औरंगजेब संत या शैतान ?


मुगल साम्राज्य की स्थापना भारत में पानीपत के सन् 1526 ई. के प्रथम युद्ध के बाद एक मुस्लिम शासक बाबर ने दूसरे मुस्लिम शासक इब्राहीम लोधी को पराजित कर की थी। मगर यह बाबर उत्तर भारत में आगरा से नीचे नही आ सका; क्योंकि वह आपस में ही लड़ मर रहे थे। सन् 1530 ई. में बाबर की बीमारी की वजह से मृत्यु हो गई। इसके बाद बाबर के चाल साल के शासन के बाद ही उसका पुत्र हूमायू 1530 ई. में दिल्ली की गद्दी पर बैठा। परन्तु दूसरे मुस्लिम शासक शेर शाह सूरी ने 1545 ई. के कलिंजर युद्ध में हूमायू को पराजित कर एक बार पुनः मुगल शासक को भारत की सीमा से बाहर निकलने पर विवश किया था। परन्तु हूमायू ने एक बार पुनः भारत पर कब्जा करने के लिये अपने पुत्र अकबर को सेनापति बैरम खां के नेतृत्व में पुनः 1561 ई. में पानीपत के द्वितीय युद्ध में अंतिम हिन्दू शासक हेमू को छल से पराजित कर पुनः भारत के उत्तरी भाग में मुगल सत्ता को स्थापित किया। बाद में अकबर ने अपना राज्य विस्तार राजस्थान, बंगाल, खानदेश के निचले इलाकों तक किया। अकबर का पुत्र जहागीर, चित्रकला का शौकिन था, जहांगीर का पुत्र शाहजहां, जिसने भारत में कई इमारतों का निर्माण करवाया। इसके बाद मुगल शासकों में सबसे विवादित एवं क्रूर शासक ने अपने पिता, भाईयों, एवं अन्य उत्तराधिकारियों की निर्मम हत्या कर दिल्ली की सल्तनत को कब्जा करने में सफल हुआ। ऐसे क्रूर शासक को कई लोगों के द्वारा जिन्दा पीर एवं सच्चा ईश्वर का सेवक माना है। कई लोगों का कहना है कि वह अपना जीवन यापन टोपिया सिलकर किया करता था। इसलिये कई लोग इसको संत भी कहते है। परन्तु उसके किये गये कार्यो एवं कृत्यों का पाठन कर यह पाठक ही निर्धारण करे कि औरंगजेब संत था या शैतान। औरंगजेब का जन्म सन् 14 नवम्बर 1618 ई.वी. को हुआ था, जब इसके पिता शाहजहाँ दक्षिण भारत में बतौर सुबेदार था। उस समय ‘‘दोहाद’’ नामक स्थान पर पैदा हुआ था। इसकी माॅ मुमताज महल थी, जो कि औरंगजेब अपने माता-पिता की आठवी संतान थी। मुहीद्दीन मुहम्मद औरंगजेब मुगल शासकों में सबसे विवादित एवं तानाशाह शासक रहा हैं, इसनें लगभग 50 वर्ष से अधिक दिल्ली की गद्दी पर बादशाह में रूप में शासन किया था।


पिता को सड़ने भेजा कैदखाने में:-

जैसा कि हम जानते है दिल्ली के सुल्तान शाहजहां के चार पुत्र दाराशिकोह, मुरादबख्श, शूजा एवं औरंगजेब थे। दाराशिकोह इन तीनों में सरल स्वभाव का था, जिसके लिये हिन्दू एंव मुस्लिम दोनों समूह के लोग पसंद किया करते थे। इसमें धार्मिक कट्रता का अभाव था। दाराशिकोह में कई संस्कृत ग्रंथों का अरबी, फारसी में अनुवाद किया। यही सब वजह रही कि शाहजहाँ दाराशिकोह को बड़ा पुत्र होने के नाते तीनों से अधिक पसंद किया करता था। इसलिए औरंगजेब मन ही मन न केवल दारा से नाराज हुआ करता था बल्कि अन्य दो भाईयों से भी मन ही मन बैर रखता था। यह सब शाहजहाँ भली-भांती जानता था, इसलिये भाईयों में किसी प्रकार का विवाद एवं मन मुटाव न हो, इसलिये औरंगजेब को दक्षिण में औरंगाबाद दे दिया था। इसको ही 14 जुलाई 1636 में दक्षिण की राजधानी बना दी गई। परन्तु औरंगजेब की दक्षिण से आ रही शिकायतों की वजह से 1643 ई. में दक्षिण की सुबेदारी से अलग कर दिया था और इसके स्थान पर खानदौरा बहादुर नुसरत जंग को दौलताबाद भेजा। कुछ दिनों बाद गुजराम की सुबेदारी औरंगजेब को विवश होकर पुनः सौप दी। लेकिन 1652 ई. में पुनः दक्षिण की सुबेदारी पर दबाव बनाकर एक बार फिर औरंगाबाद में बैठने में सफल रहा।

