''हम सब के सरदार''

नमन्,जय सरदार


''यदि अंग्रेज सरकार ने हमें स्वतंत्र न किया तो हम जबरदस्ती सत्ता छीन लेंगे'' |

सरदार पटेल सन 1945

सरदार बनना तो हर कोई चाहेगा, क्या सरदार बनना आसान है, जो सरदार बनाना चाहते हैं उसे सबसे पहले सच्चा सैनिक एवं देश भक्त बनना होगा जैसा कि सरदार वल्लभ भाई पटेल सच्चे देशभक्त एवं लौह पुरुष थे गांधीजी के सच्चे अनुयायी एवं गांधीवादी थे | इसी तरह एक दिन वह सिपाही से सरदार बन गए वे सिर्फ बने ही नहीं बल्कि लोगों ने उन्हें अपना सरदार मान लिया था | बापू के चले जाने के बाद सरदार वल्लभ भाई पटेल और जवाहर नेहरू की जोड़ी थी जिसने हिंदुस्तान को सँभाला और आज भी उनके बताए हुए मार्गों पर हम चल रहे हैं

यह दोनों बापू की दो आंखे थे |


(1) इंदोर में, सरदार के पिता |

ऐसा नहीं कि वल्लभ भाई पटेल ही सरदार थे बल्कि उनके पिता भी सरदारों से कम नहीं थे उनके द्वारा भी ब्रिटिश सरकार के खिलाफ़ बगावत की गई और उनको 1857 में भी बंदी बनाया गया कारागार में डाला गया | जैसा कि लेखक श्री सोम भाई भावसार एवं श्री काशी नाथ त्रिपाठी (1951) के अतिरिक्त प्रसिद्ध लेखक शर्मा बी ए अपनी पुस्तक 1946 प्रकाशित पुस्तक ''सरदार पटेल'' में उल्लेख करते हैं कि सरदार के पिता साधारण परिवार एवं किसान परिवार से थे | इसके साथ-साथ वह देशभक्त भी थे, 1857 में जब हिंदुस्तान के समस्त देशभक्त तात्या, टोपे एवं झांसी की रानी के साथ दे रहे थे, इसी समय सरदार जी के पिता झेबर भाई भी अपना हल लेकर पेशवाओं की सेना में शामिल हुए | कई मोर्चों पर उन्होंने लड़ाई लड़ी बाद में उनको बंदी बनाकर इंदौर के राजा मल्हार राव होल्कर ने उनको कैदी बनाकर अपने राजभवन में कैद कर लिया

ऐसा कहा जाता है कि एक दिन उनकी मुलाकात इंदौर रियासत के शासक मल्हार राव होल्कर से, उस दौरान हुई जब वे शतरंज खेल रहे थे और शतरंज में उनकी हार होने लगी थी तभी वह से निकलते समय ,झाबेरभाई पटेल ने उनको चाल बदलने के लिए कहा, उनका कहना मानकर मल्हार राव ने शतरंज की चाल चली और वे जीत गए इससे खुश होकर मल्हार राव ने उनको रिहा कर दिया ,वह अपने घर करमसद गांव चले गए |


( 2 ) सरदार का जन्म एवं उनके बचपन के किस्से |

सरदार पटेल का जन्म गुजरात के खेडा जिले में चलोतरण नाम का एक इलाका है इसमें करमसद गांव आता है इसी में 31 अक्तूबर 1875 कुछ जन्म हुआ था, और इनकी शिक्षा बड़ौदा की एक पाठशाला से प्रारंभ हुई सरदार पटेल बचपन से ही लगता है आंदोलनकारी थे और गलत कार्यों का विरोध करते थे जैसा कि एक उदाहरण से स्पष्ट होता है |

सरदार पटेल जब स्कूल जाया करते थे तब एक शिक्षक , छात्रों के लिए निजी लाभ हेतु ऊंचे दामों पर स्कूल सामग्री बेचा करता था अर्थात व्यापार करता था और उन्होंने ये नहीं बना दिया था कि सभी छात्रों को उनकी दुकान से ही सामग्री खरीदनी होगी सुन्नी की दुकान से कागज उन्हीं की दुकान से रबड़ उन्हीं की दुकान से नोटबुक उनकी दुकान से किताब उन्हीं की दुकान से आदि आदि | एक बार देखा कि सरदार के हाथ में दूसरी पेंसिल एवं कागज है इसे देखकर शिक्षक भड़क गए और कहने लगे कि क्या तो मैं अपनी पाठशाला का नियम मालूम नहीं है, सरदार जी ने कहा नियम मालूम है, यह नियम पाठशाला का नहीं है बल्कि आपका है और यह कहकर सरदार पटेल स्कूल से बाहर निकल गए उनके साथ अन्य बालक भी थे पाठशाला लगभग 3-4 दिन बंद रही आखिरकार शिक्षक को अपनी सामग्री स्कूल में बेचना बंद करनी पड़ी |

