''अद्वितीय गाँधी ''

अद्वितीय गाँधी(1916-1930) भाग 1

गुजरात भारत का आज से ही नहीं बल्कि प्राचीन काल से ही एक महत्वपूर्ण और प्रभावशाली राज्य रहा है इसने ने अपने काल के कई उतार चढ़ाव देखें एवं कई विदेशी आक्रमणों का सामना भी किया है |''गजनी''आक्रमण किसे याद नहीं हैं| परंतु गुजरात आज भी खड़ा है, गुजरात से कई नागरिक विदेशों में बसकर भारत का झंडा बुलंद कर रहे इस पर हमें गर्व होना चाहिए और अभिमान भी हैं ,कि गुजरात से एक महात्मा निकल कर विदेशों में जाकर भारतीय की मदद कि थी, अपनी प्रतिभा से वहा सरकारों के दमन कामो को रोका ओर हम आज ऐसे महामानव के प्रति अशोभनीय टीका टिप्पणी की जा रही है| जोअत्यंत दुखद है वह महामानव और कोई नहीं बल्कि अद्वितीय ''महात्मा गांधी'' जिनका सम्मान उनकें विरोधी भी कहा करते थे |स्वय सुभाषचंद्र बोस ने गाँधी को रास्ट्रपिता कहा है |

महात्मगांधी का पूरा नाम हे मोहनदास करमचंद गाँधी था और इनका जन्म 2 अक्टूबर 1869 को काठियाबाड़ प्रांत के पोरबंदर के सुदामापुरी नामक स्थान पर हुआ था इनके पिता करमचंद पोरबंदर के दीवान थे इनके पिता की ईमानदारी न्याय प्रियता के चर्चे सारे प्रांत में वह करते थे| गाँधीजी की माँ का नाम पुतलीबाई था जो अत्यंत धार्मिक प्रवृत्ति की थी

गाँधीजी की प्राथमिक शिक्षा सुदामापुरी एवं पोरबंदर में हुई थी ,एवं उच्च शिक्षा के लिए 4 सितंबर 1888 इंग्लैंड चले गए , ऐसा कहा जाता है कि गांधीजी के द्वारा जब समुद्र को पार किया गया तब गांधीजी के परिवार को समाज से बहिष्कृत कर दिया गया क्योंकि समुद्र को पार करना धर्म विरोधी में था, परन्तु गांधीजी ने अपनी पढ़ाई मैं किसी भी प्रकार की बाधा नहीं आने दी थी| गाँधीजी ने बैरिस्टर(वकील ) की परीक्षा मैं प्रथम स्थान प्राप्त किया और स्वदेश वापस लौट आए एवं ब्रिटिश न्यायालय मुंबई हाईकोर्ट में वकालत करने लगे|

दक्षिण अफ्रीका में रह रहे व्यापारी सेठ अब्दुल्ला ने महात्मा गाँधी से अनुरोध किया कि उनके साथ दक्षिण अफ्रीका के न्यायालयों में भेदभावपूर्ण रवैया अपनाया जा रहा है| वहाँ के न्यायालयों में भारतीयों के लिए न्याय नहीं मिल रहा है, क्योंकि रंग भेद की नीति के कारण भेदभाव किया जा रहा है |इस पीड़ा से महात्मा गाँधी पहले से ही भली भांति परिचित थे, इसलिए गांधीजी ने सेठ अब्दुल्ला के अनुरोध को स्वीकार कर लिया और अप्रैल 1893 में मुंबई हाईकोर्ट की वकालत को छोड़कर दक्षिण अफ्रीका रवाना हो गए| सेट अब्दुल्ला का प्रकरण दक्षिण अफ्रीका की राजधानी डरबन में चल रहा था| जिसकों गांधीजी ने अपने तर्कों से जीत लिया, यह जीत केवल गांधीजी एवं सेठ अब्दुल्ला की नहीं थी, बल्कि यह जीत विदेशी भूमि पर बसने वाले हर नागरिक की थी| इस जीत से '' विदेशी भारतीय'' अपने आप को गौरवान्वित महसूस करने लगे | जिसके चर्चा ना केवल दक्षिण अफ्रीका में बल्कि पूरे यूरोप में होने लगे, विदेशों में भारतीयों को सम्मान दिलाने वाले और कोई नहीं बल्कि गांधी थे|