बादशाह शाहजहां निश्चिन्त होकर सकुन से दिल्ली में रह रहा था, लेकिन इसी दौरान शाहजहां बीमार पड़ गया। इस समय इसकी आयु 1657 ई. में 67 वर्ष की थी। बीमार होने की वजह से सारा कामकाज दाराशिकोह के द्वारा ही किया जा रहा था। इस समय दिल्ली साम्राज्य की कुल आय छः अरब तीस करोड़ दाम थी। इसकी पुष्टि मोहम्मद शरीफ हनफी ने भी की है। औरंगजेब को ऐसा लग रहा था कि सारी संपत्ति एवं सल्तनत पर दाराशिकोह कब्जा कर लेगा। इस वजह से भी वह दाराशिकोह से शत्रुता रखता था। शाहजहां ने इससे निपटने के लिये सुजा को बंगाल, मुराद को गुजरात और औरंगजेब को दक्षिणी दिया था। बादशाह मूत्ररोग, मल अवरोध और अन्य कई प्रकार की बीमारी से जकड़ गया था। शारीरिक रूप से इतना कमजोर हो चुका था कि वह चलने-फिरने में लाचार था। एक समय ऐसा आया कि मुगल शासकों के शाही परम्परा भी बीमारी के चलते झरोखा दर्शन शाहजहां को बंद करना पड़ा।

जब शाहजहां को यह लगने लगा कि अब शायद स्वस्थ्य नही हो पा रहा है, इसलिये मन की शांति के लिये 18 अक्टूबर 1657 ई. को दिल्ली से आगरा पहुँच गया। यह आकर अपनी प्रिय बेगम मुमताज के मकबरे के पास ही आगरा के किले में शेष जीवन व्यतीत करने का निश्चय कर लिया। परन्तु यह सच भी है कि शाहजहां ने सरदारों की खूबसूरत औरतों को ही नही बल्कि इस बुड्ढे ने दरबार की दासियों को भी नही बख्शा था। जिस मुमताज महल अर्थात ताजमहल के पास इसने जीवन व्यतीत करने का निर्णय लिया था, इसी ने मुमताज की बहन फर्जाना बेगम को अपने बिस्तर पर खींच ले जाने मे संकोच नही किया। केवल शाहजहां मुमताज से ही प्रेम करता था यह इतिहास में भ्रम की स्थिति है। ‘‘शाहजहां जब दिल्ली से आगरा आ रहा था, तब उसने सभी अमीरों एवं अधिकारियों को निर्देश दिया था कि आज से ही सुल्तान दारा को बादशाह मानकर उसकी आज्ञा का पालन करें।’’

औरंगजेब को जब इस घोषणा का पता चला, तब वह आग बबूला हो गया और उसने किसी भी कीमत पर दिल्ली की सत्ता हथियाने के लिये षढ़यंत्र करना प्रारम्भ कर दिया था। इस वजह से चारों भाईयों में एक बार पुनः अशांति और अव्यवस्था का माहौल बन गया। पिता के सामने ही चारों भाईयों में खूनी संघर्ष की स्थिति बन गई थी। दक्षिण से औरंगजेब ने अपनी सेना लेकर उत्तर की ओर निकल पड़ा। इसके साथ गुजरात का सुबेदार मुरादबख्श भी निकल पड़ा।जिसको औरंगजेब ने दिल्ली का सुल्तान बनाने के लिये झूठे सपने दिखाये थे। बाद में इसी को आगरा में जाकर धोखे से गिरफतार करवा दिया और मरने के लिये ग्वालियर के किले में डाल दिया, जिसे बाद में ग्वालियर दुर्ग की दिवार से नीच फैैंक दिया। इस प्रकार औरंगजेब ने ‘‘सत्ता का प्रतिद्वंदी अपने संगे भाई शाहजादें मुरादबख्श को सन् 1662 में मार डाला।’’

