‘‘भारत रत्न’’ बाबा साहब डॉ भीमराव आंबेडकर जी की जयंती की हार्दिक शुभकामनाये


जन्मः-14 अप्रैल 1891 परिनिर्माणः- 06 दिसम्बर 1956

‘‘अंबेडकर के रूप में शुद्र लोगों को अपना मुक्तिदाता मिल गया है, मुझे पक्का भरोसा है कि आप लोगों की बेडियाँ अंबेडकर ही काटेगे। मेरी अंतरात्मा कहती है कि एक दिन ऐसा आएगा जब अंबेडकर का नाम सारे देश में चमकेगा। इनकी गणना अखिल भारतीय ख्याति और प्रभाववाले पहली पाँत के नेताओं में होगी।

छत्रपति शाहूजी महाराज

कोल्हापुर

14 अप्रैल 1891 ई.वी. को राजजी राव मालोजी की पत्नि भीमाबाई ने अपने चैदवें पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम भीमा रखा गया। इसके पहले 13 बच्चों में से केवल 04 बच्चे जीवित थे, शेष 09 बच्चे किसी कारण वश देहांत हो चुका था। रामजी राव अंग्रेज सेना में एक सुबेदार पद पर नियुक्त थे, इस समय भारत अंग्रेजों के आधीन था। इनकी नियुक्ति महू छावनी में थी, जो आज मध्यप्रदेश के इन्दौर जिले में स्थित है। सुबेदार रामजी राव महार जाति से संबंध रखते थे, जिनके पूर्वज पैतृक रूप से चमड़े के व्यवसाय से जुड़े हुए थे और यह मूलतः अम्बावेद, जिला रत्नागिरी, महाराष्ट्र के निवासी थे। ब्रिटिश शासनकाल में चमड़े के व्यवसाय से जुड़े महार उपजाति के नाम से ही महार रेंजीमेट का गठन किया गया था। दोनों विश्व युद्धों में इस रेजीमेंट ने अपने युद्ध कौशल से कई वीरता के पदक प्राप्त किये। भारतीय सेना में महार रेजीमेंट का उतना ही श्रेय दिया जाता है जितना की राजपूत रेजीमेंट या अन्य रेजीमेंटों को दिया जाता है। आज 06 दिसम्बर को बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर का परिनिर्माण हुआ था, जैसा कि लगभग सभी को ज्ञात है। परन्तु आज उनके जन्म एवं परिनिर्माण के साथ-साथ उन तथ्यों का भी उल्लेख करना अति आवश्यक होगा, जिसने भीमा से बाबा भीमराव अंबेडकर एवं उनका संविधान निर्माता बनने तक का सफर तय किया। इनका साथ देने वाले एवं इनकी विचारधारा का समर्थन करने वाले उन महापुरूषों का उल्लेख करना अति आवश्यक होगा, जिन्होने भीमराव अम्बेडकर का साथ कदम-कदम पर दिया और उनको प्रोत्साहित करने के साथ-साथ वैचारिक साहस भी प्रदान किया। भीमराव अंबेडकर के पैदा होने के एक वर्ष बाद ही उनके पिता रामजी राव का सेना से रिटायमेंट हो गया था और वह महू छोड़कर अपने मूल ग्राम अम्बावेद, जिला रत्नागिरी में रहनेे के लिये चले गये। इनका गुजर बसर केवल सेना में मिलने वाली पेंशन पर ही निर्भर था इसलिये बड़ा परिवार होने की वजह से इनके समक्ष कई प्रकार की आर्थिक कठिनाईया आ रही थी, इसलिये इन्होने अपनी आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिये अन्य व्यवसाय एवं नौकरी करने के लिये विवश होना पड़ा। चुंकि रामजी राव सेना से रिटायर्ड थे, इसलिये इन्हे सतारा के पी.डब्लू.डी. के गोदाम में काम मिल गया और वह अपने सारे परिवार को सतारा में ले आये।