सरदार पटेल का स्कूल की एक घटना और बताना चाहता हूँ कि वडोदरा की पाठशाला में सरदार पटेल ने संस्कृत छोड़कर गुजराती सीखने का निश्चय किया और वह गुजराती शिक्षक के पास पहुंचे और उनसे कहने लगे कि मैं संस्कृत छोड़कर गुजराती सीखना चाहता हूँ | इस पर शिक्षक ने नाराजगी व्यक्त की और उनको बेंच पर खड़ा कर दिया, बाद में शिक्षक ने सदर को एक से 10 तक के पहाड़े लिए खिलाने के लिए कहा गया परन्तु सरदार ने जानबूझकर शिक्षक के इस आदेश को इसलिए मना किया कि वह उनको प्रताड़ित करना चाह रहा था इसलिए उन्होंने पहाड़ी नहीं लिखें और शिक्षकों से प्रतिदिन पहाड़े की पूछता था 1 दिन शिक्षक ने बालक सरदार पटेल को हेडमास्टर के सामने पेश कर दिया , सरदार ने हेडमास्टर से कहा कि शिक्षक कम से इसलिए नाराज हैं क्योंकि मैं संस्कृति छोड़कर गुजराती सीख रहा हूँ और मैं कक्षा सातवीं का छात्र इनके द्वारा मुझे पहाड़े लिखने के नाम पर प्रताड़ित किया जा रहा है बालक सरदार पटेल का इस प्रकार का साहस जीवन भर उनके साथ रहा इसलिए उनको लोह पुरुष एवं भारत का सरदार कहते हैं


(3 ) कार्य के प्रति इमानदार /समय के पाबन्द |

सरदार पटेल बचपन से ही संघर्षशील एवं साहसी बुद्धिमान व्यक्तित्व के धनी थे इसलिए मैट्रिक परीक्षा पास कर सरदार पटेल विधि (वकालत) की पढ़ाई करने के लिए विदेश जाना चाहते थे लेकिन उनके पास धन का अभाव था, किसी ने उनको सलाह दी कि ''ईदर के राजा'' पढ़ाई के लिए धन देते हैं परन्तु यंहा से भी को यहाँ से भी मदद नहीं मिली , परन्तु उन्होंने साहस नहीं खोया और अपने जिले में ही वकालत सीखकर\पडकर कुछ काम करने लगे, बाद में धन एकत्रित होने के पश्चात आप पढ़ाई के लिए बिलायत चले गए विदेश से वापस आकर उन्होंने अहमदाबाद में वकालत चालू कर दी |

जबकि उनके बड़े भाई बिट्ठल भी मुंबई में वकालत करते थे उनके पास नहीं गए और उन्होंने अपने दम पर ही वकालत का कार्य स्थापित करने का निश्चय किया सरदार पटेल अपने कार्य के प्रति बहुत ईमानदार और सजग थे एक दिन न्यायालय में पैरवी करते समय उनको एक संदेश प्राप्त हुआ कि उनकी पत्नी का प्लेग से स्वर्गवास हो गया है जब सरदार की उम्र केवल 33 वर्ष की थी परन्तु उन्होंने पैरवी करना बंद नहीं किया, और न्यायालय की छुट्टी होने के बाद वह अपने घर पहुँचे थे |


(4 ) युवा सरदार ने, अंग्रेजी कलेक्टर को दिखाई औकात |

सरदार पटेल कभी भी लालच में नहीं आते थे, सर जब वकालत किया करती थी, उसी समय मैं गुलाब राजा नाम का एक प्रसिद्ध डाकू था और उसी समय ''वुड'' नाम का एक अंग्रेज कलेक्टर उसको पकड़ना चाहता था जब यह खबर डाकू को लगी तो डाकू उसके घर ही पहुँच गया और अंग्रेज कलेक्टर को धमकाने लगा कि तुम मुझे पकड़कर बताओ कलेक्टर डाकू के सामने घबरा का टकटकी से देखता रहा और डाकू गुलाब रानी ने कहा कि मैं चाहूं तुम अभी जान से मार सकता हूँ परन्तु मैं तुम्हें नहीं मारूंगा और यह कह कर वे चला गया |