दाराशिकोह की शाही सेना में मुस्लिमों के अतिरिक्त राजपूत महाराजा जसवन्तसिंह, रायसिंह सिसौदिया, सुजानसिंह बुन्देला, अमरसिंह चंद्रावत एवं मिर्जा राजा जयसिंह भी शामिल थे, जो औंरंगजेब की सेना का सामना कर रहे थे। परन्तु औरंगजेब की रणनीति के आगे इनकी एक न चल पाई और इनको अपने-अपने क्षेत्रों में वापिस जाना पड़ा।

पिता को बन्दी बनाकर रखा, हिजड़े की निगरानी मेंः-

मुगलकालीन इतिहास में शायद यह पहला उदाहरण मिलता है कि किसी मुगल शासक ने अपने पिता को ही बन्दी बनाया हो। सामूगढ़ जीतने के बाद सबसे पहले औरंगजेब ने अपने भाई मुराद को बधाई दी, जो उसका अंतिम प्रतिद्वंदी था। उसका उत्साह बढ़ते हुये कहने लगा कि यह विजय तुम्हारी और तुम्हारी वीरता के कारण का ही यह नतीजा है। आगे चलकर रमजान के दिनों में 02 जून को वह आगरा पहुंचा और वह जाकर देहरा के बाग मे इसने पड़ाव डाला, यहा पर शाही सेना के अफसर, मनसबदार, हाकिम, सरदार, दरबारी सब आकर औरंगजेब को मिलकर बधाईयां देने लगे। शाहजहाँ ने अपने पुत्र औरंगजेब से मिलने के लिये एक पत्र लिखा, परन्तु औरंगजेब ने अपने पिता से मिलने से इंकार कर दिया और अपने पिता के खिलाफ विद्रोह कर दिया जैसा कि यदुनाथ सरकार लिखते है कि 06 जून को किले का घेराव डाला गया, किन्तु गोलाबारी करने में उसे तोड़ने में औरंगजेब को तोपखाना असफल रहा, फिर उसने किले के पिछले हिस्से पर जहाँ यमुना नदी बहा करती है उस परअधिकार कर लिया और किले में जाने वाले पानी को रोक दिया। जिससें किले के अन्दर अफरा-तफरी मच गई, कुछ दिनों बाद किले में जमा पानी खत्म होने से स्वतः ही किले की जनता बाहर निकलने लगी। ऐसी स्थिति देख शाहजहाँ ने किले के दरवाजे खुलवा दिये और दुखी होकर औरंगजेब से कहने लगा कि ‘‘तेरे से तो वे हिन्दू अच्छे हैं जो मरने के बाद भी अपने पिता को जल पिलाते हैं और एक तू है जो जीवित पिता को पानी के लिये तरसा रहा है।’’ इस पत्र के प्रत्युतर में औरंगजेब ने केवल यह लिखा, ‘‘यह सब आपकी करनी का फल है।’’ औरंगजेब ने ऐसा इसलिये कहा होगा कि उसको ऐसा लगता था कि उसके पिता शाहजहाँ अपने पुत्रों में भेदभाव कर रहे है।

मुगल पुत्र ने मुगल पिता शाहजहाँ को कैद में डालकर कड़ा पहरा लगा दिया, जिससे की यह किसी से मिलकर उसके खिलाफ षढ़यंत्र न कर सके। पिता-पुत्र के बीच इतनी कटुता आ चुकी थी कि औरंगजेब को अपने पिता का अपमान करने में सकुन मिलता था। इसलिए उसने मंनोरंजन के सारे साधनों पर प्रतिबंध लगा दिया था एवं '‘मुतमाद’’ नामक हिजड़े को किले का मुख्य अधिकारी बना दिया, जिसने शाहजहाँ के साथ बहुत सख्ती और कठोर व्यवहार किया। शाहजहाँ इसकी प्रताड़ना से इस कदर तंग आ चुका था कि कई बार उसने आत्महत्या करने की कोशिश की, परन्तु वह ऐसा करने में सफल नही रहा। औरंगजेब की नियत अपने बुढ़े बाप का त़ड़पा-तड़पा कर मारने की रही होगी, इसलिए उसने ऐसा किया। उसकी हरम की सारी स्त्रीयों को भी हटा दिया गया। यहा तक की उसको महल से निकाल कर किले की बुर्ज पर रहने के लिए विवश कर दिया। 08 जनवरी 1666 ई.वी. को शाहजहाँ का पेशाब बंद होकर बुखार आ गया, हाकिमो ने इलाज किया पर कोई लाभ नही हुआं, 22 जनवरी को स्थिति और भी गंभीर हो गई। मुगल बादशाह शाहजहाँ की मृत्यु कब हुई यह किसी को ज्ञान नही हुआ। अंत में उसकी दो पत्नियाँ (‘‘अकबरवादी महल’’,‘‘फतहपुरी महल’’) तथा बड़ी बेटी जहानारा की उपस्थिति में मृत शव को बुर्ज से निकाला गया। अंत में यमुना नदी में शव को नहलाकर बीबी के रोजे अर्थात ताज महल में मुमताज के बाजू मे दफन कर दिया गया।