रामजी राव भीमा को स्कूल में दाखिला दिलाने के लिये सतारा के आसपास कई स्कूलों में भटकने लगे, परन्तु जाति प्रथा की वजह से कोई स्कूल भीमा को प्रवेश देने के लिये राजी नही हो रहे थे, जबकि भारत में ब्रिटिश हूकुमत हुआ करती थी। जाति व्यवस्था के सामने ब्रिटिश हुकूमत भी अपने आप को असहाय महसूस कर रही थी। सभी स्कूलों में लगभग 95 प्रतिशत उच्च वर्णीय छात्र ही अध्यनरत् थे परन्तु भीमा के पिता ने हार नही मानी और वह कई नये स्कूलों में दाखिला के लिये अनुरोध करते रहे। कोई भी समाज कभी-भी पूरी तरह नकारात्मक नही होता है, उस समाज में रहने वाले कुछ लोग ही नकारात्मक सोच के हुआ करते है जिनकी वजह से सम्पूर्ण समाज की विचाराधारा पर प्रश्न चिन्ह लगता है। जिस समाज के लोगों के द्वारा स्कूल मेें प्रवेश देने का विरोध किया जा रहा था। उसी समाज के अच्छी सोच रखने वाले लोगों ने भीमा को स्कूल में प्रवेश देना स्वीकार किया और एक दयावान ब्राह्मण हेडमास्टर ने भीमराव को स्कूल में प्रवेश दिया। यह दिन भीमा से भीमराव अंबेडकर बनने का पहला कदम था। चुंकि हेण्डमास्टर पर अपने वर्ण के अन्य लोगों का दबाव था, इसलिये स्कूल में प्रवेश देना स्वीकार किया, परन्तु उन्होने कुछ शर्ते रख दी। वह यह थी कि भीमा किसी अन्य छात्र को स्पर्श नही करेगा, वह अपनी चटाई लाकर दरवाजे के पास ही बैठेगा, पीने का पानी अपने साथ लायेगा, स्कूल परिसर में थूकने की पाबंदी रहेगी, कक्षा में अन्दर प्रवेश नही करेगा आदि शर्तो के साथ भीमराव का स्कूल में प्रवेश हो गया, परन्तु रामजी ने यह कहां कि मैं इस प्रकार की वर्ण व्यवस्था को जानता हूॅ और उनकी प्रथा, परम्पराओं से भलीभांती परिचित हूॅ, परन्तु 05-06 वर्ष का बालक इनसे पूर्णतः अनभिज्ञ है, उसके साथ इस प्रकार का व्यवहार करना अन्याय होगा। यह सुनकर हेण्डमास्टर ने कहां कि मैं भीमा की वजह से अपने समाज वालों से झगड़ा मोल नही लेना चाहता, इसलिये इन शर्तो का पालन करना आवश्यक होगा। रामजी राव ने धन्यवाद देकर चले गये। दूसरे दिन 05-06 वर्ष के बालक को एक पिता यह समझाने का प्रयास कर रहा है कि उसको शिक्षा प्राप्त करने के लिये अन्य बालकों के जैसे व्यवहार नही करना होगा, बल्कि उसको जो हिदायतेे दी है उनका पालन करते हुए शिक्षा प्राप्त करनी होगी, परन्तु 05-06 वर्ष का बालक भीमराव अम्बेडकर इन शर्तो को समझकर शिक्षा ग्रहण करने लगा, इसको तो ईश्वर ही जानता होगा कि उसने इन कठोर शर्तो का पालन कैसे किया होगा? भीमराव के पिता संत कबीर के भक्त थे, जो प्रेम व दया को ही अपना सच्चा धर्म मानते थे और यह संत कबीर छुआ-छूत, जाति-पाती, उँच-नीच, अमीर-गरीब, अडम्बर-पाखंड व सामाजिक ढकोसलों का विरोध करते थे और सरल मानवीयता के समर्थक तथा प्रचारक थे। इनके विचार अछूतों के जख्मी दिलों पर एक प्रकार के मलहम का कार्य करते थे। कबीर और रविदास के विचारों को सुना-सुनाकर भीमराव को शिक्षा ग्रहण करने के लिये प्रेरित किया करते थे, जिसका प्रभाव भीमराव पर मरते दम तक रहा।