कलेक्टर वुड गुस्से से तिलमिला रहा था और वे डाकू को पकड़ना चाहता था जिससे की पकड़ कर उसको फांसी देकर अपने अपमान का बदला ले सके, बोर्ड को ये खबर लगी कि डाकू गुलाब , सरदार पटेल से मिलने के लिए आय करता है और सरदार पटेल ही उसकी तरफ से न्यायालय में पैरवी करता है, कलेक्टर ने सरदार पटेल को एक पुलिस अधिकारी भेजकर यह संदेश दिया गया, यदि मैं गुलाब को पकड़वाने में उनकी मदद करेंगे तब उनको बहुत बड़ा इनाम दिया जाएगा और ऊंचे पद पर जगह दी जाएगी

पुलिस अधिकारी ने सरदार पटेल के पास जाकर सारी आखिर सुनाई परन्तु सरदार पटेल ने कहा कि मैं अपने कार के प्रति ईमानदार हूँ गुलाब की मैं पैर भी करता हूँ और उसके साथ में विश्वासघात नहीं कर सकता और पुलिस अधिकारियों कहा कि जाओ अपने साहब को यह बता दूँ कि मुझे किसी का डर नहीं है क्योंकि मैं भी कानून जानता हूँ


(5 ) गाँधी जी से पहली मुलाकात ,बनाया गुरु

सरदार पटेल की मुलाकात महात्मा गांधी से उस समय हुई, जब वे अहमदाबाद के गुजरात क्लब में बैठे बैठे ताश खेल रहे थे किसी ने उनसे कहा कि सरदार चलिए महात्मा गाँधी महापुरुष है | वे कुछ उद्बोधन दे रहे हैं आप भी चलिए, परन्तु सरदार ने जाने से मना कर दिया और कहने लगे कि यह केवल ब्रह्मचर्य के बारे में कहेंगे जिसे मैं जानता हूँ और ये भी कहेंगे कि सादा जीवन जीओ यह भी जानता हूँ | उस समय सरदार गाँधीजी का मजाक उड़ाया करते थे लेकिन बाद में लगभग सन 1915 मैं गाँधी से मुलाकात हुई लेकिन धीरे धीरे जैसे देसी गाँधी के विचारों को उन्होंने पढ़ा वैसे वैसे गांधीजी के नजदीक आने लगे थे |

होमरूल आंदोलन मैं गांधीजी के कार्यों से सरदार पटेल बहुत प्रभावित हुए बाद में जब गांधीजी के द्वारा गुजरात में खेड़ा मैं किसानों के लिए आंदोलन चलाया जा रहा था इस आंदोलन को और अधिक गति देने के लिए एक कुशल व्यक्ति की आवश्यकता गांधीजी के लिए थी गांधीजी ने पहली बार सरदार पटेल के लिए चुना और खेड़ा आंदोलन में अपने साथ रखा गांधीजी के विश्वास के अनुसार सरदार पटेल ने बहुत बढ़िया काम किया गाँधीजी इससे बेहद खुद एवं प्रभावित थे और गांधीजी के लिए सरदार की शक्ति को पता चला और मरते दम तक सरदार गांधीजी के साथ रहे , इस समय सरकार ने गाँधीजी को अपना राज नैतिक गुरु मान लिया |


(6 )गुरु के आदेश पर अपनाई देसी वेषभूषा |

जैसा कि हम सब जानते हैं गांधीजी ने शर्ट पेंट आई आदि विदेशी वेषभूषा को त्यागकर देश भी सुझाव को अपनाया था वैसे ही सरदार वल्लभ भाई पटेल ने जब गोधरा के परिषद में एक बैठक में जा रहे थे तब उन्होंने विदेशी बीज मूसा को त्याग कर देसी वेषभूषा धोती कुर्ता को पहनकर पहुंचे यह सब देखकर सब चकित रह गए क्योंकि उन्होंने इसके पहले कभी भी सरदार पटेल को धोती कुर्ता में नहीं देखा था इस बैठक के बाद हमेशा उन्होंने भारतीय वेशभूषा को धारण किया और लोगों को भी यह संदेश दिया कि भारतीय वेशभूषा पहनकर भारतीयों में आत्मसम्मान एवं देश के प्रति सम्मान प्रकट करें उनका यह संदेश भी था कि देसी वेषभूषा से स्थानीय कारीगरों को बड़े पैमाने पर रोजगार मिल सकता है जिससे कि वह आत्मनिर्भर बनेंगे और अंग्रेजों से लड़ने के लिए सक्षम होंगे |