पिता शाहजहां के बाद भाईयों का किया कत्लः-

सत्ता के लालच में औरंगजेब इस हद तक हिंसक बन चुका था कि उसने अपने पिता के साथ-साथ भाईयों का भी कत्ल किया और करवाया। जिससें की उसकी सत्ता को भविष्य में कोई चुनौति नही दे सके। इस प्रकार का कृत्य शायद ही विश्व के इतिहास में सत्ता के लिये किसी शासक ने किया होगा, जो कृत्य औरंगजेब ने किया।

दाराशिकोह इसका बड़ा भाई था, जो योग्य और संस्कृत का विद्वान था। इसको बन्दी बनाने के बाद औरंगजेब ने जो कृत्य किया, उसको ईश्वर भी माफ नही कर सकता और इसके संबंध में स्वयं औरंगजेब के पुत्र अकबर ने अपना दुख व्यक्त करते हुये एक बार भावुक होकर छत्रपति सम्भाजी महाराज से सन् 1683 ई.वी. में कहने लगा कि ‘‘ मेरे चाचाजान (दारा) कितने बड़े संस्कृत पंड़ित, विद्वान और योग्य व्यक्ति थे। वे दिल्ली की गरीब-गुर्बा हिन्दू और इस्लामी प्रजा के सहारे थे। हमारे दादाजान शाहजहां साहब के वे सबसे प्रिय शाहजादे थे। उस दाराशिकोह को हमारे अब्बाजान ने धोखे से मार दिया था। अपने बचपन का वह दिन आज भी मुझे याद है। हमारे अब्बाजान औरंगजेब हम सभी को साथ लेकर राजमहल की तीसरी मंजिल पर बैठे थे। उसी समय नीचे रास्ते से भिखारियों से भी गंदा दिखने वाले एक व्यक्ति का जुलूस जा रहा था। उसके आगे पीछे शहनाई, झाँझ और तुरूहियाँ बज रहे थे। पीछे चलने वाले सभी लोग शाही दरबार के दिखाई पड़ रहे थे।

‘‘सभी के बीच में कीचड़ और गोबर से सनी एक रूग्ण हथिनी चल रही थी। उसकी पीठ के हौदे में कोई मूलतः गौरांग किन्तु किस्मत की मार से काला हो गया एक तरूण बैठा था। उसके शरीर के शाही लिबास चिथड़़े-चिथड़े कर दिया गया था। उसके शरीर पर सूखे रक्त के धब्बे थे। किसी ने उसे बेदम करके मार था। फटे कपड़ों में सिर नीचा किये बैठे उस अभागे व्यक्ति के पीछे एक चौदह वर्ष का लड़का खड़ा था। वह लड़का भयभीत बकरी की तरह चारों ओर देख रहा था। उस पर मेरी नजर पड़ते ही मैं चौंख गया। बादशाह से चिल्लाकर बोला-‘‘ अब्बाजान आपने हाथी पर बैठे उस लड़के को देखा ? वह तो अपना सिफीर था। जो १३ वर्षीय दाराशिकोह का पुत्र था।