ऐसी कई घटनाऐं भीमराव के जीवन में घटीत हुई, जिनका प्रभाव उनके मस्तिष्क पर आजीवन बना रहा। ऐसे ही एक दिन दोनों भाई पैदल ही विद्यालय जा रहे थे, उसी दौरान विद्यालय की और जाने वाली बेलगाड़ी वाले ने उनको बैठने के लिये कहां और यह दोनों बैठ गये। बैलगाड़ी चलने के बाद गाड़ीवान ने उनकी जाति पूछी और दोनों बालको ने आपने आप को महार बता दिया, इतना सुनते ही उसने गुस्से से बैलगाड़ी से धक्के मारके नीचे गिरा दिया और इनको अनेकों गालीया दी तथा दोनों बालकों की पिटाई कर दी। इस घटना को भीमराव ने अपने पिता के गले से लिपटकर रोते हुए बताया और यह पूछने लगा कि क्या केवल जाति के आधार पर उसको बैलगाड़ी से धक्के मारकर दोनों भाई को पिटा गया, इसका जवाब भी उनके पिता रामजी राव के पास नही था और भीमा को समझाकर शांत कर दिया। ऐसी एक और घटना एक दिन विद्यालय में आते समय अकस्मात जोरदार भीषण वर्षा होने लगी, जिस वजह से उनकी पुस्तकें भीगने लगी, इसलिये वह एक मकान की दिवार से चिपककर दोनों भाई खड़े हो गये, जैसे ही मकान मालिक ने उसको देखा और क्रोधित होकर दोनों बच्चों को लाठी से धक्का देकर किचड़ में गिरा दिया, जिससे ंदोनों भाईयों की पुस्तकें एवं कपड़े भी किचड़ में सन गये। इस घटना का भी भीम के बालमन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। समाज मेें व्याप्त अस्पृश्यता की कुपरम्परा से बालक भीम बहुत अधिक आहत हुआ। वह यह सोचने लगा कि बार-बार उसके साथ इस प्रकार का व्यवहार क्यों किया जा रहा है? सवर्णाें का यह व्यवहार कब ठीक हो सकेगा ? क्या पढ़ाई-लिखाई, नौकरी, व्यापार आदि महत्वपूर्ण बातों पर केवल सवर्णों का अधिकार है ? क्या हम पढ़ाई-लिखाई नही कर सकते ? बालक भीमराव के साथ घटित इन घटनाओं ने उसको और अधिक साहसी एवं क्षमता योग्य बना दिया था और उसने यह दृढ़ निश्चिय किया की वह कभी-भी पाठशाला को नही छोड़ेगा और सवर्णाें के समान ही पढ़ाई-लिखाई करेगा। दृढ़ निश्चिय करने के बाद बालक भीमराव नियमित रूप से विद्यालय जाने लगा।