दक्षिण अफ्रीका में गाँधी जी ने नही उतारी पगड़ी 1894

यहाँ मैं पाठकों के लिए अभी बताना चाहता हूँ कि, जब गाँधी डरबन के उच्च न्यायालय में पेश हुए तब वह भारतीय परंपरा के अनुसार पगड़ी पहनी हुई थी न्यायाधीश ने पगड़ी उतारने के लिए कहा परन्तु गांधीजी ने भारतीय परंपरा का हवाला देकर पगड़ी उतारने से मना कर दिया, जिसको न्यायाधीशों ने भी स्वीकार किया इस प्रकार गाँधीजी ने न केवल सेठ अब्दुल्ला को जीत दिलाई बल्कि अपनी भारतीय परंपरा को भी विदेशों में कायम रखा | इस प्रकार से सम्पूर्ण दक्षिण अफ्रीका के समाचार पत्रों में खूब प्रकाशित हुआ और कई भारतीय एवं विदेशी भी गांधीजी से मिलने आने लगे गाँधीजी ने भी भारतीयों के लिए बचन दिया वह उनके साथ है ,गाँधीजी ने दूसरा प्रकरण भी सेठ अब्दुल्ला के लिए ही जीता था, यही वजय रही कि गाँधी जी के लिए दक्षिण अफ्रीका में ही प्रथम श्रेणी की डिब्बे में बैठने की वजह से अपमानित किया था और रात में ही उतार दिया था और सारी रात गाँधीजी को प्लेटफार्म पर बैठकर ही गुजारने पड़ी यह हालत एक ऐसे हिन्दुस्तानी की थी जिसने डरबन में विदेशियों से न्यायिक जीत हासिल की थी, यह पीड़ा गांधीजी के मन में जीवन भर रही 1901 मैं वापस आकर 1903 में पुनः दक्षिण अफ्रीका चले गए|


गाँधी जी ने किया , पहला सत्याग्रह दक्षिण अफ्रीका

पाठकों के लिए यह भी बताना चाहता हूँ कि दक्षिण अफ्रीका में रहने वाले प्रत्येक भारतीय के लिए 25 पोंड सालाना देना पड़ता था यह राशि आज लाखों में होती है| गांधीजी ने इसके खिलाफ़ भी मोहन छेड़ने का मन बनाया और उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में नेटाल इंडियन कांग्रेस की ओर से, मजदूरों और भारतीयों ने गाँधीजी का सहयोग किया दोनों ने मिलकर अन्याय के खिलाफ़ संघर्ष किया इस संघर्ष की कहानी पर एक पुस्तक लिखी गई जिसका नाम हरी पुस्तक है और ये पुस्तक दक्षिण अफ्रीका में रह रहे प्रत्येक भारतीय के लिए वितरित की गई बल्कि दक्षिण अफ्रीका में उन मज़दूरों को भी दी गई जो विदेशों से आकर बसे थे सेट अब्दुल्ला को दक्षिण अफ्रीका के गोरों के द्वारा धमकिया दी जाने लगी की तुम मोहनचंद करमचंद गाँधी को अपने घर से निकाल दो, वरना तुम्हारा सारा व्यापार चौपट कर देंगे| परन्तु गांधीजी के लिए सीट अब्दुल्ला ने नहीं निकला जबकि नेटाल शहर के लोग गांधीजी के खून के प्यासे हो गए थे सेट अब्दुल्ला नहीं गाँधीजी की प्राण की रक्षा की थी