दुखी होकर अकबर ने यह भी कहां कि जब मैं छोटा था, तब मैने अपने पिता औरंगजेब से पूछा था कि ‘‘ मेरे चचाजान और सिफीर भैया की ऐसी बुरी हालत किसने बनाई ? कौन है वह मूर्ख मनुष्य ? कहाँ है वह ? इस पर मेरे अब्बाजान ने मेरी नाक पर ऐसा घूँसा मार कि मैं चक्कर खाकर बगल में गिरकर कुछ समय के लिए बेहोश हो गया। दो दिनों के बाद मैंने उसी दुर्बल हथिनी की पीठ पर चचाजान की सूखी लाश देखी थी। कुछ दिनों के बाद हमारा पाठशाला में पढ़ने वाले सरदारों के बच्चों ने मुझे एब हकीकत बताकर- मरने के पहले हमारे चचाजान और सिफीर को एक अँधेरी कोठरी में रखा गया। एक रात जब बादशाह के जल्लाद उस कोठरी में घुसे, मशाल के उजाले में कत्ल करने वालों की डरावनी सूरत को छोटे सिफीर ने देखा तो वह छिपकली की तरह अपने पिता से लिपट गया। वह गाय के बछड़े की तरह रँभाने लगा। वह उन दुष्टों से प्रार्थना कर रहा था-नहीं, हमें आपका तख्त नहीं चाहिए, ताज नही चाहिए। हम दोनों यह देश छोड़कर चले जाते हैं। किसी दूसरे देश में जाकर, हाथ में कटोरा लेकर अल्लाह के नाम पर भीख माँगेगे। लेकिन हमारे अब्बाजान को मत मारो। जैसा किसी के कपड़े फाड़कर उसके टुकड़े फेंक देते हैं उसी प्रकार उन दुष्टों ने छोटे सिफीर को खींचकर अलग फेंक दिया। उस समय चचाजान भी अत्यन्त दीन स्वर में कह रहे थे- ‘‘मेरे छोटे भाई औरंगजेब को मेरा सन्देश दो- तुम्हारा तख्त और ताज तुम्हें मुबाकर हो। हमें भिखारियों के कटोरे दे दो। किन्तु हम बाप बेटे को जीने दो।

औरंगजेब ने अपने भाई दाराशिकोह को पकड़कर अपने बीमार पिता को उसका सिर काटकर मिठाई के डिब्बे में रखकर शाहजहां के पास भेज दिया था। कटे सिर को देखकर शाहजहां की रूह कांप गई। यही नही दाराशिकोह की बीबी बेगम उदयपुरी को भी जबरन अपनी पत्नि बनाकर उसका बलात्कार करता रहा। इसकी पीड़ा स्वयं उदयपुरी बेगम ने व्यक्त की थी। यही नही उदयपुरी बेगम की लड़कीयों से अपने ही पुत्रों का जबरन निकाह करवाया।

षढ़यंत्र से औरंगजेब ने अभी तक अपने भाई मुरादबख्श को महसूस नही होने दिया कि वह सत्ता का भूखा है, उसके साथ वह ऐसा व्यवहार करता रहा जैसे कि उसे सिंहासन पर बैठना ही न हो। मुरादबख्श स्वभाव का सीधा और हृदय से निष्कपट था । इसलिये वह अपने बडे भाई औरंगजेब की चालाकी व चतुराई में फंस गया और औरंगजेब एक ऐसा अवसर ढूंढ रहा था, जिससे की मुराद स्वयं उससे दुश्मनी मोल ले ले। औरंगजेब कभी-भी अपने विरोधी को सहन करने वाला नही था, इसलिए वह दिल्ली सल्तनत के एक मात्र प्रतिद्वंदी मुरादबख्श को रास्ते से हटाने की रणनीति बना रहा था और बेचारा मुराद इसको समझ नही पाया। औरंगजेब ने मुराद की सबसे बड़ी कमजोरी शराब, और अय्याशी थी, इस कमजोरी का लाभ उठाने के लिए उसने अच्छी विदेशी , मंहगी शराब का प्रबंध मुराद को करने लगा और अपने सैनिकों को कहां कि इसको इतनी पिलाओं की इसका नशा न उतरे और बेहोशी की अवस्था में रहे। एक दिन शाहजादा मुराद अपने बड़े भाई औरंगजेब से मिलने बड़ी प्रसन्नता से औरंगजेब के पडाव पर आया और दोनों एक साथ बैठे, मुराद के लिए शराबऔर कबाब का प्रबन्ध औरंगजेब के द्वारा किया गया। बेचारा मुराद शराब पीते-पीते बेहोश हो गया, तब उसके हथियार छीन ने कर औरंगजेब ने अपने भाई, जिसने दाराशिकोह को परास्त करने में तन, मन, धन एवं सेना से मदद की थी, उसको बंदी बना लिया और चालाकी से रात में ही ग्वालियर ले जाकर ग्वालियर के दुर्ग में डाल दिया। मुराद की सेना को जब यह पता पड़ा, तो कुछ अमीर और मनसबदार औरंगजेब की सेवा में आ गये, जिन्होने विद्रोह किया, उनको बेहरहमी से कुचल दिया गया। इस प्रकार औरंगजेब ने अपने तीनों भाईयों को ठिकाने लगा दिया और अपने वृद्ध पिता शाहजहाँ को ताज महल के सामने आगरा के किले मेें कैद कर दिया। मुराद तीन साल तक ग्वालियर किले में कैद रहा, अंत में दिल्ली की सल्तनत पर बादशाह बनने का सपना चकना चूर हो गया और 04 दिसम्बर 1661 ई.वी. में काजी के आदेश से दो गुलामों ने कैदखाने में ही उसकी हत्या कर दी और कफन पहनाकर किले की दिवार से बाहर फैंक दिया। इस प्रकार मुगल शाहजादे की हत्या मुगल शाहजादे ने ही कर दी, इसलिए यह सही कहां है कि सत्ता, संपत्ति और शक्ति पाने के लिए व्यक्ति कभी-भी किसी को भी खत्म कर सकता है, चाहे वह उसका धर्म एवं परिवार ही क्यों न हो ?

