अशोक ''ka'' धर्म


प्रियदर्शी अशोक सम्राट कि कलिंग विजय

मगध की राजधानी पाटलिपुत्र थी जिसकों हम आज पटना के नाम से जानते हैं इस पर सम्राट अशोक के दादा चंद्रगुप्त मौर्य उसके पता बिंदुसार ने शासक के रूप में और अधिक प्रभावशाली बनाया था| बल्कि बिंदुसार के समय में उत्तर से दक्षिण तक मोर्य शासन स्थापित हो चुका था बिंदुसार के तीन सन्तान थी अशोक दूसरा सुशिम था, एक बहन इंद्रा भी थी| बिंदुसार ने सुशिम को अफगानिस्तान का राज्यपाल बनाकर भेजा था और अशोक के लिए दक्षिण भारत में राज्यपाल पद पर भेजकर साम्राज्य विस्तार का दायित्व सौंपा था

अशोक दक्षिण भारत में विदिशा के बाद लगभग 11 वर्षों तक उज्जैन में रहा यहाँ रहकर ही उसने विदिशा की राजकुमारी देवी से विवाह किया था और इससे अशोक के दो संतानें उत्पन्न हुई थी एक का नाम राहुल दूसरी पुत्री का नाम संघमित्रा था लगभग 11 वर्षों तक उज्जैन रहकर उसने कई ऐतिहासिक भवनों का निर्माण किया जिनके अवशेष आज भी खंडर के रूप में देखे जा सकते हैं|जो अशोक कहानी कह रहें हे, बिंदुसार की मृत्यु के बाद शुसिम और अशोक दोनों के बीच में उत्तराधिकारी का संघर्ष चल रहा था| परन्तु अशोक के साथ की दरबारी, सामन्त , मंत्री जुड़े हुए थे इसलिए पिता के देहांत के बाद यह सभी चाहते थे कि अशोक ही पाटलिपुत्र का सम्राट बने इसलिए दक्षिण से तुरंत पाटलिपुत्र अशोक पहुंचे और उन्होंने पाटलिपुत्र का शासक रूप में कार्यभार ग्रहण किया ऐसा भी कहा जाता है कि अशोक ने अपने 99 भाइयों को मारकर राजगद्दी हासिल की थी परन्तु यह कहाँ तक सत्य है ये कहा नहीं जा सकता लेकिन ये निश्चित ही सही है कि वह आसानी से पाटलिपुत्र का शासक नहीं बना होगा मौर्य वंस का शासक बनने के बाद उसने चारो तरफ विकास कार्य एवं लोक कल्याणकारी योजनाओं को लागू किया जिसकी प्रशंसा आज भी भारतीय इतिहासकार किया करते हैं

पाटलिपुत्र का शासक बनने के बाद उसने अपना राजधर्म बौद्ध धर्म को घोषित कर दिया था और ये स्वयं धर्म के प्रचार के लिए यात्रा करने लगा बौद्ध धर्म शांति एवं अहिंसा का रास्ता था परंतु ये रास्ता उसने क्यों अपनाया उसकी भी एक कहानी है

जब सम्राट अशोक ने अपनी तलवार की दम पर कई रियासतों का अपने राज्य में विलय कर लिया था परन्तु एक राज्य ऐसा भी था जिसमें बौद्ध धर्म की सत्ता को स्वीकार नहीं किया | उसका राजधर्म सनातन था यह कलिंगराज राज्य था हे|इसको अशोक के पिता एवं दादा कभी भी पराजित नहीं कर सके इसलिए इस को पराजित करना अशोक ने अपनी प्रतिष्ठा मान लिया था| इसलिए 261 बीसी में अशोक ने कलिंग पर आक्रमण किया परन्तु कलंक को लगभग चार महीने घेरा डालने के बाद भी जब वह इसको विजय प्राप्त नहीं कर सका तब अशोक को धोखा देकर कालिंग को जीतने का षड्यंत्र राजगुरु सम्पुष्ट आचार्य एवं अशोक की सौतेली माता बुद्धिमती के द्वारा किया गया इसमें कलिंग के प्रधानमंत्री विशाखदत की पत्नी प्रमिला भी शामिल थी|