गाँधी जब किसी कार से नेटाल शहर के बाहर जा रहे थे तब कुछ लोगों ने उनके साथ मारपीट की थी उसी समय पुलिस अधीक्षक ने आकार गाँधीजी की मदद की जब गाँधीजी सेट अब्दुल्ला के घर पहुंचे तो उनके घर को भी विरोधयो ने घेर लिया था परन्तु सेट अब्दुल्ला को गाँधीजी की जान बचाने के लिए पिछले दरवाजे से निकालना पड़ा और चुपकर गाँधी थाने पहुँच गए|

गाँधीजी बिलकुल नहीं डरें और उन्होंने आप्रवासी भारतीयों के लिए अपना हक दिलाने के उद्देश्य ऊँच- नीच की भावना को खत्म करने के लिए सत्याग्रह प्रारंभ कर दिया, और सभी सत्ताग्राहियों को यह सलाह दी कि अंग्रेजों का क्रोध हिंसा से नहीं, बल्कि शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करना हैं| हम किसी को मारेंगे नहीं ,कोई हमको मारेगा तो हम सह लेगे, कोई जेल भेजेगा तो हम जेल चले जाएंगे, कोई हमारा अपमान करेगा तो, हम सहन कर लेंगे परन्तु हिंसा का सहारा नहीं लेंगे


पहली बार गाँधीजी,गये जेल

गाँधीजी ने इस प्रकार की पर्ची हिंदी अंग्रेजी तमिल तेलुगू आदि भाषाओं में वितरित करवा दिए इस प्रकार अंग्रेजों का विरोध दक्षिण अफ्रीका में लोगों को जागरूक कर किया गया था सत्याग्रह में हजारों लोगों ने भाग लिया भारतीयों पर लाठीचार्ज किया गया उन पर गोलियां चलाई गईं, कई भारतीय घायल हुए और पहली बार महात्मा गाँधी की पत्नी कस्तूरबा गाँधी ने दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह आंदोलन में भाग लेकर भारतीय नारियों का सम्मान बढ़ाया और कस्तूरबा गाँधी अपने पति के साथ नेटाल जेल में भी रहीं दोनों को पत्थर गिट्टियां तुड़वाकर प्रताड़ित किया गया ताकि उनका मनोबल टूट जाए| परन्तु पत्थर टूट गए, गाँधी एवं उनकी पत्नी का मनोबल नहीं टूट पाया| गाँधीजी से कई मुस्लिम भी जुड़ गए थे, जो अन्य देशों के रहने वाले भी थे|

गांधीजी की सामाजिक सेवा एवं युद्ध में सैनिकों की मदद करने, अहिंसा का मार्ग अपनाने से, अफ्रीका में लॉर्ड हार्डिंग ने केसर हिंद की उपाधि दी थी, यह पाठकों को यह बताना चाहता हूँ कि गाँधीजी को केसर हिंद की उपाधि भारत में नहीं बल्कि दक्षिण अफ्रीका में दी गई थी

गांधीजी ने 37 वर्ष की उम्र में 1903 छः ब्रह्मचर्य का व्रत ले लिया था जिसका समर्थन उनकी पत्नी ने भी किया और वह आजीवन इस का पालन करते रहे, गांधीजी ने इंडियन ओपिनियन नामक पत्रिका का प्रकाशन किया था, भारतीय एवं मज़दूरों की मदद करने की वजह से अंकित में पहली बार जेल जाना पड़ा और अपनी पत्नी के साथ दो माह तक जेल में रहे सन् 1910 में पुन सत्याग्रह किया यही नहीं सत्ता ग्रह के लिए टालस्टाय नामक संस्था की स्थापना की और 1 दिन में 55 किलोमीटर चले|


