमा था। इसकी भी वल्हरा के राजा वल्लभराय के प्रति वही सोच थी, जो सोच सुलैमान की थी। यहँ कहता है कि ‘‘ अरबों और मुसलमानों का जितना आदर राजा वल्हरा के राज्य में हैं, उतना सिन्ध और भारत के और किसी राजा के राज्य में नही है। इस राजा के राज्य में इस्लाम का अच्छा आदर और रक्षा होती है। इसके राज्य में मुसलमानो की मस्जिदे और जामे मस्जिदें बनी हुई है, जो हर तरह से आबाद है। यहाँ के राजा चालिस और पचास -पचास बरस तक राज्य करते है। यहाँ के लोगों का यह विष्वास है कि हमारे राजाओं की आयु इसी न्याय और मुसलमानों का आदर करने के कारण बड़ी होती है। गुजरात के राजा की शत्रुता का वही हाल है, और ताकन या दक्षिण के राज्य में भी मुसलमानों का वही आदी है।’’

अरब लोग गोआ को संदापुर कहा करते थे। और यहा का राजा मुसलमान था, जिसको मुसाहब कहते थे, दूसरा नाम इसका मूसा था। इस प्रकार गुजरात एवं उसके क्षेत्रों में इस्लाम तलवार से नही बल्कि जहांजों में व्यापार के रास्ते आया। खम्भायत के संबंध में सुलतान शहाबुद्दीन का समकालीन इब्न सईद मगारिबी कहता है कि खम्भात भी भारत के समुद्री नगरों में से एक है। जहाँ अरब व्यापारी लोग आया जाया करते है। इसके बाद सुलतान शम्सुद्दीन अल्तमष के समय ( सन् 625 हि.) में जामे उल् हिकायात का लेखक औफी सम्भवतः सिन्ध होता हुआ, खम्भात आया था, उसका कहना था कि खम्भात में अच्छे धर्मनिष्ठ मुसलमानों की बसती है। उनकी एक जामे मसजिद भी है और उसका एक इमाम और खतीब ( खुतबा पढ़ने वाला) भी है। गुजरात का राजा, जो नहरवाला में रहता था, इन लोगों के साथ बहुत ही न्याय का व्यवहार करता था।’’

संतोषकुमार लड़िया

उपाधीक्षक

केंद्रीय जेल उज्जैन

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