अशोक के पिता बिंदुसार की दो पत्नियां थीं है एक का नाम बुद्धिमती, दूसरी का नाम सुभंद्रगी था |यही अशोक की माँ थी| बुद्धिमती का एक पुत्र था जिसका नाम बीताशोक था ये अपने बड़े भाई अशोक से बहुत प्रेम करता था |परन्तु इसकी माँ अशोक से द्वेष भावना रखा करती थी इसका मुख्य कारण यह था कि वह अपने पुत्र बीताशोक के लिए पाटलिपुत्र का शासक बनाना चाहती थी| परन्तु बीताशोक की कभी यह इच्छा नहीं रही कि वह पाटलिपुत्र का शासक बने| इसलिए बुद्धिमती लगातार अशोक के खिलाफ षडयत्र किया करती थी परन्तु अशोक ने कभी भी बुद्धिमती के खिलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं थी

अशोक के समय कलिंग का राजा मगेंद्र था और ये हमेशा अपने सैनिकों के साथ रहा करता था इसलिए कलिंग सेना का आत्मविश्वास और साहस मैं किसी प्रकार की कमी नहीं थी |यही वजह थी कि अशोक की सेना कलिंग को पराजित नहीं कर पा रही थी| जब अशोक कलिंग को पराजित नहीं कर सका तब उसने अपने छोटे भाई बीताशोक का विवाह कलिंग की राजकुमारी प्राणयिनी से करने का निश्चित किया |परन्तु मगेंद्र ने यह कहकर मना कर दिया कि वह अपनी राजकुमारी का विवाह बौद्ध धर्म के अनुयायियों से नहीं करेगा|

अशोक जब अपनी योजनाओं में असफल होने लगा तब उसने कॉलिंग से अपनी सेना को वापस बुलवाने का निर्णय लिया परन्तु अशोक की सौतेली माँ एवं राजगुरु सम्पुष्टआचार्य इस पर तैयार नहीं हुए और अशोक पर दबाव बनाने लगे कि कॉलिंग राज्य आपके दादा और पिता विजय प्राप्त नहीं कर सके इसलिए इस पर विजय प्राप्त करना अत्यंत आवश्यक है ताकि पाटलिपुत्र का मान सम्मान बचा रहे|

अशोक बौद्ध धर्म को मानने वाला था परन्तु अशोक का प्रधानमंत्री मोहन राधागुप्त था जो एक सनातन ब्राह्मण था इसको अशोक की सौतेली माँ एवं संतुष्ट आचार्य दोनों ही पसंद नहीं करते थे| वे लगातार प्रधानमंत्री पद से हटाने का दबाव अशोक पर बनाती थी परंतु अशोक ने कभी भी राधागुप्त को हटाने का आदेश नहीं दिया बल्कि लगातार राधागुप्त का समर्थन करते रहे क्योंकि राधा गुप्ता देशभक्त एवं देशभक्ति रखने वाला व्यक्ति था| अशोक राधागुप्त को चाचा कहकर पुकारा करते थे क्योंकि यह अशोक के पिता बिंदुसार के मित्र होने के साथ साथ उनके शासनकाल में उच्च पद पर भी कार्यरत थे इसलिए अशोक का समर्थन भी राधा गुप्ता द्वारा तब से किया जा रहा था जब सम्राट अशोक उज्जैन के राज्यपाल थे प्रधानमंत्री राधा गुप्ता को कोई पसंद नहीं करता था