दूसरी बार भारत, लौटें गाँधी,1916

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम मैं लगी नेताओं के द्वारा महात्मा गाँधी के लिए भारत आमंत्रित किया गया जिससे की ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ़ चल रहे स्वतंत्रता संबंधी आंदोलनों को और अधिक गति मिल सके| इसलिए महात्मा गाँधी 1916 में भारत लौटें इस समय इनकी उम्र लगभग 47 थी |भारत आकर सर्वप्रथम भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को नए तरीके से संगठित करने का प्रयास किया, और इस प्रकार आम नागरिक को भी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जोडकर आजादी की लड़ाई में शामिल करने का कार्य किया |


भारत में खेड़ा आंदोलन,

गुजरात प्रांत के खेडा जिले में भयानक अकाल आने की वजह से कई लोग भुखमरी एवं लाचारी से मारे गए ,परंतु ब्रिटिश सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही थी बल्कि मदद करने की वजह ब्रिटिश हुकुमत तानाशाही एवं सख्ती से राजस्व कर वसूल रही थी| इस दमनकारी नीतियों के खिलाफ़ गाँधीजी ने पहला आंदोलन अपनी जन्मभूमि प्रांत के खेड़ा जिले से प्रारंभ किया, और यहाँ पर वैसा ही अहिंसक सत्याग्रह प्रारंभ किया जैसा कि एक समय में उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में किया था


काशी विश्वविद्यालय का उद्घाटन

4 फरवरी 1916 में जब गाँधी दक्षिण अफ्रीका से लौटकर आए ,उसी समय उन्होंने काशी विश्वविद्यालय का उद्घाटन किया और इसी वर्ष लखनऊ कांग्रेस में शामिल हुए, गाँधीजी और नेहरू की पहली मुलाकात लखनऊ में ही में हुई थी| 17 जून में गांधीजी ने साबरमती आश्रम की स्थापना की, यहाँ आज भी गांधीजी की विचारधारा को एवं उनके सिद्धांतों को युवा पीढ़ी में आगे बढ़ाया जा रहा है| इसी समय राष्ट्र कवि साहित्य नोबल विजेता स्वर्गीय रवीन्द्रनाथ टैगोर ने मोहनचंद करमचंद गाँधी को महात्मा की उपाधि देकर सम्मानित किया था क्योंकि उनके द्वारा दक्षिण अफ्रीका से वापस आने के पश्चात सूट बूट त्याग कर एक भारतीय परिधान को अंगीकार किया था |और सारा जीवन गरीबों की सेवा करने का संकल्प, ब्रिटिश हुकूमत को अहिंसा के सिद्धांत पर देश से बाहर निकालने का संकल्प भी लिया था ,गांधीजी ने भारतीय जागरण देशभक्ति आजादी का आंदोलन को घर घर पहुंचाने के लिए 8 अक्तूबर 1919 को नव ''जीवन ''और ''यंग इंडिया'' नामक पत्रिका का प्रकाशन किया था


'बतख मियां'' ने बचाई गाँधी जान,मिली ''बापू की उपाधि''

बिहार के चम्पारण जिले में किसानों से जबरन नील की खेती कराई जा रही थी इस वजह से लगातार किसानों की भूमि बंजर रही थी किसानों की आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय होती जा रही थी| चारों तरफ भुखमरी फैल रही थी परंतु अंग्रेजों ने किसानों पर किसी भी प्रकार का तरस नहीं आ रहा था हूँ और जबरन कर भी वसूल रहे थे इसलिए सन 1917 में गांधीजी ने किसानों की मदद करने का समय संकल्प लिया, परन्तु गांधीजी की शर्त यह थी कि आंदोलन पूर्णतः अहिंसक होगा | परन्तु कृपलानी के द्वारा कुछ हिंसा हुई , शांतिभंग भंग हुई इस कारण उन पर ब्रिटिश हुकूमत ने प्रकरण दर्ज कर दिया जुर्माने की राशि ₹40 थी परन्तु कृपलानी जी यह राशि जमा नहीं कि और 15 दिनों तक जेल में सजा भुगतनी पड़ी चंपारण आंदोलन में राजेंद्र बाबू भी शामिल थे