सरदार पटेल ने गोधरा की राजनीतिक कॉन्फ्रेंस को भी संबोधित किया था और उन्होंने गुजरात में उस समय बेगारी की परंपरा को प्रथा को बंद करने के लिए कई कार्यक्रम चलाए थे इस प्रकार सरदार पटेल सामाजिक क्षेत्र में भी कार्य कर रहे थे जिससे की दवे एवं कुचले लोगों का सुधार तथा पुनर्वास किया जाए |

( 7 ) न्यायाधीश के विरुद्ध, सरदार का सत्याग्रह 1923 |

नागपुर में एक अंग्रेजी न्यायाधीश ने एक अजीब फरमान निकाला कि कोई भी सड़कों पर राष्ट्रीय झंडा लेकर नहीं निकलेगा कांग्रेस ने इस न्यायाधीश के फरमान का विरोध किया इस विरोध में वर्धा की सेठ जमनालाल बजाज ने भी सत्याग्रह शुरू कर दिया सरकार ने जमनालाल बजाज गिरफ्तार कर लिया जमनालाल बजाज के स्थान पर उनकी कमान सरदार बल्लभ भाई पटेल संभाली थी

सरदार पटेल गाँधीजी के आदेश पर तुरंत नागपुर पहुंचे और उन्होंने वहाँ लोगों को संबोधित कर कहा कि देखिए सोचिए समझिए ''देश हमारा, जमीन हमारी, झंडा हमारा, फिर क्या ऐसी वजह है कि हम उसे लेकर सड़कों पर नहीं चल सकते'' सरदार पटेल के भाषण से वहाँ के लोगों ऊर्जा एवं शक्ति का संचार हुआ और लोगों के द्वारा उसी स्थान से झंडा रैलियां निकालने लगे जिससे स्थान पर अंग्रेजी न्यायाधीश ने झंडा रैली निकालने से मना किया था , लोग गिरफ्तार किए जाने लगा जगह जगह गिरफ्तारियां होने लगी इस गिरफ्तारी से पूरे देश में लोगों की नाराजगी का सामना अंग्रेजों को करना पड़ा, इसके साथ साथ लोग उत्साहित होने लगी लगातार गिरफ्तारियां होने के कारण सरकार थक गई और सरकार को सरदार पटेल से समझौता करना पड़ा जमना लाल बजाज को रिहा करना पड़ा इस प्रकार सरदार पटेल ने अंग्रेज सरकार को झुकाकर अपनी प्रतिभा को और अधिक लोगों के सामने लाने का कार्य किया


(8 )गांधीजी के असहयोग आन्दोलन में सरदार की भूमिका1920 |

गांधीजी ने अंग्रेजों के खिलाफ़ उनकी नीतियों के विरोध में मैं कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में अहिंसात्मक तरीके से अंग्रेजों की नीतियों का विरोध करने का संकल्प लिया था इसमें कौंसिल कॉलेज स्कूल अदालतें आदि का बहिष्कार करने का संकल्प लिया गया था गाँधी के आदेश पर वकीलों ने भी अपनी प्रैक्टिस को बंद कर दिया था पूरा सरकारी कर्मचारियों त्यागपत्र दे दिए थे मोती लाल नेहरू, देशबंधु ,सरदार वल्लभ भाई पटेल ,राजेन्द्र प्रसाद, राजगोपालाचार्य ,इन सभी ख्याति प्राप्त वकीलों ने लाखों रुपये की फीस को लात मार कर गाँधीजी का साथ दिया था गांधीजी के गिरफ्तार होने के बाद गाँधी के कार्यों को सरदार ने आगे बढ़ाया


( 9 ) बारडोली सत्याग्रह ने बनाया ''हिंदुस्तान का सरदार'' 1922 |

बिना किसी जांच पड़ताल के अंग्रेज सरकार ने अपनी मर्जी से इस क्षेत्र के किसानों पर अतिरिक्त लगान लगाया साथ उसने सोचा था कि धन मान लोग पढ़े लिखे होते है, इसलिए वह विरोध नहीं करते, व्यापारी होशियार होते हैं इसलिए वह भी पार पा लेते हैं पर किसान तो अनपढ़ और बेजुबान है बे भला सरकार का क्या कर लेंगे |