ऐसे ही औरंगजेब ने अपने तीसरे भाई सुजा को भी षढ़यंत्र पूर्वक मार दिया। तीनों भाईयों को मारने के बाद 09 मार्च 1665 ई.वी. को आगरा के किले पर दूसरी बार राजतिलक करवाया। इस प्रकार इसने अपने पिता और तीन भाईयों की हत्या करने के बाद दिल्ली की सत्ता पर एकाधिकार करने में सफल रहा।


अपने ही बच्चों का औरंगजेब ने करवाया कत्ल:-

औरंगजेब की सत्ता के बीच में जो भी आया, उसको इसने हिंसात्मक तरीका अपनाकर दमन किया। चाहे वह उसका पिता एवं भाई के साथ-साथ उसकी स्वयं की औलाद ही क्यों न हो। अपने पिता के अत्याचारों से तंग आकर औरंगजेब के पुत्र अकबर ने विद्रोह कर दुर्गादास एवं छत्रपति सम्भाजी की शरण में पहुॅच गया था। यह सभी औरंगजेब को सत्ता से हटाने के लिये रणनीति बना रहे थे। इसमें औरंगजेब की पुत्री जैत-उन-निस्सा , जिसको वह बहुत चाहता था। इसके द्वारा अपने भाई अकबर का पिता के अत्याचारों के खिलाफ मदद की थी, इसलिये 35 वर्षीय लाड़ली शहजादी को गिरफ्तार कर बंदी बनाया, परन्तु वह अपने पिता के अत्याचारों एवं उसके कार्यो की निंदा करती रही, इसलिये अत्याचारी औरंगजेब ने अपनी 35 वर्षीय पुत्री को दिल्ली के पास सलीमगढ़ के किले में कैद कर दिया और इसकी मौत भी अपने दादा एवं चाचाओं के जैसे हुई भयानक स्थिति में हुई।

इसी प्रकार अकबर और आजम दोनों पुत्रों ने भी औरंगजेब के खिलाफ बगावत की थी। परन्तु अकबर दुर्गादास एवं छत्रपति सम्भाजी की मदद लेकर इरान भागने में सफल हुआ था और वहां जाकर अपने पिता के साम्राज्य को उखाड़ फेंकने के लिये योजना बनाने लगा। परन्तु शाहजादा आजम जो भागने में सफल नही हुआ, जिसने अपनी माँ दिलरूबा बानो की याद में औरंगाबाद में बीबी का मकबरा बनवाया था, इसको औरंगजेब ने कैद खाने में डाल दिया।