जहां एक ओर छूआछूत एवं अस्पृश्यता की कुपरम्परा के समर्थक थे, वही दूसरी और कई सवर्ण इसके विरोधी थे, इसलिये अस्पृश्यता को अस्वीकार करने वाले एवं दीनहीन बालकों को प्रेम स्नेह, सहयोग एवं प्रोत्साहित करने वाले सर्वण शिक्षकों का भी स्नेह भीमराव को मिल रहा था। सातारा विद्यालय में ही ‘‘पेड़से’’ नामक ब्राह्मण अध्यापक को भीम की शिक्षा के प्रति लगन से प्रभावित होकर वह अपने घर से भीमराव के लिये भोजन लाने लगे। यही नही कई बार वह भीमराव को अपने घर भी ले जाया करते थे और कई बार इन्होने भीमराव को वस्त्र भी भेंट किये। भीमराव यह नही समझ पा रहे थे कि कुछ लोग उनका अपमान एवं अनादर कर रहे है तथा कुछ लोग उनकी इस प्रकार मदद कर उनकी शिक्षा ग्रहण करने में सहयोग कर रहे है। भीमराव को अध्यापक पेड़से की सहानुभूति ने उनके घावों पर मरहम का काम किया। भीमराव अंबेडकर को सरनेम देने वाले एक कट्र सनातनी ब्राह्मण अंबेडकर ही थे। जो बालक भीम से अत्यंत प्रेम एवं स्नेह रखते थे। यह भी अध्यापक पेड़से के जैसे ही बालक भीम की मदद किया करते थे। अध्यापक अम्बेडकर भी भीम के लिये साग-रोटी बांधकर लाया करते थे और भीम को बुलाकर बड़े प्यार से भोजन कराया करते थे, क्योंकि इनको यह ज्ञात था कि भीम की माँ का स्वर्गवास हो गया है।

एक बार स्वयं भीमराव अंबेडकर जी ने स्वीकार किया था कि उन्हे यह कहने में अभिमान महसूस होता है कि उस प्रेम की साग-रोटी का मिठास ही कुछ और थी। अपने बचपन को याद करते ही मेरा हृदय भर आता है। सच्चे रूप में अध्यापक अंबेडकर का मुझ पर बड़ा प्रेम था। इसलिये ही मैने अपने गुरू का नाम ही अपनर सरनेम अंबेडकर बना लिया। यही नही जब भीमराव अंबेडकर द्वितीय गोलमेज सभा में भाग लेने लंदन जा रहे थे तब अध्यापक अंबेडकर ने उनको एक पत्र लिखकर बधाई के साथ-साथ यह उल्लेख भी किया था कि आज मुझे गर्व की अनुभूति हो रही है। यही नही अंबेडकर जी के जीवन में कई सवर्णो के द्वारा इनका सहयोग किया गया। इसी दौरान फरवरी सन् 1913 में पिता रामजी राव की मृत्यु हो जाने के बाद भीमराव अम्बेडकर के ऊपर मानो जैसे कि पहाड़ ही टूट गया हो। पिता की मृत्यु के बाद उनकी शिक्षा में रूकावट आ चुकी थी, जिससें वह और अधिक दुखी होकर मानसिक रूप से टूट चुके थे। आर्थिक कठिनाईयों की वजह से वह आगामी पढ़ाई नही करना चाहते थे, परन्तु अध्यापक कृष्णाजी केलुस्कर भीमराव की योग्यता से बहुत अधिक प्रभावित थे, इसलिये वह स्वयं उनकी आर्थिक मदद कर रहे थे। परन्तु वह इतने सक्षम नही थे, इसलिये इन्होने बड़ौदा नरेश सियाजीराव गायकवाड़ के पास ले गये, जब वह किसी राजकीय कार्य से मुबंई आये हुये थे। यह जरूरत मंद छा़त्रों को आर्थिक सहायता देने के लिये सम्पूर्ण भारत में प्रसिद्ध थे। गुरूजी का परिचय गायकवाड़ जी ने अच्छा था, इसी वजह से भीमराव को बड़ौदा नरेश के पास ले गये। गायकवाड़ नरेश भीमराव क व्यक्तित्व से बहुत अधिक प्रभावित हुए और इन्होने 25 रू. प्रतिमाह की सहायता छात्रवृत्ति के रूप देने के आदेश बड़ौदा सरकार को दे दिये। गायकवाड़ महाराज स्वयं कुपथाओं एवं परम्पराओं के घोर विरोधी थे और इनकी मदद से ही अमेरिका के न्यूयार्क के कोलबिंया विश्वविद्यालय में प्रवेश लेकर अध्ययन करने में सफल हुये। बाबा साहेब ने सन् 1915 में एम.ए. की परीक्षा उत्र्तीण की, सन् 1916 में पी.एच.डी. का कार्य पूरा किया, अक्टूबर 1916 में लंदन के स्कूल आॅफ इकाॅनोमक्सि में प्रवेश लिया। किन्तु धन के अभाव की वजह से शोधप्रबंध प्रकाशित नही कर सके, परन्तु इन्होने सन् 1926 में इन्होने पी.एच.डी. के शोधप्रबंध ‘‘इवोल्यूशन आॅफ प्रोविजन आॅफ फायनेंस इन ब्रिटिश इंडिया’’ प्रकाशित करवाये।