परन्तु बारदोली की किसान चुप नहीं बैठे और वह सरदार पटेल के पास पहुँच गए उनको सारी बात सुनकर अपना दुख और पीड़ा प्रकट की थी ,सरदार पटेल ने गांधीजी के सत्याग्रह का पालन कर किसानों को एकत्रित किया और अंग्रेजों से लड़ने के लिए एकत्रित हुई, सरदार ने किसानों की पीड़ा अंग्रेज सरकार तक पहुंचाई लगातार आंदोलन चले, किसानों के जानवर, किसानों की जायजा, किसानों की खेती, किसानों के घर जब्त कर लिए और किसानों को जेल में डाले जाने लगा,

किसानों में फूट डालने का भी अंग्रेजी सरकार ने षड्यंत्र किया परन्तु सरदार पटेल की चतुराई से वे अपने संयंत्र में सफल नहीं हुए, बाद में अंगेजो आन्दोलन दबाने के लिये पठानों की भर्ती की गई इस प्रकार फूट डालो राज़ करो की नीती को अंग्रेजों के द्वारा उन्हें अपनाया जा रहा था आखिरकार सरदार से अंग्रेजों को समझौता करना पड़ा और किसानों को न्याय मिला बारदोली आंदोलन से सरदार वल्लभ भाई पटेल की ख्याति सारे देश में फैल गई थी, मैं मशहूर हो गए थे अब वह केवल गुजरात के साधारण नहीं थे, बल्कि हिंदुस्तान के सरदार बन चूके थे |

सरदार भी गांधीजी के जैसे ही अंग्रेजों की आँखों में खटकने लगे थे इसलिए के सत्याग्रह में सरदार पटेल को तीन माह तक जेल में बंद रहना पड़ा बाद में सरदार पटेल को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का सभापति भी नियुक्त किया यह उनके लिए बहुत बड़ी उपलब्धि थी, क्योंकि गांधीजी के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का सभापति होने का गौरव गुजरात से सरदार पटेल को ही प्राप्त हुआ था बारदोली आंदोलन के बाद महात्मा गाँधी ने ही सदा वल्लभ भाई पटेल को सरदार की उपाधि से सम्मानित किया था


(10 ) अंग्रेज सरकार के मूंड-कर का विरोध 1923 |

बोरसद में अंग्रेज सरकार ने मूड कर लगाया था इसका अर्थ यह होता कि जिसके घर में जिंस परिवार में जितनी सदस्य उतनी पर कर लगेगा सरकार यह भी जानती थी की बोरसद क्षेत्र में डाकू और लुटेरे का आतंक है इन के द्वारा वहाँ की जनता को बहुत अधिक सताया जाता है मुझे यह डाकू लुटेरे लूटपाट करते हैं वह पहले से ही आर्थिक रूप से कमजोर है दुखी है इसके बाद भी परिवार के प्रत्येक सदस्य पर कर लगाना अत्याचार था इसका विरोध करने के लिए सरदार वल्लभ भाई पटेल बोरसल क्षेत्र में पहुंचे और अंग्रेजों के इस नीति का विरोध किया |

सरदार पटेल ने बोरसद की जनता से यह कह दिया कि किसी भी प्रकार का कर देने की आवश्यकता नहीं है, पटेल ने सत्याग्रह किया लोगों को जागरूक किया, लोगों की गिरफ्तारियां हूँ लेकिन बाद में नागपुर के जैसे ही सरदार पटेल को विजय प्राप्त हुई और सरकार ने अपनी गलती मानकर बोरसद के लोगों पर लगाया गया ''मूड कर'' को वापस कर लिया |


(11 ) न्यायाधीश के विरुद्ध, सरदार का सत्याग्रह 1923 |

नागपुर में एक अंग्रेजी न्यायाधीश ने एक अजीब फरमान निकाला कि कोई भी सड़कों पर राष्ट्रीय झंडा लेकर नहीं निकलेगा कांग्रेस ने इस न्यायाधीश के फरमान का विरोध किया इस विरोध में वर्धा की सेठ जमना लाल बजाज ने भी सत्याग्रह शुरू कर दिया सरकार ने जमना लाल बजाज गिरफ्तार कर लिया जमना लाल बजाज के स्थान पर उनकी कमान सरदार वल्लभ भाई पटेल संभाली थी