बाद में इस आंदोलन में गांधीजी के लिए भी गिरफ्तार कर लिया गया परन्तु अंग्रेजी न्यायाधीश ने गाँधीजी को इसलिए रिहा कर दिया क्योंकि उनके द्वारा आंदोलन की अनुमति ली गई थी,परन्तु गाँधीजी की निगरानी के लिए एक अंग्रेज अधिकारी नियुक्त कर दिया|

आंदोलन में गांधीजी को मारने का षड्यंत्र किया गया इसमें मोतीहारी नील फैक्टरी के मैनेजर डब्ल्यू एस इरविन ने खानसामा के लिए लालच दिया, परन्तु खानसामा बतख मियां ने षड्यंत्र के बारे में ''राजेन्द्र बाबू'' को बता दिया, इस प्रकार खानसामा ने गाँधीजी की जान बचाई बाद में ब्रिटिश हुकूमत ने बतख मिया को नौकरी से निकाल कर जेल भेज दिया|

रोलट कानून 1918 एवं जलियांवाला बाग1919

1916 से लगातार अंग्रेजों के खिलाफ़ अहिंसक रूप से आंदोलन किए जा रहे थे एव भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को जन साधारण जनता से जोड़ दिया गया था| यही वजह है कि आंदोलन धीमे धीमे सारे देश में फैल रहा था अंग्रेजों की नीतियों को विरोध हो रहा था. उनकी दमनकारी नीतियों विदेशों में भी प्रचारित किया जा रहा थी | इसलिए दमन करने के लिए एक ऐसे कानून की आवश्यकता थी जिसकी सुनवाई किसी न्यायालय में भी न हो सके और ऐसा ही कानून उन्होंने तानाशाही रवैया बनाया किसको रॉलेट एक्ट के नाम से भारतीय इतिहास में जाना जाता है इस कानून मैं यह लिखा था कि कोई भी भारतीय अपने बचाव में अभिव्यक्त नियुक्त नहीं कर सकता और न ही न्यायालय में अपना पक्ष रख सकता है उसको सीधे गिरफ्तार कर कारागार में डाल दिया जाता था गाँधीजी ने इसका विरोध भी अहिंसक तरीके से किया और उनका साथ न केवल हिंदुओं ने दिया बल्कि बड़ी तादाद में मुसलमानों ने भी भाग लिया जगह जगह हड़ताल की गई मोर व्रत रखे गए और हिंदी तथा मुसलमानों ने एकता का परिचय देकर अंग्रेजों को हिला दिया होना चाहिय

हिंदू मुस्लिम एकता को तोड़ने के लिए अंग्रेजों ने चालाकी से दंगे भड़का दिए दोनों वर्गों पर अत्याचार किए गए जबकि दोनों ही शांतिपूर्ण तरीके से काले कानून का विरोध कर रहे थे पंजाब के बगीचे में एकत्रित भीड़ पर बिना कोई सूचना दिए जनरल डायर ने गोलियां चलवा दी और इसमें भाग लेने वाले हजारों लोग मारे गए जो बच गए उनके लिए अंडमान निकोवर कि सेल्युलर जेल भेज दिया गय

बाद में ''उधम सिंह'' इंग्लैंड जाकर जनरल डायर की हत्या कर बदला लिया


हिंदू मुस्लिम एकता का समर्थन(1919)

ब्रिटिश हुकुमत के द्वारा बगदाद के खलीफा के कुछ धार्मिक अधिकारों को कम कर दिया था एवं उन पर कई प्रतिबंध लगा दिए थे इससे मुस्लिम देशों में एक मुसलमानों में इतने भेज दिया असंतोष व्याप्त हो गया था भारत में भी ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ़ मुसलमान मुसलमानों ने एकत्रित होकर अंग्रेजों के विरुद और उनकी नीतियों के खिलाफ़ भारत में आन्दोलन चलाया यह आंदोलन अली बंधुओं के द्वारा चलाया जा रहा था