अमेरिका से सन् 1917 में वापिस आने के पश्चात् इनके द्वारा बड़ौदा नरेश के यह सैन्य सचिव के पद पर अनुबंध के अनुसार नियुक्त किया गया, परन्तु जातिवादी व्यवस्था ने इनका पीछा नही छोड़ा और लगातार अपमान सहने के पश्चात् नौकरी छोड़कर मुंबई में सिडन होम विश्वविद्यालय में प्राध्यापक पद पर नियुक्त हो गये। यह भी उँची जाति के छात्रों ने इनसे पढ़ने मना कर दिया, लेकिन बाबा साहेब ने अपनी योग्यता से इस विश्वविद्यालय में लोकप्रिय हो गये और सभी ने इनको स्वीकार कर लिया। परन्तु यह ज्यादा दिनों तक प्राध्यापक नही रहे और यहां से भी नौकरी छोड़कर मुंबई के उच्च न्यायालय में वकालत करने लगे। अब मुंबई के लोग अंबेडकर साहेब के व्यक्तित्व से परिचित हो चुके थे, इसलिये कई लोग उनको एक महान दार्शनिक, शिक्षाविद, कानूनवेता, राजनीतिज्ञ, अर्थशास्त्री और सामाजिक क्रांति के प्रेरणा के रूप में जानने लगे थे। अंबेडकरजी पर सत्यशोधक आंदोलन के जनक एवं जातिवादी व्यवस्था के विरोधी महात्मा ज्योतिराव फूले का बहुत अधिक प्रभाव था जो माली समाज से आया करते थे। यही नही इनके विचारों पर बाबा गाडगे एवं कोल्हापुर के महाराज छत्रपति शाहूजी का भी बहुत अधिक प्रभाव था। यही वजह रही कि वह मांस एवं शराब से हमेशा दूर रहे। अंबेडकर के व्यक्तित्व से प्रभावित कई सकारात्मक विचारधारा रखने वाले सवर्णो के सहयोग मिलने से अछूतोें के उत्थान के लिये कई कार्यक्रम चलाये। सन् 1927 में बहिष्कृत परिषद के नेतृत्व में कायस्थ जाति के ‘आनंत विनायक चित्रे’ ने महाड़ सम्मेलन की स्वयं तैयारी की थी, जिसमें महाड़ नगर पालिका के चवदार तलाब का पानी इस्तेमाल करने के लिये सम्मेलन किया था क्योंकि इस तलाब पर केवल सवर्णो का ही अधिकार था। दिसम्बर 1927 में ही चिंतामण ब्राह्मम्ण गंगाधर नीलकंठ सहस्त्रबुद्धे ने जो स्वयं सनातनी धर्म को मानने वाले थे, इन्होने अपने हाथो से ही हिन्दू धर्म में फैली हुई बुराईयों को मिटाने के लिये मनुस्मृति को अपने हाथों से जलाया था, ऐसे ही अप्पासाहब पटवर्धन, विट्ठल लक्ष्मण फड़के, सेनापति बापट और साने गुरूजी भी अस्पृश्यता निवारण के कार्यक्रम चला रहे थे। इन सब का साथ भीमराव अंबेडकर साहेब को हिंदू धर्म में फैली कुरीतियों को मिटाने के लिये मिल रहा था।