सरदार पटेल ने गाँधीजी के आदेश पर तुरंत नागपुर पहुंचे और उन्होंने वहाँ लोगों को संबोधित कर कहा कि देखिए सोचिए समझिए ''देश हमारा, जमीन हमारी, झंडा हमारा, फिर क्या ऐसी वजह है कि हम उसे लेकर सड़कों पर नहीं चल सकते'' सरदार पटेल के भाषण से वहाँ के लोगों ऊर्जा एवं शक्ति का संचार हुआ और लोगों के द्वारा उसी स्थान से झंडा रैलियां निकालने लगे जिससे स्थान पर अंग्रेजी न्यायाधीश ने झंडा रैली निकालने से मना किया था , लोग गिरफ्तार किए जाने लगा जगह जगह गिरफ्तारियां होने लगी इस गिरफ्तारी से पूरे देश में लोगों की नाराजगी का सामना अंग्रेजों को करना पड़ा, इसके साथ साथ लोग उत्साहित होने लगी लगातार गिरफ्तारियां होने के कारण सरकार थक गई और सरकार को सरदार पटेल से समझौता करना पड़ा जमना लाल बजाज को रिहा करना पड़ा इस प्रकार सरदार पटेल ने अंग्रेज सरकार को झुकाकर अपनी प्रतिभा को और अधिक लोगों के सामने लाने का कार्य किया |


(12 ) नेहरू जी के साथ सरदार

19 29 मैं लाहौर कांग्रेस अधिवेशन आयोजित किया गया इसकी अध्यक्ष पंडित जवाहरलाल नेहरू कर रहे थे इस अधिवेशन में कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज की मांग की एम इसके लिए आंदोलन चलाएं अप्रैल 1930 को सप्ताह ग्रह प्रारंभ हुआ सबरमती आश्रम से गाँधी जी ने दांडी मार्च निकाल कर अंग्रेजों द्वारा लगाए जा रहे करों का ग्रोथ किया गाँधीजी केस आर्थिक रूप में सरदार वल्लभ भाई पटेल आगे आगे चल रहे थे और लोगों को जागरूक कर रहे थे अगर इस सरकार ने सरदार पटेल को गिरफ्तार कर लिया परंतु बाद में जून 1930 उनको रिहा कर दिया |

इसके बाद 1931 में पाकिस्तान के कराची में कांग्रेस अधिवेशन हुआ सरदार पटेल को इसका प्रधान चुना गया इस अधिवेशन में लोगों के द्वारा गाँधीजी एवं सरदार पटेल को काले झंडे दिखाए गए क्योंकि सरदार भगत सिंह, राजगुरु, एवं सुखदेव, को कुछ ही दिनों पहले फांसी हुई थी इससे कई भारतीय नाराज थे परन्तु सरदार वल्लभ भाई पटेल ने देर पूर्वक विद्रोह को शांत किया और अहिंसा के रास्ते पर चलने की सलाह दी गाँधी की विचारधारा को मानने के लिए प्रेरित किया |


14) गोलमैज कांफ्रेंस की असफलता सरदार का जेल जाना |

गाँधीजी लंदन में गोलमेज सम्मेलन में शामिल होने के लिए लंदन गए हुए थे, परंतु असफल होने के बाद वापस आए और उन्होंने पुनः सत्याग्रह का बिगुल फूंक दिया और सारे भारतवर्ष में फिर से आंदोलन होने लगी वही है, कांग्रेस के नेताओं की गिरफ्तारी होने लगी कांग्रेस को सरकार ने गैरकानूनी घोषित कर दिया इस समय सरदार पटेल कांग्रेस के प्रधान थे इसी वजह से उनको भी पकड़ लिया गया बाद में किसी विशेष कारणों से आंदोलन स्थगित कर दिया गया, परन्तु सरदार पटेल को जेल में डाल दिया था जिसके कारण उनका स्वास्थ्य बिगड़ता जा रहा था इस वजह से उनको 1934 मैं रिहा कर दिया गया


(15 ) सरदार ने किया , आठ राज्यों में मंत्र परिषद का गठन

1935 मैं सरकार ने प्रांतों में नए चुनाव की घोषणा कर दी कांग्रेस ने चुनाव लड़ने का निर्णय लिया गया, और कांग्रेस को आठ प्रांतों में मंत्रिमंडल बनाने का अधिकार प्राप्त हुआ | परंतु कांग्रेस ने मंत्रिमंडल इसलिए नहीं बनाया क्योंकि बेए चाहती थी कि ब्रिटिश ग