कुरान के खिलाफ जाकर गोलकुण्डा, बीजापुर पर किया हमला:-

बीजापुर के मुख्य न्यायाधीश शेख-उल-इस्लाम एवं कई काजी औरंगजेब के पास यह फरीयाद लेकर पहुंचे कि गोलकुण्ड़ा एवं बीजापुर इस्लामिक रियासते है, इसलिये कुरान यह कभी इजाजत नही देता है कि अपने धर्म के भाईयों पर भी दूसरा मुस्लिम शासक अत्याचार करने या बंधक बनाये। यह कुरान के खिलाफ है। परन्तु औरंगजेब ने इनकी फरीयाद न सुनकर इनको अपमानित कर भगा दिया और बाद में गोलकुण्ड़ा एवं बीजापुर पर षढ़यंत्र पूर्वक अधिकार कर लिया। यही नही इस क्षेत्र की मुस्लिम औरतों के साथ मुगल शाही सेना ने बलात्कार, अत्याचार किया, उनकी संपत्ति को लूटा और इन क्षेत्रों को मुगलों के आधीन कर लिया। समान धर्मी होने के बाद भी गोलकुण्ड़ा एवं बीजापुर सत्ता लोभी औरंगजेब के पंजे से नही बच सके। इस प्रकार के कृत्यों से दुखी होकर मुल्लाओं ने औरंगजेब के खिलाफ भी फतवा जारी कर कहां था कि यह इस्लाम के नियमों का पालन नही करता है। इस्लाम कभी हिंसा का रास्ता नही अपनाता है, जो इस प्रकार का कृत्य करते है वह अल्लाह के इस्लाम को नही बल्कि तथाकथित मुल्लाओं के द्वारा बनाये गये इस्लाम का पालन करते है, जिनकी रग-रग में लोभ, लालच छुपा रहता है।


औरंगजेब अपने कृत्यों को छुपाने के लिये क्या करता था धर्म का दिखावा:-

छत्रपति सम्भाजी के मित्र कवि कलश, जो इनके साथ हमेशा रहा करते थे। जब यह दोनों सन् 1688 ई.वी. के पास औरंगजेब की कैद में थे, और यह दोनों को शारीरिक यातनाऐं दे रहा था एवं तब कवि कलश ने औरंगजेब की यातनाऐं सहने के बाद भी उसके कृत्यों को उसके ही मुहँ पर कहने का साहस दिखाया और कहने लगा कि ‘‘ आपने अपने पूरे परिवार को मार डाला, आपसे हमें उम्मीद नही है। आपकी यातनाऐं सहने के लिये तैयार है, लेकिन हिन्द स्वराज्य से समझौता नही होगा। यह वही कवि कलश है, जो सम्भाजी के आगरा बंदी बनने के दौरान उनके साथ रहा करता था। यह जाति से कन्नौज ब्राहम्ण था और सम्भाजी के साथ भागकर रायगढ़ आया था। इस साहसी ब्राम्हण ने औरंगजेब से दांत पिसते हुये कहां कि अल्लाह की सेवा सिर्फ टोपी सीने के नाटक से नही होती। पागल औरंगजेब तुम्हारे दिमाग के टांके ही ढीले पड़ गये है और जोर-जोर से कविता गाने लगा-

‘‘पाप कर्म करके सदा करता बिस्मिलाह

ढोंग किया, टोपी सिया मिले नहीं अल्लाह

निज दिमाग को टाँक लो पागल शाहंशाह’’

कविता को आधी-अधूरी पंक्तियों के कान में पड़ते ही औरंगजेब ने कवि कलश की जीभ कटवा दी। परन्तु कवि कलश कन्नौज ब्राम्हण इशारों से ही औरंगजेब को उसकी कृत्यों का आभास कराता रहा।

जिसने अपने पिता, भाई, पुत्र-पुत्रीयों को सत्ता के लिये मार डाला हो, जिसने गरीब लोगों को प्रताड़ित किया हो, अपनी शाही सेना से औरतों की इज्जत से खिलवाड़ करवाया। क्या वह टोपीयां सिलकर अपने पापों को धो सकता है ? जिसने 50-60 वर्षो तक षढ़यंत्र किया, वही बीमारी से सन् 1707 ई.वी. में मर गया। क्या ऐसे शासक को जिन्दा पीर कहना उचित होगा, इसका निर्णय स्वयं पाठक कर सकते है।

औरंगजेब के पिता शाहजहां ने मालवा के माण्डू में बनी गयासुद्दीन खिलजी की समाधी, जिसने अपने पिता को जहर देकर मारा था, उस सामाधी को शाहजहां ने जूतों की ठोकर लगाकर अपमानित किया था। यह पर तो औरंगजेब ने अपने परिवार को ही मार डाला, क्या शाहजहा के जैसे ही व्यवहार करना उचित होगा।

यदि औरंगज़ेब शैतान हैं तब इसके नाम पर सड़क और संस्थाओ का नाम कहा तक उचित है ?

लेखक

संतोष कुमार लड़िया