यही नही सवर्ण समाज के ही अध्यापकों ने शुद्र वर्ग को शिक्षा देने के लिये नौकरी से बचे हुए समय में अछूतों की बस्ती में जाकर उन्हे पढ़ाया करते थे। इसलिये पंडित माटे को अछूत अथवा महार मास्टर कह कर उनका अपमान करने लगे थे, परन्तु इसके बाद भी 20 साल तक अछूतों को पढ़ाने के काम में वह लगे रहे, जबकि वह पूना के हिंदू महासभा के पदाधिकारी भी थे। ऐसे ही देवराव विष्णु नाइक ने सन् 1921 से 1929 तक डाॅ. अंबेडकर साहेब का पग-पग पर साथ दिया और यह अंबेडकर साहेब के मार्गदर्शन मेें समाज की बुराईयों को समाप्त करने के लिये समता पाक्षिक पत्रिका का संपादन करते थे। इन्ही के सहयोग से ही अंबेडकर साहेब ने सन् 1928 में साइमन कमीशन के समक्ष अछूतों को अधिकार दिलाने के लिये एक ज्ञापन सौंपा था जिसमें अछूतों को रोजगार, शिक्षा एवं दलित वर्गो के प्रतिनिधि सरकार में रखने का भी उल्लेख किया गया था। यही वजह रही कि 30 सिंतबर सन् 1932 को मुंबई में ‘‘दि एंटी अनटचेबिलिटी लीग’’ की स्थापना हुई। इसमें उद्योगपति घनश्यामदास बिरला इसके अध्यक्ष थे और समाजसेवी अमृतलाल ठक्कर महासचिव नियुक्त हुये। लीग के प्रबंधक मण्ड़ल में 08 सदस्य नियुक्त हुये, इनमें से 03 अछूत वर्ग के थे, इस वर्ग में डाॅ. भीमराव अंबेडकर को भी नियुक्त किया गया। इस मण्ड़ल के द्वारा जातिपात मिटाने, अंतर्जातिय विवाह एवं अंतर्जाति भोज जैसी व्यवस्था लागू करने पर बल दिया। साथ ही हिंदू समाज में कट्रपंथियों को भी उनकी विचारधारा बदनले के लिये कार्यक्रम चलाने की योजना बनाई गई। परन्तु यह सब सफल न हो सका। इसलिये इससे दुखी होकर अंबेडकर साहेब ने हिन्दू धर्म में न रहने का विचार बना लिया और वह अपना धर्म बदलने के लिये अपने अनुयायीयों से विचार-विमर्श करने लगे। एक सभा में अंबेडकर साहेब ने कहां कि अधिकांश सवर्ण हमको नीच और अपवित्र मानते है, हम यदि नीेचे की सीढ़ी पर बैठे रहे तो वह हमे शांतिपूर्ण तरीके से बैठे रहेने देगें, यदि हम अपना स्थान बदलकर ऊँची सीढ़ीयों पर चढ़ना चाहे तो हिन्दू वर्ण व्यवस्था हमे स्वीकार नही कर सकती है, इसलिये इस व्यवस्था को त्यागना ही उचित होगा।