कलिंगराज का प्रधानमंत्री विशाख देशभक्त था परंतु उसकी पत्नी प्रमिला कलिंग राज्य के शासक से दुष्भावना रखा करती थी क्योंकि वह कलिंग की राजमाता बनने का सपना देख रही थी इसलिए कल नरेश मृगेंद्र को मारने का षडयंत्र प्रधानमंत्री की पत्नी प्रेमिला के द्वारा किया जा रहा था और प्रमिला स्वयं बौद्ध धर्म को मानने वाली थी इसलिए पाटलिपुत्र के राजगुरु सम्पुष्ट आचार्य के संपर्क में रहती थी और इसने ही कलिंग राज्य की सभी गोपनीय जानकारी दिया करती थी यहाँ तक कि जब संतुष्ट आचार्य ने अशोक को बताए बिना ही कलंक सेना पर धोखे से हमला करवा दिया उसी समय प्रेमिला ने सभी चाबियां संतुष्ट चार को चुपचाप भिजवा दी और नतीजे यह हुआ कि कलिंग सेना को गोलाबारूद नहीं मिल सका और वह पराजित हुई चारो तरफ हाहाकार मच गया लाशों के ढेर लग गए इस प्रकार प्रमिला की धोखेबाजी कलिंग पराजय हुआ और प्रधानमंत्री विशाखदत्त कलिंगराज का शासक बन गया

कलिंगों को धोखेबाजी से जीतकर अशोक बहुत अधिक दुखी हुआ दुखी हुआ और इसी युद्ध के बाद अशोक ने शांति का रास्ता अपनाया अहिंसा का रास्ता बनाया यह उसके शासन काल का आखिर युद्ध था इसके बाद कभी भी अशोक ने अपनी राज्य का विस्तार तलवार की दम पर नहीं बल्कि शांति और भाई चारे के द्वारा किया| कलिंग की पराजय के बाद राजपरिवार के सदस्य पलायन कर चूके थे परन्तु अशोक ने किसी भी व्यक्ति को कलिंग का शासक नहीं बनाया बाद में कलंक के सदस्यों को खोजकर उनको उनका राज्य वापस कर दिया|

कलिंग राज्य के कुलगुरु चिदानंद स्वामी ने राजकुमार जितेन्द्र को शरण दी , स्वामी का आश्रम बनारस में था ,राजा महेंद्र की देहांत हो चुका था| जितेंद्र अपनी जान बचाने के लिए बौद् भिक्षु की शरण ली और उनके द्वारा इन तीनों की जान बचाने का वचन दिया| चिदानंद स्वामी कलिंगराज के राजा मृग्रेन्द्र के गुरु थे और इनकी इच्छा थी कि हिन्दू धर्म बचा रहे इसलिए राजा महेंद्र की मृत्यु के बाद जितेंद्र राजकुमार की जान की रक्षा करना इनका कर्तव्य था |इसलिए उन्होंने उनको बौद्ध भिक्षु बनने की सलाह दी ताकि राजकुमार जितेंद्र की जान बची रहे क्योंकि पाटलिपुत्र की राजगुरु एवं अशोक की सौतेली माँ राजकुमार को पता लगते ही कभी भी मरवा सकती थी है|

परन्तु बाद में राजकुमार जितेन्द्र एवं उसकी माँ का पता लग गया, अशोक ने उसका राज्य विशाखदत्त से वापस लेकर उसको सौंप दिया, यह दबाव नहीं बनाया वे बौद्ध धर्म स्वीकार कर लें, इस प्रकार अशोक के शासनकाल में ही कॉलिंग राज्य सनातन धर्म का केंद्र बना रहा यदि अशोक के द्वारा उस समय सनातन धर्म को एवं उसके अनुयायियों को संरक्षण नहीं दिया होता, तब निश्चित ही सनातन धर्म उसी समय समाप्त हो जाता इस प्रकार अशोक ने धार्मिक सहिष्णुता का परिचय दिया इसलिए यह धर्म आज तक बचा रहा|