गांधीजी के लिए हिंदू मुस्लिम एकता को कायम करने के लिए इससे अच्छा अवसर नहीं था| यही वजह रही कि मुसलमानों का गाँधीजी ने समर्थन किया| एवं अंग्रेजी हुकूमत खिलाफ़ कांग्रेस का समर्थन दिलवाया, खलीफा के अधिकार वापस करने के लिए अंग्रेजों पर दबाव बनाया


पहली खादी भंडार दुकान की स्थापना

इसी आन्दोलन में पहली बार मौलाना अब्दुल कलाम आजाद से 18 जनवरी 1920 को मुलाकात हुई थी, एवं गांधीजी ने पहली बार जनवरी 1921 में मुंबई में खादी भंडार की दुकान की स्थापना की थी ताकि स्वदेशी को अपनाया जा सके और 1 अगस्त सको भारत के हर स्थान पर विदेशी वस्तुओं को जलाकर अपना बूथ जताया इसमें सभी वर्गों के लोगों ने बढ़ चढ़कर भाग लिया इसी समय गांधीजी ने टोपी का त्याग कर जीवन भर लंगोटी पहनने का संकल्प लिया

गाँधी के द्वारा अंग्रेजों का असहयोग करना(4 अप्रैल1920)

कांग्रेस अधिवेशन ''कलकत्ता'' में गांधीजीने अंग्रेजों की नीतियों का विरोध किया और किसी भी तरह उनको सहयोग नहीं करने का प्रस्ताव अधिवेशन में पारित कराया क्योंकि ब्रिटिश गवर्नमेंट के द्वारा भारत को बर्बाद करने की नीतियाँ लगातार बनाई जा रही थी इसलिए उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के जैसे ही अहिंसावादी सत्याग्रह प्रारंभ किया गांधीजी ने यह ऐलान भी किया कि हम किसी भी तरह से विदेशी सरकार से संबंध नहीं रखेंगे| अदालतों एवम भारतीय वकील स्कूल कॉलेज जैसी सभी संस्थाओं का परित्याग करेंगे ओर इसके स्थान पर स्वदेशी अपनाएंगे जिससे कि आर्थिक रूप से ब्रिटिश हुकुमत को नुकसान हो सके| सारे हिंदुस्तान में लोगों के द्वारा आंदोलन किए जा रहे थे ओर इन आंदोलनों का दमन ब्रिटिश हुकुमत तानाशाही से कर रही थी|

1922 को गोरखपुर के चोरा चोरी नामक स्थान पर पुलिस चौकी में तैनात 23 सिपाहियों को उग्र भीड़ ने जिंदा जला दिया था इस वजह से गांधीजी के विरुद्ध एक प्रकरण दर्ज हुआ इस प्रकरण में गांधीजी को सजा सुनाई गई

चोरा चोरी कांड के नायक रमापति चमार थे 2 फरवरी 1922 को चोर चोरी के थानेदार गुप्तेश्वर सिंह ने एक भगवान दास नामक दुकानदार को बुरी तरह पीटा था एवं उसको भद्दी भद्दी गालियां दी थी ये गुप्तेश्वर अंग्रेजों का गुलाम था इस अन्याय के विरोध में सात तारीख बाजार बंद रखा गया रमापति चमार के नेतृत्व में 5000 सै दलितों ने विरोध किया था| लोग यह भी कहते हैं कि गांधीजी ने यह आंदोलन इसलिए समाप्त कर दिया था कि आंदोलन की कमान दलितों के हाथ में जा रही थी परन्तु एक इतना सत्य है यह कहा नहीं जा सकता हें| रमापति चमार फांसी के फंदे पर लटकाया गया| गाँधीजी ने अपना पुरस्कार सर की उपाधि अंग्रेजों को विरोध स्वरूप वापस कर दी|