सन् 1935 में अहमदनगर जिले के येवला सम्मेलन में अंबेडकर साहेब ने कहां कि मैं अपने बारे में स्पष्ट शब्दों मे कह देना चाहता हूॅ कि ‘‘यह मेरा दुर्भाग्य है कि मैं हिन्दू अछूत के रूप में जन्मा हूॅ यह मेरे वश में नहीं था। किन्तु यह मेरे अधिकार में अवश्य है कि मैं इस अधर्म और अपमानकारी हालत में जीने से इंकार कर दूं। मैं आपसे पक्का वायदा करता हूॅ कि मैं हिन्दू के रूप में नही मरूगाॅ।’’ इसलिये उन्होने 14 अक्टूबर सन् 1956 को नागपुर में बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। जो हिन्दू धर्म की कुप्रथा एवं गैर-बराबरी की वजह से गौतम बुद्ध के द्वारा स्थापित किया गया था। इस प्रकार डाॅ. अंबेडकर हिंदू धर्म की जातिगत एवं छूआछूत की तथा गैर-बराबरी की कुप्रथाओं से दुखी थे, लेकिन वह हिंदू धर्म के पूर्णतः विरोधी नही थे। यही वजह रही कि उन्होने इस्लाम धर्म स्वीकार न कर बौद्ध धर्म को स्वीकार किया और जीवनभर संघर्ष करने के बाद 06 दिसम्बर सन् 1956 को दिल्ली में बाबा साहेब का परिनिर्माण हो गया। हम सब को बाबासाहेब अंबेडकर की शिक्षाओं, जो उन्होने जीवन भर पूरे भारत में घूमकर अछूत एवं वंचित वर्ग को दी थी, वह हमेशा पुरूष एवं महिलाओं को सम्मेलन एवं कार्यक्रमों में कहा करते थे एवं उन्होने खुले मन से स्वीकार किया कि अछूतों की समस्याओं की वजह केवल उच्च जातिया नही है उनको सारा दोष देना भी उचित नही होगा। वह कहते है कि हमारी बस्तीयों में फैली हुई गंदगी के लिये क्या सवर्ण दोषी है? हमारे वर्गो के लिये प्रतिदिन शराब एवं मांस का सेवन करवाने के लिये क्या सवर्ण हमारी बस्तीयों में आते है? हम बच्चों को स्कूल क्यों नही भेजते है? हम अपनी महिलाआंे एवं लड़कीयों को शिक्षा क्यों नही देते है? इसके लिये भी क्या सवर्ण दोषी है? समाज में जो कुरीतिया फैली हुई है इसका जिम्मेदार कौन है इन सभी समस्याओं को कोई और नही बल्कि अनुसूचित जाति एवं जनजाति तथा पिछड़ी जातियों को ही सुधारना होगा। अंबेडकर साहेब का कहना था कि छूआछूत एवं अस्पृश्यता की समस्या का हल हो भी सकता है, परन्तु अपनी बस्तीयों का सुधार एवं पुनर्वास तो हम को ही करना होगा। महाड़ के एक जाटव मोहल्ले में भाषण देते हुए अंबेडकर साहेब ने महिलाओं से कहां था कि आप स्वयं को अछूत मानते हो, इसलिये उच्च जातिय के लोग आपको अछूत मानकर अपमानित करते है इसलिये आप अपने आप को अछूत मत समझो। सफा-सुधरा जीवन व्यतीत करो। स्वच्छ वस्त्रों को धारण करों। इसकी चिंता मत करो की तुम्हारे वस्त्र पुराने एवं फटे हुए है। आपके वस्त्रों की स्वतंत्रता पर कोई प्रतिबंध नही लगा सकता है और न ही आपको स्वच्छ रहने पर, आगे अंबेडकर साहेब कहते है कि मुझको बीड़ी, सिगरेट, शराब किसी से प्रेम नही है, आप लोग भी इनसे प्रेम न करे, क्योंकि यह हमारे अधिकार प्राप्त करने में बहुत बड़ी बाधा है। अपनी बस्तीयों में शराब रोकने का कार्य करो, यदि तुम्हारे पति एवं पुत्र शराब पीकर आते है तो उन्हे खाना मत दो, शराब सभी दोषों को बढ़ाती है। जब तक शराब पियोगे, तब तक अपनी बस्तीयों का विकास नही कर सकते। आगे जोर देकर अंबेडकर साहेब कहते है कि हमको अपना सुधार अपने आप ही करना होगा, कोई ईश्वर या शक्ति आपका उत्थान एवं विकास करने नही आयेगी। वह महिलाओं की सभा में लगातार रात्रि में 04 घण्टे तक सामाजिक सुधारों पर अपने विचारों को रखते रहे।

मालाबार में जो आज केरल के नाम से जाना जाता है, यह पर भी महिलाओं की स्थिती देखकर बहुत दुखी हुये और कहने लगे कि तुम्हारे गांव में ब्राह्मण चाहे कितना ही निर्धन क्यांें न हो वह अपने बच्चों को पढ़ाता है। उसका लड़का पढ़ते-पढ़ते डिप्टी कलेक्टर बन जाता हैं तुम ऐसा क्यों नहीं करती? तुम अपने बच्चों को पढ़ने क्यांे नहीं भेजती? दूसरों की जूठन बटोर कर चाटते रहें? तुम अपने शरीर को नंगा क्यों रखती हो? दुनिया में कहीं औरतें तुम्हारी तरह आधी नंगी नही रहती। यह बुरी बात है। तुम अपना सम्मान बनाओं और कपड़े पहनने का अपना ढँग बदलो। अपने बच्चों का आदर्श बनों और उनके जीवन को पढ़ा-लिखाकर ऐसा ढालों की तुम्हारी संताने योग्य बने और दुनिया में नाम रोशन कर सके। आगे अंबेडकर साहेब भावुक होकर यह कहने लगे कि उनकी माँ भीमाबाई उनको छः वर्ष की उम्र में छोड़कर चली गई थी तब मेरे पिता रामजी राव ने मुझे माँ एवं पिता दोनों का प्यार देकर इस योग्य बनाया कि मैं आज आप लोगों के सामने खड़ा हुॅ। मेरे जीवन में मेरे पिता, मेरे आदर्श एवं मार्गदर्शक थे। उन्होने मेरे जीवन को खुशहाल बनाने के लिये एक-एक पाई मेरे लिए लगा दी थी। मैंने मेरे पिता से ही सीखा की बीड़ी, सिगरेट, शराब एवं बुरी आदतों से कभी-भी प्रेम नही करना चाहिए। अंबेडकर साहेब के इस उदबोधन का सभी लोगों पर व्यापक प्रभाव पड़ा और अगले दिन ही सभी महिलाऐं स्वच्छ, पूरे वस्त्र पहनकर आयी और उन्होने बाबा साहेब को फूल अर्पित किये। इससे उत्साहित होकर बाबा भीमराव अंबेडकर मालाबार में प्रचार करते रहे और इन्ही के प्रयासों से धीमे-धीमे शुद्र बस्तीयों में सुधार होने लगा। उन्होने हमेशा यह स्वीकार किया कि समाज में सभी सवर्ण बुरे एवं कंुठित विचारधारा के नही है बल्कि ऐसे कई सवर्ण नागरिक है जो जातिवाद एवं कुप्रथाओं के घोर विरोधी है तथा जिन्होने भीमराव अंबेडकर का कदम-कदम पर साथ दिया था।

भारत के स्वतंत्र होने के बाद डाॅ. अंबेडकरजी ने कहां था कि ‘‘देश स्वतंत्र हो गया। सैकड़ों वर्षो की पराधीनता छूट गई। हमारा देश है और हमारा कानून। सभी को बराबरी के अधिकार मिल चुके हैं। अब राष्ट्र-निर्माण का प्रश्न आगे खड़ा है। संविधान निर्माण समिति के अधिकांश सदस्य सवर्ण ही थे। सभी ने मिलकर आप सबको बराबरी का दर्जा दिया है। यह केवल मेरे करने से ही नहीं हो जाता। इसमें सभी ने अपनी-अपनी सदाशयता का परिचय दिया है। अब दलित अपने आपको अकेला न समझे।’’ इसलिये छूआछूत एवं जातिवाद को मिटाकर वंचित एवं शोषित वर्गो में शिक्षा का प्रचार-प्रसार करना अति आवश्यक है क्योंकि शिक्षा के प्रकाश से ही अंधकार समाप्त होता है। हम सब बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर की दी गई शिक्षाओं पर चल कर देश एवं समाज का विकास करेगें, तभी भारत रत्न बाबासाहेब को सच्ची श्रृद्धांजली मानी जावेगी।

संतोष कुमार लड़िया

उज्जैन (म.प्र.)