स्वराज दल की स्थापना 1923

ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ़ हिंदुस्तान में गांव- गांव, गली -गली आंदोलन चल रहे थे| और ऐसा लग रहा था कि अंग्रेज देश छोड़कर चले जाएंगे परंतु इसी समय गांधीजी ने चोरी चोरी प्रकरण के बाद जिसमें 23 जवानों को कुछ दलितों ने जिंदा जला दिया था इस घटना से दुखी होकर उन्होंने असहयोग आंदोलन को वापस ले लिया गांधीजी के इस निर्णय से आंदोलनकारियों में असंतोष हुआ एवं कई आंदोलनकारी इतने दुखी हुए कि उन्होंने गांधीजी से अलग हटकर अपना रास्ता चुन लिया रु के नए दिल की स्थापना की जिसकों स्वराज दल कहा जाता है इसकी स्थापना करने वाले मोतीलाल नेहरू एवं चितरंजन दास थे जो दुखी होकर कांग्रेस छोड़ कर स्वराज दल की स्थापना की थी यह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का पहला विभाजन था परस्पर मतभेद के कारण अंग्रेजों के खिलाफ़ चल रही मुहिम धीमी गति आ गयी|

गाँधी जी द्वारा क्षमा याचना(1924)

गाँधीजी को ऐसा लग रहा था कि उनके द्वारा चलाई गई मुहिम में जाने अनजाने में कई लोगों को पीड़ा हुई जिसमें अंग्रेजी भी शामिल थे और कई लोगों की आंदोलन के दौरान हत्या हो चुकी थी इससे गांधीजी बहुत दुखी थे और उनको लगातार आप मिलानी हो रही थी इस पीड़ा से उबरने के लिए उन्होंने 18 सितंबर 1924 21 दिवस का उपवास क्या और पहली बार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बेलगाम सम्मेलन के अध्यक्ष नियुक्त हुए इसके पहले और बाद में कभी भी गाँधीजी कांग्रेस के अध्यक्ष नहीं रहे|

गाँधी जी ने लिया,''स्वतंत्रता दिवस'' मनाने का संकल्प1930

गाँधीजी असहयोग आंदोलन के बाद पुनः सक्रिय हुए , उन्होंने 26 जनवरी 1930 को पहली बार प्रति वर्ष स्वतंत्रता दिवस मनाने का संकल्प लिया और यही वजह रही कि 26 जनवरी के दिन ही भारतीय गणतंत्र को चलाने के लिए संविधान लागू किया गया| जिससे कि आने वाली पीढ़ियों को यह ज्ञात हो सके कि आजादी का संकल्प कब लिया गया था इसमें ये नहीं कहा जा सकता कि इसके पहले कभी आजादी का संकल्प नहीं लिया गया था|

सविनय अवज्ञा आन्दोलन(1930)

ब्रिटिश हुकुमत के द्वारा लगातार जनविरोधी नीतियों एवं कानून बनाए जा रहे थे इसका विरोध करने के लिए साबी ने अवज्ञा आंदोलन गांधीजी ने पुन प्रारंभ किया की हम आपके हर आदेश का पालन नहीं करेंगे, विनम्रतापूर्वक ही कानून को तोड़ेंगे यही कारण कारण रहा कि नमक पर लगने वाले टैक्स को तोड़ने का निश्चय गांधीजी ने लिया और इस आंदोलन को पुनः जन साधारण लोगों से जुड़ने का प्रयास किया गया 13 मार्च 1930 को दांडी यात्रा की गई इसमें सभी धर्मों के लोगों ने हिस्सा लिया 5 मई 1930 को गाँधीजी ने गुजरात की दाडी नामक स्थान पर पहुंचा नवकार को थोड़ा और बाद में 4 मार्च 1931 को गाँधी